चारण साहित्य का इतिहास – छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान) – [Part-C]

५. श्रंगारिक काव्य:- आलोच्य काल में केवल वांकीदास एवं मानजी ही ऐसे कवि हुए हैं जिनमें श्रंगार की प्रवृत्ति पाई जाती है। इस दृष्टि से वांकीदास कृत ‘झमाल राधिका सिख नख वर्णन’ एवं ‘हेमरोट छत्तीसी’ नामक रचनायें उल्लेखनीय हैं। नायक-नायिका के नख-शिख वर्णन करने की पद्धति पुरातन काल से ही चली आ रही है किन्तु इसे स्वतन्त्र विषय बनाने का श्रेय वांकीदास को ही है। कवि ने यत्र-तत्र अलौकिकता का पुट अवश्य दिया है किन्तु चित्र लौकिक ही हैँ। पूज्य भावना के अभाव में राधा तो सामान्य नायिका के स्तर पर उतर आई है। उपमान रूढ़िगत भी है और नवीन भी ! कवि ने कहीं पर भी सामाजिक मर्यादा का उललंघन नहीं किया है। राधा के रूप-वर्णन में आँख, कपोल, केश आदि का वर्णन अलंकृत है। आँख का यह वर्णन कितना आकर्षक है ?-

काळी भमरावळि कळी भूँहाँ बाँकड़ियाँह।
कमळ प्रभात विकासिया, इसडी आँखड़ियाँह।।
इसडी आँखड़ियाँह किया म्रग वारणै।
सर मनमथ गा हारिक अंजण सारणै।।
खूबी न रही काय खतंगाँ खंजनाँ।
नेही ह्वै मुनिराज विसारि निरंजनाँ।।

“नेही ह्वै मुनिराज विसारि निरंजनाँ” इस खटकनेवाली उक्ति को छोड़कर यह सौंदर्य-वर्णन परम्परा युक्त होते हुए भी बड़ा मोहक बन पड़ा है। केशराशि का वर्णन भी इन विशेषताओं से विभूषित है। यथा-

सित कुसुमाँ गूंथी सुखद वेणी सहियाँ ब्रंद।
नागणि जणै नींसरी, सांपडि खीर समंद।।
सांपडि खीर समंद, दुरंग सवाँरिया।
धारा फेण कलिंद, तनूंजा धारिया।।
भाषण उपमाँ और, मनोरथ भेळिया।
मझ आटी मखतूल, कमोती मेलिया।।

इसी प्रकार कानों का यह वर्णन कितना आकर्षक है-

काँन जडाऊ कामरा, कुंडल धारण कीन्ह।
झळहळ तारा झूमका दुहुँ पाखां ससि दीन्ह।।
दुहुँ पाखां ससि दीन्ह अंधार निकंदवा।
तेजोमय रथ तास, निपात पही नवा।।
माँग फूल सिर फूल जड़ाऊ मंडिया।
खिण-खिण निरखै नाह, हिए दुख खंडिया।।

कविराजा ने बल खाती हुई पनिहारियों की विभिन्न मुद्राओं का भी बड़ा ह्रदयहारी वर्णन किया है। एक ओर तो चलने की गति से उमड़ते हए ह्‌दयस्थित हेम-कलशों की शोभा तथा दूसरी ओर सिर पर धारण किये हुए जल-कुम्भों की छवि कवि को अभिभूत कर देती है-

हेम कलश कुच जुग हिए, नीर कलश सिर लेई।
पग धर हुंता बाहडै कलश दहू कर देई।।
नष सूं लै चोटी लगै तन छवि मोह करंत।
लुल मिल केहर लंकियां लावे निर भरंत।।
लावे सर पाणी भरे गोरी गात अनूप।
ज्यो आगे पाणी भरे रंभ अलौकिक रूप।।

मानजी ने गणगौर के मेले का वर्णन करते समय स्त्रियों की सामूहिक क्रीडा का वर्णन किया है-

आय गज अलवेलियां, घुमड़े बीरह थाठ।
लग थगती लाज कलियां, नाजुक अंग निराट।।
नाजुक अंग निराट सुचंगी नारियां।
पांणी घड़ा झलोल भर पणिहारियां।।
अलबेली रंगवेली, अजेन गालियां।
लांमां लूहर गाय हंसे दे तालियां।।

और भी-

गीत झकोळे गोरियां, सुणतां लगै सुप्यार।
हींडै डोलर हींडता तीज गळै तिणवार।।
तीज गळै तिणवार ठठा लग ढोळकी।
झुक-झुक गोडी लार झणक रम झोळकी।।
पटा छूट कसबोह भमर भणके परा।
पायल ठमके पाय घमंके घूंघरा।।

६. राष्ट्रीय काव्य:- अँग्रेज अपनी सैन्य-शक्ति एवं राजनीति के बल पर राजस्थानी नरेशों को एक-एक करके अपने वश में कर रहे थे। यह देखकर कतिपय स्वतंत्रता प्रेमी नरेशों का हृदय क्षुब्ध हो उठा। अत: उन्होंने उनका विरोध किया। अंग्रेजों के साथ संधि हो जाने पर भी भरतपुर नरेश रणजीतसिंह ने जसवंतराव होल्कर को अपने यहां शरण दी और लाख प्रयत्न करने पर भी उसे नहीं सौंपा। विषम परिस्थितियों में उलझे रहने पर भी जोधपर नरेश मानसिंह ने जीवन भर अंग्रेजों को तबाह किया, होल्कर के साथ संधि की और अप्पाजी भोंसले को अपने यहां शरण दी। राज्य-गद्दी की कठिनता, सरदारों की चालबाजी एवं नाथों के उपद्रव ने उन्हें चेन की नींद न लेने दी फिर भी उन्होंने अंग्रेजों को खूब छकाया और उनकी आज्ञाओं को टालते रहे। महाराजकुमार चैनसिंह (नृसिंहगढ़), महारावल जसवंतसिंह (डूंगरपुर), हाडा बलवंतसिंह गोठड़ा (बूंदी) एवं रावत केसरीसिंह (सलूंबर) से तो युद्ध भी हुए किन्तु इन वीरों ने दासता स्वीकार नहीं की। इससे सरदारों में भी जोश आ गया और उन्होंने अंग्रेजों को तंग करना आरम्भ किया। शेखावाटी प्रदेश के बठोठ गांववासी डूंगरसिंह एवं जवाहरसिंह अंग्रेजों की डाक तथा खजाने लूटने लगे और चांपावत अभैसिंह एवं चिमनसिंह (बलूओत) नामक दो भाइयों ने भी ऐसा कर उनका साथ दिया। यदि अन्य नरेश पारस्परिक वैर-वैमनस्य एवं प्रलोभन को तिलांजलि देकर इन राष्ट्र-वीरों के साथ विश्वासघात न करते तो शायद स्थिति कुछ और ही होती। कहना न होगा कि चारण कवि इन घटनाओं से प्रभावित हुए हैं और उन्होंने इन क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की है।

इस दृष्टि से वांकीदास, नाथूराम, नवलदान, बुधजी, जवानजी, चिमनजी, गोपालदान, चैनजी, गोपालदान (भदोरा), गिरवरदान, जादूराम, चंडीदान, मोहबतसिंह, दुर्गादत्त, बुधसिंह, दलजी, लक्ष्मीदान, चंडीदान महियारिया, गंगादान, जीवराज एवं भारतदान की रचनायें उल्लेखनीय हैं। इनमें राष्ट्रीय क्रियाशीलता के प्रमुख केन्द्र – भरतपुर, जोधपुर, जयपुर, बूंदी एवं डूंगरपुर की विविध हलचलों का यथार्थ चित्रण हुआ है। अस्तु,

राजा-महाराजाओं के पारस्परिक वैर-वैमनस्य एवं उनकी ऐश्वर्य प्रियता के कारण धरती माता शनैः-शनैः पराई होती जा रही थी। यह देखकर स्वदेश प्रेम विह्वल कविराजा वांकीदास का हृदय जलने लगा। बिना युद्ध के अंग्रेजों के आगे नतमस्तक होना उन्हें बहुत बुरा लगा। अत: उन्होंने ओज भरी वाणी में इन बाहुबलियों की भर्त्सना की और उन्हें स्वाभिमान एवं कर्त्तव्य के लिए ललकारा। यह लक्ष्य करने की बात है कि भारतेंदु बाबू हरिश्चन्द्र से भी पूर्व कविराजा ने स्वाधीनता के लिए शंखनाद किया था और इस ओर सबका ध्यान आकर्षित किया कि अंग्रेज नाम का शैतान हमारे देश पर चढ़ आया है जिसने देश के जिस्म की सारी चेतना को अपने खूनी अधरों से सोख लिया है। ‘गीत चेतावणी रो’ में कवि की राष्टीय भावना कितने सुन्दर रूप से मुखरित हुई है?

आयो इंगरेज मुलक रै ऊपर, आहँस लीधा खैंचि उरा।
धणीयाँ मरै न दीधी धरती, धणीयाँ ऊभाँ गई धरा।।1।।
फोजाँ देख न कीधी फोजाँ, दोयण किया न खळा डळा ।
खवाँ-खाँच चूडै खावंद रै, उणहिज चूडै गई ईळा।।2।।
छत्रपतियाँ लागी नह छाँणत ! गढ़पतियाँ धर परी गुमी।
बळ नह कियो बापडाँ बोताँ, जोताँ-जोताँ गई जमी।।3।।
दुय चत्रमास बाजियो दिखणी, भोम गई सो लिखत भवेस।
पूगो नहीं चाकरी पकड़ी, दीधो नही मरेठाँ देस।।4।।
बजियो भलो भरतपुर वाळो, गाजै गजर धजर नभ गोम।
पहिलाँ सिर साहब रो पड़ियो, भड़ ऊभाँ नह दीधी भोम।।5।।
महि जाताँ चींताताँ महलाँ, ऐ दुय मरण तणाँ अवसाँण।
राखो रै किहिंक रजपूती, मरद हिन्दू की मुसलमाण।।6।।
पुर जोधाण, उदैपुर, जैपुर, पह थाँरा खूटा परमाँण।
आंकै गई आवसी आंकै, “बांकै” आसल किया बखाँण।।7।।

स्वतंत्रता को लक्ष्य करके वांकीदास ने और भी कई गीत लिखे हैं जिनमें ‘गीत भरतपुर रो’, ‘गीत नींबावतां रै महंत रो’ एवं ‘गीत मानसिंहजी रो’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। राष्ट्रीय दृष्टि से ये गीत बडे महत्वपूर्ण हैं। ‘गीत भरतपुर रो’ में कवि ने अंग्रेजों के विरूद्ध राजा रणजीतसिंह की अतुल युद्धवीरता का ओजस्वी वर्णन किया है। यथा-

