चारण साहित्य का इतिहास – सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान)

चारण साहित्य का इतिहास – भाग २

आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान

[सन १८५० – १९५०ई.]

(१) काल विभाजन

आधुनिक चारण साहित्य का द्वितीय उत्थान १९वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से आरम्भ होकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक प्रवाहमान होता है। विदेशी संस्कृति के सम्पर्क में आकर राजस्थान ने जितना खोया उतना पाया नहीं। देशव्यापी प्रतिक्रिया होने से यहाँ भी अनेक अभूतपूर्व आंदोलन हुए जिनको दृष्टि-पथ पर रखते हुए आलोच्य काल को ‘क्रांति-युग’ की संज्ञा दी जा सकती है। राष्ट्रीयता एवं समाजवाद की भावनाओं का विकास होने लगा। राजनीतिक हलचलों एवं सामाजिक क्रांतियों का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा। कवियों का ध्यान राज-मार्ग से हट कर ग्राम-कुटीर की ओर जाने लगा जिससे प्राचीन आलम्बन बदल गये। सन् १८५७ की राज्य-क्रांति के अनन्तर सत्य और अहिंसा ने पथ-प्रदर्शन किया। साहित्य में नवीन भावों का चित्रण हुआ। कविता व्यक्ति से ऊपर उठकर समाज का स्पर्श करने लगी। गांधी का सत्याग्रह बालू के कणों में भी चमकने लगा। राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में फैली हुई कुरीतियों की होली मनाई जाने लगी। इस युग का कवि एक नवीन राग अलापने लगा। भाव के सदृश भाषा में भी परिवर्तन हुए। हिन्दी भाषा एवं साहित्य की उन्नति से राजस्थानी के मार्ग में एक व्यवधान उपस्थित हुआ। फलत: यहां के निवासियों का अपनी मातृभाषा के प्रति सहज अनुराग शनैः-शनैः कम होता गया। अत: चारण कवि राजस्थानी एवं ब्रजभाषा के साथ हिन्दी में भी काव्य-रचना करने लगे। यद्यपि ब्रजभाषा में पुराने ढर्रे के लोग अब भी काव्य-रचना करते थे किन्तु ऐसे कवियों की संख्या अत्यन्त कम है। डिंगल अपना प्रकृत स्वरूप खोने लगी और उसका रूप सरल होने लगा।

(२) राजनैतिक अवस्था

(क) राजस्थान एवं केन्द्रीय सत्ता:- इस काल के प्रथम पन्द्रह वर्षों का समय एक विषम सँक्रांति काल था। अंग्रेजों ने राजस्थान में आधुनिकता का प्रसार अवश्य किया किन्तु उनकी कुटिल नीति एवं शासन-योजना को देखकर सर्व साधारण का हृदय क्षुव्ध हो उठा। क्षत्रिय जाति भी मन ही मन अप्रसन्न थी। अंग्रेज हिन्दू-मुसलमानों के बीच फूट डालकर अपना उल्तू सीधा करते रहते थे। वे भारतीय नरेशों का अस्तित्व मिटा देने की चर्चा करने लगे। लार्ड डलहौजी की राज्य लोप नीति से कई राज्य ज़ब्त हो गये (१८४८ ई०) बम्बई के आइनेम कमीशन तथा अन्य योजनाओं के अनुसार सामन्त-वर्ग की निर्धनता ने उग्र रूप धारण किया। जब साधारण सी बात पर रेजीडेण्ट भारतीय शासकों को डांटने-डपटने लग गये तब उनकी कुल-मर्यादा को ठेस लगी। सती प्रथा बंद कर देने वाले नियम ने वीरांगनाओं को रुष्ट कर दिया (१८३३ ई०)। सैनिकों की धार्मिक भावना को कुचलकर उन्हें विदेशों में लड़ने भेजना, दण्ड स्वरूप समुद्र पार जाने के लिए बाध्य करना तथा वर्ण-व्यवस्था की अवज्ञा से भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहाग्नि भभक उठी। राज्य-क्रांति के समय राजस्थान अज्ञान की मोह-निद्रा में सोया पड़ा था। उसे जगाने के लिए जब भारतीय सेना ने ताँतिया टोपे के नेतृत्व में विद्रोह का झण्डा खड़ा किया तब प्रांतीय राजनीति के पाप-पङ्क में धँसे हुए नरेशों एवं उनके सरदारों ने ‘यूनियन जेक’ की शरण ली और स्वातंत्र्य-संग्राम में मर-मिटने वाले भारतीय सैनिकों का साथ देना तो दूर रहा उल्टा उन्हें कुचलने में अग्रेजों को सहायता पहुंचाई। संचित शक्ति, संगठन एवं वैज्ञानिक साधनों के अभाव में यह आंदोलन असफल रहा। अंग्रेज सरकार को विश्वास हो गया कि साम्राज्यवाद के लिए इन नरेशों के अस्तित्व को बनाये रखना नितांत आवश्यक है। अत: देशी राज्यों का संरक्षण अंग्रेज सरकार की नीति का एक अविभाज्य अंग बन गया। विद्रोह का दमन कर अंग्रेजों ने राजा-महाराजाओं एवं बड़े-बड़े जागीरदारों को उनकी सेवाओं के उपलक्ष्य में नाना प्रकार की उपाधियों से अलंकृत किया।

राज्य-क्रांति के पश्चात् अंग्रेजों ने अपने शासन को लगभग ५० वर्षों तक संगठित किया। इस समय उन्होंने चतुराई के साथ राजस्थान के अर्द्ध-स्वतन्त्र राज्यों को पूर्णरूपेण अपने अधीन रखा। लार्ड लिटन ने जब दिल्ली में शाही दरबार का आयोजन किया (१८७७ ई०) तब गोद लेने तथा मुख्यमंत्री की नियुक्ति के विषय में अंग्रेज सरकार की स्वीकृति लेना आवश्यक हो गया। विभिन्न राज्यों के शासन-प्रबंध में हस्तक्षेप करने की नीति का अब कसकर पालन किया जाने लगा। टोंक, जोधपुर एवं अलवर में ऐसा ही हुआ। लार्ड कर्जन के समय तक अंग्रेजों का प्रभुत्व चूडान्त स्वरूप को प्राप्त हो नया। अब उनका विरोध करना जरा टेढ़ी खीर था। झालावाड के शासक जालिमसिंह (द्वितीय) ने यह दुःसाहस किया था फलत: सन् १८९६ ई० में राज-गद्दी से च्युत कर दिया गया। लार्ड कर्जन ने घोषणा करते हुए कहा भी था- ‘राजमुकुट का प्रभुत्व सर्वत्र नतमस्तक होकर स्वीकार किया जा रहा है। हमारी नीति के फलस्वरूप अब देशी नरेश साम्राज्य के शाही संगठन के एक अखण्डात्मक अंग बन गये हैं।’

राजनैतिक प्रभुत्व के साथ सांस्कृतिक विजय प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा से लार्ड मेयो ने अजमेर में ‘मेयो कॉलेज’ की स्थापना की (१८७५ ई०) जहाँ राजस्थान के भावी नरेशों एवं जागीरदारों को नवीन शिक्षा के साँचे में ढालकर अंग्रेज बनाने का भरसक प्रयत्न किया गया। इसमें उच्चवर्गीय सामन्त समाज पराधीनता का पाठ पढ़कर राष्ट्रीय भावनाओं से शून्य होता गया। किशनसिंह (भरतपुर), भवानीसिंह (झालावाड़), विजयसिंह व लक्ष्मण सिंह (डूंगरपुर), पृथ्वीसिंह (बांसवाड़ा), रामसिंह (प्रतापगढ़), उम्मेदसिंह (शाहपुरा), शालीवाहन व जवाहरसिंह (जैसलमेर) प्रभृति राजकुमार यही ज्ञान-गुटिका लेकर अपने-अपने राज्यों मैं सिंहासनारूढ़ हुए थे। चतुर गंगासिंह (बीकानेर) इस प्रभाव से दूर रहे। इस प्रकार संस्कृति एवं शिक्षा की ओट में क्षत्रिय नरेशों एवं बड़े-बड़े जागीरदारों को दासत्व की शृंखलाओं में कस दिया गया।

अंग्रेजों ने राजनैतिक सम्बन्ध की दृढ़ता के लिए और भी कदम उठाये जिनमें केन्द्रीय दरबार की योजना उल्लेखनीय है। प्राय: समस्त राजा-महाराजा इन दरबारों में उपस्थित होकर अंग्रेजों को सहयोग देने के लिए प्रतिश्रुत होते रहते थे। इंग्लैड के सम्राट पंचम जार्ज के सिंहासनारूढ़ होने के अवसर पर जब दिल्ली में दरबार हुआ तब प्राय: सभी राज्यों ने उपस्थित होकर आत्म-समर्पण कर दिया। इसके लिए उन्हें पद, पदक, प्रशंसा-पत्र एवं तोप-सलामियाँ दी गई, जिन्हें पाकर वे अपनी राजनैतिक श्रेष्ठता एवं गौरव का झूठा स्वांग रचने लगे। अंग्रेजों पर वाह्य संकट आने पर इन्हीं नरेशों को आगे किया जाता था। जब रूस वालों ने अफगानिस्तान की ओर पैर बढ़ाया तब राजस्थान की सम्मिलित सेना ने ही उनकी रक्षा की। इसी प्रकार महायुद्धों में भी इन्होंने विदेशी युद्ध-भूमि मैं पहुँच कर अपने प्राणों की बाजी लगाई थी। इतना होते हुए भी उदयपुर के राणाओं ने सिसोदिया वंश की कुल-मर्यादा का सफलतापूर्वक निर्वाह किया।

(ख) प्रांतीय शासक एवं शासन-व्यवस्था:- अंग्रेजी साम्राज्य के संरक्षण में राजस्थान के विभिन्न अर्द्ध स्वतंत्र राज्यों का शासन-प्रबन्ध प्राचीन जमींदारी पद्धति पर चलता रहा। यद्यपि वाह्य आक्रमणकारियों का अब कोई भय नहीं रह गया था तथापि आंतरिक शांति के दिन दूर थे। जयपुर राज्य के अतिरिक्त प्राय: सारे राज्यों की शासन-व्यवस्था शोचनीय थी। वहाँ सरदारों, भीलों एवं डाकुओं के नित नये उपद्रवों से शाति बनाये रखना कठिन हो गया था। महाराणा सरूपसिंह व सज्जनसिंह (उदयपुर), जसवंतसिंह द्वितीय (जोधपुर) , रतनसिंह, सरदारसिंह एवं डूंगरसिंह (बीकानेर), रामसिंह (भरतपुर), जालिमसिंह द्वितीय (झालावाड़), लक्ष्मणसिंह (बांसवाड़ा), जगतसिंह (शाहपुरा) प्रभृति नरेशों के समय में जो उपद्रव हुए, उनसे राजनैतिक स्थिति डांवाडोल होने के साथ-साथ आर्थिक स्थिति भी बिगड़ गई। पुलिस की कोई उचित व्यवस्था नहीं थी। राज्यों में न तो कानून का ही पालन किया जाता था और न अदालतों का ही कोई क्रमबद्ध संगठन था। दीवानी एवं फौजदारी मुकदमों में राजाओं का प्रमुख हाथ होने से उनकी इच्छानुसार ही न्याय होता था। जेल-व्यवस्था और भी असंतोषजनक थी। जोधपुर राज्य में तो कैदी को खुराक खर्च भी अपनी जेब से देना पड़ता था (१८८४ ई० तक) राज्यों का माली प्रबन्ध भी अत्यन्त अव्यवस्थित था। इतना होते हुए भी कतिपय नरेशों ने प्राचीन एवं अर्वाचीन पद्धतियों का सामंजस्य कर सुधार करने की भी चेष्टा की। इनमें महाराणा शंभूसिंह, फतहसिंह व भूपालसिंह (मेवाड़), रामसिंह, माधोसिंह द्वितीय व मानसिंह द्वितीय (जयपुर), सरदारसिंह, सुमेरसिंह व उम्मेदसिंह (जोधपुर), गंगासिंह (बीकानेर), लक्ष्मणसिंह (डूंगरपुर), नाहरसिंह व उम्मेदसिंह (शाहपुरा) आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। राजस्थान में आधुनिकता लाने का श्रेय इनको ही है। ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ की स्थापना से (१८८५ ई०) राजस्थान की शासन-पद्धति का विरोध हुआ और शांतिमय क्रांति के द्वारा शीघ्र ही प्रजातंत्र की मांग की गई। इसके फलस्वरूप प्रतिनिधि सभाओं की स्थापना हुई जिनमें जनता ने भी प्रवेश किया। अंग्रेजों के संकेतों पर राजाओं ने काँग्रेस तथा अन्य राष्ट्रीय संस्थाओं पर कम अत्याचार नहीं किया किन्तु अन्तत: महात्मा गाँधी का स्वप्न साकार हुआ और सदियों पुरानी शासन-प्रणाली सहसा बदल गई।

(३) सामाजिक अवस्था

इस काल के आरम्भ में सर्वत्र अज्ञान की आँधिया चल रही थीं। अंग्रेजों की अनीति को कार्यान्वित करते रहने से जनता के हृदय में नरेशों के प्रति भक्ति-भाव नहीं रह गया था। सन् १८५८ ई० तक नरेशों के बढ़ते हुए अत्याचारों एवं सरदारों के सतत् विद्रोहों ने प्रजा के लिए अनेक उलझनें उत्पन्न कर दीं। जनता को अपना कोई ऐसा नेता नहीं दिखाई दिया जो दुख दूर करने में सहायक होता। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर निश्चेष्ट सोई पड़ी थी। उसका जीवन निराशामय होता जा रहा था। शनै: शनै: वह राजनीति से उपेक्षित होने लगी। राज-गद्दी को लेकर उठने वाली समस्याओं के प्रति उसकी कोई रुचि नहीं रह गई। राज्य-क्रांति के पश्चात् जन-जीवन में और भी स्तब्धता छा गई। अंग्रेजी काल की पराधीनता ने प्रजा की विचारधाराओं को संकीर्ण बना दिया। उनकी दृष्टि अपने-अपने राज्य तक ही सीमित रही। पड़ोसी राज्यों की गतिविधियों का ध्यान कतिपय शिक्षित व्यक्ति ही रखने लगे। सामाजिक जीवन में कहीं चेतना नहीं दिखाई दे रही थी। लोग जाति, प्रान्त अथवा देश के हित में बहुत कम सोचने लगे। समाज-सुधार की महत्वाकांक्षा से स्वामी दयानंद सरस्वती ने राजस्थान को ज्योतिर्मान किया जिसके परिणामस्वरूप मेवाड़, मारवाड़, डूंगरपुर आदि राज्यों में महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार होने लगे। महात्मा गांधी के विचारों से भी बल मिला। अब लोगों का ध्यान बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, स्त्री-शिक्षा, पर्दा-प्रथा, निरक्षरता आदि की ओर गया।

(४) धार्मिक अवस्था

राज्य-क्रांति के पश्चात् लोगों का ध्यान धर्म-रक्षा की ओर गया। दार्शनिकों एवं संत-पुरुषों ने अपने प्रवचनों के द्वारा उनको भक्ति की ओर लगाये रखा। अनेक आंदोलन हुए जिससे हिन्दू धर्म की समुचित व्याख्या हुई। अनेक देवी-देवताओं के स्थान पर एक ईश्वर की उपासना पर जोर दिया गया जिससे एकता आने लगी। सार्वजनिक समानाधिकार की भावना ने सभी धर्मों के प्रति श्रद्धा-भक्ति उत्पन्न की। इससे धार्मिक सहिष्णुता भी आई और पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि विकारों को दूर करने का प्रयत्न किया गया। प्राय: सभी उपदेशकों ने धर्म की कुरीतियों एवं अंध-विश्वासों को दूर कर उसके निर्मल एवं पवित्र रूप को जन-समाज में प्रतिष्ठित किया। इस दृष्टि से स्वामी दयानन्द सरस्वती के सदुपदेशों से राजस्थान लाभान्वित हुआ। वेदाध्ययन करना, सत्य का पालन करना, सदाचार का अनुसरण करना, ज्ञान का संचय करना एवं समाज-सेवा में सर्वस्व न्यौछावर कर देना इनके मूल मंत्र हैं। वाह्याडम्बर का खण्डन कर ईश्वर को मानव के रूप में चित्रित करना इस समय की प्रधान विशेषता है। साथ ही अध्यात्मिक तथा नैतिक जीवन को विशेष महत्व दिया गया। वर्ण-व्यवस्था एवं जाति-पांति के भेद-भाव नवीन विचारों के आगे स्थिर नहीं रह सके। इस प्रकार देश-काल के अनुरूप एक नवीन धर्म की प्रतिष्ठा हुई। इस कार्य में विभिन्न धार्मिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण योग दिया।

(५) चारण साहित्य

इस काल का चारण साहित्य बहुत बड़ी मात्रा में उपलब्ध होता है। इसे मध्य एवं आधुनिक युग का मनोहर केन्द्र-बिन्दु कहा जा सकता है क्योंकि इसमें जहां अतीत का स्वर है वहां वर्तमान का नव-गान भी। अखिल भारतीय चारण सम्मेलन की योजना एवं उसके अन्तर्गत पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन से अनेक कवि आगे आये, जिन्होंने समसामयिक गतिविधियों से प्रभावित होकर रचनायें लिखी। युद्ध-वर्णन में सूर्यमल्ल मिश्रण ने विश्वविख्यात होमर को भी मात कर दिया। इनके संरक्षण में अनेक कवि साहित्य-साधना करने लगे। इनकी अद्वितीय काव्य-प्रतिभा के विषय में विश्व कवि टैगोर का यह कथन दृष्टव्य है- “मैं स्वयं कवि हूँ। मैंने उच्चकोटि की कवितायें देखी और सुनी हैं पर सूर्यमल्ल की कविता बड़ी ही आह्लादकारी एव अनूठी है।” राष्ट्रीय काव्य की रचना करने मैं भी कवि पीछे नहीं रहे। उन्होंने एक ओर जहाँ अंग्रेजों की भर्त्सना की वहां दूसरी और भारतीय राजनैतिक नेताओं की प्रशंसा की। विभिन्न आन्दोलनों के फलस्वरूप कतिपय कवियों ने सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों का भण्डाफोड़ किया जिससे जनता को सही मार्ग मिला। साथ ही पूर्ववर्ती काव्य-प्रवृत्तियों का भी अभूतपूर्व विकास हुआ जिससे चारण-साहित्य पूर्णरूप से समृद्ध हो गया।

