चारण साहित्य का इतिहास – छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान)

(ख) आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य

१. प्रशंसात्मक काव्य (सर):- आलोच्य काल में प्रशंसात्मक काव्य को (सर) कहा जाने लगा। ‘सर’ आदर-सूचक अंग्रेजी शब्द है जिसका अर्थ है- ‘श्रीमान’। इसका प्रचलन पाश्चात्य शिक्षा के कारण हुआ। इसके रचयिताओं ने विशिष्ट राजाओं, जागीरदारों एवं महापुरुषों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। राजाओं एवं जागीरदारों के विषय में जहां एक ओर वीरता, दानशीलता, कृतज्ञता, तेजस्विता एवं प्रभुता के दृष्टान्त मिलते हैं वहां दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वार्थ-भावना के वशीभूत होकर भी छंद-रचना की गई है। इसके अतिरिक्त कुछ कवि ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने अपने गुरुजनों के श्रीचरणों में नत मस्तक होकर काव्य का उपहार समर्पित किया है।

वीरता का गान करने वाले कवियों में वांकीदास, महादान, आवड़दान, मानजी, चंडीदान, रायसिंह, बुधसिंह एवं चिमनदान का प्रमुख स्थान है। वांकीदास कृत ‘सुपह छत्तीसी’, ‘भुरजाल भूषण’, ‘जेहल जस जड़ाव’, ‘सिद्धराव छत्तीसी’, ‘मान जसो मंडन’ एवं ‘श्री दरबार रा कवित्त’ नामक रचनायें प्रशंसात्मक हैं किन्तु इनमें कवि का ध्यान व्यष्टि की ओर कम तथा समष्टि की ओर अधिक है। इतना होते हुए भी कहीं-कहीं वह परोक्ष रूप से व्यक्तिगत प्रशंसा करने लग जाता है। मारवाड़ के महाराजा जसवन्तसिंह (प्रथम) की प्रशंसा में कवि ने कहा है-

जितै जसो पह जीवियो, थिर रहिया सुरथांण।
आंगल ही अवरंग सूं, पड़ियो नह पाखांण।।

इसी प्रकार राव राठौड़ अमरसिंह (नागोर) के लिए-

हणियौ तै जम दाढ हथ, रोद सलाबत रेस।
साहजहां रो सोंकियो, अंबखास अमरेस।।

महादान ने सुल्तानसिंह (नीमाज) , मानसिंह (जोधपुर) एवं भीमसिंह (उदयपुर) की वीरता पर अनेक छंद लिखे हैं। लालसिंह (बड़ली) के लिए-

वांका आखर बोलतो, चलतो वांकी चाल।
झड़िया वांकी षाग झटा लड़ियो बांको लाल।।
यो कहतो लालो अषर, दूलावत डाढाल।
जीवत गढ़ सूंपे जिका, गढपतियां ने गाल।।
मिले बिळाला भिजलसां, गढपत झालां गोड।
दूलावत अमलां नणा, रंग लाला राठौड़।।

आवड़ ने जोगीदास (मारवाड़) की वीरता का वर्णन इस गीत में किया है—

फौजा घेरियो गढ आंण फलोदी बीरत षाग बजावे।
छत्तपत्तां रिणमाळां छोगो, जोजो भाग न जावे।।
रावळ साथ कटक रा जोरां, टूका दळ रजधांणी।
पाखरियां नाहर गढ पैठां, मार हथो मुक नाणी।।
झाटक कोट हुवा जूंझावो, रथ भाराथ रूचाळो।
पडियां सीस पछै पालट सी, अनड़ फलांदी वाळो।।

मानजी ने कुंवारी कन्याओं के द्वारा भवानी की स्तुति के रूप में महाराजा मानसिंह की वीरता का प्रभाव इस गीत में व्यक्त किया है-