अण खरब कळह तर कहै दुज अेकठा, गरब वां किताबां तणा गळियां।
थया बलहीण लसकर फिरंगथांन रा, चीण इनांन रा इलम चलिया।।
मेर मरजाद रणजीत आखाड़ मल, खेर दीधा डसण जबर खेटै।
पुखत गुरगम मिळी सेन पण पांकियो, भरतपुर फेर नह उसर भेटै।।

‘गीत नींबावतां रै महंत रो’ में लम्बे टीके वाले पाखंडी एवं विश्वासघाती साधुओं के कारण जाटों की पराजय का उल्लेख है। यथा-

हुवो कपाटां रो खोल बोहतै फिरंगी थाटां राहलो, मंत्र खोटा घाटां रो उपायो पाप भाग।
भायां झड़ां फाटां रो हरीफां हाथे दीनो भेद, ऊभा टीका वाळां कीनो जाटां रो अभाग।।
माल खायो ज्यांरो त्यांरो रत्ती हीथे, नायो मोह, कुबदी सूं छायो भायो नहीं रमाकंत।
वेसासघात सूं कांम कमायो बुराई दाळो, माजनो गमायो नींबावतां रै महंत।।

‘गीत मानसिंहजी रो’ में अँग्रेजों के सामने न टिकने वाले राजाओं की शिव रूप महाराज मानसिंह की शरण में आने का चित्रण है। यथा-

देख गरुड़ अंगरेज दळ, बणिया नृप अन व्याळ।
जठै मांन जोधाहरो, भूप हुवो चंद्र भाळ।।

कवि नाथूराम ने अँग्रेजों के विरुद्ध महाराजा मानसिंह के विषय में अनूठी कल्पना की है। जिस प्रकार सूर्य का रथ काशी से दूर ही निकलता है उसी प्रकार अँग्रेजों की फौजें उनके पास नहीं फटकती-

महाराज मांन मुरधार माथै, चमू फिरंगी नांह चढ़ै।
रै ! जाणै सूरजवाळो रथ, कासी सूं आंतरे कढ़ै।।
मारवाड़ ऊपर फिरंगी मिळ, पर दळ थोड़ा खड़ै न पास।
सिवपुर हूंता दुरसा हेतो, सूर बगल काढ़ै सपतास।।
कासी सथर घणी नव कोटी, समंद अथाग कंपनी साथ।
बेड़ा पार उतारण बाबो, नेड़ा भीड़ जलंधर नाथ।।

अंग्रेजों के फरमानों की कब परवाह करने वाला था मानसिंह ! वह डंके की चोट उनका सामना करने को तत्पर है। उसने क्रोध में बावला होकर अँग्रेजों की असंख्य सेना को तहस-नहस कर दिया और इस प्रकार दासता को स्वीकार नहीं की। नवलदान का यह गीत इसका उदाहरण है-

फिरी वागां जठी ने चलाई पातसाही फौजां,
भुजां लाज भळाई सदाई आई भाय।
रूठियां धूंधळी नाथ कळाई ऊजळी रूकां,
मारवाड़ां दिल्ली ने मिळाई धूड़ मांय।
भांजै चोक हरोलां अणि रा उतोळियां भालां,
धकै तणो मेलियां जणी री रीस धूत।
रही आंट कणीरी जींवार सिद्धारांज राखी,
साजी बाजी नवां कोटां धणी री सबूत।
संग्रामां संभावै वीज जुळां कसां आय सामै,
रेण अेक थोड़ा नांमै थावै असी रीत।
न मावे फिरंगी हिंदूथांन कीधौ पाय नामैं,
आप नामैं नाज खाधौ विजाई अजीत।।

अँग्रेजों को तंग करने में खोंखरी (मारवाड़) के अभैसिंह तथा चिमनसिंह नामक दो भाइयों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने कितनी ही बार उनकी डाक लूटी और उनकी पलटनों का सामना किया। कई बार वे डूंगजी-जवारजी की सहायता भी कर चुके थे और उनके साथ अँग्रेजों के खजाने लूट चुके थे। जोधपुर नरेश द्वारा जागीर छीन लेने पर अन्तत: उन्होंने अरावली पहाड़ में ‘भाखर ढांणा’ नामक स्थान पर रहना आरम्भ किया जो अंग्रेजों ने घेर लिया। बुधजी रचित निम्न गीत से इसकी पुष्टि होती है-

चांपौ एक हुवौ जग चावौ, नरपुर ज्यूं दूजौ करनौत।
तीजौ वळै वरण खट तारग, दस देसां चावौ देसौत।।
मुरधर रूप सिरै रिड़मालां गज ढालां ढाहण हमगीर।
आपण बलू दुरंग जिम आथां, हाथां चिमनो हेल हमीर।।

बुधजी ने डूंगजी-जवारजी पर भी गीत लिखा है-

धरा रो लोभ नह रिदा में धारियौ, अंग रो ताकियो नहीं ओळौ।
कंपनी कैद सूं भ्रात ने काढ़ियौ, रात आधी समै करै रोळौ।।
आगरै तखत सूं डूंगरो आंणतां, वळो वळ लिखाणा जगत वाका।
जुहारी सींध का टाळिया जगत में, डाकुवां रूप रा सुजस डाका।।
सारका कोट नर जुहारे सारखा, गिणै तन पारका कुंभ गैली।
कैद सूं डूंगरो लावतां कीरती, फिरंग हिंदवांण तुरकांत फैली।।

जवानजी के इस गीत में महाराजा मानसिंह (जोधपुर) के अंग्रेजों को ‘कर’ न देने की प्रशंसा की गई है-

मांण हीण सुपह भरै थत मामलत, पांण कुण करै महारांण पाजा।
मोसरां तांण महाराज मरदां मरद, रचै घमसांण जमराज राजा।।
नाथ परताप नह धरै धड़क नरपति, चमू सत्रहरां चकरै धकै चाळ।
डांखियो सेर साजी अणि हाकरे, पेस कस भरै किम बियो बिजपाळ।।

कवि चिमनजी के गीत का विषय भी यही है-

अरक आकरो मांन भूपत तपै आजरो थटै दळ कळह समांन थातां।
पेसकस भरै सुन मांन औवड़ पगां, यरां मत करो अभमांन आतां।।
रेस जबरां दियण नित वरसै रसा, गुसो मन जिकां गाड मगभावै।
दोयणां चार दिन चहो जीवण दसा, तज कसा रहो महाराज ताबै।।

गोपालदान ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध मानसिंह की वीरता का प्रकाशन किया है-

फिरै फिरंगी के हकां काज सुधारै हकारै फौजां,
धूंकळी उबारै रंकां मारै बंका धींग।
संवादी भैभीत होय नगारा घुरावै सारे,
माझी थारे भरोसे नचीता मानसींग।
खावै मारू राव माल उडावै न मावै खांपां,
जावै जठै पावै फतै बखांणै जिहांन।
बीजा राव राजा रांणा जोड़रा घुरावै बंबी,
थारे पांण चमरां करावै राजस्थांन।।

चैनजी ने लिखा है कि राजस्थान की मर्यादा मानसिंह की भुजाओं पर निर्भर है-

मेळै सुभट्टां कंपनी वाळा आया हिंदवांण माँहै, जठै सारी प्रथी-राजा पाय लागा जाय।
गुमनेस नंद तठै अंगजी जोधांण गादी, इंद नरां न कीधी सरद्दो सांभां आय।।
तिलंगां हाजरी लेतां वजातां अगंजी तोपां, भेचकै साराही दसूं दिसां तणा भूप।
हुआ मदां उतार गंयद जेम सारा हटै, राजा जठै खीज राया कंठीर चै रूप।।
दानां री उझेल वीक भोज ओळै जाय दुरै, वसू सिंध कानां री कीरती हुई वाद।
भूमंडलां वीच नृपां आंन री जोवतां यत्री, मानसिंह भुजां राजथांन री म्रजाद।।

गोपालदान (भदोरा) ने ‘गीत सेखावाटी रै सरदारां रो’ में अंग्रेजों का साथ देने वालों की निंदा की है-

नहीं उदैपुर भीम जगतेस नहीं जैनगर, बीकपुर नहीं सुरतेस इण बेर।
दिखाता हाथ असुरां दळ सदाही, अधपत दिखाता नहीं आसेर।।
कहो तो सुणां अरज किण सों करां, चौतरफ कौण बाधै चाळो।
चिंणायर अंजसता जिका भड़ गया कपूतां लगायो गढां काळो।।
आज रजपूत तणों पंथ चूकिया अधपती, जुगां लग जकी नह बात जासी।
हमर के ढहाया किला दे पर हथां, अधिपति घणां दिन याद आसी।।

गिरवरदान ने डूंगजी-जवारजी के लिए यह दोहा कहा है-

सेखावत जळहर समर, फिर चळवळ फिरंगांण।
प्रथी सैंग कळहळ पड़ै, झळहळ ऊगां भांण।।

जादूराम ने ‘गीत चांपावत अभैसिंह चिमनसिंह रो’ में दो राष्ट्रवीरों की बहादुरी का सच्चा चित्र खींचा है-

गाजै अनड़ धीब पड़ गौळा त्रजड़ां झड़ वाजै रण-ताल।
भड़ अभमल चिमनौ किम भाजै ? गिर भाजै लाजै गोपाळ।।
पाड़ै फिरंग नीठ रिण पड़ियां कमधां साको प्रबळ कियौ।
दीधौ मरण बलू दह वारी सार कोट रै मरण दियौ।।
दिल सुध बचन गजन नै दीधौ समर खगांवळ कह्यो सचै।
तूटां सिर ढांणांगर तूटा, पालटियो घर कोट पछै।।

महाराजा बलवंतसिंह गोठड़ा (बूंदी) ने अँग्रेजों का सामना किया था। अँग्रेजों एवं महाराजा के संलाप में ओज की प्रधानता है। बलवन्तसिंह के इस उत्तर में सर्वत्र ‘उत्साह’ की अपूर्व छटा है-

भोळा अँगरेज अळीकइ भाखै, इम आखे बळवंत अभंग।
उतवँग लार लगाया आवध, आवध री लारां उतवंग।।
बहादर सुनत एम मुख बोलै, बळ तोलै कासूं चख बोह।
लोहां कमळ तणी लज लागी, लीजै कमळ तूटियां लोह।।
खग धारां गोरा सिर खांडूं बैरी दळ पाडू भर बाथ।
सिरचै साथ ससत्र सम्हाया , सिर मो हुवौ ससत्रां साथ।।
कहतौ बचन जिसा हट कीधा, पिसणां रत पीधा अणपार।
सिर तूटां लीधा पर साथां, हाथां नहँ दीधा हथियार।।