(६) – कवि एवं उनकी कृतियों का आलोचनात्मक अध्ययन

(क) जीवनी-खण्ड:

१. सूर्यमल्ल:-ये मिश्रण शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८१५ ई०) और बूंदी के निवासी थे। इनके माता-पिता का नाम क्रमश: भवानबाई एवं चण्डीदान था। चारण दम्पति ने इनका लालन-पालन बडे लाड़-प्यार से किया था। इससे शिक्षा में बाधा आती देख इनके पिता मारपीट भी किया करते थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा के सम्बन्ध में किंवदंती है कि ५ वर्ष की अवस्था में जब ये पाठशाला गये तब पहले ही दिन लिखना-पढ़ना सीख लिया और तीन दिन में अमरकोष के तीनों ही काण्ड कण्ठस्थ कर सटीक सुना दिये। गुरूजी से इस बात का पता चलने पर माता-पिता के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे इनका अधिक ध्यान रखने लगे। इन्हें नित्य डिंगल के दो गीत बनाने पड़ते थे। इनकी ९ वर्ष कीं आयु का गीत बंगाल-हिन्दी मण्डल के संग्रहालय में विद्यमान है। जब ये ७ वर्ष के थे तब दरबार के पास जाते समय इनके पिता ने एक गीत बना रखने को कहा किन्तु खेल-कूद में मग्न होने से ये भूल गये और उनके लौटने पर कह दिया, हाँ बना लिया और जब सुनाने की नौबत आई तब सुना भी दिया। १२ वर्ष की अवस्था में ये काव्य-शास्त्र में प्रवीण हो गये। घर से बाहर जिन महानुभावों ने शिक्षा दी, उनमें प्रसिद्ध दादू पंथी साधु श्री स्वरूपदासजी महाराज का नाम उल्लेखनीय है। उनका इन पर जितना स्नेह था, इनकी उन पर उतनी ही श्रद्धा थी। मौलाना मुहम्मद साहब से इन्होंने फारसी का अध्ययन किया। एक अन्य बहादुर मुसलमान से संगीत विद्या सीखी। इन सब गुरुओं के प्रति कवि ने आभार प्रकट किया है।

सूर्यमल्ल का जीवन अलौकिक प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है। राजस्थान के किसी भी चारण कवि में इनके जैसी बहुज्ञता नहीं पाई जाती। चारण-कुल परम्परा एवं अनुकूल वातावरण के अनुसार इसका शनै: शनै: विकास होता गया। षटभाषा ज्ञान ने इसे प्रकाशित किया तथा इसमें चमक-दमक उत्पन्न की। इस असाधारण पांडित्य से अपने को धन्य समझकर तत्कालीन बूंदी-नरेश रामसिंह ने इन्हें राज्याश्रय प्रदान किया (१८३६ ई० के आसपास) लगभग २५ वर्ष की अवस्था में आशु कवि के रूप में इनकी कीर्ति-कौमुदी का विस्तार होने लगा। स्फुट पद्यमय बातें करके ये दूसरे के हृदय पर अपनी छाप छोड़ने लगे। जन-समाज में भी लोकप्रियता बढ़ने लगी। राजकवि होने से इनकी यश-पताका अन्य राज्य-दरबारों में भी फहराने लगी। शीघ्र ही अनेक ठिकानों से इनका सार्धम्य स्थापित हो गया, जिनमें भिणाय (अजमेर), जोधपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, प्रतापगढ़ (मालवा), सीतामऊ, रतलाम, मसूदा, जैतगढ़, आउवा एवं पीपल्या के नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं।

चारण-काव्य के दरबारी कवियों में सूर्यमल्ल का व्यक्तित्व सर्वोच्च है। इनके स्मरण मात्र से आखों के आगे एक रुद्र रूप खड़ा हो जाता है, जिसका वाह्य रूप भयावह है, आभ्यंतरिक स्वरूप मृदुल। चारण रक्त एवं रजपूती मज्जा से विनिर्मित इनके अंग-प्रत्यंग में स्फूर्ति रह-रह कर उछलती रहती थी। राजा ने इन्हें कविराजा कहा तो रंक ने ठाकुर। इन्होंने अपनी जन्मजात प्रतिभा से राजा और प्रजा दोनों पर जादू का सा प्रभाव डाल दिया। राज्य से दुखी होकर लोग इनके पास आते और राजा-महाराजा मित्रता के लिए हाथ बढ़ाते थे। और तो और ब्रिटिश सरकार के एजेण्ट भी आवश्यकतानुसार विचार-विमर्श करते रहते थे। संत-महात्माओं के सदृश इनमें भक्ति का निरूपण, दर्शन की मीमांसा एवं उपदेश का आग्रह नहीं किन्तु क्षत्रियत्व को प्रशस्त करने की तीव्र भावना है और है उसके आदर्शों को अक्षुण्ण बनाये रखने की महत्वकांक्षा। यह लक्ष्य करने की बात है कि ये वीर-काव्य के अद्वितीय प्रणेता ही नहीं प्रत्युत क्षत्रियत्व के खरे समालोचक भी हैं। एक राज्याश्रित कवि की यह विद्वत्ता, गुणग्राहकता एवं निष्पक्षता उसकी महानता का प्रतीक है। इनकी दृष्टि में कवि का आदर्श ऊंचा था। परिस्थिति से दबकर वाणी का क्रय-विक्रय तथा झूठी प्रशंसा करना ये कवि का कर्म नहीं मानते। ये कवि ही नहीं अपितु पंडित, गुणी, रसिक एवं सगीतज्ञ भी थे। अक्खड़ता में ये कबीर से बातें करते हैं किन्तु उनके जैसी फक्कड़ता नहीं। इनका जीवन रईसों का जीवन था, अनेक सईसों की कतार द्वार पर खड़ी रहती थी। अपने समकालीन आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता भारतेंदु के समान इनमें विलास एवं मस्ती की पर्याप्त मात्रा थी। राज्य-भक्ति के साथ राष्ट्रीय भावनाओं से भी ओत-प्रोत थे। इनका स्वभाव एवं प्रकृति अनेक प्रकार की विचित्रताओं से परिपूर्ण है। ऊपर से तेज मिजाज एवं रूखे दिखाई देते थे और छोटी-छोटी बातों पर बिगड़ने में देर नहीं करते थे। जब तीसरा नेत्र खुलता तब बड़ी कठिनता से बंद होता था। इनके मानस में स्पष्टवादिता, खरापन एवं स्वच्छंदता की तरंगें कभी-कभी मान-मर्यादा के फूलों का उल्लंघन भी कर देती थीं। सत्य की राह पर तो ये सीधा कह देते यहां तक कि अपने आश्रयदाता को भी डांट देते थे। इन्होंने कभी किसी की चिन्ता नहीं की और सदैव अपने राग-रंग में डूबे रहे। इन विचित्रताओं के रहते हुए भी इनकी हृदयस्थली में कोमलता, सहृदयता एवं उदारता के अंकुर विद्यमान थे।

बूंदी-नरेश महाराव रामसिंह साहित्य के प्रेमी थे। एक दिन अपने पंडित आशानंद ब्राह्मण से महाभारत की कथा सुनते-सुनते उन्होंने इच्छा प्रकट की कि देववाणी के सदृश लोकभाषा में भी एक ऐसा विशाल ग्रंथ होना चाहिए जिसमें चौहान वंश की खोजपूर्ण विस्तृत व्याख्या हो। इस कार्य के लिए उन्हें सूर्यमल्ल से बढ़कर और कोई योग्य व्यक्ति नहीं दिखाई दिया अत: इन्हें बुलाकर इस कार्य को पूरा करने के लिए कहा गया (१८४० ई० के आस-पास) इन्होंने महाराव को स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया- ‘मैं आपकी आज्ञा से बनाऊंगा तो सही, परन्तु जो सच बात होगी वही लिखूंगा। आप बुरा न मानें।’ महाराव ने यह बात स्वीकार कर ली और ये ग्रंथ-निर्माण के लिए साधन-सामग्री जुटाने में लग गये। इससे इनके जीवन में एक नवीन अध्याय का सूत्रपात हुआ जो जीवन-पर्यंत कभी बंद नहीं हुआ। कार्य भी ऐसा जटिल था, जिसमें पीढियां खप सकती थीं। यत्र-तत्र बिखरी हुई बहियों एवं ख्यातों को कठोर परिश्रम से एकत्रित किया गया और ग्रंथ का श्री गणेश हुआ। इसके रचना-काल की दैनिक जीवनचर्या अत्यंत रोचक एवं दिलचस्प है। ये रात-दिन काव्य-साधना में लीन रहते। प्रात: से सायं तक चार लिपिकारों को इनके पास रहना पड़ता था जिनमें अंबालाल दाहिमा, नंदराम गूजर गौड़, हुंडा दाहिमा एवं मुकुन्द गूजर गौड़ के नाम लिए जाते हैं। इनमें अंबालाल इनके विशेष कृपा-पात्र थे। कविता बनाने का कोई समय निश्चित नहीं था। सब कुछ मन-तरंग पर निर्भर था। शराब की चुस्ती के साथ काव्य-सृजन चलता रहता। जैसे ही अग्नि-रेखा घट में प्रवेश करती वैसे ही एक हूक उठती और अचानक स्फूर्ति आते ही कहते ‘हूँ’। इस शब्द को सुनकर लिपिकार सावधान होकर अपने-अपने आसन पर बैठ जाते। ये धारा प्रवाह बोलना आरंभ करते और वे कलम उठाकर लिखने लगते थे। इस भीषण विचक्षण आशु कवि से जो कोई जितना चाहे और जिस विषय, भाषा एवं छंद में चाहे, लिखा ले।

सूर्यमल्ल स्वजाति के हितैषी एवं राजपूत जाति के जागरूक पहरेदार थे। इनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि चारण जाति पढ़-लिखकर ज्ञानी बने और क्षत्रिय जाति का पथ-प्रदर्शन करे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये सतत् प्रयत्नशील रहते और विकारों की भर्त्सना किया करते थे। मानवीय क्षुद्रताओं एवं अनुचित व्यवहारों को देखकर इनकी आत्मा तिलमिला जाती। ३६ वर्ष की अवस्था में जब लसाड्या (अजमेर), मूंदाली (किशनगढ़) एवं कचोल्या (जयपुर) के कुछ चारणों ने अपने पारिवारिक सदस्यों पर अत्याचार करना आरम्भ किया तब इन्हें बाध्य होकर अपनी हवेली में अनेक राज्यों के चारण-मुखियों को आमंत्रित कर अन्यायियों का बहिष्कार कराना पड़ा। इस प्रकार त्याग को लेकर इन्होंने चंपालाल बोहरा (बांसवाड़ा) से लड़ाई की थी। यह उल्लेखनीय है कि इनके संरक्षण में रहकर अनेक मेधावी चारण कलाकारों ने विद्याध्ययन किया जिनमें गणेशपुरी का नाम उल्लेखनीय है। अन्य शिष्यों में वल्लभ, सीताराम, हरदान, विजयनाथ, मोतीराम, बख्शीराम, धूकल एवं मुरारिदान के नाम सगर्व लिये जा सकते हैं। राजपूतों की मान-मर्यादा की रक्षा करने हेतु ये सदैव शिक्षा दिया करते थे। जब एक बार ये भिणाय (अजमेर) गये हुए थे तब रानी कमला बाई ने इनके पास कुछ मूल्यवान चूनड़ियां पसंद व कीमत करने के लिए भेजी क्योंकि वे इनकी पत्नी को उपहार स्वरूप भेजना चाहती थीं। कविराजा ने उन चूनड़ियों को यह कहकर लौटा दिया- “इनकी कीमत तो मैं तब करूंगा, जब तुम राजाजी (बलवंतसिंह) के मरने पर इनको पहनकर सती होगी।” कहते हैं, समय आने पर रानी ने चूनड़ी पहनी और चितारोहण के समय आदमी भेजकर इन्हें सूचना दी। कवि के हाथों में पड़कर यह घटना काव्य का अमर छंद बन गई। ब्रह्ममुहूर्त्त में अपने स्वामी के लिए नित्य की यह प्रार्थना कैसी? “हे भगवान् भास्कर, एक दिन ऐसा भी उगे कि जब मेरे स्वामी का मुण्ड घोड़ों की टापों में लुढ़कता मिले।” पतिव्रता एवं नवविवाहिता रानी नगोदणी को यह बुरा लगा। उसने इनको कहलवाया भी जिससे ये और चिढ़ गये। उत्तर दिया- “मैं यही कामना करता हूँ कि मेरा स्वामी दीर्घायु ही क्या अमर हो जाय। यदि मेरी प्रार्थना स्वीकृत हुई और तुमने भी कर्त्तव्य का पालन कर सहगमन किया तो तुम्हारे पति के साथ तुम्हें भी अमर कर दूंगा। कहते हैं, जब महारानी ने यह बात अपने पति के कानों में डाली तब उन्होंने यही कहा कि एक राजपूत के लिए इससे अधिक शोभा की बात और क्या हो सकती है?

सूर्यमल्ल का जीवन-चरित चारण एवं राजपूत जाति की घनिष्टता का सुनहरा प्रतीक है। प्राय: चारण कवि राजाओं का कीर्ति-गान करते पाये जाते हैं किन्तु यहां बात ही दूसरी है। अनेक सारग्राही नर-नरेश इन्हें अपने यहां आमंत्रित करने के लिए तरसते और जाने पर भाव-भरा आदर-सत्कार करते थे। उदाहरणार्थ, देवगढ़ (मेवाड़) के रावतजी ने इन्हें अपने यहां बुलाते समय दूर तक अगवानी ही नहीं की प्रत्युत बड़े सम्मान से तख्त पर बैठाकर स्वयं अपने हाथों से हुक्का भर कर पिलाया था। इसी प्रकार रतलाम नरेश बलवंतसिंह ने ढाई कोस तक अगवानी करके पालकी में कंधा भी दिया था। इस प्रीति-भाव के कारण इन्हें अनेक रजवाडों की यात्रा करनी पड़ी यहां तक कि आगरा एवं काशी भी जाना पड़ा था। सबकी यही इच्छा रहती, ये उनके विषय में कुछ न कुछ लिख दें। जोधपुर नरेश जसवंतसिंहजी ने इन्हें ६०-७० हजार की जागीर देकर कुछ समय के लिए अपने यहां बुलाना चाहा किन्तु उन्होंने प्रस्ताव ठुकरा दिया। इसी प्रकार रतलाम नरेश बलवंतसिंह ने इन्हें २५ हजार की जागीर देनी चाही किन्तु इन्होंने यही कहा- “क्या करूं? रामसिंह के बिना मेरा दिल नहीं लगता है।”

महान विभूतियों, विशेषत: कवियों की दैनिक चर्या बड़ी ही विचित्र होती हे और सूर्यमल्ल भी इसका अपवाद नहीं। इनके चरित में कन्चन, कादम्ब एवं कामिनी का सुयोग देखते ही बनता है। कंचन इनके लिए साधन मात्र था, साध्य नहीं। यदि इन्हें बूंदी राज्य-कोष की कुंजी कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। कहते हैं, इन्हें प्रतिदिन दरबार को बिना पूछे पाँच हजार तक व्यय करने की आज्ञा थी। उपहार तो न जाने कितने मिला करते थे? कादम्ब इनके जीवन का सर्वस्व था। आठों पहर इसका सेवन करते। नशा इनके लिए काव्य था या काव्य नशा – इसका निर्णय करना कठिन है। संदेह नहीं कि इसका सेवन सांसारिकता को भुलाने एवं काव्य-शक्ति को जगाने के लिए किया जाता था। यह देखकर राव एवं उमराव अपने यहाँ तैयार किया हुआ बढ़िया से बढ़िया आसव इनके पास भेजा करते थे। शराब के नशे में कभी-कभी ये संतुलन खो देते थे। प्रवाद है कि जब एक दिन ये नशे में चूर होकर बैठे थे तब हरलिया नाम के चाकर ने ६ मास की गुड़िया सी कन्या को लाकर इनकी गोद में रखा और इन्होंने उसे प्यार से इतना हिलाया-डुलाया कि उसकी साँस ही निकल गई। इसी प्रकार थूणपुर (कोटा) वाली ठकुराणी महियारिणी की दाह-किया के समय श्मशान घाट पर शराब पीकर परिक्रमा लगाना तथा बहादुर कलावंत से तम्बूरा छीनकर “लाडीजी घूंघटड़ो खोलो म्हाने देखण रो चाव छै” नामक शोक-गीत गाना, रतलाम-नरेश के स्वर्गवास पर तालाब के किनारे कविता की जलांजलि देना प्रसिद्ध हैं। जहां तक नारी का सम्बंध है, वह इनके जीवन में स्फूर्तिदायक प्रेरणा बनकर आई थी। इनके ६ स्त्रियां थीं- दोला, सुरजा, विजयका, जसारु, पुष्पा एवं गोविन्दा। संभव है, संतान न होने से इतने विवाह करने की आवश्यकता हुई हो! ये गणिका-गायन के विशेष प्रेमी थे। जब झज्झर ग्राम की गणिका पर मुग्ध होकर काव्य-रचना शिथिल पड़ गई तब बूंदी-नरेश ने उसे इनाम देकर चुपके से भगा दिया। जब इन्हें इस बात का पता चला तब कपड़े जला दिये, भस्म रमा ली और सन्यास लेने पर उतारू हो गये। निदान अपनी वंश-कीर्त्ति में व्यवधान आते देख चतुर नरेश ने इनके पास नित्य ही मनोरंजनार्थ एक नहीं अनेक गणिकाओं को भेजने की आज्ञा दे दी। इसी प्रकार एक गायन पर न्यौछावर होकर इन्होंने गणिका को पाँच सौ रूपये इनाम देने के लिए खजानची के नाम पत्र भेजा किन्तु उसने अधिक समझकर इनकी बात टाल दी। जब गणिका ने लौटकर इस बात की शिकायत की तब इन्होंने उसमें पाँच सौ और जोड़ दिये। उधर खजानची दरबार के पास पहुँचा होगा कि इधर गणिका ने दौड़कर पाँच सौ और बढ़वा दिये। अंत में रामसिंह जी ने निर्णय किया कि पहले लिखी हुई रकम पाँच सौ की पूर्ति खजाना करे और बाकी एक हजार खजानची भरे।