पूजन कर गवर तणां पग पूजै, जग अरियां सह धिया जपै।
जां सिर बैर मन ऊछजियो, ओ गिरजा मत पिया अपै।।
सगती बचन सचा सुण लीजै, अरज मनीजै गवर इती।
खल ज्यां शीश विजाहर षीजै, बर मां दीजै बीस हथी।।
झाट षगां जिण सूं कुण झालै, दुयण उघालै गवण दहै।
सुत गुमनेस जिकां उर सालै, किम हालै घर वास कहै।।
चौकस आस किसी चुड़ला री, कहो री अबै सुहाग किसो।
देबी इसो भरतार न दै री, जिण सिर बैरी मान जिसो।।

महाराणा भीमसिंह (उदयपुर) की वीरता के लिए मानजी का कथन है-

रसियो तल लाडो रहै, है आडो हिंदवांण।
जाडो थट जोधाहरो, जुध गाडो जमरांण।।
जुथ गाडो जमरांण, छवीलो छत्रपति।
जलहळ भूखण जोख, भाग भळहळ रती।।
चन्दा बदन निहार दसू दिसियां चहै।
रसियो राणे राव, हिये वसियौ रहै।।

चंडीदान ने महाराजा बलवन्तसिंह, गोठड़ा (बूंदी) की वीरता के लिए ये सोरठे लिखे हैं-

पढियौ तुरकां पीर, देव कळा जिम हिन्दवां।
बळवंत जेहा वीर, हुवा न कोई होवसी।।
लोहां बळ हट लाग, पग २ दोयण पाड़िया।
अंगरेजां उर आग, बाळी भली बळूंत सी।।

रायसिंह ने सलूंबर (मेवाड़) ठिकाने के रावत केसरीसिंह की वीरता का वर्णन इस दोहे में किया है-

जे केहर नह जनमतो सुरियंद पदम सुजाव।
पकड़े हाथ पराणियां, हळ हाकत उमराव।।

बुधसिंह ने गीत ‘नरसिंहगढ़ महाराजा हणवन्तसिंहजी रो’ में अपने आश्रयदाता की प्रशंसा करते हुए लिखा है-

नर नाहर सोभाग नृप, तवा अचळ वड तोल।
राजै जिण गादी रिधू हणवंत गुणां-हरोळ।।

इसी प्रकार-

डंड अडंडा नित दियण, खंडण खळां खतंग।
मंडण कुळ हणवंतसी, सुभटां लियां सुचंग।।

चिमनदान कृत ‘जसवंत-पिंगल ‘, ‘ प्रागराव रूपक ‘, ‘लिछमण-विलास’ एवं ‘श्री रामदे-चरित’ नामक काव्य-ग्रंथ प्रशंसात्मक है। यद्यपि पहला ग्रंथ छंद-शास्त्र का है तथापि इसमें जोधपुर-नरेश जसवंतसिंह (द्वितीय) की प्रशंसा के पुट दिये गये हैं। महाराजा की वीरता के लिए कवि का कथन है-

जसवंत बळवंत, गुणवंत महाराज।
वर वीर मन धीर कंठीर सिरताज।
कुळ लाज भुज आज कवराज दुखकाप।
इळ सज्ज वडलज्ज कमधज्ज धिन आप।।

भोपालदान, किसना, तेजराम, चिमनदान एवं लक्ष्मीदान ने दानशीलता का वर्णन किया है। सीसोदा गांव से पुरस्कृत किये जाने पर किसना ने महाराणा भीमसिंह (उदयपुर) की प्रशंसा में जो गीत लिखा, वह इस प्रकार है-

कीजै कुण-मीढ न पूजै कोई, धरपत झूठी ठसक धरै।
तो जिम ‘भीम’ दिये तांबा पत्र, कवां अजाची भल करै।।
षटके अदत खजांना पेट, देतां बेटां पटा दिये।
सीसोदौ सांसण सीसोदा, थारा हाथां मौज थिये।।
मन महारांण धनौ मेवाड़ा, दाखै धाड़ा दसूं दसा।
राजा अन बाँधे रजवाड़ा, तूं गढवाड़ा दिये तसा।।
अधपत तनै दिया रौ अंजस, लोभी अंजस लियारौ।
भांणै साच जणायौ ‘भीमा’, हाथां हेत हिया रौ।।