जब आउवा के ठाकुर कुसालसिंह के यहां जोधपुर का पॉलिटिकल एजेन्ट कैप्टिन मेशन सिपली ठा. सगतसिंह के हाथ से मारा गया तब मोहबतसिंह ने लिखा था-

हिन्दू इस्लामी नार रा रुप सझिया जहांन हाको,
समुद्रां बार रा भड़ां पाविया सौभाग।
म्हारांणी मल्लिका रे हुकम्मां धार रा मांझी,
छटक्के सार रा बळां जाणे हिन्द छाग।
गाढे मनां जाडे थण्डां झोकणा विड़ंगी गजां,
आडे अश्रु रुदन्नां अलाप छाडे आंन।
हुक्का धोम ज्यांरी संक न काढे नरेन्द्र हेको,
(जठे) आउवो तोपां रा धूँवां चाढे आसमांन।
अटक्के नपल्ले भूप भारती निरास एला,
महियां कटक्के छल्ले चल्ले गौरमेन्ट।
भटक्के रोसंगी भूरा वीर भोम भल्ले-भल्ले,
आउवा रे हल्ले कल्ले लटक्के एजैन्ट।
कराळ काळ रा वीर समोवड़ी महाक्रान्त,
ताळ रा न कीधा नाद बैठा ओळो ताक।
थाळ रा नीर ज्यूं भूप थरबके अथाग थाटां,
(जठे) गोपाळ रा पोता धिनो धूजाया गैणाक।।

दुर्गादत्त ने अंग्रेजों के विरुद्ध बलवंतसिंह हाड़ा की वीरता का वर्णन किया है-

जुड़ै सेन थंडां जाडावाळी धोम जाळा री साबात जागी,
खंडां आडावाळा री लागी हाला री खुलास।
जोम गाडावाळी प्रलय काळा री उनागी जठै,
वागी हाडावाळी नराताळी री बणास।।
छायो धूंअें अयास धमंका सोर भंकां छूट,
घोर तोपां अमंखां चरेल पंखां घांण।
कसीस अढार टंकां ऊघड़ी परीर कंकां,
झड़ी बीर बंका सीस असंकां झूसांण।।

अंग्रेजों के साथ भारतीय शक्तियों की जो मुठभेड़ हुई उसमें नरसिंहगढ़-नरेश सौभाग्यसिंहजी के महाराजकुमार चैनसिंहजी के साथ होने वाला युद्ध अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस युद्ध में अँग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध चैनसिंहजी ने वीर-गति प्राप्त की (१८२४ ई०) इस प्रसंग से अनुप्राणित होकर बुधसिंह ने वीर रस की जो अभिनव रचना की है, उससे युद्ध-वर्णन एवं भारतीय जन-मानस का स्वातन्त्रय-प्रेम प्रकट होता है। अँग्रेज अफसर उस राष्ट्रीय वीर के शौर्य-पराक्रम को देखकर आश्चर्यचकित हो गये थे। कवि के इस गीत से उसके स्वदेश-प्रेम, राष्ट्रीयता एवं निर्भीकता की पुष्टि होती है-

चले आवतां फिरंगी फौजां ऊससे क्रोधार चैनों,
चोळ चखी सारधारां ढाहणा चंचाळ।
ऊबकै आराबा आग हूबकै जोधारे अंगां,
(जठै) ताता जंगां पमंगां मेलिया निराताळ।।
वगे वीर हाक जगे ज्वाळ तोपां जेण वार,
ससत्रां संभाळ ठाळ करे महासूर।
कोमंखी कराळ जंगां मिले घड़ी प्रळे-काळ,
किरमाळों निराताळ वाजिया करूर।।
उभै ओड़ा घाव वहै हकै चमू उभै ओड़ा,
घमोड़ां साबळां घोड़ां भड़ां दाव घाव।
झटक्का हजारों वहै सरीरों बटक्का झड़ै,
रटक्का कटक्कां रिमां करै गाढेराव।।
ईखे भांण आरांण तमासो तुरीतांण ऊभो,
वारंगा विमांणां मिले मगां व्योम।
फीलो झंडा फरक्कै भभक्कै घाव तनां फाबै,
धधक्कै लोयणां क्रोध जुड़ै रूपीधोम।।
कटै गजां म्रसुंडां प्रचंडां झड़ै तुंडा केही,
उभै फौजां थंडा वीर घुमंडा आपांण।
लेवे मुंडा माहेस जोगणी झुंडा छाक लेबे,
जुड़ै आडाखंडा जोम छाकीया जोधार।।

और भी:-

वरै वरण जुंझार वडाळा, खळहळ रूधिर इळा पर खाळा।
क्रोध चखां भटकै कळ चाळा, कंवर तणा भड़ ळड़ै कराळा।।
लाखों फिरंग तोड़ घण लाडो, गुमर धार रुपियो गुण गाढो।
जुध सीहोर खेत कर जाडो, अणखीलो पडियो नर आडो।।
फौजां लख पाछो नह फिरियो, गजबी वीर जंगां गेहरियो।
विमळ उछाह अपछरां वरियो, इळ विच नाम अमर ऊबरियो।।

दलजी ने ‘डूंगरपुर रा सोरठा, दूहा एवं गीत’ में देश के लिए फिरंगियों से लड़ने वाले जसवंतसिंह को धोखा देने वाले सरदारों को प्रताडित किया है। यथा-

मूंघा हालरा उगेर, व्रथा पालणै हिंडाया मात,
पोखै केण कारणै, जिवाया थांनै पीव।
लोकां लाज धारणै, फिरंगी हूंत झाट लेता,
जैर खाय धणी रै, बारणै देता जीव।
आघा जाता मूंडौ लेर, पाछाई न आवणो छौ पीव,
करै सारा भेळा, क्यूं गमावणौ छौ कूंत।
आबरू थावतां वठै, पीवणो सही छौ आक,
जीवणो नहीं छौ, धणी जावतां जसूंत।।

लक्ष्मीदान ने डूंगजी-जवारजी के आगरा के युद्ध का वर्णन किया है-

भिड़ियो इम ज्वार लियां भड़ संग, इसो फिर ईस सुण्यो नह जंग।
दीधी खग झाट पराक्रम आंण, घणां गढ़ छोड़ भगा फिरंगांण।।
मुड्या नह केक तज्यो नह मांण, रह्या वे पूरबिया रढ़रांण।
तठै भड़ ज्वार तणा पैंतीस, रया जंग जूट धिखंतां रीस।।
सेखावतां रांण खळां भंज खेल, पाछी सब दीध पलट्‌टण ठेल।
सबै नर आखत झोक अभंग, रिपु बहु ज्वार हण्या बिच जंग।।
करै जुध जंग’ र ताळा काट, जठै सब भेद लगायो जाट।
इण विध भेळयो आगरो, सधर किलो जिम सेज।
संक कछवाहां सूं सुणौ, गयो भाग अंगरेज।।

राजस्थान में शेखावत डूंगजी-जवारजी (काका-भतीज) के नाम प्रसिद्ध हैं। ये अंग्रेजों के इलाकों में धावा मारते थे और धनाढ्‌यों को लूटकर निर्धनों में धन बांट देते थे। एक बार अँग्रेजों ने डूंगजी को गिरफ्तार कर आगरा के किले में कैद कर दिया था। इसकी खबर जब जवारजी को मिली तब अपने वीरों को साथ लेकर आगरा पहुँचे और रात्रि के समय आक्रमण कर डूंगजी को छुड़ा लाये। चंडीदान महियारिया ने निम्न गीत में इन दोनों वीरों का वर्णन किया है-

खावै आतंकां आगरो खांपां न मावै भमावे खळां, धावै थावै अजाण लगावै चौड़े धेस।
उगां भाण नाग वंसां माथै खगां राज आवे, दावै लागौ पंजावै फरंगी वाळा देस।।
कंपू मार तेगां तीजी ताळी सो कुरंगी कीधी, जका बाघनूं रंगी प्रजाळी भुजां जोम।
मांनूं जाणै तारखी विहंगी काळी घड़ा माथै भूप ऊंगौ बंधू से फरंगी वाळा भोम।।
पड़ै धोखा दल्ली वंसां कुरंभां चाढ़वा पाणी, आप मत्तै शेष घू गाडवा जाम आठ।
काकोदरां माथै खगांधीस जूं काढ़वा केवा, लागो केड़ै बाढ़वा हजारां जंगी लाठ।।
तूटो व्योम वाट नरा ताळका विछूटो तारो, केता छूटौ प्राण आळक्का ताके कोप कूंप।
कहूं रूद्र माळक्का बिहंगां नाथ झूठो कना, रूठा गोरां माथै प्रळै कालक्का सा रूप।।
भल्लों भाई सेखा राळे विखेरे सारकी भीच, सारां सटै मार छावणी सोज सोज।
मल्ले थाट हबोळा तारखी कांळी नाग माथे, फेरे दोळी भारकी भूरियाँ वाळी फौज।।
लोही खाळ पूर पट्‌टां हजारां वैणने लागा, थट्‌टे रंभा गैण ने हजारां लागा थाट।
रूकां झाट हजारां वैणने लागा काळ रूपी, लागा टूक व्हेण ने हजारां जंगी लाट।।
रैण डंडा-अडंडां गवाने भीच वाग़ राका, खाग राका भूर डंडां अरिन्दां खाणास।
पड़ै धाका खंड खंडां फैण नाग राका पीधां, बाही आगरा का झंडां ऊपरै बाणास।।

इसी प्रकार गंगादान, जीवराज, भारतदान एवं गिरवरदान ने भी इस विषय पर यह गीत लिखा है। एक उदाहरण देखिये-

खाग रा जोर धू खळां घूपटै खजाना खासा,
जठै दिल्ली आगरा सत्रासा आठूं जांम।
खैगां खूर कीधां बंका सेखाणी ऊबांणे खांडै,
ठांणै कंपू गाहटै उठांणै ठांम-ठांम।
ईखै सिवाहरौ गोरा जिहांन रा सोच आंणै,
तांणै मूछां छत्री हिंदूथांन रा तमांम।।