सूर्यमल्ल का जीवन-वृत्त अनेक मनोरंजक घटनाओं का अद्‌भुत जाल है। ये बूंदी के पाँच रत्नों में से एक थे। राजमहल में इनका एक विशेष स्थान नियुक्त था किन्तु अपना अधिकांश समय महाराजा जगन्नाथसिंहजी की हवेली में व्यतीत करते थे। इन्हें गुलेल चलाने का शौक था। इससे पड़ोसी बंदरों के आतंक से निश्चिंत रहते थे। इनके कनिष्ट भ्राता जयलाल जी अपने समय के प्रसिद्ध वैयाकरण थे, आवश्यकतानुसार इनकी शंकाओं का समाधान करते रहते थे। जब ऊब जाते तब सितार लेकर हवेली में इमली के पेड़ पर बनाये हुए मचान पर जा बैठते और गाने लगते- “मीसण थारो मनड़ो कहूं न दीसै”. . . . अपने स्वजनों पर विपत्ति आई देख जो कह देते, वह करके दिखाते थे। कहते हैं कि पाटन के एक बनिये की दुकान पर जब दरबार की आज्ञा से ताला लग गया तब इन्होंने खुलवा दिया था। इसी प्रकार अपने विश्वासपात्र अंबालाल दाहिमा के यहाँ कन्या-जन्म के समय तंगी देखकर इन्होंने राजकीय प्रबंध करा दिया था। यही दाहिमा जब ‘गंगालहरी’ का पाठ करते समय महाराव की मिथ्या प्रशंसा का कोप-भाजन बना तब इन्होंने बूंदी-नरेश को लिखा- “आज ज्ञात हुआ कि प्रशंसा करने से आप हमारे लेखकों के दरोगा चौबे अंबालालजी से नाराज हो गये। यह नई बात मालुम हुई और खयाल आया कि मैंने तो आपकी बहुत प्रशंसा की है और आगे भी करने की इच्छा है – सो इस तरह आप कभी मुझ पर भी नाराज हो सकते हैं। आपको वास्तविकता से इतना प्रेम हो तो ऐसी खरी-खरी सुनाई जाय कि फिर न मुँह दिखाओगे और न हमारा मुँह देखना पसन्द करोगे।” यह पत्र आगे आने वाली घटना का पूर्वाभ्यास था।

सूर्यमल्ल एवं रामसिंह की अनन्यता को देखते हुए क्या कोई इनके भिन्नत्व की कल्पना कर सकता है? इस वस्तु जगत में अभिन्न मित्रता कहाँ पड़ी है? प्राय: बड़े से बड़ा संसर्ग लोभ एवं स्वार्थ के छोटे प्रसंग से टूट जाता है और फिर उसका ताल-मेल बैठाना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में निन्दक भी कान भर दिया करते हैं जिससे चित्त विक्षिप्त होकर विपथ-गामी बन जाता है। यही बात हम राजा और कविराजा के सम्बंध में पाते हैं। लगभग १० वर्ष की कठोर तपश्चर्या के पश्चात् इन दोनों में विरोध आरम्भ हुआ जो किसी छोटे से प्रसंग के विस्फोटित होने की प्रतीक्षा करने लगा (१८५२ ई० के आस-पास) कोई आश्चर्य नहीं, अर्थाभाव से अथवा अधिक व्यय से मनमुटाव हुआ हो। कहते हैं, इस बीच जब कोई दरबार के यहाँ से इनके पास कार्य की प्रगति के विषय में पूछने आता तब ये उसके पीछे पत्थर लेकर मारने दौड़ते और वह बेचारा बड़ी कठिनता से अपने प्राण बचाता था। एक दिन यही दशा मुकुन्द गूजर गौड़ की हुई। चारण विद्वानों का कथन है कि जब बूंदी-नरेशों का क्रमिक गुणावगुण लिखते-लिखते रामसिंह का नाम आया और इन्होंने खरा-खरा लिखना आरम्भ किया तब महाराव से इनकी अनबन हो गई (१८५५ ई०) जान पड़ता है, रामसिंह ने कवि को कुछ ऐसी बात लिखने के लिए अवश्य कह दिया था जिसके लिए इनका हृदय साक्षी नहीं देता था। मुंशी देवीप्रसाद के मतानुसार एक बार इन दोनों में झड़प भी हुई थी। महाराव ने खीझकर कहा-“आपने मेरे बाप-दादा वगैरह के जो दोष लिखे हैं, उनको पढ़कर तो मैंने जैसे-तैसे सबर किया परन्तु अपने दोषों के लिए नहीं कर सकता। ” इन्होने अक्खड़ता से उत्तर दिया-“जब सबके दोष लिखे गये हैं तो आपके भी लिखे जायेंगे। ” यह हौसला देखकर रामसिंह बोल उठे-“ऐसे लिखने से तो नहीं लिखना अच्छा है। ” अपने वर्षों के श्रम, साधना, सेवा एवं काव्य पर सहसा पानी फिरते देख कवि को जो मर्मान्तक पीड़ा हुई होगी, उसकी कल्पना सहज ही में की जा सकती है।

सूर्यमल्ल का समस्त जीवन एक असाधारणत्व लिए हुए था। निःसंतान होने के कारण इन्होंने मुरारिदान को गोद ले लिया जिन्होंने रामसिंह की आज्ञा से ‘वंशभास्कर’ के अपूर्ण अंश को पूर्ण किया। राज्य-सेवा से विमुख होकर कवि १३ वर्ष तक और जीवित रहा और ५३ वर्ष की अवस्था में शरीर त्याग दिया (१८६८ ई०)

सूर्यमल्ल ने कुल ८ रचनायें लिखी जिनमें ‘वंशभास्कर’ (४ भाग, प्रकाशित) विशेष प्रसिद्ध है। इसे राजस्थानी का महाभारत कहा जाता है जिसकी सटीक पृष्ठ सँख्या ४३६८ है। मूल ग्रंथ २५०० पृष्ठों का है। यह ग्रंथ १५ वर्ष की साधना का सुफल है (१८४०-५५ ई०) इसके पश्चात् ऐसा विशाल ग्रंथ कोई नहीं लिखा गया। वीर काव्य की दृष्टि से ‘वीर सतसई’ (प्रकाशित) का घना मूल्य है (१८५७ ई०) इसके प्रामाणिक दोहों की संख्या २८८ है। पिता की लिखी हुई ‘पल विग्रह’ नामक रचना इनके द्वारा पूरी हुई थी। १० वर्ष की अवस्था में ‘रामरंजाट’ नामक ग्रंथ बनाया जिसमें अपने आश्रयदाता के आखेट का वर्णन है। ‘सती रासो’ की रचना भिणाय (अजमेर) की रानी के सती होने पर की गई थी। ‘छंदोमयूख’ छंद-शास्त्र विषयक ग्रंथ है। ‘बळवद्विलास एवं बलवंतविलास’ में भिणाय एवं रतलाम के राजाओं का चरित वर्णित है। ‘धातु रूपावली’ का पता नहीं लगता। इनके अतिरिक्त फुटकर कवित्त-सवैये आदि भी बहुत उपलब्ध होते हैं।

२. चंडीदान:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और कोटा के निवासी थे। इन्हें महाराव राजा रामसिंहजी का आश्रय प्राप्त था जिन्होंने इन्हें कविराजा की उपाधि से अलंकृत किया था। इन्हें संस्कृत, हिन्दी, डिंगल एवं पिंगल भाषाओं का ज्ञान प्राप्त था। इनका रचना-काल सन् १८४३ ई० माना जाता है। सूर्यमल्ल मिश्रण से इनकी प्रतिस्पर्द्धा चलती रहती थी। देवी की स्तुति में एक-आध कवित्त बनाना इनका नित्य नियम था। इनका निधन सन् १८८० ई० में हुआ था।

३. गोपालदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८१५ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत सीकर जिले के उदयपुरा (चोखा का बास) नामक ग्राम के निवासी थे। ये प्रसिद्ध अल्लू भक्त की वंश परम्परा में से थे। इनके पिता-पितामह का नाम क्रमश: खुमान एवं ज्ञान था। डिंगल-पिंगल रचयिता बालाबख्श इनके मामा थे। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा अपने काका रामनाथ कविया से प्राप्त की थी। आगे विद्याध्ययन के लिए तिजारा (अलवर) के श्री बलवंतसिंह रईस के यहां चले गये जहां इन्होंने फुटकर कविता लिखना आरम्भ किया। ये महाकवि सूर्यमल्ल के समवयस्क एवं समकालीन थे। इन्होंने अपने काका के साथ सूर्यमल्ल से बूंदी में भेंट की थी और वंशभास्कर का अध्ययन किया था जिसका प्रभाव इनकी कला-कृतियों पर पड़ा। इनकी कवित्व-शक्ति पर प्रसन्न होकर सीकर के रावराजा माधोसिंह ने राज्याश्रय प्रदान किया था। इनके तीन भाई और एक बहिन थी। इनके दो विवाह हुए और पाँच पुत्र एवं दो पुत्रियां हुईं। इनका स्वर्गवास ७० वर्ष की अवस्था में हुआ था (१८८५ ई०)

गोपालदान ने पद्य के साथ-साथ गद्य-साहित्य की भी सेवा की है। यह गद्य इनकी कृतियों के बीच-बीच में देखने को मिलता है। इनके लिखे हुए ग्रंथों में ‘शिखार-वंशोत्पत्ति पीढ़ी वार्त्तिक’ (सीकर का इतिहास) १८६९ ई० एवं ‘कूर्मवंश-यश प्रकाश’ (लावारासा) प्रकाशित भी हो चुके हैं (१८७३ ई० के आस पास) इन दो ग्रंथों के अतिरिक्त इन्होंने राज्याज्ञा से ‘कृष्णविलास’ एवं स्फुट गीत भी लिखे हैं। कहते हैं कि इन्होंने ‘काव्य प्रकाश भाषा’ एवं ‘सभा प्रकाश भाषा’ नामक दो अन्य ग्रंथों की सृष्टि की थी जो अभी तक अप्रकाशित हैं।

४. गणेशपुरी:- ये पातावत शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८२६ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत परबतसर परगने के चारणवास ग्राम के निवासी थे। इनके पिता का नाम पद्मसिंह था। आरम्भ में इनका नाम गुलाबदान था किन्तु कालांतर में सन्यास लेने के कारण इन्हें महात्मा एवं गोस्वामी कहकर सम्बोधित किया जाने लगा। ‘पूत के पांव पालने में ही दीख जाते हैं’ इसके अनुसार इनके होनहार होने की आशा बचपन से ही की जाती थी। एक बार जब ये भैसों को चराकर सायंकाल अपने घर लौट रहे थे तब बालसुलभ चपलतावश एक भैस पर सवार हो गये। एक परिचित सन्यासी ने इन्हें इस प्रकार देरवकर कहा- ‘वाह गुलाबदान! हमने तो सोचा था कि पद्मजी का बेटा सपूत होगा और लाखपसाव प्राप्त कर हाथी पर चढ़ेगा किन्तु आज हमारी धारणा निर्मूल सिद्ध हुई।’ ये शब्द इनके हृदय मैं शूल की तरह चुभ गये और ऐसे लज्जित हुए कि इन्हें अपना काला अक्षर भैंस बराबर दिखाई दिया।

सन्यासी के वचनों से प्रेरित होकर गणेशपुरी का ध्यान शिक्षा की ओर उन्मुख हुआ। घर में उपयुक्त वातावरण न होने से ये रिवदान महडू (बोरून्दा) के संरक्षण में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने लगे। वहाँ रहकर इन्होंने अलंकार, छंद, नायिका भेद एवं पिंगल का ज्ञान प्राप्त किया और स्फुट कविता भी लिखने लगे किंतु पर्याप्त अध्ययन के अभाव में इन्हें संतोष नहीं हुआ। आगे के लिए इन्हें सूर्यमल्ल मिश्रण (बूँदी) दिखाई दिये किन्तु उनके पास जाने में सबसे बड़ी बाधा यह थी कि वे पातावत बारहठ को नहीं पढ़ाते थे। इसका कारण यह बताया जाता है कि इस शाखा के लोगों ने किसी मिश्रण चारण की भूमि पर अधिकार कर लिया था। विद्या-प्रेमी गणेशपुरी को यह जातिगत राग-द्वेष अधिक दिनों तक नहीं रोक पाया। सम्भव है, इस विषय को लेकर इन दोनों में बातचीत हुई हो किन्तु डाँ० मेनारिया ने गुलाबदान को गुप्तजी बनाकर जिस किंवदंती का उल्लेख अपने ग्रंथों में किया है, वह विश्वसनीय प्रतीत नहीं होती। उसका खण्डन करते हुए चारण-समाज विशेषत: कवि के भतीज श्री चंडीदान का दावा है कि गणेशपुरी अपढ़ अवस्था में सूर्यमल्ल के पास नहीं गये थे।

गुलाबदान डिंगल-पिंगल के ज्ञाता थे और इन दोनों भाषाओं में काव्य-रचना करते थे। चारण विद्वानों का कथन है कि एक बार नायिका भेद के प्रसंग को लेकर इनका कविराजा मुरारिदान (जोधपुर) से वाद-विवाद हो गया, जिसमें यह विजयी हुए किन्तु कुछ लोगों के पक्षपात से प्रौढ़ कविराजा विजयी घोषित कर दिये गये। इस घटना से इनके मानस-पटल पर विषाद की रेखायें खिंच आई और ये आगे संसार के प्रति उदासीन हो गये। कोई-कोई यह छेड़-छाड़ मेवाड़ में किसी अन्य चारण से होना बताते हैं किन्तु इनके भतीज इसका विरोध करते हैं। जो हो, इस प्रकार की घटनाओं से इनके अन्तस्तल मे वैराग्य के अंकुर प्रकट होने लगे। इधर बढ़ती हुई अवस्था को देखकर बड़े भाई इनका विवाह करने वाले थे कि रात्रि के समय ये सहसा अपनी जन्मभूमि को त्याग कर ज्ञान की खोज में निकल पड़े और अजमेर में एक प्रसिद्ध गुसाइयों के स्थान पर जाकर सन्यास ले लिया। यहीं इन्होंने अपना नाम बदलकर गणेशपुरी रखा। गणेशपुरी की मेधा शक्ति अत्यंत तीव्र थी। सत्य की सतत शोध ने इन्हें सदैव क्रियाशील बनाये रखा। श्री चंडीदान के मतानुसार अजमेर में साधुओं के पास भी इन्हें शांति नहीं मिली तब इन्होंने सूर्यमल्ल के पास जाने का निश्चय किया। अत: ये वहाँ से बूंदी की ओर चल पडे। ग्रीष्म ऋतु में तृषा से व्याकुल होकर इन्हें अपनी वैराग्य-भावना बड़ी कष्टदायक प्रतीत हुई। घर लौट जाने के संकल्प-विकल्प में ठाकुर कवि के सवैयों ने इन्हें मार्ग-दर्शन प्रदान किया। कहते हैं बूंदी पहुंच कर इन्होंने अपने विद्या-बल से सूर्यमल्ल को प्रसन्न किया और उनके पास अपना ज्ञान बढाया। सूर्यमल्ल ने एक दिन प्रसन्न होकर कहा- “गोसाईं! तू बड़ा विलक्षण बुद्धि का व्यक्ति है अत: काशी विद्या पीठ चला जा और कुछ समय तक वहां संस्कृत का अध्ययन कर। मेरे पास इतना समय नहीं कि तुझे वह पढ़ा दूं।” इस आदेश को पाकर फिर ये काशी चले गये। वहाँ ये एक तपस्वी के समान वल्कल धारण कर पत्ते पर भोजन करते और नियमित रूप से संस्कृत का अध्ययन करते रहते थे। इसके लिए इन्हें ‘मुग्ध बोध’ व्याकरण बहुत प्यारा लगा। ५ वर्ष तक ये काशी में रहे फिर वहां से बूंदी लौट आये। सबसे पहले महाराव रामसिंहजी से मिले, जिन्होंने इनका बहुत आदर-सत्कार किया। बूँदी में यह नियम था जो कोई दरबार से मिलता उसे पहले सूर्यमल्ल से मिलकर विद्वत्ता का प्रमाण-पत्र प्राप्त करना आवश्यक था किन्तु ये सीधे ही मिले। महाराजा से वार्ता करते समय सूर्यमल्ल भी वहां आ पहुंचे। इन्होंने चरण-स्पर्श कर अपने शिष्यत्व का परिचय दिया। नाम ज्ञात होने पर सूर्यमल्ल अत्यंत प्रसन्न हुए और इन्हें अपने हृदय से लगा लिया। तत्पश्चात् सूर्यमल्ल ने इन्हें अपने पास ५ वर्ष तक और विद्या पढ़ाई। इस प्रकार कठोर साधना करते-करते ये पूर्ण विद्वान हो गये। सूर्यमल्ल ने इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा- “यदि गुरू कहने से किसी का भला हो तो मेरी तुझे आशीष है कि भगवान तेरा भला करे और मेरे सब शिष्यों में तू प्रधान गिना जाय।”

गणेशपुरी अपनी परिपक्व अवस्था में राजस्थान के राज्यों में इधर-उधर घूमते रहते। मारवाड़ एवं मेवाड़ में इनका विशेष आदर हुआ। इन्होंने अपने जीवन-काल में कई शिष्यों को ज्ञान-दान दिया। रोहड़िया शाखा के बारहठ किशोरदान इनके प्रिय शिष्य थे। गुणग्राही महाराणा सज्जनसिंह के आग्रह से इन्होंने कुछ समय के लिए मेवाड़ में निवास किया। इनके सम्पर्क में आकर महाराणा भी कविता करने लगे। यह उल्लेखनीय है कि इनका डिंगल, पिंगल एवं संस्कृत का उच्चारण अत्यंत स्पष्ट एवं शुद्ध होता था। साथ ही कविता पढ़ने का ढंग ऐसा प्रभावशाली था कि सुनने वाले आनंद-भाव में मग्न हो जाते थे। साधारण रचना भी इनके मुंह से निकलकर असाधारण हो जाती थी। इस प्रकार संयमित जीवन व्यतीत करते हुए एक दिन कोटा में इनका स्वर्गवास हो गया।

गणेशपुरी की लिखी हुई अनेक रचनायें बताई जाती हैं जिनमें से चार के नाम प्राप्त होते हैं- मारू महराण, वीर विनोद, भरतृर्हरिशतक एवं जीवनमूल। ‘वीर विनोद’ (कर्णपर्व) एक प्रकाशित ग्रंथ है, जो राजस्थान में बहुत प्रसिद्ध है। इनके अतिरिक्त फुटकर कवित्त-सवैये भी बहुत उपलब्ध होते हैं।