भोपालदान के इस दोहे में महाराजा मानसिंह (मारवाड़) की दानवीरता है-

करी हमाली कौल, कासीदी, बावन करी।
तें मांना नभ तोल, ब्रवी जिका धर वीदगो।।

तेजराम ने महाराणा जवानसिंह (उदयपुर) की दानवीरता के लिए यह गीत लिखा है–

चोड़ा उराटां नराटां जे भुरज्जा तोड़ा धकै चाढ, नाळी जंत्र जोड़ दो-क-तसाळां नवांन।
राखवा भुमत्थां कत्थां गुणां जोड़ा हूंत रीजे, जोड़ा भांण रत्था घोड़ा समापै जवांन।।
अयाळां सलंबी काच हुलबी को माच अंगा, लंबी धावा धार अंबी ऊपरा लेबाह।
प्रलंबी तराजां झंबी झांप लेता दीधा पातां, बाजा हेम साजा कीधा झलंबी वेबाह।।

बिलाड़ा के उदार, गुणग्राही एवं साहित्य-प्रेमी अधिपति लक्ष्मणसिंह दीवान (मारवाड़) से एक सुन्दर घोड़ी एवं स्वर्ण के कडे मिलने पर चिमनदान ने चुटकी लेते हुए लिखा है-

उर चौड़ी दौड़ी उड़ै, डीघोड़ी मृगडांण।
गज मोड़ी तोड़ी गढ़ां, दी घोड़ी दीवांण।।
मासे में हाथी मढ़ै, ज्यैरी पड़ै न जांण।
कारीगर उणरा किया, दिया कडा दीवांण।।

लक्ष्मीदान ने मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के लोड़ते ग्रामवासी भाटी गुलसिंह के लिए कहा है-

तन मन हेतू ताकवों, गायक सुजस गुलाह।
तोने रंग भीमै तणा, खटरित गेह खुलाह।।

वीर दाता के रूप में चिर प्रख्यात है। अत: कहीं-कहीं वीरता एवं दानशीलता की प्रशंसा एक साथ देखने को मिलती है, जैसे वाँकीदास, रायसिंह, तेजराम एवं चिमनदान के फुटकर छन्दों में। बाल्यकाल में रायपुर ठाकुर राठौड़ अर्जुनसिंह (मारवाड़) ने वांकीदास के लिए शिक्षा एवं निवास स्थान का समुचित प्रबन्ध किया था। इन उपकारों से प्रभावित होकर कविराजा ने यह दोहा कहा है-

रवि रथ चक्र गणेश रद, नाक अलंकृत नार।
यूं हिज हक इळ पर अजो, दीपै सूर दतार।।

रायसिंह ने मूंडेटी (ईडर) के ठाकुर सूरजमल चौहान के लिए कहा है-

अरक कहै सांभळ उरण, हाकल खड़े व्रहास।
समपे देसी सूजड़ो, छोड़े रथ सपतास।।

तेजराम का महाराणा जवानसिंह (उदयपुर) वीर है और दानी भी-

राती चखां अमेळो जंगाळी चडां छाती रोप, साथं जियां सुमेळो बधावै हेकै साथ।
सूना बैर जगातो बेरियाँ हूँ न करै जाती, ना करै बंदगी जाती भूरो प्रथीनाथ।
जाङै भाग भीमाणी प्रत्प्पो दळां-जाड़ी-जोड़, लखां बीजा अणी पांणी सौ भाग लैसोत।
प्रथीनाथ थारा बेहूँ ऊधरां सभावां परां, दुजाला वार रा वांरू आजरा देसोत।।

इसी प्रकार चिमनदान कृत ‘जसवंत-पिंगल’ नामक ग्रंथ में जोधपुर-नरेश जसवंतसिंह (द्वितीय) के लिए कहा गया है-

तखतेस नंद क्रोधार तेम, जुधवार भद्र वीरांण जेम।
जसवंत सींह प्रथमाद जीप, दुनियंद वंस दातार दीप।।