७. रीति काव्य:- चारण साहित्य में विषय-विस्तार के साथ-साथ काव्य-शास्त्र का प्रणयन हुआ जिसके फलस्वरूप विभिन्न काव्य-शैलियों की उत्पत्ति एवं विकास होने लगा। काव्य-शास्त्र सम्बंधी ग्रंथों के अन्तर्गत रस, छंद, अलंकार एवं नायिका भेद का विस्तृत एवं सम्यक विवेचन हुआ है। इस दृष्टि से वांकीदास, किसनाजी, स्वरूपदास, दुर्गादत्त एवं चिमनजी के नाम उल्लेखनीय हैं। स्वर्गीय पुरोहित हरिनारायण का अनुमान है कि कविराजा वांकीदास ने रस तथा अलंकार का ग्रंथ लिखा था और उस ग्रंथ की बानगी के रूप में ३७ पद (गीत) ‘वांकीदास ग्रंथावली’ के तीसरे भाग में उद्‌धृत किये गये हैं। पुरोहितजी ने उनके एक अन्य ग्रंथ ‘वृत्त रत्नाकर भाषा व व्याख्या’ का भी अनुमान किया है जिसके उद्धरण भी उक्त ग्रंथावली में दिये हुए हैं। स्वतन्त्र रूप से इन ग्रंथों का पता नहीं चलता।

राजस्थानी के चारण साहित्य में ‘रघुवर जस प्रकास’ छंद-रचना का एक अद्वितीय लक्षण ग्रंथ है। इसमें ग्रंथकर्ता ने राजस्थानी काव्यों में प्रयुक्त विभिन्न छंदों के लक्षण प्रस्तुत करते हुए स्वरचित उदाहरणों के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र का यशोगान किया है। साथ ही संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं हिन्दी के छंदों का अभिनव शैली में पूर्ण विवेचन किया गया है। कवि ने मुख्य विषय छंद-रचना के लक्षणों एवं नियमों का बड़ी सरल एवं प्रसाद गुण पूर्ण भाषा में वर्णन किया है। रीति के अनुसार ग्रंथ पांच भागों में विभक्त है। छंद-लक्षण जैसे दुरूह एवं अप्रिय विषय को सरल एवं सुबोध बनाने की महत्वाकांक्षा से राम की लोकप्रिय कथा को उदाहरण के गीतों में खूब ही गूंथा गया है।

प्रथम प्रकरण में मंगलाचरण, गणागण, गणागणदेव, गणागण का फलाफल, गण मित्र शत्रु, दोषादोष, आठ प्रकार के दग्धाक्षर, गुरु, लघु, लघुगुरु की विधि, मात्रिक गण, मात्रिक गणों के भेदोपभेद एव उनके तथा छंद-शास्त्र के आठ प्रत्ययों- प्रस्तार, सूची, उद्दिष्ट, नष्ट, मेरु, खंडमेरु, पताका और मरकटी का संक्षिप्त वर्णन व विवेचन है। द्वितीय प्रकरण में मात्रिक छंद का वर्णन किया गया है। इसमें कवि ने कुल २२४ मात्रिक छंदों के लक्षण देकर उनके उदाहरण दिये हैं। लक्षण कहीं-कहीं पर प्रथम दोहों में या चौपाई में दिये गये हैं। फिर छंदों के उदाहरण हैं। कहीं-कहीं लक्षण एवं छंद सम्मिलित ही दे दिये गये हैं। इस प्रकरण में राजस्थानी की साहित्यिक गद्य-रचना के नियम भी समझाये गये हैं। उनके भेदोपभेद- दवावैत, वचनिका और वार्ता का भी संक्षिप्त विवेचन है। इस प्रकरण में चित्र-काव्य के भी उदाहरण कमलबंध, छत्रबंध आदि समझाये गये हैं। तृतीय प्रकरण में छंदों के दूसरे भेद, वर्णवृत्तों के लक्षण व उदाहरण दिये हैं। प्रारम्भ में कवि ने एक अक्षर के छब्बीस अक्षर के छंदों के नाम छप्पय कवित्त में गिनाये हैं। ये समस्त छंद संस्कृत के हैं जिनका स्वतंत्र उदाहरण राजस्थानी में नहीं मिलता। तत्पश्चात् क्रमश: ११७ वर्णवृत्तों के लक्षण व उदाहरण दिये हैं। चौथे प्रकरण में राजस्थानी ‘गीत’ का विस्तारपूर्वक विशद वर्णन है जो इस ग्रंथ का मुख्य विषय है। ग्रंथकार ने गीतों के वर्णन में गीतों के अधिकारी, गीतों के लक्षण, गीतों की भाषा, गीतों में वयण सगाई, वयण सगाई के नियम, वयण सगाई और अखरोट, अखरोट और वयण सगाई में भेद, गीतों में नौ उक्तियाँ, गीतों में प्रयुक्त होने वाली जथायें, गीत-रचना के ग्यारह दोष एवं विभिन्न गीतों की रचना, नियम आदि का पूर्ण एवं सरल भाषा में विशद वर्णन किया है। राजस्थानी में प्राप्त छंद-रचना के लक्षण-ग्रंथों में इतना विस्तारपूर्ण एवं इतने गीतों का वर्णन किसी भी ग्रंथ में प्राप्त नहीं होता। इसमें ९१ प्रकार के गीतों के लक्षण आदि का विस्तृत-वर्णन है। केवल गीतों का ही नहीं, उनके विभिन्न अंगों का वर्णन भी बड़े सुन्दर ढंग से किया गया है। गीतों के ११ प्रकार के दोष तथा वयण सगाई के प्रयोग का महत्व भी दर्शाया गया है। गीतों में वयण सगाई के प्रयोग के उदाहरण कवि की काव्य-प्रतिभा के द्योतक हैं। छंद-शास्त्र में चित्र काव्य का अपना विशिष्ट स्थान है। साहित्यकारों ने इसे एक स्वतंत्र शब्दालंकार का भेद माना है। संस्कृत एवं ब्रजभाषा में यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है किन्तु राजस्थानी काव्य में इसका उल्लेख नहीं मिलता। इस ग्रंथ में ‘जाळीबंध वेलियो सांणोर’ गीत का चित्र-काव्य के रूप में उदाहरण मिलता है। पंचम प्रकरण में ग्रंथाकार ने एक राजस्थानी छंद विशेष निसांणी का वर्णन किया है। प्रकरण के आरंभ में प्रथम निसांणी के लक्षणों को देकर फिर उदाहरण दिये गये हैं।

गीत का अधिकारी कवि कौन है, इसका वर्णन करते हुए एक स्थान पर कवि कहता है-

अधिकारी गीतां अवस, चारण सुकवि प्रचंड।
कौड़ प्रकारां गीत की, मुरधर भाखा मंड।।

यहां ‘जाळीबंध वेलियो सांणोर’ का यह लक्षण दिया जाता है-

आद अठारै पनर फिर, सोळ पनर क्रम जेण।
अंत लघु सांणोर कहि, तवै वेलियौ तेण।।
नव कोठां मझ अेक तुक, लखजै चित्त लगाय।
उरध अधबिचलौ आखर, दौवड़ वंच दिखाय।।
लखियां दीसै नव अखिर, ऊचरियां अगीयार।
जाळीबंध जिण गीत रौ, नांम सुकव निरधार।।

और भी-

साखी रे भांण नसापत सारै, कीध महाजुध कीत सकांम।
साच तकौ कज साधां सारत, राच महीप सु रांमण रांम।।
दासरथी सुखदाई सुन्दर, नमै पगां सुर नर आनूप।
नरकां मिट जन तारै नकौ, भाख पयोध प्रभाकर भूप।।
पती-सीत भूतप परकासी, वासी सिव उर वास विसेस।
आपी तसां लंक आसत अत, नरा सत्र हण नमौ नरेस।।
कळ नावै नेड़ौ कह ‘किसन’, आव थरु सुख आसत आथ।
दख नांके जैरै दन अदना, नाथ थयां समना रघुनाथ।।

महात्मा स्वरूपदास रचित ‘पांडव-यशेन्दु-चंद्रिका’ के आरम्भ में रस अलंकार, छंद आदि काव्यांगों पर संक्षिप्त प्रकाश डाला गया है। दुर्गादत्त ने नायिका भेद के जिस ग्रंथ का निर्माण किया है उसका पता नहीं चलता।

रीति काव्य की दृष्टि से चिमनजी कृत ‘जसवंत-पिंगल’ एवं ‘भाखा-प्रस्तार’ दो महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं। ‘जसवंत-पिंगल’ में ग्रंथकर्त्ता ने छन्दों के नियम छन्दबद्ध रूप में बताये हैं जिनमें अनेक नवीन प्रणाली के हैं। सैकडों छन्दों का यह ग्रंथ अभाग्यवश नष्ट हो चुका है केवल कुछ अंश ही प्राप्त हुआ है। उदाहरणु के लिए छंद मल्हार एवं केवळ यहां दिये जाते हैं-

(छंद मल्हार)
धुबै क्रोध वड जोध पर बोध रणधीर।
आगमण प्रसंण घण पंचायण गहीर।
सूरहर समर कर निडर अर साल।
मछर धर जोध गिर उजागर माल।।

(छंद केवळ)
भूपाळ वडा पण भाखोजी।
दाताख सूरज दाखोजी।
पांगी प्रथंमाद प्रमांणैजी।
मारूपत मौजसु मांणैजी।।

‘भाखा-प्रस्तार’ में साहित्य विषयक तथा काव्य के आवश्यक एवं उत्तम लक्षण तथा गणादि का सुन्दर चित्रण है। दुर्भाग्यवश यह ग्रंथ तो बिल्कुल ही नष्ट हो चुका है। कोई मामूली अंश उपलब्ध होता है। ग्रंथ के अंतिम पृष्ठ पर कवि का पता लिखा हुआ है। गणों का रूप, फल, देश, लक्षण, जाति आदि का वर्णन अवशिष्ट अंश में देखने को मिलता है। यह ग्रंथ भी जोधपुर-नरेश को सम्बोधित किया गया है। उदाहरण के लिए नगण भेद दिया जाता है-

नगण तीन लघु नेम, पनंग जिण देव प्रमांणै।
व्रछी रास वाखांण, नखत पण हस्त निपांणै।
चंद्र दछा पैचांण, जात कुळ रूद्र जपीजै।
असत्री दे आक वे, देवगण जेण दखीजै।
आरबळ वधै दौलत अखां, सेस वचन निरवांण सत।

८. शोक-काव्य (मरसिया):- दानवीर क्षत्रिय नरेशों एवं जागीरदारों की दिवंगत आत्माओं के प्रति शोक प्रकट करना चारण काव्य की मुख्य प्रवृत्ति है। इसके अन्तर्गत कवियों ने गहरी संवेदनाओं का प्रकाशन किया है। इसके अतिरिक्त लोक-विश्रुत सन्त-महापुरुषों पर भी उन्होंने मरसिये कहे हैं। इस दृष्टि से ब्रह्मानंद, नवलदान, बुधजी, बुधसिंह, चंडीदान, अनजी, नारजी, चतरजी, स्वरूपदास एवं लक्ष्मीदान के स्फुट छंद अवलोकनीय हैं।