५. कमजी:- ये दधवाड़िया शाखा में उत्पन्न हुए थे और उदयपुर के निवासी थे। ‘वीर विनोद’ के रचयिता महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास इनके पुत्र थे। इनकी गणना प्रतिष्ठित नागरिकों में की जाती थी। इनके लिखे हुए फुटकर गीत मिलते हैं।

६. भवानीदान:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और कोटा के निवासी थे। इन्हें कोटा-नरेश ने कविराजा के पद से विभूषित किया था। इनकी स्फुट कवितायें मिलती हैं।

७. बख्शीराम:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के ढाढरवाड़ा गाँव के निवासी थे। इनकी फुटकर कविता उपलब्ध होती है।

८. नवलदान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८२३ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत गांव छीडिया के निवासी थे। आप बड़े देश-भक्त थे। इनका स्वर्गवास सन् १८९३ ई० में हुआ। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें मिलती हैं।

९. शंकरदान:- ये सामौर शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८२४ ई०) और बीकानेर राज्यान्तर्गत सुजानगढ़ तहसील के गांव बोबासर के निवासी थे। ये अपने पिता शेरदानजी के इकलौते पुत्र थे अत: बाल्यकाल सुख-वैभव में ही व्यतीत हुआ। सन १८४७ ई० में इनके पिता का देहान्त हो गया और सन १८५० ई० में पत्नी भी चल बसी। अत: इनके मन को गहरी चोट पहुंची।

बाल्यकाल से ही शंकरदान की रुचि साहित्य की ओर थी। ये अपने चचेरे भाई पृथ्वीसिंह से दुरसाजी के दोहे, आशाजी बारहठ के उमादे के कवित्त तथा ईसरदासजी के हाला झाला रा कुण्डलिया के छंद बड़े चाव से सुनते थे। काव्योचित संस्कारों के निर्माण का श्रेय इसी पृथ्वीसिंह को है। संस्कृत का सामान्य एवं राजस्थानी का विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर इन्होंने काव्य-रचना करना आरंभ किया। इन्हें भगवती दुर्गा के शक्ति स्वरूप का इष्ट था।

शंकरदान ने साहित्य के साथ तत्कालीन राजनीति में भी महत्वपूर्ण भाग लिया, साथ ही कई सामाजिक कुरीतियों में सुधार किया। इनका जीवन संघर्षमय अधिक था अत: आप बड़े निर्भीक थे। आत्म-गौरव की भावना प्रबल होने से इन्होंने राज्याश्रय में रहना पसन्द नहीं किया और न किसी प्रकार की जागीर ही स्वीकार की। सीकर-नरेश ने पिपरालो गांव और बीकानेर-नरेश ने तीन गाँवों का पट्टा दिया किन्तु इन्होंने नहीं लिया। स्वाभिमानी इतने थे कि रोडू गांव से निष्काषित एक भोमिया राजपूत सरदार को अपनी जागीर में से ११०० बीघा भूमि प्रदान कर दी। तभी से आप बीकांण बली कहलाने लगे।

शंकरदान के लिखे हुए पाँच ग्रंथ मुख्य हैं- शक्ति सुजस, साकेत शतक, भैरूंजी रा गीत, वगत वायरों एवं देस दरपण। इनके अतिरिक्त फुटकर गीत, दोहे, छप्पय आदि भी बहुत लिखे हैं। इनका देहान्त सन् १८७८ ई० में हुआ था। इनके गीतों के विषय में आज भी प्रसिद्ध है-

शंकरये सामौर रा, गोळी जेहड़ा गीत।
मिन्तर साँचा मुलक रा, रिपुवां उलटी रीत।।

१०. मुरारिदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८३२ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के ग्राम भांडियावास के निवासी थे। इनके पिता का नाम कविराजा भारतदान था। पितामह वांकीदास डिंगल के प्रसिद्ध कवि हो चुके हैं जिनका परिचय गत अध्याय में विस्तार से दिया जा चुका है। मुरारिदानजी प्रखर बुद्धि के व्यक्ति थे और अपनी हाजिरजवाबी से दूसरे को मुग्ध कर देते थे। इन्होंने आजीवन मारवाड़ राज्य के अनेक महत्वपूर्ण विभागों में उच्चपद पर कुशलता से कार्य किया। दीवानी और फौजदारी अदालतों के न्यायाधीश के रूप में इनकी सेवायें सराहनीय रहीं। यहाँ रहकर आपने जिस सच्चाई, ईमानदारी एवं निष्पक्षता का परिचय दिया उससे ये प्रसिद्ध हो गये। यह लक्ष्य करने की बात है कि उन दिनों ऋषि दयानन्द के आदेशानुसार सर प्रताप ने अदालतों की भाषा मारवाड़ी कर दी थी और ये अपने सारे निर्णय मारवाड़ी में ही दिया करते थे। इससे इनका मातृभाषा-अनुराग प्रकट होता है। ये अपने समय के मारवाड़ी के सर्वोच्च अधिकारी विद्वान माने जाते थे। तवारीख का विभाग भी इनके अधीन रहा। इसके अतिरिक्त राज्य-परिषद (State Council) के भी सदस्य रहे। उल्लेखनीय है कि राजस्थान के समस्त रईस यहाँ तक कि अंग्रेज सरकार व बड़े-बड़े अफसर भी राज्य सम्बन्धी कार्य इनकी सम्मति से किया करते थे।

मुरारिदानजी ने कविता लिखना देर से आरम्भ किया। इनका रचना-काल सन् १८८३ ई० से आरम्भ होता है। ये डिंगल के साथ-साथ पिंगल के भी मर्मज्ञ थे। संदेह नहीं कि ये अपने गुणों के कारण उन्नति करते रहे और व्यक्तित्व निखरता गया। इन्हें जोधपुर-नरेश महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) के कविराजा होने का यश प्राप्त है।

मुरारिदानजी ने ‘जसवंत जसोभूषण’ नामक एक वृहद् ग्रंथ बनाया जो ८५२ पृष्ठों में पूर्ण हुआ है। इसका लघु रूप ‘जसवंत भूषण है’ जो ३५१ पृष्ठों का है। ये दोनों ग्रंथ राजकीय मुद्रणालय, जोधपुर से प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी साहित्य-सेवा पर प्रसन्न होकर महाराजा ने लाखपसाव का पुरस्कार दिया तथा अंग्रेज सरकार से ‘महामहोपाध्याय’ की पदवी दिलाई। इन्हें चार गाँव जागीर में भी मिले, जिनके नाम ये हैं- मथाणियाँ का बास, कोटडा, किरमरिया कलाँ और किरमरिया खुरद। इनका देहान्त सन् १९१३ में हुआ था।

११. हरीदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८३३ ई०) और बीकानेर राज्यान्तर्गत ग्राम दासोड़ी के निवासी थे। इनके पिता का नाम रिवदानजी था। इनका स्वर्गवास सन् १९१८ ई० में हुआ। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

१२. समान बाई:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुई थी (१८३३ ई० के आस-पास) और अलवर राज्यान्तर्गत तिजारा तहसील में सिहाली नामक ग्राम की रहने वाली थी। डिंगल के प्रसिद्ध भक्त-कवि कविया रामनाथ इनके पिता थे। इनका विद्याध्ययन आरम्भ से लेकर अन्त तक अपने पिता के संरक्षण में हुआ। एतदर्थ, बाल्यावस्था से ही इनके हृदय में ईश्वरीय भक्ति के संस्कार बद्धमूल हो गये जो जीवन पर्यन्त बने रहे।

कालांतर में जब समान बाई बड़ी हुई तब पिता ने इनका विवाह माहद (अलवर) के ठाकुर रामदयालजी पाल्हावत बारहठ के साथ कर दिया। प्रथम मिलन में इन्होंने अपने पति से प्रार्थना की- ‘मेरा विचार इस नश्वर शरीर से भगवद्‌भजन करने का है, श्रीमान् की क्या इच्छा है ?’ रामदयाल जी ने जो स्वयं हरिभक्ति में लीन रहते थे, उत्तर दिया- ‘इस विषय में जिस प्रकार की आपको अड़चन हो, वह मुझे कह दें। मैं हर तरह से आपके हरि-भजन के मध्य में पड़ने वाली बाधाओं को मिटा दूंगा। मैं अपना जीवन कृत-कृत्य समझूंगा कि श्रीमती जैसी भक्त रत्न महिला के साथ मेरा पाणिग्रहण हुआ।’ सम्मान बाई ने सब प्रकार के सांसारिक सुखों के होते हुए वैराग्य धारण कर लिया। कहते हैं, जब इन्होंने एक बार अपने पति से ब्रज-यात्रा एवं श्री रंगनाथजी के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की तब रामदयालजी स्वयं तीर्थयात्रा के लिए इनके साथ गये। तीर्थयात्रा करने के पश्चात् जब ये श्री रंगनाथजी के मंदिर में दर्शनार्थ पहुंची तब दर्शकों एवं पुजारियों को बाहर निकालकर अकेली प्रतिमा के सामने दो घंटे तक बैठकर उस अलौकिक रूप को देखती रही। मंदिर से बाहर आने पर आँखों पर एक कपड़े की पट्टी बांधकर जगदीश्वर से प्रार्थना करने लगी- ‘हे प्रभो! आपका स्वरूप मेरी आँखों में बस चुका है, इसलिए अब वह दृष्टि से ओट न हो और कोई सांसारिक नश्वर पदार्थ का रूप मेरी आँखों के समक्ष न आवे। यह पट्टी जीवन भर बँधी रही और जब तक जीवित रहीं तब तक गंगा-जल का ही सेवन किया।

समान बाई की आँखों पर पट्टी बंधी रहने से आर्ष-ग्रंथों का अध्ययन बंद हो गया। यह देखकर रामदयालजी इनकी इच्छानुसार रामायण, भागवत, गीता आदि धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर सुनाया करते थे और ये सूर, तुलसी एवं मीरां के सदृश सदैव ईश्वर विषयक ८-१० पद, कवित्त, सवैया आदि रचकर उन्हें सुनाया करती थी। घर में कीर्तन होते रहने से रामदयालजी राज्य-दरबार में भी जाना भूल जाते। अपनी पत्नी को थोड़ा भी अस्वस्थ होते देख वे इनकी विशेष देखभाल रखते थे। कहते हैं, एक बार जब इनके पति रुग्ण हो गये और उनके बचने की आशा न देखकर रामनाथजी व्याकुल हो गये। यह देखकर इन्होंने कहा- ‘घबड़ाइये नहीं, आपकी पुत्री सम्मान को ईश्वर कभी वैधव्य-कष्ट से पीड़ित नहीं करेंगे।’ हुआ भी यही। सम्मान ने तत्काल दो नवीन पद रचकर अखिलेश्वर की पुकार की जिससे उनकी अवस्था सुधरने लगी। इस प्रकार सांसारिक विषयवासना-हीन वैराग्यमय जीवन व्यतीत करती हुई समान बाई का स्वर्गवास सन् १८८५ ई० में हो गया। रामदयाल के पुत्र नहीं हुआ, गोद ले लिया पर दूसरा विवाह नहीं किया।

राजस्थान में मीरां जैसी यदि कोई चारण कवयित्री प्रादुर्भूत हुई है तो वह समान बाई है। इनके ४ ग्रंथ उपलब्ध होते हैं- पतिशतक, कृष्ण बाललीला, सोळे (वैवाहिक गीत) एवं भक्त-चरित्र। इनके अतिरिक्त स्फुट पद भी बहुत मिलते हैं।

१३. राघोदास:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८३४ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के गांव मृगेश्वर के निवासी थे। इनके पिता का नाम भैरूदान था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पिता की देख-रेख में हुई। ये कट्टर शाक्त मत के अनुयायी थे। इन पर महाराजा तख्तसिंह की विशेष कृपा थी। इनका पाल ठिकाने में आना-जाना रहता था और जोधपुर आने पर पाल-हवेली में ही ठहरते थे। ये डिंगल के अच्छे ज्ञाता थे। इन्होंने बाघजी राव को लक्ष्य करके निन्दात्मक काव्य की सृष्टि की है। ये छप्पय रचना में पटु थे। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

१४. मुरारिदान मिश्रण:- ये मिश्रण शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८३८ ई०) और बूँदी के निवासी थे। ये प्रसिद्ध कवि सूर्यमल्ल के दत्तक पुत्र थे। उनके संरक्षण में शिक्षा ग्रहण करने से ये षट्भाषा के ज्ञाता हो गये। ये एक प्रतिभा सम्पन्न कवि भी थे। ‘वंश-भास्कर’ लिखते समय जब गतिरोध उत्पन्न हो गया तब उसके अपूर्ण अंश को इन्होंने पूरा किया था। इसके अतिरिक्त इन्होंने दो ग्रंथ और बनाये- डिंगल कोष तथा वंश-समुच्चय। ये पिंगल में भी काव्य रचना करते थे। इनका देहान्त सन् १९०७ ई० में हुआ।

१५. शिवबख्श:- ये पाल्हावत शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८४२ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत हणूंतिया ग्राम के निवासी थे। इनके पिता का नाम रामसुख था। जब इनकी आयु ८ वर्ष की थी तब इनके पिता का देहान्त हो गया अत: ये अपने ननिहाल मेँ प्रसिद्ध रामनाथ कविया की देख-रेख में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने लगे। यहां इन्होंने काव्य-शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया। फिर इन्होंने थाणा के ठाकुर साहब हनुमन्तसिंहजी (अलवर) के पास विद्याध्ययन किया जो इनकी १२ वर्ष की आयु में चल बसे। उनकी स्त्री के सती होने पर इन्होंने छप्पय सुनाये थे। इन्हें पुरस्कार भी दिया गया किन्तु लेने से मना कर दिया। ठाकुर साहब के लड़के मंगलसिंहजी इनके परम मित्र थे। जब अलवर-नरेश शिवदानसिंहजी ने मंगलसिंह को गोद लिया और वे अलवर की राज-गद्दी पर बैठे तब शिवबख्श भी अलवर चले आये। यहाँ इन्हें भूमि मिली। अलवर में रहकर इन्होंने फुटकर कविता लिखना आरम्भ किया (१८६५ ई०) कालान्तर में महाराजा के अप्रसन्न होने पर ये वृंदावन की ओर चले गये जहां से ये महाराजा की जीवित अवस्था में नहीं लौट पाये। ये कुछ दिनों तक कश्मीर में रहे जहाँ के महाराजा ने इन्हें भव्य विदाई दी। इसके अतिरिक्त ये रतलाम में भी रहे थे। मंगलसिंह का रतलाम में जो विवाह हुआ उसमें इनका मुख्य हाथ था।

शिवबख्श के तीन पुत्र हुए और एक लड़की। पुत्रों में चंडीदान एवं ईश्वरीदान कवि थे किन्तु दुर्भाग्य से चंडीदान युवावस्था में ही परलोकवासी हो गये। शिवबख्श का देहान्त ‘थाणा’ में ठाकुर साहब की अलवर वाली हवेली में हुआ (१८९९ ई०) इनका दाह-संस्कार चैनपुरा के ठाकुर गंगासिंह ने पांच सौ रुपये देकर किया था। इनके वर्तमान वंशधर तेजदान एवं भैरोंबख्श हैं।

शिवबख्श के लिखे चार ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं- १-वृन्दावन शतक, जिसमें १११ कवित्त एवं सवैये हैं। २-तवारीष अलवर, जिसके पुरस्कार स्वरूप इन्हें पचीस रुपये मासिक मिलना स्वीकृत हुआ था। ३-झमाल जूनिया एवं ४-झमाल अलवर षड्ऋतु वर्णन, जिसमें १३० झमाल देखने को मिलते हैं। इनमें से नं० १, २ व ४ राजस्थान रिसर्च सोसाइटी, कलकत्ता के संग्रहालय में हैं, बाकी नं० ३ का कोई पता नहीं लगता। इनके अतिरिक्त फुटकर कविता भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है।

१६. रघुनाथदान:- ये उज्वल शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के गाँव ऊजला के निवासी थे। इनके पिता का नाम शेरदानजी था। इनका निधन १८९७ ई० में हुआ। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१७. गंगाबिसन:- ये उज्वल शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८४३ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के गाँव ऊजला के निवासी थे। ये राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि नाथूरामजी के ज्येष्ठ पुत्र थे। इन्हें संस्कृत का भी अच्छा ज्ञान प्राप्त था। इनका निधन सन् १९१८ ई० में हुआ। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१८. जेठूदान:- ये उज्वल सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के गाँव ऊजला के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१९. हेतुराम:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य में पोकरन के पास बारहठों के गाँव में रहते थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२०. लक्ष्मीदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सोजत परगने के ग्राम आंगदोष के निवासी थे। चारण-समाज में ये आशु कवि के रूप में प्रतिष्ठित थे। इन्हें चमत्कारवादी कवि कहा जा सकता है।

२१. भारतदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम ईंटदड़ा के निवासी थे। ये भक्ति की रचनायें लिखने में प्रवीण थे। इन्होंने भगवद्‌गीता का दोहों में उल्था किया है।

२२. नाथूदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम मृगेश्वर के निवासी थे। इनके पिता का नाम शिवदानजी था। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२३. रिडमलदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम मृगेश्वर के निवासी थे। इनके पिता का नाम हीरदानजी था। ये डिंगल-पिंगल के ज्ञाता थे और संस्कृत भी जानते थे। इन्होंने ‘आदिया’ को सम्बोधित करते हुए दोहे लिखे हैं। इन्होंने फुटकर कवितायें लिखी हैं।

२४. जवाहरदान:- ये बारहठ लषावत शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सोजत परगने के गाँव रेंदडी के निवासी थे। राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि स्वामी गणेशपुरीजी के ये शिष्य थे। इन्हें डिंगल-गीतों को पढ़ने की अपूर्व शक्ति मिली हुई थी।

२५. आईदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सोजत परगने के गाँव रेंदडी के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२६. किशोरदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के गाँव मोरटहूका के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२७. शक्तिदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जैतारण परगने के गाँव खीनावड़ी के निवासी थे। इनके पिता का नाम जयकरणजी था। इन्हें संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त था। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

२८ जोरदान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जैतारन परगने के गाँव सोबड़ावास के निवासी थे। इनके समय में महाराजा तख्तसिंह सिंहासनारूढ़ थे। ये उच्च श्रेणी के कवि थे। इनकी लिखी हुई अनेक कवितायें उपलब्ध होती हैं।

२९. चतरदान:- ये पाल्हावत शाखा में उत्पन्न हुए थे और जयपुर राज्यान्तर्गत ग्राम हणूंतिया के निवासी थे। ये बालाबक्स के काका थे और गोपालदान इनके वेवाई (समधी) थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