कृतज्ञता के उदाहरण वांकीदास एवं रामनाथ नामक कवियों में देखने को मिलते हैं। जब बड़े होने पर वाँकीदास को यथेष्ट कीर्ति प्राप्त हुई तब एक दिन वे महाराजा मानसिंह के साथ हाथी पर चढ़े हुए कहीं जा रहे थे। इतने में अर्जुनसिंह मिल गये। उन्होंने कविराजा से पूछा कि आपको पुराने प्रसंग की याद है या नहीं। इस पर कवि ने कहा-

माळी ग्रीखम मांय, पोख सुजळ द्रुम पाळियो।
जिण-रो जस किम जाय, अत घण ____ ही अजा।।

बंदीगृह से मुक्ति दिलाकर पुन: अपना गाँव दिलाने वाली शाहपुराधीश की बहिन एवं अलवरेन्द्र की माताश्री रूपकुँवरजी के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए रामनाथ का यह सोरठा-दोहा उल्लेखनीय है-

तैं आया नभ तोल, कवी जँजीरां काढियो।
मोनै लीधो मोल, शाहपुरै शीशोदियै।।
रूपकँवरि निज रीझ रो, अचरज कासूं आण।
शाहपुरौ पीहर सरस, नान्हाणा वीकाण।।

भोमा ने बीकानेर-नरेश रतनसिंह की तेजस्विता का वर्णन इन शब्दों मे किया है-

सधर रतन इळ सोहियो, कमंधा पत बीकाण।
तै पाट प्रतपै रतन सा, भूपतियां वंस भाण।।
ऐवासां नरपत अरस, रहत सलूणै रंग।
त्रेता सतजुग ने कहै, विध किण आ वीरंग।।

राजा-महाराजाओं की प्रभुता का वर्णन करने वाले कवियों में रामदान, नाहर एवं चिमनदान के नाम उल्लेखनीय हैं। रामदान ने गणगौर के शुभ दिवस पर महाराणा भीमसिंह (उदयपुर) के राजसी ठाट-बाट का वर्णन इन शब्दों में किया है-

असंक सेन आरम्भ बोल नकीब बळौबळ।
गहर थाट गैमरां चपळ हैमरां चळो बळ।।
भाळ तेज भळहळै ढळै बिहुँवै पख चम्मर।
दिन दूलह दीवाण ए चढ़ियौ छक ऊपर।।
तिण वार आप दरियाव तट विडग छंडि जगपति बियौ।
दीवाण भीम गणगौर दिन एम रांण आरम्भियौ।।

बुधसिंह कृत जसवन्तसिंह (जोधपुर) के विवाहोत्सव के उपलक्ष में लिखा यह गीत देखिये-

इसो करतां विवाह आब घराणे चढ़ाय ऊभो,
दांन लखां देर ऊभो कविदां दीवाँण।
भांमी-करां अगंजीत कीरती कहाड़ ऊभो,
माठों मांण गाळ ऊभो बिजाई खूंमाण।
आंटीला देसोत छोलां इन्द्र वाळी देर ऊभो,
लाखां मुखां प्रभा लेर ऊभो गुणाँ लोड।
आकारीठ सोभाग सुजाब माठी वेर ऊभो,
वाढ खेर ऊभो पातां दळद्रो वितोड़।
उजाळा वंसरी रीझां ताकवां समाप ऊभो,
गाल ऊभो अदत्तारों सान गाढ़ेंराव।
अनमी ऊमटो-नाथ नीर पखां चाढ ऊभो,
महावीर लाखों दांन दे ऊभो अमाव।
आचार जीतरा खत्री ढोलड़ा वजाय ऊभो,
करै ऊभो अखी वसू ढोलड़ा कंठीर।
अचळेस-हरा रोर रूप मनो तोड़ ऊभो,
हणुतेस झोका-झोका झोका हेळांरा हमीर।।