ब्रह्मानंद ने अपने गुरु स्वामी सहजानंद के बिछुड़ जाने पर उनके पुनर्मिलन की मधुर कल्पना की है-

मेरे मन विरह के बान, गये हैँ लगाय के,
जीयत ब्रह्मानंद मिलेंगे आय के।

जब एक बिल्ली ने सांईदीन के मुर्गे को मार दिया तब उनके कहने से नवलदान ने यह मरसिया बनाया था-

कायर कूंकड़ा कह कीजै कांसू काल बडो वे काजा।
जो तोने जांणु जावतड़ो जतन करावत जाझा।।
आधी रात मेह पण आयो, झार पवन दे झोळा।
दगो कियो मिनड़ी पुळ देखे, बाहड़ मीठा बोला।।
बोळ सुणातो ऊंचो वैसे, हरिये रूष स हेतो।
तीजा पहर तणे सुर तीषे, दोय टहूका देतो।।
फूले फळे आंबली फूले, एकर सूं बळ आवे।
गहरा वचन दोय चोगाळा, सैण ने समलावे।।

बुधजी ने महाराजा मानसिंह (जोधपुर) के देवलोक होने पर यह छप्पय कहा है

आज कलू आवियो आज मरजादा उट्‌ठी।
आज हुवो अन्याय आज ध्रम पाजा फूट्‌टी।।
आज सोच उपन्नो आज भागी धन आसा।
मान आज महाराज कियो बैकूंठो बासा।।
आज रो दीह ऊगो अरक, भूंडे रंग भयान रो।
आज री दीह षोटो अरक, मरण सुनायो मान रो।।

कवि बुधसिंह ने महाराज महताबसिंहजी (नरसिंहगढ़) के देवलोक होने पर अनेक सोरठे लिखे जिनसे उनकी शोक-संवेदना प्रकट होती है-

मरण तूझ महताब, असह अचांणक आवियो।
खांवंद कियो खराब, मोनू बूढापै मही।।
हियो फटै दुख हेर, कटै विपत रा दिवस किम।
वीसरगो इण वेर, माळवपत महताबसी।।
हरि घर नांहि हिसाब, जाहर मन में जांणियो।
माळवपत महताब, जोखमिये की जांणेन।।
दीन दया द्विज देव, पूजा संकर में निपुण।
अहियो अलक अभेव, त्रिगहियो महताब नृप।।
औ नरसिंहगढ़ आज, विरंगो दीसे तो विना।
रोर मिटावण राज, घणी आब मेहताब धर।।

चंडीदान ने हाड़ा बलवन्तसिंह (बूंदी) के वीरगति प्राप्त करने पर निम्न दोहे-सोरठों में बड़ा ही हृदयद्रावक चित्र खींचा है-

वित पातां, डर बैरियां, पळ ग्रीधां परवार।
बळवँत हाड़ा तो बिना, देसी कुण दातार।।
हेड़ाऊ कुल हैमरां, मुंहड़ै दीसै मोळ।
बळवंत हाड़ा बाहिरा, तुरियां घटिया तोल।।
हट नभियौ हिंदवाण दुरजोधन रावण जिसौ।
चावौ भड़ चहुवाण, बढियौ आज बळंतसी।।
दुसहां तोड़ण दंत, मोड़ण रण घड़ मैंगळां।
बूंदी धर बळवंत, एकरसां फिर आयजे।।
शूरा चामल सीस, बिढ़तां पिंड कीधा सुबप।
आखै पितर असीस, बसजे सुरग बळंतसी।।

महाराव शिवसिंह (सिरोही) के कैलाशवासी होने पर अनजी नारजी ने यह मरसिया कहा था-

कर तपसा करुर तखत पर गादी तपीयो,
जगता हर गुण जांण जगत पत नांम पण जपियो।
कर देही कल्याण बले अल नाम बध्यारो,
क्षत्री धरम सो धार पछे बैकुंठ पध्यारो।
दरसण षट पालण दनी देणकर मत दागणां,
शिवपरी फेर प्रिछत सवो मले न पाछो मांगणां।
जण तपसा रे जोर करूर तप राजस कीनो,
जण तपसा रे जोर दान केई विप्रां दिनो।
जण तपसा रे जोर भाखर कै वंका भलीया।
जण तपसा रे जोर गढपत कै शत्रु गलीया।
बेरी साल सुतन ताला बिलंद वड़े हत क्रीत वधावियो,
सो ताप सेहत सूरज सवो सारणैश्वर सधावियो।
पछम धर मेद पाट मही कांठो मालागर,
धर वागड ढुंढाड धुंधकार हुओ ऐती धर।
ध्रम मुरत छत्र धार बड़ो दातार बखाणे,
सुतवेरा सरीयंद जश समदां तट जांणे।
वड हथ दली मंडल वचे रव करण जश रमियो,
सरताण हरो सूरज सवो आबुधर आथमियो।।

चतरजी ने महाराणा जवानसिंह (उदयपुर) के स्वर्गवास होने पर यह शौक गीत लिखा है-

भूलै नह सहर मुलक नह भूलै, पँडित न भूलै पाणा।
भड़ कव पासवान किम भूलै, रूंष न भूलै राणा।।
उदियापुर गोषां अनदाता, निरव्रत पणो न धारो।
करबा सहल भूप हेकर सां, पाछा महल पधारो।।
भाला हथां जोध भीमाणी, बाल्हा सुरपुर बासी।
पांत बिराज बिलाला पातां, प्याला मद कुण पासी।।
सत आचार अथग रा सहजां, षग रा षलां षवाना।
मन मोहण थिर चर षग मृग रा, जगरा मुकट जवाना।।
दीवाळी होळी दसरावै, गौरिल हूर गवाड़ा।
असवारी थारी कद आसी, मिणधारी मेवाड़ा।।
षेलण फाग षास षिलबतियां, सुरां रमण सिकारां।
अेक बार षडवै कर आजो, तीजां तणा तिवाँरां।।

स्वरूपदास महाराजा बलवंतसिंह (रतलाम) को भावुकतावश पुन: पृथ्वी पर आने के लिए कहते हैं-

वसू पाछा आवौ कहै हाडौती माढ रा बासी।
दाखै ढूंढाड़ रा बासी झुरै दाम-दाम।।
कमंधेस बासी मारवाड़ रा चिंतारै केही।
त्यूंही मेवाड़ रा बासी चींतारै तमाम।।
सेल ढाबौ छत्रधारी दहल्लां मनावौ सत्रां।
करौ बाग त्यारी गोठां हल्लां कहीप।।
भड़ां वाळा फाटै हिया सहल्लां करेवा भूरा।
महल्लां अनेक मौज चितावौ महीप।।
छूटौ नीर चखां सन्तराम ऊँचरंता छेला।
सरूपदास री छाती उझेला समंद।।
जामी आज महांनै छोड़ अकेला कठीनै जावौ।
कोयलां बारंगां हेला दे रही कमंध।।
कासूं जोर चालै टेट हरी रै अगाड़ी कूंतो।
दूसरौ न पूंतौ उठै अक्रमां दळूंत।।
तजे मोह माया हुवौ बासी सैंजोत रौ तूं तो।
बामीबंध हूँ तो तोनै हूँतो न भूलूं बळूंत।।

लक्ष्मीदान ने जयपुर राज्यान्तर्गत गीजगढ़ के ठाकुर चांपावत राठौड़ कानसिंह के लिए कहा है-

अन धन बगसण ईहगां, दुजों समापण दांन।
एक रसों फिर आवजो, कळ वृछ चंपा कांन।।

९. सती-माहात्म्य:- आलोच्य काल में चमनजी ने महाराणा जवानसिंह (उदयपुर) की मृत्यु होने पर उनकी दो रानियों एवं छ: उप-पत्नियों के सती होने का सांगोपांग वर्णन किया है। यथा-

करे असनान जळ गंगबळ कुल कमळ, साज तन भलळ भूषण सुहातै।
वमल मन सजी करतार उचरै वयण, सहण झळ अनळ भरतार साथै।।
वत दुजाँ दांन धारां कनक बूठती, प्रभत मुख हजारां संध पाठां।
तेज तन प्रकासे भाण बारा तरह, कंथ लारा हली चढण काठां।।
उभै चव पासवानां उमंग आणियो, चता सुब जाणिया उसेज चाहे।
कीध भटियाणियां रीत सूरज कुंवर, राणियां रीत बाघेल राहे।।
पैंड असमेद जग परठ परमाण रौ, वचन निरबाण रौ सांच बीदो।
निभायो पतबरत नेह नर बाण रौ, कर हरक राण रौ साथ कीदो।।
त्रँबालां ढोल बज ऐक तालां तठै, छजे नभ प्रजाळा धौम छायौ।
तज महल सुढाळा लार खामँद तणै, तती झाळां सैहल सुवप तायौ।।
अळा कीरत रही पखां उजवाळतां, गाळतां अगन झळ तन गुलाली।
भीमतण साथ अह नर सुरां भाळतां, चमर सर ढाळतां लेर चाली।।

इस विषय को लेकर कवि ने दोहे-सोरठे भी लिखे हैं। यथा-

साजां जरतारां सजै, तन जवहारां तेज।
हींदू-पत लारां हलौ, सहण अंगारां सेज।।
ढोलां सद खारा ढमक, अक बक जग अवरेख।
सुर मंडळ थायौ सुरख, सतियां आठ सुपेख।।
माथे धारण मौड़, भटियाणी कीदौ भलां।
चाड़े जळ चीत्तौड़, सतपुर पूगी रांण सथ।।
बाघेली रजवट बडम, छेली वार संभाळ।
सेजां रँगरेली समी, झेली पावक भाळ।।

१०. प्रकृति-प्रेम:- चारण कवियों का प्रकृति के साथ नैसर्गिक प्रेम नहीं दिखाई देता। यही कारण है कि इस काल में भी ऐसे कवियों का अभाव है जिन्होंने अपने काव्य में इसके विविध रूपों को चित्रित किया हो। अधिक से अधिक एक-दो कवियों में ही इसका सामान्य चित्रण पाया जाता है। केवल महादान एवं मानजी ही ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में रुचि प्रकट की है। महादान के ऋतु-वर्णन पर कतिपय गीत लिखे बताये जाते हैं किन्तु वे उपलब्ध होते नहीं।

मानजी का प्राकृतिक वर्णन प्रासंगिक है। उदयपुर में गणगौर के मेले का वर्णन करते समय कोयल, पपीहा आदि का स्वर सुनाई देता है, चारों ओर जल का सुन्दर दृश्य मोहित कर देता है, यहां तक कि उन्हें कैलाश का स्मरण हो आता है-