३०. हरसूर:- ये बारहठ शाखा के चारण थे और जैसलमेर राज्यान्तर्गत ग्राम भीमाड़ के निवासी थे। इनका रचना-काल सन् १९०० ई० के आस-पास कहा जाता है। इन्होंने अनेक फुटकर गीत लिखे हैं।

३१. कृष्णसिंह:-ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८४९ ई०) और शाहपुरा राज्यान्तर्गत देवपुरा ग्राम के निवासी थे। इस गाँव की जागीर इनके पूर्वजों को युद्ध में काम आने से मिली थी। आप शाहपुरा के पोलपात थे। कविराजा श्यामलदास (उदयपुर) इनके मामा थे। महाराणा सज्जनसिंह (उदयपुर) की इन पर बड़ी कृपा थी किन्तु कालान्तर में महाराणा फतहसिंह ने किसी कारण से इन्हें दरबारी के पद से हटा दिया। अत: ये जोधपुर आ गये जहाँ महाराजा जसवन्तसिंह ने इनको तीन-सौ रुपया मासिक देना आरम्भ किया। फिर ये शेष जीवन में जोधपुर ही रहे। इन्होंने कविराजा मुरारिदान के आदेशानुसार पं० रामकर्ण आसोपा की सहायता से ‘वंश-भास्कर’ की कुछ टीका लिखी थी। इनके विक्टोरिया रानी पर लिखे हुए कवित्तों का प्रकाशन जोधपुर राजकीय मुद्रणालय से हो चुका है। ‘कृष्णोपदेश’ इनकी अप्रकाशित पुस्तक है। इसके अतिरिक्त फुटकर काव्य भी लिखा है जिसमें उमादे के छप्पय विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इनका स्वर्गवास सन् १९०७ ई० में जोधपुर में हुआ था।

३२. मोतीराम:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ के निवासी थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत मिलते हैं।

३३. भीखदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम बिड़लिया के निवासी थे। इनका रचना-काल सन् १८७० ई० के आसपास बताया जाता है। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

३४. हरदान:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८३४ ई०) और मारवाड़ राज्यानान्तर्गत जोधपुर परगने के मोगड़ा गाँव के निवासी थे। इनके बाल्यकाल में माता-पिता का देहान्त हो गया था। इसलिए इन्हें अपनी प्रारम्भिक शिक्षा हेतु गाँव गोदियाना (किशनगढ़) अपने सम्बंधी बारहठ वल्लभजी के पास जाना पड़ा। ये गणित विद्या में पारंगत थे। इनकी रुचि छंद-शास्त्र की ओर विशेष थी इसलिए आगे चलकर इसके श्रेष्ठ जानकार हो गये। संदेह नहीं कि अपनी सूझ-बूझ से नये-नये छंदों की सृष्टि कर देते। कहते हैं, छंद-विद्या में इन्होंने सूर्यमल मिश्रण को भी पराजित कर दिया था किन्तु इस प्रसंग को टाल दिया गया है। डिंगल के साथ साथ इन्होंने पिंगल शास्त्र का भी अध्ययन किया था। अत: यह दोनों भाषाओं में काव्य-रचना करते थे। इन्होंने ‘छंद महोदधि’ नामक ग्रन्थ का निर्माण किया जिसकी कई लोगों ने प्रशंसा की किन्तु यह अप्राप्य है। इसकी एक प्रति मसूदा ठिकाने के सँग्रहालय में बताई जाती है। इनका स्वर्गवास सन् १९०२ ई० में हुआ।

३५. श्यामलदास:- ये दधवाड़िया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८३६ ई०) और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ढोकलिया गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम कमजी (कायमासिंह) था और दादा का रामदीन। ये चार भाई थे- ओनाड़सिंह, श्यामलदास, ब्रजलाल और गोपालसिंह। इन्होंने १० वर्ष की आयु में व्याकरण का सारस्वत ग्रंथ पढ़ना आरम्भ किया और उसके बाद वृत्त-रत्नाकर, साहित्य दर्पण, रसमंजरी, कुवलयानंद इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन किया जिससे संस्कृत काव्य के प्राय: सभी अंगों का इन्हें अच्छा ज्ञान हो गया। सन् १८५५ ई० तक विद्याभ्यास चलता रहा। इस समय में इन्होंने संस्कृत के अतिरिक्त उर्दू-फारसी तथा डिंगल में भी दक्षता प्राप्त कर ली। इन्होंने एक-दो ग्रंथ ज्योतिष तथा वैद्यक के भी पढ़े थे।

श्यामलदास ने दो विवाह किये किन्तु कोई पुत्र जीवित न रहने से इन्होंने अपने छोटे भाई के पुत्र जसकरण को गोद ले लिया। इनका देहान्त सन् १८९४ ई० में हुआ था।

श्यामलदास एक सभा-चतुर, नीति-निपुण एवं स्पष्टभाषी पुरुष थे। महाराणा सज्जनसिंह की इन पर विशेष कृपा थी। यह देखकर लोग इनसे मन ही मन ईर्ष्या करते थे। इन्हें ठकुर सुहाती कहना नहीं आता था यहां तक कि बड़े से बड़े व्यक्ति को भी खरी-खोटी सुना देते थे। ये राज्य-सभा के सदस्य थे और इतिहास कार्यालय, पुस्तकालय, म्यूजियम आदि की देख-रेख भी करते थे। इसके अतिरिक्त राज-काज सम्बन्धी प्राय: सभी महत्वपूर्ण विषयों पर इनकी सम्मति ली जाती थी। मेवाड़ राज्य के प्रति की हुई सेवाओं के उपलक्ष में महाराणा ने इन्हें कविराजा का उपटंक, जुहार, ताजीम, छड़ी, बांहपसाव, चरणशरण की मुहर, पैरों में सब प्रकार के स्वर्ण-आभूषण और पगड़ी में मांझा देकर इनकी प्रतिष्ठा बढ़ाई। अंग्रेज सरकार ने भी योग्यता की प्रशंसा कर इन्हें महामहोपाध्याय की पदवी दी। मेवाड़ के राजदूत (Resident) कर्नल इम्पी ने अपनी कोठी पर दरबार कर इन्हें ”कैसरे हिन्द” का तग़मा दिया था।

श्यामलदास कवि एवं इतिहासकार दोनों थे किन्तु राजस्थान में इनकी कीर्ति का आधार इनकी कवितायें नहीं वरन् इनका लिखा हुआ ‘वीर विनोद’ नामक इतिहास ग्रंथ है। यह वृहद् इतिहास दो भागों में विभक्त है एवं २२५९ पृष्ठों में समाप्त हुआ है। महाराणा शम्भूसिंह की आज्ञा एवं कर्नल इम्पी के आग्रह से सन् १८७१ ई० में इसका लिखना आरम्भ हुआ और महाराणा फतहसिंह के राज्य-काल में इसकी समाप्ति हुई (१८९२ ई०) इसके लिए सामग्री जुटाने में मेवाड़ राज्य का एक लाख रुपया व्यय हुआ था। ग्रंथ छप तो गया किन्तु महाराणा फतहसिंह ने कुछ विशेष कारणों से इसका प्रचार होना रोक दिया। कई वर्षों तक यह बंद कोठरी में पड़ा रहा। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘सज्जन यश वर्णन’ नामक पुस्तक भी लिखी है।

३६. चाँदजी:- ये किनिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के गाँव सुइयाप के निवासी थे। ये अपने समकालीन नरेश जसवंतसिंह द्वितीय (जोधपुर) के कृपा-पात्र थे और उनके पास आया-जाया करते थे। इनकी कवित्व-शक्ति पर प्रसन्न होकर महाराजा ने इन्हें पोपावास ग्राम देकर पुरस्कृत किया। इन्हें ताजीम भी दी गई। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें उपलब्ध होती हैं।

३७. गिरवरदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम हिलोड़ी के निवासी थे। इनके समय में महाराजा तख्तसिंह सिंहासनारूढ़ थे। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

३८. चैनदान:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पारलाऊ गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम भैरूदान था जो अपने समय के उच्चकोटि के साहित्यकार थे। महाराजा तख्तसिंह (जोधपुर) इनके समकालीन थे। इनकी स्मरण-शक्ति अपने पिता के सदृश तीव्र थी। ये दरबारी ठाट-बाट एवं शान-शौकत से रहते थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत मिलते हैं।

३९. ईसरदास:- ये बोगसा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सिवाना परगने के सरवड़ी गाँव के रहने वाले थे। इनकी लिखी हुई ईश्वर भक्ति विषयक रचनायें उपलब्ध होती हैं।

४०. जादूराम:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पारलाऊ गाँव के निवासी थे। इन्हें स्वर्ण ताजीम प्राप्त थी अत: लोग इन्हें ठाकुर कहते थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत मिलते हैं।

४१. महादान:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पारलाऊ गाँव के निवासी थे। ये अपने गाँव के पाटवी थे और ठाकुर कहकर सम्बोधित किये जाते थे। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

४२. विजयदान:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पारलाऊ गाँव के निवासी थे। पारलाऊ के पाटवी होने से लोग इन्हें ठाकुर कहते थे। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

४३. महेशदान:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पारलाऊ गाँव के निवासी थे। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

४४. गंगाराम:- ये बोगसा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड राज्यान्तर्गत सिवाना परगने के सरवड़ी गाँव के रहने वाले थे। ये महाराजा तख्तसिंह के समकालीन थे। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

४५. पदमजी:- ये बोगसा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सिवाना परगने के सरवड़ी गाँव के रहने वाले थे। इनकी लिखी हुई ईश्वर भक्ति की रचनायें उपलब्ध होती हैं।

४६. शिवदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के भांडू गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम खूमदान था। महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय (जोधपुर) इनके समकालीन थे। ये अत्यन्त सहृदय, उदार एवं लोकप्रिय कवि थे। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

४७. बादरदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पाली परगने के ग्राम बसी के निवासी थे। ये अपने समकालीन नरेश सरदारसिंहजी (जोधपुर) के कृपा-पात्र थे और उनके पास आया-जाया करते थे। इनका परम्परागत वात कहने का ढंग अनूठा था। इनके फुटकर छन्द उपलब्ध होते हैं।

४८. नाथूदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के गाँव भांडू के निवासी थे। इनके पिता का नाम शिवदान था। ये डिंगल-पिंगल दोनों का उद्भट विद्वान, इतिहास के ज्ञाता एवं सहिष्णु प्रकृति के व्यक्ति थे। इनकी स्मरण-शक्ति अद्भुत थी और लगभग ६३ ग्रंथ कंठस्थ याद थे। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

४९. करणीदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के गाँव भांडू के निवासी थे। इन्हें प्राचीन कवि आल्हा के वंशज होने का गौरव प्राप्त है। ये साहसी, दानी एवं ओजस्वी वाणी के व्यक्ति थे। ये डिंगल-कविता का पाठ करने में बेजोड़ थे। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५०. बक्सीराम:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के पारलाऊ गाँव के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

५१. वाँकीदान:- ये बोगसा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सिवाना परगने के सरवड़ी गाँव के रहने वाले थे। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५२. मयाराम:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और जैसलमेर राज्य के ग्राम सिरवा के निवासी थे। इनकी फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५३. सायबदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और जैसलमेर राज्य के ग्राम सिरवा के निवासी थे। इनकी फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५४. गणेशदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पाली परगने के बसी गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम बादरदान था। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५५. रामलाल:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और जैसलमेर राज्यान्तर्गत बारहठ रो गाँव के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५६. गिरधारीदान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के थूंभली गाँव के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५७. शिवजी रामजी:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ओढाडिया गाँव के निवासी थे। ये जैसलमेर के कविराजा थे और इन्हें ग्राम भू (जैसलमेर) मिला था। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५८. हेमदान:- ये वीठू बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शिव परगने के झिणकली गाँव के निवासी थे। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

५९. वूधरदान:- ये उज्वल सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और सिरोही राज्यान्तर्गत पुनावा गाँव के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

६० उदयदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के बाळाउ गाँव के निवासी थे। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

६१. प्रतापदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पाली परगने के एन्दलास गाँव के निवासी थे। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

६२. शिवकरण:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत देसूरी परगने के रायपुरिया गाँव के निवासी थे। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

६३. पद्मदान:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पांचेटिया गाँव के निवासी थे। इनके समय में जोधपुर की राज्यगद्दी पर महाराजा जसवंतसिंह विराजमान थे। उल्लेखनीय है कि बीजलियावास गाँव के अमरदान लालस ने मरते समय इन्हें जोरजी चांपावत की झमाल बनाने के लिए कहा और इन्होंने इस कार्य को पूरा किया। यह एक मौलिक रचना है।

६४. महताबदान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के गाँव छींडिया के निवासी थे। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

६५. कालूराम:- ये उज्वल सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के निवासी थे। महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय (जोधपुर) इनके समकालीन थे। इनमें काव्य-पाठ की अद्भुत शक्ति थी। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

६६. मेजळदान:- ये उज्वल सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के निवासी थे। ये प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति थे अत: अनपढ होने पर भी काव्य-रचना किया करते थे।

६७. वाँकीदान उज्वल:- ये उज्वल सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के निवासी थे। इनकी फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

६८. गणेशदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के भांडू गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम नाथूदान था। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

६९. उदयदान:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के तोलेसर गाँव के निवासी थे। इनकी फुटकर कविता उपलब्ध होती है।

७०. शिवकरण:- ये बारहठ शाखा मेँ उत्पन्न हुए थे और जोधपुर के पास मथानिया गाँव के निवासी थे। महाराजा तख्तसिंह इनके समकालीन थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

७१. सायबदान सांदू:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत मेड़ता परगने के डीडिया गाँव के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

७२. फतहदान:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पारलाऊ गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम भैरूदान था और ये उनके छोटे पुत्र थे। इनके लिखे हुए फुटकर छंद मिलते हैं।

७३. मोडसिंह:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम टींटोड़ा के निवासी थे। इनका रचना-काल सन् १८७३ ई० माना जाता है। इन्होंने ‘वीर सतसई’ के नाम से एक ग्रंथ लिखा जो अप्रकाशित है। इसके अतिरिक्त फुटकर रचनाएँ भी उपलब्ध होती हैं।

७४. राजूदान:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बोरून्दा गांव के निवासी थे। इनके पिता का नाम रिवदान था। अपने पिता की वृद्धावस्था में ये जोधपुर-नरेश तख्तसिंहजी और उनके महाराजकुमार जसवंतसिंहजी के पास रहते थे। ये बडे दृढ़ निश्चयी एवं सत्यवक्ता थे। एक बार जब तख्तसिंहजी अंतःपुर में मद्यपान कर रहे थे तब उन्होंने इनके लिए मद्य की मनुहार भेजी। ये मद्य-मांस का सेवन नहीं करते थे अत: उसे सादर लौटा दी। यह देखकर महाराजा स्वयं बाहर ड्‌योढी पर आये और आग्रह करने लगे। राजूदान ने नम्रता से निवेदन किया- ‘जब आप इतना आग्रह करते हैं तब मैं उपेक्षा नहीं करना चाहता। मद्य पी भले ही लूंगा परन्तु अब यह शरीर कृष्णार्पण है।’ इन्होंने प्याला उठाया किन्तु जोधपुर-नरेश ने हाथ पकड़ते हुए कहा कि तुम्हारा साहस प्रशंसनीय है। तुम मनुहार लेने से भी कई गुना अधिक प्रशंसा के भागी हो गये हो। इनके लिखे हुए स्फुट छंद उपलब्ध होते हैं।

७५. ऊमरदान:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८५२ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के ग्राम ढाढरवाड़ा के निवासी थे। इनके पिता का नाम बख्शीराम एवं दादा का मेघराज था। ये तीन भाई थे- बड़े भाई का नाम नवलदान और छोटे का शोभदान था। ये मँझले थे। दुर्भाग्य से इनके माता-पिता का देहान्त बाल्यावस्था में ही हो गया अत: ये वात्सल्य सुख से वंचित रह गये। अपने भाइयों की अवहेलना से इन्हें पारिवारिक स्नेह भी नहीं मिल पाया। एक ऐसी अवस्था में जब मनुष्य के संस्कार बनते एवं दृढ़ होते हैं, नियंत्रण न होने से ये दिन-दिन उदण्ड होते गये। घर में अन्य भाई भू-सम्पत्ति को लेकर झगड़ा करने लगे। यह देखकर ये खैडापे के रामस्नेही साधुओं की मण्डली में जा मिले तथा उनके कंठीबंध शिष्य हो गये। कहते हैं, मौजीराम नामक एक साधु के चक्कर में आकर इन्होने रामस्नेही पंथ को अंगीकृत कर लिया। लगभग १९ वर्ष की अवस्था तक ये इधर-उधर बैरागी के समान घूमते रहे। वहीं रामस्नेही साधुओं के संरक्षण में इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की। डिंगल-पिंगल के साथ इन्होंने, अंग्रेजी का भी सामान्य ज्ञान प्राप्त किया। इसके लिए ये जोधपुर हाई स्कुल में भरती हुए और बड़े परिश्रम से चौथी-पांचवीं कक्षा तक अंग्रेजी सीखी। इसके पश्चात् अभ्यास द्वारा इन्होंने अपना ज्ञान और बढ़ा लिया। विद्या के अध्ययन से इनकी आँखें खुली और अपने कर्तव्य का बोध हुआ। रामस्नेहियों का स्नेह इन्हें अधिक दिनों तक पथ-भ्रष्ट नहीं कर पाया। बुराइयों की ओर दृष्टि पड़ते ही ये उनका साथ छोड़कर पुन: अपने घर लौट आये और गृहस्थी बनकर जीवन व्यतीत करने लगे। (१८७९ ई०) इसी समय के आसपास इन्होंने अपनी कुल-परम्परा के अनुसार काव्य-रचना करना आरम्भ किया और इसके लिए सबसे पहले इन्होंने राम के ढौंगी प्रेमियों को आड़े हाथ लिया।

संदेह नहीं कि ऊमरदान एक जन्मसिद्ध आशुकवि थे। जन-साधारण की समस्याओं को स्पर्श करते रहने से इनकी लोकप्रियता शनै: शनै: बढ़ने लगी। अपनी प्रतिभा के बल पर ये तत्कालीन नरेश महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) के कृपा-पात्र बन गये। यही कारण है कि जब ऋषि दयानंद सरस्वती को महाराजा ने अपने यहां आने का निमंत्रण दिया तब उन्हें उदयपुर से लाने के लिए इन्हें भेजा गया था (१८८३ ई०) ये प्रगतिशील विचारों के पक्षपाती थे अत: हंस के सदृश विविध पंथों से विचार-मोतियों को चुगते रहते थे। इनके व्यक्तित्व पर आर्यसमाज के विचारों की अमिट छाप है। सुधारवादी प्रवृत्ति होने के कारण इनकी काव्य-कौमुदी का विस्तार अन्य राज्यों में भी हुआ और वहां की जनता भी इन्हें आदर-सम्मान की दृष्टि से देखने लगी। इस प्रकार घास-फूस की झोपड़ी से लेकर राज-प्रासाद तक इनका यश छा गया।