नाहर ने दूणी राव लक्ष्मणसिंह (जयपुर) के घोड़े के विषय में निम्न गीत लिखा है-

महाबाह कछवाह तप अधिक आपै मरद, अश्व अणथाह वपु बळ अरोड़ो।
सम बड़ाँ भाल रो तिलक जीवे सरो, घणै छक बालरो तिलक घोड़ो।।
राव क्रामत अघट प्रकट लीधां रती, सोह उळट पळट सुघर साजाँ।
पुहिमि सबळाँ मुकट पाट दूणीं पती, बणैं असि मुकट घट सिरे बाजा।।
सपूताचार लखि लहै आणंद सयण, करै बहु छन्द मग गहै कुरगाँ।
हजारां भडां तुर रो फबै चंदहर, तुरंग तुररा फबै भुयण तुरगां।।
ढाल ढूंढाड़ पिसणाँ घड़ा ढाहणो, साहणो झंप गज धजाँ साजी।
राम सिय कृपा जुग कोड़ कायम रहो, तरण कुळ लछो दल रूप ताजी।।

चिमनदान कृत ‘प्राग राव रूपक’ में भुज नरेश राम देशलजी के पुत्र प्रागराव का यह वर्णन आकर्षक है-

गाढ़ा गढ़ काठ बुरज गज गीरिय, कांठळ सोव्रन महल कळा।
झगमग नग हीर झरोखाँ झंखत, पखालं थंमा प्रथळा।।
अधकर असमांन कंगोरां ओपम, जांण श्रृंग गिरमेर जिसो।
रूपग चित भाव चाव राजेसुर, आज प्राग महाराव इसो।।
जाजम पचरंग रंगबहु जाझिय, सेत चांनणी जेथ सदा।
राजत जिण सीस दलीचा रेसम, मिसरू तकिया है उमदा।।
सुरियंद पौसाख सुहै इम सोभा, जांणक आफू खेत जिसो।
रूपग चित भाव चाव राजेसुर, आज प्राग महाराव इसो।।
केसरं छिड़काव अंतर हुय कादव, जांणक भादव मास जळं।
जातां जुग क्रीत कबू नह जावै, पावै मत पातां प्रघळ प्रघळ।।
हूकळ रंग राग रंभ नाटक हुय, जांण तखत है इन्द्र जिसो।
रूपग चित भाव चाव राजेसुर, आज प्राग महाराव इसो।।

चिमनदान कृत ‘लिछमण-विलास’ में राजा लक्ष्मणसिंह दीवान (मारवाड़) का यह प्रभाव अतिरंजनापूर्ण होते हुए भी आकर्षक है-

पूजत जोधांण उदैपुर पूजत, पूजत धर जेसाँण परा।
पूजत जयनगर अजैपुर पूजत, नरपत पूजत सोय नरा।।
पूजत बीकांण जांण वावलपुर, पांण कळा सगती प्रगटै।
लिछमण दीवांण राण बीलाड़ै, रंग सुजस दुनियाँण रटै।।

सायबदान, इन्दा एवं रिवदान का सर-काव्य दूसरे ढंग का है। इन कवियों ने कविता के माध्यम से अपने लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयत्न किया है। यथा गंभीरसिंह (ईडर) से कोई पुरस्कार न मिलने पर सायबदान की यह उक्ति देखिये–

मैं जग दातार जांण कवत तीन सै बणाया।
सुण रूपग हेत सूं फेर महाराज फरमाया।।
मैं तूठा तो शीश झूठ इण में मत जाणै।
माजां झड़मांडसां कड़ा मोती केकांणै।।
आपसा एक सासण अवल, दूनी सरब कहसी दियो।
नर अवर कूप जांचूं नहीं, भूप मोहा देधि भेटियो।।

और भी-

दिल धरियो विसवास करि सेवा त्रण वरसां।
पारस ने परहरे अवर पाखांण न परसा।।
माळी घड़ा हजार सदा सींचे जिम जाणै।
रूत आया फळ होय सुबा अगलो ऊषाणै ।।
ज्यू जाण करि सेवा अठे, मम उणत अजहू न मरी।
तुम दोष नहीं अण देस तणा, नहचै वात नसीब री।