कोयल दिये टहूकड़ा, पपिहो करै पुकार।
पांणी अण छोळां पड़ै, धर अंबर इक धार।।
धर अम्बर इक धार, कइंद्र अछेह के।
साचो झगड़ो माचो नेह सनेह के।।
करै ध्यांन महेस पती कयलास को।
मिलै उदैपुर बास हवा चत्रमास को।।

११. ऐतिहासिक काव्य:- आलोच्य काल के अधिकांश चारण कवियों में कोई न कोई ऐतिहासिक प्रसंग उपलब्ध हो ही जाता है किन्तु विशुद्ध रूप से वांकीदास, किसना, दयालदास एवं चिमनदान के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें से वांकीदास एवं दयालदास की रचनायें ऐतिहासिक गद्य-साहित्य के और किसना एवं चिमनदान की रचनायें ऐतिहासिक पद्य-साहित्य के अन्तर्गत आती है।

वांकीदास की इतिहास में बड़ी रुचि थी। वे इतिहास सम्बंधी विषयों का निरन्तर संग्रह अपनी डायरी में किया करते थे। ‘वांकीदास-री-ख्यात’ उनके इसी इतिहास-प्रेम का फल है। यह एक अमूल्य ग्रंथ है। डॉ० गौरीशंकर हीराचंद के शब्दों में- ‘पुस्तक बड़े महत्व की है।…. ग्रंथ क्या है, इतिहास का खजाना है। राजपूताना के तमाम राज्यों के इतिहास-सम्बंधी अनेक रत्न उसमें भरे पड़े हैं।…. उसमें राजपूताना के बहुधा प्रत्येक राज्य के राजाओं, सरदारों, मुत्सद्दियों आदि के सम्बंध की अनेक ऐसी बातें लिखी हैं जिनका अन्यत्र मिलना कठिन है। उसमें मुसलमानों, जैनों आदि के सम्बंध की भी बहुत सी बाते हैं। अनेक राज्यों और सरदारों के ठिकानों की वंशावलियां सरदारों के वीरता के काम, राजाओं के ननिहाल, कुंवरों के ननिहाल आदि का बहुत कुछ परिचय है। कौन-कौन से राजा कहाँ-कहाँ काम आये, यह भी विस्तार से लिखा है। अनेक राजाओं के जन्म और मृत्यु के संवत्, मास, पक्ष, तिथि आदि दिये हैं।’

‘वांकीदास-री ख्यात’ में लगभग दो हजार बातों का संग्रह है। ये बातें छोटे-छोटे फुटकर नोटों के रूप मैं हैं। अधिकांश बातें २-३ अथवा ४ पंक्तियों की है।’ २-३ पृष्ठों तक चलने वाली थोड़ी ही हैं। प्रामाणिकता की दृष्टि से राजस्थान की अन्य सभी ख्यातों की अपेक्षा यह अधिक विश्वसनीय है। ये बातें राजपूतों के इतिहास से सम्बंधित है जिनमें राठौडों की बातें संख्या में सबसे अधिक हैं। इसके पश्चात् राजपूतों की विविध शाखाओं के राज्यों को १-१ करके लिखा गया है। सर्व प्रथम जोधपुर राज्य के राठौडों को लिया गया है फिर ठिकानों को और फिर उनके अन्यान्य राज्यों तथा ठिकानों को। इसके पश्चात् गहलोतों, यादवों, कछवाहों, चौहाणों आदि शाखाओं को लिया गया है। राजपूतों के पश्चात् मराठों, सिखों, मुसलमानों और अंग्रेजों की बातों को स्थान दिया गया है। इसके पश्चात् ब्राह्मण तथा ओसवाल आदि जातियों और जैनों के गच्छों की बातें दी गई हैं। आगे धार्मिक, भौगोलिक तथा प्रसिद्ध व्यक्ति और वस्तुओं की बातें देकर अंत में फुटकर बातों के अन्तर्गत नीति विषयक बातें, दूहा-गीत आदि कवितायें तथा अस्पष्ट और अधूरी बातों को रखा गया है। इस संग्रह में कोई क्रम नहीं है अत: श्रंखलाबद्ध वृत्तान्त नहीं पाया जाता। एक ही व्यक्ति के सम्बंध की बातें अनेक भिन्न-भिन्न स्थानों पर आई हैं। डॉ० ओझा ने इन्हें क्रमबद्ध रूप देना चाहा था पर यह कार्य हो नहीं पाया। अब प्रो० नरोत्तमदास स्वामी ने यह कार्य पूरा कर दिया है और उनके कुशल सम्पादन में ग्रंथ राजस्थान पुरातत्वान्वेषण मंदिर, जयपुर से प्रकाशित भी हो चुका है।

ऐतिहासिक काव्य रचयिताओं में दयालदास का विशिष्ट स्थान है। ‘बीकानेर रे राठौडों री ख्यात’, ‘आर्य आख्यान कल्प द्रुम’, ‘देश दर्पण’ एवं ‘बीकानेर रे राठौडों रा गीत’ नामक रचनाओं में महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं। इन्होंने बीकाजी और करनीजी, भाटियों पर विजय, बीकानेर स्थापना, बीकाजी की जाटों पर विजय, अन्य विजय, द्रोणपुर पर विजय, कांधलजी का मारा जाना, सारंगखां पर आक्रमण, जोधपुर पर चढ़ाई, रिड़मल और हिंदाल पर आक्रमण, लूणकरण का विवाह करने चित्तौड़ जाना, जैसलमेर पर चढ़ाई आदि घटनाओं का ब्यौरा दिया है। साथ ही राव श्री नरौजी, राव श्री लूणकरणजी, राव श्री जैतसीजी, राव श्री कल्याणसिंघजी, राजा श्री रायसिंघजी, राजा श्री दलपतसिंघ जी, सूरसिंघजी, करणसिंघजी एवं अनूपसिंघजी का भी वर्णन है। राजाओं एवं मुसलमान शासकों की जन्म-पत्रिकायें भी हैं। जान पड़ता है, दयालदास अपने समय का एक प्रभावशाली व्यक्ति था। उसका स्थान मूता नैणसी से कुछ ही नीचा है।

किसना भी इतिहास-प्रेमी था। ऐतिहासिक सामग्री का चयन करने हेतु जब कर्नल टाड ने मेवाड़ का भ्रमण किया तब ये उनके साथ थे। चारणों के यहां पड़ी हुई बहुत सी सामग्री इन्हीं के परिश्रम से उन्हें प्राप्त हुई थी। इन्होंने महाराणा भीमसिंह (उदयपुर) की आज्ञा से ‘भीम विलास’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें महाराणा का जीवन-वृत्तान्त है। इसमें उनके शासन-काल की प्रमुख घटनाओं का वर्णन है। इतिहास के विद्यार्थियों के लिए इसका अनुशीलन उपयोगी है।

ऐतिहासिक दृष्टि से चिमनदान कृत ‘सोढ़ायण’ ग्रंथ महत्वपूर्ण है। इसमें ऊमरकोट के सोढ़ा राजपूतों का पूरा इतिहास दिया हुआ है। सोढ़ा राजपूतों एवं सूमरे मुसलमानों के बीच युद्ध-वर्णन में कहीं-कहीं अतिश्योक्ति से काम अवश्य लिया गया है फिर भी ग्रंथ में आई हुई घटनायें सच्ची हैं।

१२. भाषा, छन्द एवं अलंकार:- राजस्थानी भाषा को समृद्ध बनाने में इस काल के कवियों का योगदान स्तुत्य है। इस दृष्टि से वीर काव्य के रचयिताओं ने अच्छी सफलता प्राप्त की है। वस्तुत: ऐसे कवियों से ही डिंगल को नये-नये शब्द मिले हैं और वह पृथक भाषा होने का दावा करती है। कृपाराम, वांकीदास, चंडीदान, मोहबतसिंह, सालूदान, गिरवरदान, तेजराम, रामलाल, रामलाल आढ़ा, चिमनदान, चंडीदान महियारिया की भाषा विशुद्ध राजस्थानी का उदाहरण है। वांकीदास की भाषा अत्यंत प्रौढ़, परिमार्जित एवं विषयानुकूल है। उनकी वर्णन-शैली संयत और स्वाभाविक है। प्रसाद गुण उसकी एक ऐसी विशेषता है जो डिंगल में बहुत कम पाई जाती है। अन्य कवियों की भाषा भी प्रौढ़ है। रामदान, महादान, नवलदान, नाथूराम, लच्छीराम, कृपाराम, मायाराम, आवडदान, मान, सायबदान, इन्दा, खोड़ीदान, गोपालदान, किसना, भोमा, रिवदान, दुर्गादत्त, मोड़दान, कनीराम, स्योदान, लक्ष्मीदान प्रभृति कवियों ने अपनी रचनाओं में भाषा की शुद्धता का ध्यान रखा है। इनमें गोपालदान, किसना एवं स्योदान की भाषा विशेष परिष्कृत है और उनकी रचनाओं में ऊंचे पांडित्य का परिचय मिलता है। कतिपय कवियों ने ब्रजभाषा को भी अपनाया है। एतदर्थ उनकी रचनाओं में राजस्थानी एवं ब्रज दोनों के शब्द आ गये हैं। ब्रह्मदास, राधावल्लभ, गंगादीन, कोजूराम, जसराम, बदनजी, महात्मा स्वरूपदास, चतुरदान, दुलेराम, मंगलदास आदि कवि इसी श्रेणी में आते हैं। ब्रह्मदास की भाषा मेँ राजस्थानी, ब्रज, गुजराती और कच्छी का मेल है। उनमें एक महान संत कवि के योग्य भाषा-शैली का चमत्कार देखने को मिलता है। इनके अतिरिक्त संस्कृत का प्रभाव भी है। प्रौढ़ावस्था में लिखे गये पदों की भाषा प्राय: शुद्ध है। उन्होंने भिन्न-भिन्न भाषाओं का ज्ञान होने पर भी रसोत्पत्ति में कोई बाधा नहीं आने दी। महात्मा स्वरूपदास की भाषा पर ब्रज का प्रभाव होने पर भी वह सरल एवं परिमार्जित है और हृदयस्पर्शी भाव-सौष्ठव तथा विषयगत लालित्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह उल्लेखनीय है कि चंडीदान ने डिंगल को पिंगल के प्रभाव से बचाया है, यद्यपि उन्होंने इन दोनों में काव्य-रचना की है। राजस्थानी के नियमों की रक्षा करते हुए भी जिन कवियों ने भाषा को सरल बनाने का प्रयत्न किया है, उनमें ओपा, रायसिंह एवं रामनाथ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ओपा में सरसता एवं कोमलता देखते ही बनती है। रायसिंह की भाषा जन-साधारण के अच्छी तरह समझ में आने वाली है। रामनाथ की भाषा सरल होते हुए भी प्रवाहमयी एवं हृदय पर चोट करने वाली है। डिंगल पर श्रुतिकटुत्व होने का आरोप है पर रूपा, वखतराम, हरिसिंह, हमीर, सूर्यमल, सोम, हरा, जासा, भगवानदान, बुद्धा आदि कवियों ने भक्ति के क्षेत्र में भी उसका सफल प्रयोग कर दिखाया है।