ऊमरदान एक अत्यन्त सरल प्रकृति के व्यक्ति थे और वेश-भूषा में सच्चे चारण के प्रतीक थे। जो लोग इनके सम्पर्क में आये हैं, उनकी आंखों के सामने आज भी इनका चित्र उपस्थित हो जाता है। यदि इन्हें कोई पूछता कि तुम्हारा मकान कहाँ है तो ये उत्तर देते-

दुकान है दुकान मां, मकान ना मकान मां।
उठाय लट्ठ अट्‌ठ जाम, मैं फिरां घमां-घमां।।

जीवन में नाना प्रकार के अभाव होते हुए भी ऊमरदान संतोषी थे। इससे इनके मुंह पर सदैव प्रसन्नता झलकती रहती थी। ये दूसरों से सदैव हँसकर मिलते-जुलते थे। जब प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डा० ओझा ने विक्टोरिया हाल, उदयपुर की प्रथम भेंट में इन्हें अपना शुभ नाम पूछा तब इन्होंने सस्मित उत्तर दिया- ‘सदा आनन्दी उम्मरदान’ इससे इस आनन्दी जीव के हास्य-विनोद का अनुमान सहज ही में लगाया जा सकता है। स्वभाव एवं सिद्धांत की दृष्टि से इनके व्यक्तित्व की तुलना मस्त मौजी संत कबीर से की जा सकती है। अंतर केवल इतना ही है कि कबीर की वाणी अटपटी थी और इनकी साफ-सुथरी।

ऊमरदान मन के दृढ़ थे। इन्होंने सत्य के लिए सतत संघर्ष किया और अंतिम श्वास तक काव्य के माध्यम से समाज का कल्याण किया। गृहस्थी के रूप में इन्हें दो पुत्र-रत्न उपलब्ध हुए- अग्रदान एवं मीठालाल। अग्रदान तो इनके सामने ही १८ वर्ष की आयु में चल बसा (१९०० ई०) अत: दूसरा पुत्र मीठालाल ही इनका एकमात्र अवलम्ब था। इस घटना के तीन वर्ष पश्चात् ये ५१ वर्ष की अवस्था में स्वर्गवासी हो गये (१९०३ ई०) इनके निधन ने काव्य-प्रेमियों का हृदय बेध दिया। वे ‘कवि ऊमर री ओळूँ’ में आठ-आठ आँसू बहाने लगे-

हमें निपट अळगो हुवो, लालस नेह लगाय।
कागा बिच डेरा किया, जागा अबकी जाय।।
विद्या कविता वीरता, ऊमर तो उपदेश।
एकण हां फिर आवज्यो, देखै मरुधर देस।।

ऊमरदान का जीवन-चरित उसकी साहित्य-सेवा का साक्षी है। तत्कालीन गतिविधियों से प्रभावित होकर इन्होंने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व का एक ऐसा मनोहर सामंजस्य उपस्थित किया, जो अन्यत्र अप्राप्य है। यह उल्लेखनीय है कि डिंगल के साथ-साथ ये पिंगल में भी काव्य-रचना करते थे। छंद-रचना के साथ इनको इतिहास एवं प्राचीन काव्य-ग्रंथों की खोज करने में भी रुचि थी। दुरसा आढ़ा कृत ‘विरुद छहत्तरी’ की हस्तलिखित प्रति खोज निकालने का श्रेय इनको है। इनकी दो रचनायें ‘जसवन्त जस जळद’ (१८९५ ई०) एवं ‘डफोलाष्टक डूंडी’ (१९०० ई०) इनके जीवन-काल में ही प्रकाशित हो चुकी थी। शेष रचनाओं का संग्रह ‘ऊमर काव्य’ के नाम से जब प्रथम बार प्रकाशित हुआ तब जनता ने उसका हार्दिक अभिनन्दन किया (१९०६ ई०) यह जन-जीवन में इतना प्रिय हुआ कि आगे चलकर दो संस्करण और निकालने पड़े (१९१२ ई० व १९३० ई०)।

७६. बालाबख्श:- ये पाल्हावत शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८५५ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत हणूंतिया ग्राम के निवासी थे। इनके पिता का नाम नृसिंहदास था। पितामह जसराज जी थे। शिवबख्श इनके बड़े भाई थे। इनके परिवार में सब के सब कवि थे अत: प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। फिर दादूपंथी खेमदास से धर्मग्रंथ एवं रीति ग्रंथ पढ़े तथा छंद-अलंकार आदि काव्यांगों का ज्ञान प्राप्त किया। ये अत्यन्त मिलनसार एवं गम्भीर प्रकृति के व्यक्ति थे। इनका साहित्यिक संस्थाओं में आना-जाना होता रहता था। इतिहास में इनकी विशेष रुचि थी। इन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, काशी को कई हजार रुपये का दान दिया था, जिसके सूद से ‘बालाबख्श-राजपूत-चारण-पुस्तक माला’ के अंतर्गत राजपूत एवं चारणों के रचे हुए इतिहास तथा कविता विषयक ग्रंथों का प्रकाशन होता है। इनका स्वर्गवास सन् १९१३ ई० में अपने निवास-स्थान पर ही हुआ था।

बालाबख्श डिंगल-पिंगल के बड़े प्रेमी थे। इन्होंने दोनों भाषाओँ में काव्य-रचना की है। इनके लिखे हुए १९ ग्रंथ हैं जो एक-दो के अतिरिक्त अप्रकाशित हैं- १. अश्व विधान सूचना २. भूपाल-सुजस-वर्णन ३. आसीस-विगतावली ४. आसीस-अष्टक ५. आसीस-पच्चीसी ६. षट् शास्त्र-सारांश ७. खंडेला पाना खुर्द की वंशावली ८. शास्त्र विधान सूचना ९. शास्त्र-प्रकाश १०. शस्त्रसार ११. सन्ध्योपासना उत्थानिका १२. क्षत्रिय-शिक्षा-पंचाशिका १३. छंद देवियों के १४. छंद राजाओं के १५. रावराजा माधवसिंह सीकर वालों का स्मारक काव्य १६. मान महोत्सव महिमा १७. मरसिया ठाकुर जोरावरसिंह का १८. शोक शतक १९. कछावों की खाँपें और ठिकाने २०. नरूकुल सुयश। इनके अतिरिक्त फुटकर गीत एवं कवित्त भी बहुत मिलते हैँ।

७७. रामलाल:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८५३ ई) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के गाँव छींडिया के निवासी थे। इनके पिता का नाम नवलदानजी था। उनके समान ये भी राष्ट्र भक्त थे। इन्होंने चार कुए खुदवाये, जिनके नाम इस प्रकार हैं- गाँधी सागर, नेहरू सागर, सुभाष सागर एवं वल्लभ सागर। यह राष्ट्र भक्ति का नमूना है। इन्होंने बहुत सी कवितायें लिखी हैं।

७८. जुगतीदान:- ये देथा शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८५५ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बिलाड़ा परगने के गाँव बोरूंदा के निवासी थे। चारण जाति कृषि एवं गौ-पालन में आरम्भ से ही प्रसिद्ध है। यह उल्लेखनीय है कि ये अपने समय के सबसे बडे कृषक थे और कृषि-विद्या के कोविद थे। आपने अपने खेत के चारों ओर पत्थर की दीवारें बनवाईं जो आज भी देखी जा सकती हैं। गाँव के पास ही एक कुआ खुदवाया जिसकी गणना राजस्थान के श्रेष्ठ कुओं में की जाती है। इसमें इतना अधिक पानी है कि जिसे देखकर आश्चर्य होता है।

जुगतीदान वीर प्रकृति के पुरुष थे। ये अन्याय का विरोध ही नहीं करते, उससे लोहा भी लेते थे। ये धार्मिक एवं सामाजिक विचारों के समर्थक थे। ऋषि दयानंद के विचारों का इन पर यथेष्ट प्रभाव पड़ा। अत: इन्होंने पर्दा-प्रथा, शराब एवं मृत्यु-भोज जैसी सामाजिक कुरीतियों को हटाकर समाज-सुधार की चेष्टा की। इनके जीवन की अंतिम अभिलाषा यह थी कि बाड़ी में कुए के पास दाह-संस्कार किया जाय। परिवार वालों ने ऐसा ही किया। वहाँ इनकी छतरी (स्मारक) आज भी विद्यमान है। इनका स्वर्गवास सन् १९३६ ई० में हुआ था।

जुगतीदान महाराजा सर प्रताप के सन्निकट थे। ये सर प्रताप के विशेष कृपा-पात्र थे। उनकी प्रशंसा में २५ दोहों की एक रचना ‘प्रताप-पच्चीसी’ कवि ने लिखी है। उन्हें निःसंकोच खरी-खोटी भी सुना देते। ये डिंगल भाषा एवं उसके महत्व से परिचित थे। अपने समकालीन कवियों से प्रभावित होकर आवश्यकतानुसार काव्य-रचना करते रहते। इनका लिखा हुआ स्फुट काव्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है।

७९. फतहकरण:-ये उज्वल सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ऊजलां ग्राम के निवासी थे। इनका उपनाम जयकरण उज्वल था। इनके पिता का नाम नाथूरामजी था जिनके पाँच पुत्रों में ये तीसरे थे। कालान्तर में ये महाराणा सज्जनसिंह के समय में सपरिवार उदयपुर जाकर महाराणा की छत्रछाया में रहने लगे। इन्होंने बाल्यकाल के पश्चात् विद्यार्थी-काल में पंडित गिरधारीलाल व्यास से व्याकरण, पं० नारायण देवजी ज्योतिषी से गणित और ज्योतिष, पं० न्याय विजयजी से षटभाषा, पं० मणि विजयीजी से जैन रामायण, पं० उदय विजयजी से धर्म-शास्त्र तथा श्री कृष्ण कविजी (जयपुर) से काव्य-साहित्य की शिक्षा प्राप्त की थी।

फतहकरण चारण होने के नाते अस्त्र-शस्त्र, घुड़सवारी, शिकार, युद्ध-विद्या आदि को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते थे और इन विद्याओं में निपुण थे। आप बडे ही विद्या-व्यसनी, सभा-चतुर, शास्त्र-निपुण एवं उत्तम कवि थे। इन्हीं सद्‌गुणों के द्वारा ये महाराणा सज्जनसिंह (मेवाड़) के कृपा-पात्र बन गये। महाराणा साहब इनका यथेष्ट मान रखते थे। जयपुर-नरेश माधोसिंहजी के माँगने पर भी इन्हें महाराणा ने उनके यहाँ न भेजकर अपने पास ही रखा। जयपुर-नरेश के साथ इनका फोटो भी है। इन्होंने अपने जीवन के मध्यकाल के कुछ पूर्व से लेकर समूची आयु उदयपुर महाराणा की सेवा में व्यतीत की थी। इनका स्वर्गवास सन् १९२१ ई० में हुआ। इनके पुत्र के नाम विजयकरण एवं शुभकरण हैं।

फतहकरण एक चमत्कारवादी चारण थे और यही बात ऋषि दयानंद ने अपने उदयपुर के प्रवास में इनसे वार्तालाप करते हुए कही थी। इसी प्रकार जब पंडित मदन मोहन मालवीय दरभंगा-नरेश को साथ लेकर हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी के लिए चंदा लेने उदयपुर आये (१९१२ ई०) तब इन्होंने मेवाड़ की ओर से युक्ति-युक्त भाषण दिया था। महाराणा साहब ने दो-ढाई लाख का चंदा दिया। मालवीयजी इन पर प्रसन्न हुए और इनकी हवेली पर भी गये थे। उल्लेखनीय है कि इन्हें अंग्रेजी राज्य की रीति-नीति पसन्द नहीं थी और कभी-कभी तो प्रत्यक्ष रूप से इसका विरोध भी प्रकट कर देते। दिल्ली दरबार के अवसर पर ये भी महाराणा फतहसिंहजी के साथ थे (१९०७ ई०) लार्ड कर्जन के दिल्ली छोड़कर चले जाने के आदेश से ये क्षुब्ध हुए। इन्होंने महायुद्ध के समय महाराणा के कोर्ट में अंग्रेजों की आलोचना की थी (१९१४ ई०) जो उस समय की एक बड़ी बात थी।

फतहकरण डिंगल-पिगल के सफल कवि हैं। इनके प्रकाशित ग्रंथों में ‘वंश-प्रदीप’ एवं ‘पत्र-प्रभाकर’ के नाम उल्लेखनीय हैं। अप्रकाशित ग्रंथ में ‘वंश भास्कर’ की टीका को लिया जा सकता है जिसमें अशुद्धियों को शुद्ध किया गया है। इनके अतिरिक्त फुटकर लोक-गीत भी उपलब्ध होते हैं।

८०. रामनाथ:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८६० ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत शेखावाटी में चन्दपुरा ग्राम के निवासी थे। १० वर्ष तक जयपुर में ये मुख्याध्यापक के पद पर रहे। ये इतिहास के अच्छे जानकार थे। ‘इतिहास राजस्थान’ पुस्तक की रचना से इस कथन की पुष्टि होती है। आप विलायत भी हो आये थे। ये जोधपुर महाराजा के शिक्षक, ईडर रियासत के मंत्री तथा किशनगढ रियासत की कौंसिल के सदस्य भी रहे थे। सन् १९१९ ई० में आपका स्वर्गवास हुआ। आप में जाति तथा स्वदेश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। आप निस्पृह तथा दूरदर्शी थे। आपकी न्यायप्रियता तथा निडरता की अनेक कथायें राजस्थान में प्रसिद्ध हैं।

८१. सुजानसिंह:- ये सामौर शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८६१ ई०) और बीकानेर राज्यान्तर्गत सुजानगढ़ तहसील के गांव बोबासर के निवासी थे। इनके पिता-पितामह का नाम जवानसिंह एवं ईसरदानजी था। इनका परिवार सुसम्पन्न था। इन्हें शंकरदान सामौर के साथ रहने का सुअवसर मिला था। पंडित गणेशरामजी जोशी से इन्होंने संस्कृत एव राजस्थानी का अध्ययन किया। इनकी भागवत में विशेष रुचि थी। ये संत प्रकृति के थे। इनके छोटे भाई का नाम अन्नेसिंह था। इनका विवाह सन् १८८३ ई० में हुआ और सन् १८८७ ई० में इनके एक पुत्र हुआ जो चतरदान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ये डिंगल एवं इतिहास के माने हुए ज्ञाता थे। कविता के नाम से लिखा अत्यन्त कम है किन्तु जो लिखा है वह उच्चकोटि का है। इनके नीति के दोहे ‘सुजान शतक’ के नाम से विख्यात है। इनके अतिरिक्त भजन भी लिखे हैं। इनका देहान्त सन् १९३९ ई० में हुआ।

८२. श्योबक्श:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८६२ ई०) और जयपुर के निवासी थे। इनके पिता का नाम हरदानजी था। ये अष्टविधान करते थे अर्थात् आठ कार्य एक साथ कर सकते थे, जैसे समस्या पूर्ति करन। शतरंज खेलना, कहानी कहना आदि-आदि। इन्हें अलवर में भी अच्छा सम्मान प्राप्त था। इनका स्वर्गवास सन् १९२६ ई० में हुआ था। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

८३. हिंगलाजदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८६७ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत सेवापुरा ग्राम के निवासी थे। इनके पिता का नाम रामप्रतापजी था। इनके वंश में सागरदानजी एक प्रसिद्ध कवि हो चुके हैं। ये पांच वर्ष की अवस्था में ही कविता करने लग गये थे। कहते हैं, इनके पिता ने इन्हें सरस्वती का मंत्र दिया था। इनकी स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। इनका निधन सन् १९५० ई० में हुआ। इनके लिखे हुए चार ग्रंथ उपलब्ध होते हैं- मेहाई महिमा, मृगया मृगेन्द्र, प्रत्यय पयोधर एवं लालग्रह शतक, जिनमें से प्रथम ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है, शेष सभी अप्रकाशित हैं।

८४. माधवदान:- ये उज्वल शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८६८ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के ग्राम ऊजला के निवासी थे। इनके पिता का नाम गंगाबिशनजी था। ये डिंगल-पिंगल एवं संस्कृत के ज्ञाता थे। इनकी लिखी हुई महात्मा श्री रामदेवजी की जीवनी का कुछ भाग उपलब्ध है जो गद्य का उत्क्रष्ट उदाहरण है। पद्य के क्षेत्र में रामदेवजी रा कवित्त, कीर्ति-प्रकाश एवं सवाईसिंहजी री निसाणी उल्लेखनीय रचनायें हैं। इनके अतिरिक्त फुटकर कविता भी मिलती है। इनका स्वर्गवास सन् १९३० ई० में हुआ था।

८५. केसरीसिंह (मेवाड़):- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८७० ई०) और मेवाड़ राज्यान्तर्गत राजनगर परगने के ग्राम सौन्याणा के निवासी थे। इनके पिता का नाम खेमराज था। इनके अन्य तीन भाइयों के नाम है- जान, चतुर्भुज और लक्ष्मण। इनमें से चतुर्भुज गोद गये थे। इन्हें डिंगल-पिंगल के अध्ययन, मनन एवं चिन्तन के लिए एक उचित वातावरण मिला। इनकी वंश-परम्परा में एक-एक से बढ्‌कर योद्धा एवं कवि हुए हैं। इन गुणों के अतिरिक्त धर्म-परायणता एवं उदारता भी कम नहीं रही है। जसूजी ने मेवाड़ में १२ शिखरबंद मंदिर बनवाये जो आज तक विद्यमान हैं। जसूजी के भ्राता दौलतसिंह ने हाड़ोती में थोनपुर के महियारिया लक्ष्मीदास के यहां शादी के उपलक्ष में अपने याचक वृंद को एक लक्ष मुद्रा का दान दिया। इसीसे आपके वंशज ‘लाखवरीश’ की उपाधि से सम्बोधित किये जाते हैं।