अपने पूर्वजों के हाथ से बासनी गांव निकल जाने पर इन्दा ने महाराजा मानसिंह को जो कविताबद्ध प्रार्थना-पत्र दिया, उसका नमूना इस प्रकार है–

बतन आद ईहगां बड़ी मरजाद बतावे।
साख एक सांवणू एक सौ रूपिया आवे।।
खून अमे खालसै किणी कारण कर दीवी।
समय आप मुस्सद्दियां दाय आयां लिख दीवी।।
थेट री हुती सांसण थकां, अवर के पटे उदासणी।
महाराज मान दीजै मने, बिजमल बीजा बासणी।।

अपने भाइयों के द्वारा सताये जाने पर रिवदान गीत के रूप में एक प्रार्थना-पत्र लेकर मानसिंह की शरण में पहुंचे और उनसे न्याय की याचना की–

अस अप्रबळ भवस कळपतर आयरा, जीवन गयो समेत जड़।
उडिया अनड़ पंख ज्यूं ईहग, विन कज सेवन किया वड़।।
गढ़पत हूँ संपात तणीगत, पावां आयो जगत पत।
हर माहेस तणा कब हंसा, मानसरोवर ढेल मत।।
पारस राकां गयो पला सूं, केहर हर जस वास कर।
जगपत अमां न टावै तूं जद, धर पर दूजी किसी धर।।
चीलां गुण न तजे द्रुम चंदण, माछां गुण ना तजे महण।
मोटा धणी अबे तो मांना, पर पाळे बड़ा पण।।
आषां काट गयो पत पीरां, आंषा मन लो ईसवर।
तू ले ठीक न लेही तारग, षेड़ेचा म्हारी षबर।।

ब्रह्मानन्द ने अपने गुरु के प्रति आभार प्रदर्शित किया है। स्वामी सहजानन्द से प्रथम बार भेंट होने पर ब्रह्मानन्द का यह आंतरिक आनन्द, उत्साह एवं उमंग दृष्टव्य है-

आज नी घड़ी रे, धन्य आज नी घड़ी, मैं निरख्या सहजानन्द, धन्य आज नी घड़ी।।टेक।।
काम क्रोध ने लोभ विषे, रस न सके नड़ी, भाव जीती मूर्तीपाटा, हृदय मां खड़ी रे।
जीवन बुद्धि जाणी न सके मोटी अड़ी सदगुरु नी दृष्टि जोता वस्तु जड़े रे।
चोर्यासी चहु खाण मां हुंतो, थाल्यो आपड़ी अन्तर हरि सूं एक तालारे, दुगधा दूर पड़ी रे।
ज्ञान कुंची गुरू गम थी, गयां ताळां उधड़ी, लाडू सहजानंद-नोहाळतां हरी आखंडी रे।।

२. निन्दात्मक काव्य (विसहर):- ‘सर’ विहीन कविता को ‘वीसर’ कहते हैं। आजकल इसके लिए ‘विषहर’ शब्द भी प्रयुक्त हुआ है। इस काव्य को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक वर्गगत, जिसके अन्तर्गत समाज को सम्बोधित करते हुए उसकी बुराइयों का भण्डा-फोड़ किया गया है और दूसरा व्यक्तिगत, जिसके अन्तर्गत किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य करके उसकी धज्जियाँ उड़ाई गई हैं। इससे वर्ग एवं व्यक्ति दोनों को सुधरने का अवसर मिला है किन्तु जहां व्यक्ति-विशेष की निन्दा में स्वार्थभावना आ गई है वहां कविता अपना मूल्य खो बैठी है।