आलोच्य काल में छन्दों की दृष्टि से कोई नवीनता नहीं दिखाई देती। कतिपय ग्रंथ-प्रणेताओं ने विभिन्न छंद अवश्य अपनाये हैं जिनमें ब्रह्मदास, सालूदान एवं चिमनदान के नाम उल्लेखनीय हैं। ब्रह्मदास ने अमृतध्वनि, रेंणकी, भुजंगी, मोतीदाम, नाराच, छप्पय, चंदावला आदि छंदों में रचनायें लिखी हैं। सालुदान के अधिकांश गीत या तो जांगडो हैं अथवा त्रकूट बंध। इसके अतिरिक्त उन्होंने दोहा, छप्पय, नीसाणी, रेंणकी छंदों का प्रयोग किया है। चिमनदान ने दोहा, छप्पय, त्रोटक, भुजंगी, पद्धरी, मधुर, नीसाणी, रेंणकी, मोतीदाम एवं रोमकंद छंदों में काव्य-रचना की है। फुटकर कवियों ने अधिकांश में दोहा, गीत एवं छप्पय ही लिखे हैं। दोहा लिखने में रामदान, वांकीदास, नवलदान, महादान, मायाराम, रायसिंह एवं रिवदान सिद्धहस्त हैं। गीत रचयिता तो बहुतेरे हैं जिनमें ओपा, नाथूराम, इन्दा, कोजूराम, खोड़ीदान, चंडीदान, गिरवरदान, चतरजी, दुर्गादत्त, कनीराम, मोड़दान, स्योदान, भारतदान आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन्होंने मुख्यत: गीत बड़ा साणौर, छोटा साणौर एवं सुपंखरो का प्रयोग किया है। चंडीदान ने छंदों की गति का विधिवत ध्यान रखा है। छप्पय लिखने वालों में सायबदान, किसना एवं भोमा ने अच्छी सफलता प्राप्त की है। इनके अतिरिक्त गोपालदान के पद एवं सवैये लोकप्रिय हुए हैं। नवलदान ने कुंडलिया भी लिखी हैं।

चारण कवियों का अलंकारों के प्रति कोई आग्रह नहीं दिखाई देता फिर भी चार-पांच कवियों में इनका अच्छा निर्वाह हुआ है। इस दृष्टि से वांकीदास का स्थान अद्वितीय है। अलंकारों पर उनकी दृष्टि कुछ विशेष थी, मुख्यत: अर्थालंकारों पर। वैसे तो उनकी रचनाओं में प्राय: सभी अलंकार मिल जायेंगे किन्तु जिन-जिन अलंकारों में उनकी विशेष रुचि थी, उनके नाम इस प्रकार हैं- अप्रस्तुत प्रशंसा, हेतु, उदात्त और समुच्चय। इनमें भी अप्रस्तुत प्रशंसा की ओर उनका झुकाव अधिक था। उन्होंने ये अलंकार संस्कृत-हिन्दी से ही लिये हैं। ‘धवल-पचीसी’ एवं ‘नीति मंजरी’ में कुल १४ प्रकार के अलंकार आये हैं- हेतु, विचित्र, सम, आक्षेप, अप्रस्तुत प्रशंसा, समुच्चय, विधि, उदात्त, अधिक अनन्वय, संभव, निरुक्ति, विषाद और विनोक्ति। ‘नीति-मंजरी’ में १२ प्रकार के अर्थालंकार हैं- समुच्चय, विचित्र, उदाहरण, दृष्टान्त, सम, हेतु, अप्रस्तुत प्रशंसा, उदात्त, परिणाम, उपमा, क्रम और व्याघात। ओपा में उपमा, रूपक एवं उत्प्रेक्षा जैसे सामान्य अलंकारों का ही स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। चंडीदान में वयण सगाई का प्रयोग दृष्टव्य है। इसी प्रकार सालूदान एवं चिमनदान ने उपमेय के लिए उपमान का उपयुक्त विधान किया है। शेष कवियों में साधारण अलंकार ही प्रयुक्त हुए हैं।

(ग) गद्य साहित्य:- इस काल में ‘ख्यात’ एवं ‘वात’ संज्ञक रचनायें उपलब्ध होती हैं। इतिहास का ही दूसरा नाम ख्यात है। वात में किसी व्यक्ति, जाति, घटना अथवा प्रसंग का संक्षिप्त इतिहास होता है। आकार में ख्यात बड़ी होती है और वात छोटी। ख्यात को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक, जिसमें क्रमबद्ध इतिहास मिलता है और दो, जिसमें क्रम न होकर पृथक-पृथक वातों का संग्रह होता है। इनके अतिरिक्त गद्य की अन्य रचनायें भी जिनमें दवावैत, वचनिका आदि के नाम लिये जा सकते हैं, इस काल में लिखी गयीं। रीति-ग्रंथों की व्याख्याओं एवं काव्य-ग्रंथों के बीच-बीच में भी गद्य के उदाहरण पाये जाते हैं। इस प्रकार पद्य के साथ-साथ गद्य का विकास भी उत्तरोत्तर होता गया।

आलोच्यकाल में वांकीदास, रामदान, बुधजी, किसना, दुरगादत्त, दयालदास, एवं खुमाण नामक लेखकों ने गद्य की विभिन्न शाखाओं को पुष्पित करने में अपना योगदान दिया है। इन सब में वांकीदास की सेवायें सराहनीय हैं। इन्होंने स्वतंत्र रूप से एक ‘ख्यात’ का निर्माण किया है जिसका महत्व ऐतिहासिक ही नहीं, साहित्यिक भी है। यह गद्य की एक अत्यन्त प्रौढ़ एवं उत्कृष्ट रचना है जिसके अन्तर्गत अक्रमबद्ध रूप से भिन्न-भिन्न बातें हैं। इनमें रोचकता का अभाव नहीं है। अनेक बातों में पढ़ते समय कहानी का सा आनन्द आता है। उदाहरण के लिए फिरंगी विषयक यह वार्ता दी जाती है-

‘अंगरेज कहै सीपसूं मोती प्रगट हुवै, सीपनूं चीर मोती लोक लियै तैरी ऊपर काड्‌या पवन ऊपर है, इणनूं पायदार मत जाणो, मांस खाणो ईसे किताब में कह्यो है नहीं नै थें सरब जंतुआं रो मांस खावो सो क्यों? ओ प्रश्न कियो, अंगरेज उत्तर दियो-कासमीरिया रै धरम री किताबां में त्रियां रै माथे पाग बांधणी न कही है। पिण कासमीर में सरदी बहोत, इण कारण सूं प्रथम अेक औरत पाग बांधी, पछै देखा-देखी सूं सारी कासमीरणियां पाग बांधी, हमै देसांतर में रहै जिकेही कासमीरणियां पाग बांधै है, परंपरा ठैरायी, यूं फिरंग में सरदी बहोत जिण सूं हकीमां मांस खाणो अंगीकार कियो, अब देसांतर में ही फिरंगी मांस खावे है।।’

रामदान कृत ‘भीम प्रकाश’ के बीच-बीच में गद्य मिलता है जिसकी भाषा बड़ी ही उन्नत है। निम्न उदाहरण में लेखक ने गणगोर के मेले का वर्णन किया है-

‘यण रीति उदियापुर सहर गणगोर रा हगाम मंडिया। सागर री तीर पागड़ा छांडिया। ऊंचै ढाळ तषत निवास कियो। सो जाण जैक सत-सुक्रत रो सिंघासण प्रगट थियो। तिकण रै सीस श्री दीवाण आप विराजिया। भाई सगा सोळा ही उमराव आप-आप री बैठक हाजरि थिया।।’

बुधजी ने मायाराम दरजी की बात लिखी है जिसका राजस्थान में काफी प्रचार है। इसमें दयाराम एवं जसां के विवाह का वर्णन किया गया है। भाषाशैली रोचक है और मनोरंजक भी। इसमें नाटकीय संकेत भी मिलते हैं। पात्रों की भावनाओं के साथ प्रकृति का सुन्दर चित्रण हुआ है। यथा-

‘वधाइदार नै पांच सै मोहरां वधाई मै दीधी नै मालकीनै कहयौ- थूं सांमी जाय। भादरवा की घटा पण आयनै लूंबी छै। मुधरी-मुधरी बूंदां पडै छै। राव बषतावर सिंग असवारी कीधी छै। सो पैतीस हजार नरुपोता सोनैरी साकतां गजगाहां मै गरक कीया थका बाजार में घोडा उछकावै छै। महोलां-महोलां हजारां सहेलीया ऊभी गावै छै। जकण वषत मै जांनरौ कैतूल कीधा सरीषा घोडा, सिरदार लीधा, मयारामजी पण आया छै। रंग-राग उमेदवाराम (मै) छाया छै। सो जसां कहै- मालकी ! थूं सांमी जा। जद मालकी कहै- आ तो मेह अंधारी रात छै नै जण मै रावरी असवारी रौ लोक गलीयां मैं नहीं छै। मयारामजी की कसी षबर पडै? जद जसां कहै- सूरज बादलां मै ढकीयौ कदी रहै? अण ऐह ळाणा मयारामजी नै ओलष लीजै।।’

बुधजी ने दवावैत की भी रचना की है जो तुकान्त हैं। एक उदाहरण निरर्थक न होगा-

‘वरसायत आवण की धारी छै, आपकै जावण की त्यारा छै। जमी नीला सिणगार धारसी, जसां सिणगार उतारसी। मोरीया महकसी, डेडरा डहकसी, झिलीगन झणकसी, भमरा भणकसी। सीतल पवन वाजसी, मुधरौ मेह गांजसी। झाषरै री छीयां लागसी, ग्रीषम रित भागसी। वीजलीयां भलकसी, भाषरां सूं वाला षलकसी, पावस की पोटां पडसी, इंद्र की असवांरी चडसी। हरीयालीयां चूंटसी, नदीयां का बंध फूटसी, जण रतमै आप कमरां बांधां (धौ) छौ, आपकै कोइ मासू पला भव कौ बांधौ छौ।।’

किसना ने ‘रघुवर जस प्रकास’ में विभिन्न छंदों, गीतों, अलंकारों एवं दोषों के लक्षण तथा उदाहरण देते समय उनकी गद्य में व्याख्या की है। यह गद्य बड़ा ही शक्तिशाली है। ‘निनंग’ दोष को समझाते हुए लेखक लिखता है-