बाल्यावस्था से ही केसरीसिंह की रुचि इतिहास की ओर थी। इनका स्वभाव सरल, रहन-सहन साधारण एवं व्यवहार बड़ा ही प्रेममय था। ये अपने परिवार में युवकों को डिंगल-पिंगल एवं उनके व्याकरण का ज्ञान देते रहते थे। अपने कुल की मर्यादा का पालन करना ये अपना कर्त्तव्य मानते थे। चारण शिक्षालयों की उन्नति के लिए ये सदैव प्रयत्नशील रहते थे। ये धर्म-परायण एवं उदार प्रकृति के थे। समय ने इन्हें अनुभवी एवं व्यवहार कुशल बना दिया था। निर्भीकता, स्पष्टवादिता एवं विद्वत्ता ने इनके व्यक्तित्व को ऊँचा उठाया। सीधी-सादी भाषा में मन के तत्व को प्रकट करना इन्हें खूब आता था। इनका स्वर्गवास हो जाने से काव्य-प्रेमियों को काफी धक्का लगा है (१९५७ ई०)

केसरीसिंह जन्म-जात कवि थे अत: खड़े-खड़े ही कठिन से कठिन समस्या की पूर्ति कर देते थे। इनका छंदों पर पूर्ण अधिकार था। इनके लिखे हुए ५ ग्रंथ उपलब्ध होते हैं- प्रताप-चरित्र, राजसिंह-चरित्र, दुर्गादास-चरित्र, जसवंतसिंह-चरित्र एवं रूठी राणी। ये समस्त ग्रंथ इनकी स्थायी कीर्ति के दीप-स्तम्भ हैं।

८६. पाबूदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८७१ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के ग्राम भांडियावास के निवासी थे। इनके पिता का नाम मोडदानजी था। ये लोगों पर संदेह अधिक करते थे। इनका प्रारिम्भक जीवन लाड-प्यार में बीता। ये तीन भाई थे जो डिंगल, पिंगल एवं संस्कृत के ज्ञाता थे और साथ ही इतिहासकार भी। इनका विवाह ग्राम ऊजला के मेकदानजी सिंढायच की सुपुत्री मिरगां बाई से हुआ था। इनकी लिखी हुई लगभग पन्द्रह रचनायें उपलब्ध होती हैं जिनमें ‘करनल सुयश प्रकास’, ‘जोरजी री झमाळ’, ‘प्रतापसिंह री झमाळ’, ‘रामदेव रूपक’ आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त फुटकर कवितायें भी मिलती हैं।

८७. केसरीसिंह (शाहपुरा):- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८७२ ई०) और शाहपुरा राज्यान्तर्गत देवपुरा ग्राम के निवासी थे। इनके पिता कृष्णसिंह डिंगल-साहित्य के विद्वान थे। उन्होंने इनकी शिक्षा ५ वर्ष की अवस्था में शाहपुरा में आरम्भ की। दो वर्ष पश्चात् जब वे उदयपुर चले गये तब वहां दक्षिणी ब्राह्मण पंडित गोपीनाथ के संरक्षण में इन्हें संस्कृत की शिक्षा दी गई। यहां इन्होंने अंग्रेजी का प्रारम्भिक ज्ञान भी प्राप्त किया किन्तु आगे चलकर इसका अध्ययन बंद कर दिया (१८८९ ई०) इनका विवाह कविराजा देवीदान की सहोदरा माणक कंवरि के साथ हुआ (१८९० ई०) इनका शाहपुरा, उदयपुर एवं जोधपुर के राज-घरानों से सम्पर्क था।

केसरीसिंह राष्ट्रीय विचारों के सहृदय व्यक्ति थे। इन्होंने भारत धर्म मंडल का प्रतिनिधित्व किया और अपने अथक परिश्रम से इस संस्था को रजिस्टर्ड कराया (१९०१ ई०) इस कार्य को देखकर इन्हें कवि-रत्न की उपाधि से अलंकृत किया गया और प्रमाण-पत्र भी दिया गया। कोटा में रहकर इन्होंने नगर-पालिका एवं सार्वजनिक पुस्तकालय में अनेक सुधार किये (१८९९-१९१३ ई०) यहां इन्हें अध्ययन के लिए पर्याप्त अवकाश मिला अत: गुजराती, मराठी एवं बंगला का अध्ययन किया। साथ ही प्राकृत एवं गुरुमुखी से भी जानकारी प्राप्त की। यहीं भारतीय राजनीति के प्रति प्रेम बढ़ा और लोक सभा की गतिविधियों को बड़ी तत्परता से देखने लगे।

केसरीसिंह राजस्थान के सर्व प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने बंगाल के क्रांति आन्दोलन में भाग लिया। इन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र प्रतापसिंह तथा कनिष्ठ भ्राता जोरावरसिंह को भी इस आन्दोलन से सम्बद्ध कर दिया। ये लोग पैसा लेकर बम बनाते और बंगालियों को बेचकर क्रांतिकारियों की सहायता करते। ये बम मारवाड़ के पाँचेटिया गाँव में चंडीदानजी के मकान में बनते जहाँ गणेशदान आढा, गोपालदान आढा, भूरसिंह बारहठ, नारायणसिंह जोधा एवं चारण छात्रावास के निरीक्षक लहरी इनके सक्रिय सहायक थे। क्रांति के लिये धन की आवश्यकता थी और इसके लिए प्यारेराम साद (कोटा) की हत्या हुई। इन्होंने सर प्रताप से मिलकर मारवाड़ के राजपूतों को अनिवार्य शिक्षा देने हेतु एक अपील प्रकाशित कराई। जागीरदारों की एक सभा का आयोजन होने वाला था किन्तु इसके पूर्व ही अँग्रेज सरकार को पता लग गया कि केसरीसिंह कोटा हत्याकाण्ड में अपराधी है अत: शाहपुराधीश की प्रवंचना से इन्हें बंदी बना दिया गया (१९१४ ई०), स्थायी एवं अस्थायी सम्पत्ति जब्त कर दी गई और इनके पास अपना कुछ भी नहीं रहा यहाँ तक कि स्त्रियों को भी बंद मकान में रहना पड़ा। कहना अनावश्यक न होगा चारण छात्रावास, जोधपुर की भी तलाशी हुई और कागज पकडे गये।

राजनीति का क्षेत्र अत्यंत विकट होता है और क्रांतिकारी को अनेक कठोर परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है। यही बात हम केसरीसिंह के जीवन-चरित में पाते हैं। कोटा हत्याकाण्ड के अतिरिक्त इन पर दिल्ली, बनारस, लाहौर तथा आरा (अयोध्या) के षडयंत्र काण्डों का अभियोग लगा। इस प्रकार भारत के पाँच प्रसिद्ध मुकदमों में इनका हाथ था। अत: आजीवन कारावास में कलकत्ता भेज दिये गये। पाँच वर्ष पश्चात् कोटा-नरेश के कहने से इन्हें क्षमादान दिया गया। आरा (अयोध्या) के हत्याकाण्ड में जोरावरसिंह आजीवन फरार रहा। लाट साहब पर बम फेंकने के आरोप में लहरी को बीस वर्ष की कैद हुई जिससे छुटकारा स्वराज्य के बाद मिला। वस्तुत: बम जोरावरसिंह ने फेंका था। उल्लेखनीय है कि इनके दल के कार्यकर्त्ता वेश बदलकर स्त्रियों की पँक्ति में जा बैठते और अवसर ताककर अंग्रेजों से टकराते थे। प्रतापसिंह बरेली में बंद रहा। नारायणसिंह जोधा का अजमेर कारावास में देहान्त हो गया। इन मुकदमों में पं० रामकर्ण आसोपा राज्य की ओर से मुखबिर बने थे।

इस प्रकार देश-सेवा में केसरीसिंह तथा उनके परिवार की अपार हानि हुई। क्रांति के पीछे जीवन भर शांति नहीं मिली और ये इधर-उधर अनेक प्रकार की यातनायें सहते रहे। अन्तत: ये कोटा के माणिक भवन में रहकर अपना अधिकांश समय हरि-भजन में व्यतीत करने लगे। इनका लिखा हुआ स्फुट काव्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। इनकी ‘चेतावणी रा चूंगट्‌या’ नामक ऐतिहासिक रचना प्रसिद्ध है जिसमें १३ दोहे-सोरठे हैं।

८८. अमरदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८७३ ई०) और अलवर राज्यान्तर्गत ग्राम सटावट के निवासी थे। इन्होंने अपने पिता से छंद प्रबन्ध, अमरकोष, रसमंजरी, रसराज, रसरत्न आदि काव्योपयोगी ग्रंथों का अध्ययन किया। इनके पितामह रामनाथ पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर चुके थे। इनका रचना-काल सन् १८९५ ई० के आस-पास से आरम्भ होता है।

८९. राघवदान:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और सिरोही राज्यान्तर्गत झांखर गाँव के निवासी थे। कवि के रूप में इनका नाम प्रख्यात था। ये दुरसा के वंशज थे और सिरोही महाराव केशरीसिंह के दरबारी कवि थे। इन्हें राज्य की ओर से कविराजा की उपाधि मिली थी। इनका रचना-काल सन् १८९५ ई० के आस-पास माना जाता है। इनके लिखे हुए बहुत से फुटकर गीत उपलब्ध होते हैं। इन्होंने महाराव की आज्ञानुसार प्राचीन कवित्तों का संग्रह करके ‘चत्रभुज इच्छा प्रकाश’ नामक ग्रंथ लिखा है।

९०. विजयनाथ:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और जयपुर के निवासी थे। इनके समय में महाराजा श्री सवाई रामसिंहजी द्वितीय एवं श्री सवाई माधवसिंहजी द्वितीय राजगद्दी पर विराजमान थे। वृद्धावस्था में इन्होंने कवित्त रूप में महाराजा के पास एक आवेदन-पत्र भेजा जिससे प्रसन्न होकर इन्हें रामसिंहजी ने उदक में ग्राम दिया था। इनका रचना-काल सन् १९०० ई० से आरम्भ होता है।

९१. प्रभुदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के ग्राम भांडियावास के निवासी थे। इनका निधन सन् १९५० ई० मैं हुआ। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

९२. जसवंतसिंह:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के ग्राम भांडियावास के निवासी थे। ये पाबूदान के भाई थे। इन्होंने विवाह नहीं किया और आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। ये एक भक्त कवि थे और भगवान राम की उपासना करते थे। इन्होंने ‘रघुवर जस प्रकास’ नामक ग्रंथ की रचना की है जो अभी तक अप्रकाशित है।

९३. चमनसिंह:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम ढोकलिया के निवासी थे। इनके पिता का नाम औनाड़सिंह था। बड़े होने पर ये खेमपुर गोद चले गये। ये एक व्यवहार-कुशल व्यक्ति थे और राजनीति में भी रुचि रखते थे। इनकी गणना अच्छे कवियों में की जाती थी। इन्हें मेवाड़ के राज्य-दरबार में मान-सम्मान प्राप्त था। इनका निधन सन् १९१८ ई० में हुआ। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

९४. चिम्मनसिंह:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और प्रतापगढ़ राज्यान्तर्गत ग्राम संचेई के निवासी थे। इनकी गणना डिंगल के ओजस्वी कवियों में की जाती थी। इनका सलूम्बर ठिकाने में आना-जाना रहता था। इस ठिकाने को स्वतंत्रता-प्रिय बनाने में इनका हाथ था। इन्होंने फुटकर रचनायें लिखी हैं।

९५. किशोरसिंह:- ये सौदा बारहठ (बार्हस्पत्य) शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८७९ ई०) और शाहपुरा राज्यान्तर्गत देवपुरा ग्राम के निवासी थे। ये केसरीसिंह के भाई थे। ये अपने विद्याध्ययन के कारण ही पटियाला (पंजाब) के इतिहास-लेखक पद पर प्रतिष्ठित हुए और पुरावृत्तवागीश एम. आर ए. एस. (लंदन) थे। पटियाला में सन् १९३७ ई० में इनका स्वर्गवास हुआ। इन्होंने ‘राजस्थान’ (कलकत्ता) एवं ‘चारण’ (आगरा) नामक शोध-पत्रिकाओं का कुशलता से सम्पादन किया है। इन्होंने ईसरदास कृत ‘हरिरस’ ग्रंथ का सम्पादन भी किया है। इसके अतिरिक्त ‘करणी चरित’ एवं ‘पागल-प्रमोद’ इनकी अनुपम कृतियां हैं। राजस्थानी भाषा एवं साहित्य विषयक इन्होंने अनेक लेख लिखे हैं। फुटकर कविताओं में ये ‘पागल’ उपनाम से रचना करते थे।

९६. उदयराज:- ये उज्वल सिंढ़ायच शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८८५ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम ऊजलां के निवासी थे। इस गाँव के जागीरदार एवं अपनी विशेषता के कारण ही इनका कुल ‘उज्वल’ नाम से प्रसिद्ध है। इनके पिता-पितामह का नाम क्रमश: लक्ष्मीदान एवं नाथूराम था। रामप्रताप, रामदयाल एवं जसकरण इनके बडे भाई थे और ये सबसे छोटे थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पोकरण में हुई (१८९३-१८९५ ई०)। मातृभाषा राजस्थानी तो कुल धरोहर थी, पिता उसके विद्वान थे और भाई ज्ञाता। एतदर्थ उसका सहज ज्ञान प्राप्त होता गया किन्तु अँग्रेजी शिक्षा-दीक्षा के लिए घर छोड़ना पड़ा। इनके ताऊ श्री फतहकरण उदयपुर-महाराणा के कृपा-पात्र थे अत: वे इन्हें अन्य भाइयों सहित उदयपुर ले गए (१८९६ ई०) किन्तु जी न लगने से दो-ढाई वर्ष तक वहाँ रहकर पोकरण लौट आए, जहाँ इन्होंने मिडिल तक शिक्षा प्राप्त की। इसके पश्चात् शिक्षा के प्रति रुचि मन्द पड़ गई किन्तु एक मित्र के उपालम्भ ने इन्हें ज्ञान-मार्ग पर अग्रसर किया। इस बार ताऊजी ने गीजगढ़ के ठाकुर कान्ह सिंह की हवेली (जयपुर) में इनके रहने एवं पढ़ने की व्यवस्था की। यहाँ इन्होंने जमकर अध्ययन किया और इन्टर परीक्षा उतीर्ण की (१९०८ ई०)। किन्तु जब बी० ए० की परीक्षा के दिन निकट आए तब छमाही में अनुत्तीर्ण होने से प्रिन्सिपल ने इन्हें विश्वविद्यालय की परीक्षा में बैठने से रोक दिया (१९१० ई०) । इससे क्रम टूट गया और जब ये ग्रीष्मावकाश में घर आए तब परिस्थितिवश जयपुर लौटने में विवश हो गए। उल्लेखनीय है कि ये मारवाड़ के प्रथम चारण विद्यार्थी थे जिन्होंने बी० ए० तक की आधुनिक शिक्षा प्राप्त की। निःसंदेह उस समय के लिए यह गौरव की बात थी। इसके लिए ये महाराजा कॉलेज के तत्कालीन प्रोफेसर श्री वीरेश्वर शास्त्री द्रविड़ के प्रति आभार प्रदर्शित करते रहते थे।

उज्वलजी का अधिकांश जीवन राज्य-सेवा में व्यतीत हुआ। कुंवर चैनसिंहजी (पोकरण) ने जो जयपुर कॉलेज के साथी थे, इन्हें कोर्ट सरदारान विभाग में एक साधारण सरकारी पद पर नियुक्त करा दिया। १९११ ई० मैं इन्होंने रुचि लेकर सर्वश्री चण्डीदानजी दधवाडिया, जोरावरसिंहजी सौदा, भोपालसिंहजी आढा तथा मोतीलालजी किनिया के सहयोग से प्रस्ताव पारित कराया कि जोधपुर में चारण छात्रावास की स्थापना होनी चाहिए। जहाँ चाह वहाँ राह। फलत: भवन बनकर तैयार हुआ, जहाँ आज भी इस प्रदेश के छात्र विद्याध्ययन करते हैं। अपनी योग्यता से ये शनै: शनै: उन्नति करते गए। आगे चलकर जब हाकिम बनने का अवसर आया तब अकस्मात् इनका भावी उत्कर्ष अवरुद्ध हो गया (१९१५ ई०)। राजस्थान के राष्ट्रीय कवि बारहठ कैसरीसिंह (कोटा) पर जब राजद्रोह का अपराध लगाया गया तब वे इनके पास आया-जाया करते थे और प्राय: छात्रावास में ही ठहरते थे। जब वे बन्दी हुए (१९१३ ई०) तब इस छात्रावास की तलाशी हुई जिसके परिणाम स्वरूप अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। कालान्तर में ये शहर के नायब कोतवाल नियुक्त हुए जहां १० वर्षों तक अपने दायित्व का सफलता पूर्वक निर्वाह किया (१९२०-१९३० ई०)। इस बीच राजस्व-विभाग में सहायक हाकिम बनने का सौभाग्य मिला। फिर ये जन-निर्माण विभाग के विकास-कार्यालय में पट्‌टा अधिकारी रहे जहाँ अंग्रेज अभियंता एडगर ने प्रसन्न होकर इनका वेतन दुगना कर दिया। इनकी कार्यकुशलता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि अवकाश-काल आ जाने पर भी राज्य-सरकार ने इनकी सेवाएँ ३ वर्ष तक और बढ़ा दीं। इस प्रकार ३४ वर्ष तक अपनी विनयशीलता, ईमानदारी एवं कर्त्तव्य-परायणता का परिचय देकर इन्होंने सन् १९४५ ई० में अवकाश ग्रहण किया।

आधुनिक युग के भारतीय साहित्य पर राष्ट्र-पिता महात्मा गाँधी की विचार-धारा का यथेष्ट प्रभाव पड़ा है। उदयराजजी भी प्रारम्भ से ही काँग्रेस के सिद्धान्तों से प्रभावित रहे। यहाँ तक कि क्षत्रिय सभाओं तथा साहित्यिक समारोहों में उपस्थित होकर ये सदैव देश-सेवा की प्रेरणा देते रहे। अपनी गुण-ग्राहकता, विद्वत्ता एवं निष्पक्षता के कारण ही ये राजपूत हितकारिणी सभा, जोधपुर के सदस्य मनोनीत किए गए (१९४४ ई०)। जब २९ जनवरी सन् १९५४ ई० में जयपुर में अखिल भारतीय राजस्थानी साहित्य सम्मेलन हुआ तब राजस्थान के विद्वानों ने इन्हें सभापति चुना किन्तु देवयोग से अपने भतीजे जैतदानजी के देहावसान से ये वहाँ उपस्थित नहीं हो पाए। १८ अक्टूबर, सन् १९५६ ई० में जब जयपुर में राजस्थानी साहित्यकार सम्मेलन हुआ तब उन्हीं विद्वानों ने इन्हें सभापति के पद पर पुन: प्रतिष्ठित किया था।