वांकीदास वर्गगत निन्दात्मक काव्य के प्रतिनिधि कवि हैं। उनकी लिखी हुई लगभग एक दर्जन रचनाएं इसी कोटि की हैं जिनमें ‘वैसक वार्ता’, ‘मावडिया मिजाज’, ‘कृपण दर्पण, ‘ ‘चुगल मुख चपेटिका’ एवं ‘कृपण-पचीसी’ मुख्य हैं। इनमें तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों को दूर करने की चेष्टा की गई है। ये रचनाएं कवि के ज्ञान एवं अनुभव की द्योतक हैं। उपदेश प्रधान होते हुए भी इनमें ध्वंसात्मक के स्थान पर सृजनात्मक प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं। कवि ने दुर्जनों, कायरों, पूँजियों, कुकवियों, चुगलखोरों आदि के स्वभाव-लक्षण स्पष्ट करते हुए उनकी कड़ी भर्त्सना की है किन्तु भावावेश में कहीं-कहीं वह इतना आगे बढ़ गया है कि साहित्यिक शिष्टाचार का उसे ध्यान नहीं रहता। ऐसे स्थल न्यून होने से उसकी रचना में ऊँची रुचि और ऊँचे आदर्श पाठकों का ध्यान बरबस खींच लेते हैं। ‘मावडिया मिजाज’ में स्त्रैण एवं जनानखाने में घुसे रहने वालों के लिए कहा गया है-

मावड़िया अंग मोलियां, नाजुक अंग निराट।
गुपत रहे ऊमर गमै, खाय न निजबल खाट।।
नैणा रा सोगन करै, भै माने सुण भूत।
रामत ढूलांरी रमै, रांडोली रा पूत।।
प्रगटे वाम प्रवीण रो, नर निदाढियो नाम।
नर मावड़िया नाम त्यूँ, बिना पयोधर वाम।।
कर मुख दे लचकाय कर, झमक चलैसुर झीण।
मावड़ियो महिला तणी, मारे रोज मलीण।।

इसी प्रकार ‘कृपण दर्पण’ में कृपण को आड़े हाथ लिया गया है-

कृपण संतोष करै नहीं, लालच आड़े अंक।
सुपण बभीषण सूं मिलै, लिये अजारे लंक।।
कृपण सन्तोष करै नहीं, सोमण जाणौ सेर।
कर टांकी ले काट हीं, सुपना मांहि सुमेर।।
कृपण हुवै मर कुंडली, संपत बांटे नांहि।
कहियो चोड़ै कुंडली, मरता भारथ मांहि।।
करतब नह राजी कृपण, राजी रूपैयांह।
कडबो दास कुटंबियां, प्रामणड़ाँ पइयाँह।।

वांकीदास के सदृश लच्छीराम, कृपाराम एवं किसना भी वर्गगत निन्दा के पक्षपाती है। लच्छीराम ने नाथ-पंथियों को आड़े हाथ लिया है। नाथों के यह कहने पर कि हम तो जीविका प्रदान करते हैं अत: बुराई करना बंद कर दो, कवि ने यह दोहा सुनाया था-

जाचे लच्छो जोधपुर, जयपुर जाच न जाय।
चारण और न जंचही, सिंघ घास न खाय।।

जो लोग शरीर में थोड़ा सा भी दर्द होने पर अपनी दुर्बलता जताकर तरोताजा पकवान खाने की इच्छा करते हैं, उनके विषय में कृपाराम का कहना है-

घोंचो लागां घाव, घी गेहूं भावे घणा।
अहड़ा तो अमराव, रोट्‌यां मूंघा राजिया।।

किसना ने इन लोगों से दूर रहने की सलाह दी है-

चाकर चोर कुचीत कुचळ अस राव क्रमंतो।
व्रछ पान फळ बिन्न दान विणन्न पत अदत्तो।।
पूत कपूत पिटाक ठोठ कविराज ठगा रो।
खोटी दाम कुमंत्र नाद विण अमठ नगारो।।
क्रतघणी सचिव खोड़ो दरक सत्र नेह खग संधिए।
कदेई भूल कसना सुकव ऐता वार न बंधिए।।

व्यक्तिगत निन्दा करने वाले कवियों में मायाराम, सायबदान, खोड़ीदान एवं रामनाथ के नाम लिये जा सकते हैं। मायाराम ने भाद्रार्जुन के ठाकुर सोमसिंह ऊदावत के विषय में लिखा है-

शूं माँडू रो भोमियो, हूँ कटार गढनाथ।
थारे म्हारे सो भड़ा, व़ण जासी भाराथ।।

~~क्रमशः


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