‘बिना ठिकांणै विकळ वरणण होय सौ निनंग दोख तथा मग्न दोख। पैली कहवारी वात पछै वरणै, पछै वरणवारी वात पैहली वरणै सौ विकळ वरणण वाजै ज्यूं अठै रत नद तिरत कबंध सार इम चली। पैहली तरवार चालै जद लोही आवै, जद नदी वहै, अठै पैहलो लोही री नदी वरणी, फिर कबंध वरण्या, जठा पछै तरवार चली कही, ठिकांणा चूक वरणण छै, जींसूं निनंग दोख हुवौ।।’

यह लक्ष्य करने की बात है कि इस रीति-ग्रंथ में लेखक ने गद्य के प्रमुख अंगों की विवेचना उनके ढंग पर ही की है। यथा- दवावैत, वचनिका एवं वारता को समझाने के लिए उसने उन्हें नियमानुसार लिख भी दिया है। राजस्थानी गद्य होते हुए भी यह हिंदी से प्रभावित है। तीनों के क्रमश: उदाहरण यहां दिये जाते हैं

(अथ दवावैत)
१. ‘माहाराजा दसरथ के घर रामचंद्र जनम लिया। जिस दिन सै आसरू नै ऊदेग देवतूं नै हरख किया। विसवामित्र मख-रख्या के काज अवधेस तैं जाच लिये। माहाराजा दसरथ उसी बखत तईनाथ किये। सात रोज निराहार एकासण सनद्ध रहै। रिखराज का जिग की रछ्या काज रजवाट का बिरद भुजदंडूं गहे। सुबाहू कूं बांण से छेद जमराज के भेट पुंहुंचाया। मारीच के तांई वाय बांण से मार उडाया। रज पाय से तारी गौतम की घरणी। खंडपरस का कोदंड खंडकर जांनुकी परणी। अवध कूं आते दुजराज कूं सुद्ध भाव किया। जननी से सलांम कर सपूती का बिरद लिया। ऐसा श्री रांमचंद्र सपूतूंका सिर मोड़। अरोड़ का रोड़। गौ बिप्रूंका पाळ। अरेसूं का काळ। सरणायूं-साधार। हाथ का उदार, दिल का दरियाव। रजवाट की नाव। भूपूंका भूप साजोत का रूप। काछवाचका सबूत। माहाराज दसरथ का सपूत। भरथ लक्षमण सत्रुघण का बंधु। करुणा का सिंधु।।’

(वचनका)
२. ‘हांजी ऐसा माहाराजा रांमचंद्र असरण-सरण। अनाथ नाथ बिरदकूं धारै। सौ ग्राहकू मार न्याय ही गजराज कूं तारै। औ भी नरसिंघ होय प्रवाड़ा जग जाहर किया। हरणाकुस कूं मार प्रहलाद कूं उबार लिया। प्रळैका दिन जांण संत देस उबारण कूं मच्छ देह धारी। सतब्रत की भगती जगजाहर करी। ऐसा स्री रांमचंद्र करणानिध। असरण-सरण न्याय ही वाजै। जिसके तांई जेता बिरद दीजै जेता ही छाजै।।’

(वारता)
३. ‘रामचंद्र जिसा सिध रजपूत कोई वेळापुळ होवै छै। ज्यांके प्रताप देव नर नाग खटब्रन सुख नींद सोवै छै। राजनीत का निधांन सींह बकरी एक घाटै नीर पावै छै। पंछी की पर बागां बाज दहसत खावै छै। तप के प्रभाव पांणी पर सिला तरै छै। भ्रगुपत सा त्रबंक ज्यांका बळ काढ़ सणंक सुधा करै छै। बाळ दहकंध सा अरोड़ानूं रोड़ जमींदोज कीजै छै। सुग्रीव भमीखण जिसा निरपखांनूं केकंधा लंक दीजै छै। जांका भाग धन्य जे रांमगुण गावै छै। जांमण मरण भय मेट अभै पद पावै छै।।’

गद्य की दृष्टि से बुधसिंह रचित ‘महाराजकुमार श्री चैनसिंहजी री वार्ता’ एक उल्लेख्य कृति है। इसे एक राष्ट्रीय वीर की कहानी ही समझिये जिसमें लेखक ने अनेक महत्वपूर्ण विवरण दिये हैं। भाषा परिमार्जित है। सांस्कृतिक दृष्टि से इसका मूल्य अधिक है। एक उदाहरण देखिये-

‘अतरे सोनखेड़ा वाळा ऊमट कोकजी बड़ी अंगरखी पेटी लाय हाजर करी, जद हुकम फरमायो के बड़ी अंगरखी तो मेल दो, छोटी अंगरखी लाव। आज अपणै, अैगरेजां के झटकामार होगी, जद छोटी अंगरखी दोवड़तां लाय हाजर करी सो पहरी। ऊपर सादो कमंरबंदो बांध्यो तरवार बांधी, ऊपर चंदेरी को जरदोजी दुमट्टो बांध्यो और ढाल कत्ती हथवांसे धारण कियां डेरा में आय विराज्या और केसराजी ऊमट सोनंखेड़ा वाळा सूं हुकम फरमायो के सब साथ वाळा सूं कह दो, आप-आपकी जागा जम्या रहै। अमल की चवटां दे दो सो आप आपस में मनवार कर आछी तरह अमल ले लेवे। केसराजी सारा साथ वाळाहै अमल की बटियां वांट दीवी हुकम सुणाय दियो सभी साथ में आछी तरह अमल की मनुहारा ऊई।।’

दुरगादत्त की लिखी हुई एक दवावैत उपलब्ध होती है जिसकी चार-पाँच प्रतियां विद्यमान हैं। इसका लेखक इसरदा ठिकाने में आशा लेकर गया था, वहाँ उचित पुरस्कार न मिलने पर उसने खीझकर यह निन्दात्मक दवावैत बनाई थी। इसकी वर्णन-शैली गद्य की प्रौढ़ता की ओर संकेत करती है। इसमें वयणसगाई अलंकार की छटा दृष्टव्य है। साथ ही अंत्यानुप्रास, मध्यानुप्रास या किसी अन्य प्रकार के अनुप्रास व यमक आदि का रंग भी खूब जमा है। यथा-

‘पूर्व की तरफ राजावटी देस। रोझूं का रैवास भांडू का भेश। जिस देश में ईसरदा नाम का गांव। बेवकूफों का बास। धूरतों का धाम। मंगतूं का मोहल्ला, कंगालूं का कोट। हीजडूं का सहर, जारूं का जोट, चुगलूं का चबूतरा, सगलू का रैवास। कुकरमूं का कोठार, अघूमूं का ऐवास। भूक का भांडा, मालजादूं का मुकाम। अनीत का अखाड़ा, अदूतों का आराम। हराम का हटवाड़ा। हरामजादूं की हाट, खोटूं का खजाना। परेतूं का पाट। विपत का बगीचा। बुराई का वास। काल का कुंडाला। मरी का मेवास, ठगूं का ठिकाणा, सौदूं की सराय। पाप का पुवाड़ा। वसती का बलाय भूतां का भंडार। सीकोरियो का सहायक। डाकणियां का दरबार रोग का रजवाड़ा। सोग की सिरकार। कायरूं की कुटी। चोरूं का आधार।।’

दयालदास ने भी अपने इतिहास-ग्रंथ में एक अपूर्ण दवावैत लिखी है जिसमें बीकानेर नरेश रतनसिंह का वर्णन है। गद्य परिमार्जित है किन्तु उस पर हिन्दी का प्रभाव देखने को मिलता है-

‘गणपति दीजै बुध उक्त का ज्ञान। मैं गाऊं बीकानेर पति मधवान। पारथ से वरणा वली भारत भीम। परीछत परमारथ के सुदाता के सीम। वचनों के दरवासा सील के गंगेल। तपस्या के मृत्यजंय रावन अभिमेल…….। जिस छगा में महाराज के कविराव। विधा के आगर जश रस के विभाव। कश्यप सै उत्पति आरष्टे मात। दिनकर पुराणव्यास, वरण विख्यात। शील के सदन जुत धर्म की मरजाद। षटभाषा जाणैगर अमरु कुल आद।।’

दयालदास के गद्य में स्फूर्ति है और लचक भी। उनका ध्यान सर्वत्र इतिहास की ओर ही अधिक है। यथा-

‘अरु सं० १७२६ आसाढ़ सुद ४ औरंगाबाद मै करणसिंघजी धाम पधारिया। इतरी लारै सती हुई- भटियाणी धनराजौत अजबदे, जैसलमेरी सिणगारदे, बिकुंपुररी कोडमदे, मलणवासी मनसुखदे सरूपसिंघ केसो दासोतरी, साउवाणी। इतरी खवास सती हुई- मोदकळी, रामौती, किसनाई, मेघमाळा, गुणमाळा, चंपावती, रूपकळी, पेमा, कुंजकळी, म्रदंगराय, सहेली अनारकली सती वीस हुई। इतना कंवर हुवा- अनूपसिंघजी, केसरीसिंघजी, पदमसिंघजी, मूणसिंघजी, देवीसिंघजी, अमरसिंघजी, अजबसिंघजी, खुवास रौ वनमालीदास।।’

लेखक वचनिका लिखने में भी पीछे नहीं। राजा श्री रायसिंघजी की वचनका का नमूना यहां दिया जाता है-

‘पीछै महाराज रौ पधारणौ गुजरात री तरफ हुवौ। तठै राव सुलताण भाण रौ आय मिलियौ। तद रायसिंघजी सुलताण नै सीरोही आधी रौ मालक कियौ। अरू आधी जमी पातसाहजी रै खालसै राखी। पातसाहजी रौ फुरमाण अरजी मेल सुलताण रै नामै मंगाय दीनौ। जिण दिनां सिरोही खालसा छी सू सुरताण कदमां आयौ। तद विजौ देवड़ौ हरराजरौ पण महाराज रै कदमां आयौ। तथा लालच पण दिखायौ तौई माराज इण री अरज मानी नहीं। सुरताण री तरफ रया। सू आ वात इण तरै छै।’

इनके अतिरिक्त खुमाण कृत ‘ग्रंथ दवावैत रायजी श्री भगवानदासजी रो’ की भी सूचना मिलती है किन्तु इसका उदाहरण नहीं मिलता। सरस्वती भंडार, उदयपुर में अज्ञात कवियों की महाराणा संग्रामसिंह एवं उदयसिंह पर लिखी हुई दवावैतें भी मिलती हैं। इनसे गद्य के इन विविध रूपों की लोकप्रियता का अनुमान सहज ही में लगाया जा सकता है।

*******छठा अध्याय समाप्त*******

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