उदयराजजी ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ के प्रतीक थे। ये एड़ी से चोटी तक खरे राजस्थानी थे- वेशभूषा, बोल-चाल, रहन-सहन आदि सभी दृष्टियों से। साहित्य के प्रति इनकी रुचि बाल्यकाल से ही थी किन्तु इसका परिष्कार सरकारी नौकरी के साथ हुआ। अत: यही इनका रचना-काल माना जा सकता है (१९११ ई०)। एक राज्य-कर्मचारी का साहित्यानुराग एवं शिक्षण-संस्थाओं के प्रति जागरूकता उसकी राष्ट्रीयता का प्रमाण है। ये स्थानीय, प्रान्तीय, एवं भारतीय चारण-सम्मेलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे। इनके जीवन का मूल मन्त्र यही है- ‘दूर करै दुख देस रो, के साहित के सूर।’ जोधपुर में ये स्वनामधन्य ‘ऊजलां री हवेली’ (त्रिपोलिया) में निवास करते थे। अवकाश-काल के शान्त क्षणों में आँखों की ज्योति को क्षीण करता हुआ यह वयोवृद्ध मुक्त भावयोगी सतत साहित्य-साधना करता रहा, यह हमारे लिए अनुकरणीय है।

उज्वलजी की साहित्य-सेवा का मूल्यांकन करना सहज नहीं। इनके लिखे हुए छोटे-बड़े सौ से अधिक ग्रंथ उपलब्ध होते हैं, जिनमें लगभग ६०-७० तो प्रकाशित हो चुके हैं, शेष अप्रकाशित हैं। प्रकाशित ग्रन्थों में ‘धूडसार’ (धूड़ री बेड़ी) , ‘मारवाड़ रा वीर’, ‘दूध प्रकाश’, ‘मातृभाषा दोहावली’, ‘भानिए रा दूहां’, ‘स्वराज शतक’, ‘उज्वल शतक’, ‘तेज शतक’, ‘सर्वोदय शतक’, ‘श्रम शतक’, ‘सती शतक’, ‘जागीरदारों के अवगुण’, ‘गाँधीजी रा दूहा’, ‘अँग्रेजों रे गुणां रा दूहा’, ‘विग्यान रा दूहा’, ‘भाषा शतक’, ‘सांवरा शतक’, ‘उदय दोहावली’, ‘डिंगल शतक’, ‘कुशल शतक’ आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उज्वलजी एवं सीतारामजी लालस ने मिलकर डिंगल-कोष का भी कार्य किया है जो अनेक वर्षों की साधना का सुफल है। ब्रह्मदास कृत ‘भक्तमाल’ का सम्पादन पुरातत्व मन्दिर, जोधपुर से प्रकाशित हो चुका है। ठाकुर हमीरसिंह कृत ‘हंस-प्रबोध’ का अनुवाद भी इन्होंने किया है। ये हिन्दी एवं अंग्रेजी में भी सुन्दर रचनाएँ लिखते थे। ‘वीर-पूजा’ इनकी अंग्रेजी भाषा की कृति है। फुटकर दोहे, सोरठे, गीत, कवित्त, सवैये आदि तो बहुतेरे हैं। विस्तार-भय से यहाँ इतना कह देना ही पर्याप्त होगा कि ये चारण काव्य के प्रतिनिधि कवि एवं लेखक हैं। इनके अतिरिक्त चारण साहित्य के संरक्षण में इनकी सेवाएँ सर्वथा स्तुत्य हैं। राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के पुनरुत्थान की समस्याओं को सुलझाने, हस्तलिखित ग्रंथों को सँजोने एव साहित्य तथा इतिहास के लेखकों की सहायता करने में ये सदैव तत्पर रहते। डॉ. एल. पी. टैसीटोरी (इटली) एवं डॉ. डब्लु. एस. एलन (इँगलैंड) जैसे विदेशी विद्वानों ने इसके लिए आभार प्रकट किया है।

आधुनिक चारण साहित्य के निर्माताओं में उज्वलजी का नाम सदैव गौरव के साथ लिया जाएगा। वे राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के अमूल्य भंडार थे। अनेक ज्ञात-अज्ञात कवि एवं लेखक उनकी वाणी में निवास करते थे। न जाने कितने शोधकर्त्ताओं का इन्होंने पथ-प्रदर्शन किया है। यदि इन्हें एक चलते-फिरते पुस्तकालय की संज्ञा दी जाए तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी। जो चाहे और जब चाहे, उनसे ‘प्रेम के ढाई अक्षर’ सीख सकता था। वे राजस्थानी भाषा के प्रबल समर्थक थे- शब्द और अर्थ तक ही सीमित रहने वाले नहीं प्रत्युत भाषा एवं साहित्य की सर्वव्यापकता पर अधिक बल देते थे। अपने जीवन-काल में इन्होंने राजस्थानी को मान्यता दिलाने हेतु अथक परिश्रम किया। ये चाहते थे कि स्कूलों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में इसकी पढ़ाई-लिखाई हो। जो कठिनाइयाँ सामने आई, उनका डटकर सामना किया। एक बार अपने भतीजे (जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं) के यह कहने पर कि ‘क्या राजस्थानी भी कोई भाषा है ?’- इन्होंने मुँह तोड़ उत्तर देते हुए कहा था- ‘तुम जैसे कपूतों से और क्या आशा की जा सकती है?’ भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के सदृश मातृभाषा के लिए इनका यह संदेश सदैव कानों में गुँजता रहेगा-

सत ऊजल संदेश, उदैराज ऊजल अखै।
दीपै वांरौ देस, ज्यांरा साहित जगमगै।।

राजस्थानी का यह महान भक्त सन् १९६७ ई० में सदैव के लिए अस्त हो गया।

९७. चतरदान सामौर:- ये सामौर शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८८७ ई०) और बीकानेर राज्यान्तर्गत सुजानगढ़ तहसील के गाँव बोबासर के निवासी थे। इनके पिता का नाम सुजानसिंह था। निःस्वार्थ समाज-सेवा के कारण ये अपने क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। इन्हें दिखावा (ढौंग) बिल्कुल पसन्द नहीं था। राजनीति से सदैव दूर रहते। इन्हें ऊँट रखने का बहुत शौक था और उन पर दोहों की रचना भी करते थे। इन्हें ऊँटों के डाक्टर की संज्ञा दी जाय तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी। इनका स्वर्गवास सन् १९६८ ई० में हुआ था। खुंडिया (सरदारशहर) ग्रामवासी बारहठ महेशदानजी ने इन पर मरसिये लिखे हैं जो इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक हैं। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है। गद्य के क्षेत्र में इनकी कृति ‘घर बीती परबीती’ एक अत्यन्त सुन्दर रचना है।

९८. बद्रीदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८८७ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के गाँव इन्दोकली के निवासी थे। ये डिंगल के उच्च कोटि के विद्वान थे और साथ ही अच्छे ज्योतिषी भी। राजनीति में भी समान रूप से रुचि रखते थे। इनकी लिखी हुई कई रचनायें उपलब्ध होती हैं। इनका निधन सन् १९२८ ई० में हुआ था।

९९. जवानसिंह:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम मेंगटिया के निवासी थे। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

१००. किशनदान:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और डूंगरपुर के महारावळ उदयसिंह के आश्रित थे। इनका जीवन-वृत्त उपलब्ध नहीं होता पर रचना-काल सन् १९०८ ई० माना गया है। इन्होंने महारावळ की आज्ञा से ‘उदयप्रकाश’ नामक एक ग्रंथ बनाया जो प्रकाशित हो चुका है।

१०१, गुलाबसिंह:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और प्रतापगढ़ राज्यान्तर्गत ग्राम संचेई के निवासी थे। इन्होंने कई फुटकर गीत लिखे हैं।

१०२. नाथूसिंह:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८९१ ई०) और उदयपुर के निवासी थे। इनके पिता का नाम केसरीसिंहजी था। इनके जन्म का नाम विजयसिंह था, बाद में पिता ने इनका नाम नाथूसिंह रखा। मेवाड़ राज्य में ‘सिंह’ नाम पर प्रतिबन्ध होने से ये नाथूदान भी कहलाने लगे। इनकी माता का नाम रामकुंवर बाई था जो दुरसा आढा के वंश में उत्पन्न हुई थीं। बाल्यावस्था में इनके पिता ने तीसरी कक्षा तक पढ़ा-लिखाकर प्रारम्भिक कविता का बोध कराया। फलत: ये ७ वर्ष की अवस्था में कविता करने लग गये। जब ये ९ वर्ष के थे तब पिता चल बसे और १३ वर्ष की अवस्था में माता भी चल बसी अत: आगे अध्ययन नहीं कर पाये।

नाथूसिंह शिकार के बडे शौकीन थे। यह शौक इतना बढ़ गया कि रात-दिन जंगलों में कई प्रकार के जानवरों का शिकार करते रहते थे। एक बार आहत सुअर ने आक्रमण कर इनके पैर की हड्डी तोड़ डाली। इसी प्रकार दूसरी बार घोड़े से गिर जाने के कारण इनका बायाँ पैर टूट गया।

नाथूसिंह ने दो विवाह किये। पहला विवाह जीतावास (तहसील चित्तौड़) के ठाकुर दलेलसिंह आसिया की सुपुत्री फूलकुंवर बाई के साथ हुआ (१९०० ई०) इनके एक पुत्री एवं तीन पुत्र- मोहनसिंह, प्रतापसिंह एवं मह्‌ताबसिंह हुए। दूसरा विवाह कड़ियां के ठाकुर रामलाल की सुपुत्री दाखकुंवर बाई के साथ हुआ जिनका थोड़े समय के बाद ही देहान्त हो गया। फूलकुंवर बाई के साथ कवि का जीवन बडे आनन्द से बीता।

नाथूसिंह वीर एवं साहसी व्यक्ति थे। सन १९०९ ई० में गांव कालीवास (तहसील गिरवां) के डाकुओं ने इनके गांव बान्दरवाड़ा पर डाका डाला तथा गाँव के मवेशियों को घेरकर भगा ले गये। इन्होंने कुछ आदमियों के साथ उनका पीछा किया, मुठभेड़ हुई और दोनों ओर के काफी व्यक्ति हताहत हुए। ये डाकू दल के तीन प्रमुख व्यक्तियों को मारकर अपने घायल साथियों एवं अपहृत पशुओं सहित अपने स्थान पर लौट आये। इन पर मुकदमा भी चला किन्तु आत्म-सुरक्षा की धारा के अन्तर्गत अपराध से मुक्त कर दिये गये। दो वर्ष हुए इनका देहान्त हो चुका है। नाथूसिंह ने कभी शास्त्राभ्यास नहीं किया था। स्फुट रचना का अभ्यास अवश्य चलता रहा। इन पर अपने समय की विभिन्न परिस्थितियों का प्रभाव पड़ता रहा। महात्मा गांधी के अहिंसात्मक आंदोलन से ये विशेष रूप से प्रेरित हुए (१९३३ ई०) इससे ये राष्ट्रीयता की ओर झुके। इसी समय इन्होंने ‘वीर सतसई’ की रचना आरम्भ की किन्तु घरेलू परिस्थितियों के कारण लगभग पांच वर्ष तक उसे पूर्ण नहीं कर पाये। सन् १९३९ ई० में यह कार्य फिर उठाया और पूर्ण किया। श्री यदुनाथ सरकार ने उदयपुर आने पर कहा था- ‘मुझे उदयपुर में सिर्फ दो वस्तुओं ने खींचा है जिसमें एक तो हल्दीघाटी और दूसरी श्री महियारिया जी की काव्य-प्रतिभा।’ भारत के प्रथम राष्ट्रपति स्व० डॉ० राजेन्द्र प्रसाद इनकी कविताओं से विशेष प्रभावित हुए थे। इन्होंने फूलकुंवर बाई की स्मृति में ‘हाडी शतक’ रचना लिखी। इसके अतिरिक्त ‘गांधी शतक’, ‘चूंडा शतक’, ‘झाला मान शतक’ एवं ‘वीर शतक’ नामक रचनायें भी उल्लेखनीय हैं। ‘वीर सतसई’ के अतिरिक्त शेष सभी रचनायें अप्रकाशित हैं।

१०३. सूर्यमल आसिया:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और उदयपुर जिले के कडियां गाँव के निवासी थे। ये इस काल के आरम्भ से ही काव्य-रचना करने लग गये थे और डिंगल गीत-रचना में पारंगत थे। इनकी लिखी हुई सादड़ी के सारंगदेवोत रायसिंह के पुनर्जीवन से सम्बंधित रचना प्रसिद्ध है। साथ ही फुटकर कविता भी मिलती है।

१०४. पाबूदान रतनू:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पोकरन परगने के बारहट रो गाँव के निवासी थे। उल्लेखनीय है कि पढ़े-लिखे न होने पर भी ये आशु कवि थे और चलते-फिरते कविता बना लेते थे। इनके स्फुट छंद मिलते हैं।

१०५. मगनीराम:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ परगने के गाँव बिराई के निवासी थे। इनकी गणना डिंगल के श्रेष्ठ कवियों में की जाती है। इनकी लिखी हुई फुटकर कविता उपलब्ध होती है।

१०६. वाँकीदास वीठू:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के गाँव वीठुओं की बासनी के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१०७. जुगतीदान सांदू:- ये सांदू शाखा में उन्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के ग्राम भदोरा के निवासी थे। ये डिंगल-पिंगल दोनों भाषाओं के ज्ञाता थे और भक्ति की रचनायें लिखते थे। इनमें ‘नाम माला’ (अपूर्ण), ‘करुणा पचीसी’ एवं ‘हर जस संग्रह’ के नाम उल्लेखनीय हैं। साथ ही फुटकर छन्द भी लिखे हैं। इनका निधन सन् १९१८ ई० के आस-पास हुआ था।

१०८. गोकुलदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के गाँव बिराई के निवासी थे। ये एक सरस एवं लोकप्रिय कवि थे। इन्होंने स्तुतिपरक कवितायें लिखी हैं। निन्दात्मक काव्य (विसहर) में विशेष सफलता मिली है। इसके अतिरिक्त हास्य-व्यंग्य के फुटकर छंद भी मिलते हैं।

१०९. अलसीदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पोकरन परगने के बारहट रो गाँव के निवासी थे। इनके पिता का नाम पाबूदान था। ये इतने परोपकारी थे कि खेत में हल चलाते हुए भी उसे छोड़कर गरीबों की सहायता करने जा पहुँचते। किसी के यहाँ पशु-धन की चोरी अथवा डकैती की सूचना पाकर ये नि:स्वार्थ भाव से उसकी सेवा करते। ये इतने लोकप्रिय थे कि इनका कोई विरोधी अथवा शत्रु नहीं था। ये उदार प्रकृति के थे और अपना कार्य ईमानदारी से करते थे। इनके असामयिक स्वर्गवास पर उस क्षेत्र की जनता में शोक की लहर छा गई। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें उपलब्ध होती हैं जो उच्च कोटि की हैं।

११०-११२. रणजीतदान, अन्नदान एवं गंगादान:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शेरगढ़ परगने के चांचळवा गाँव के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

११३. शेरजी:- ये उज्वल शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के गांव ऊजलां के निवासी थे। इनकी लिखी हुइ स्फुट रचनायें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं।

११४. शेरादान:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव एकलगढ़ (सीतामऊ) के निवासी थे। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

११५. मुरारिदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सोजत परगने के गाँव आगदोष के निवासी थे। इन्हें काश्मीर नरेश का राज्याश्रय प्राप्त था। उन्होंने इन्हें कविराजा की उपाधि प्रदान की थी। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

११६. नवलदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और सिरोही राज्यान्तर्गत खाण गाँव के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें मिलती हैं।

११७. मानदान:- ये कविया (अलूदासोत) शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८९४ ई०) और ग्राम दीपपुरा (सीकर) के निवासी थे। इनकी लिखी हुई कृतियों में मेंगल कुल सुयश प्रकाश’, ‘मृगेन्द्र आखेट’ एवं ‘इन्द्र सुयश’ के नाम उल्लेखनीय हैं। साथ ही फुटकर कविता भी मिलती है। इनका स्वर्गवास सन् १९५५ ई० में हुआ था।

११८. औनाड़सिंह:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम मेंगटिया के निवासी थे। इन्होंने कई गीत लिखे हैं।

११९. दुर्गादान:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और कोटा के निवासी थे। ये अत्यन्त गम्भीर, दृढ़ एवं मधुर भाषी थे। इन्हें कविराजा का पद मिला हुआ था। इनका देहावसान सन् १९५५ ई० में हुआ था। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१२०. मुकनदान:- ये पाल्हावत शाखा में उत्पन्न हुए थे (१९०० ई ०) और ग्राम बिरमी (चुरू) के निवासी थे। इन्होंने स्फुट रचनायें तथा स्तुतियां लिखी हैं। इनका स्वर्गवास सन् १९७१ ई० में हुआ था।

१२१. तेजदान:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे (१९०० ई०) और अलवर राज्यान्तर्गत गजुकी ग्राम के निवासी थे। इनके पिता का नाम ईश्वरीदान था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा पंडित छाजूरामजी के पास अलवर नोबल स्कूल में ७ वीं कक्षा तक हुई। उनके पास इन्होंने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। इन्होंने डिंगल-पिंगल दोनों में स्फुट काव्य-रचना की है। इन पर अलवर-नरेश की विशेष कृपा थी। इनकी लिखी हुई ‘ब्रज बहत्तरी’ नामक रचना उपलब्ध होती है।

१२२. कल्याणदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१९०१ ई०) और ग्राम दीपपुरा (सीकर) के निवासी थे। इनके पिता का नाम बद्रीदान था। इन्होंने ‘सिंह का शिकार’, ‘निन्दक बत्तीसी’ एवं ‘बलदेव प्रकाश’ नामक कृतियाँ लिखी हैं। साथ ही फुटकर स्तुतियाँ भी मिलती हैं। इनका स्वर्गवास सन् १९७२ ई० में हुआ था।

१२३. बलवंतसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और अलवर राज्यान्तर्गत माहुंद गाँव के निवासी थे। इन्होंने महाराणा प्रताप के घोड़े ‘चेतक’ पर रचना की है।

१२४. रामकरण:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्यान्तर्गत जहाजपुर तहसील के ग्राम सरसिया के निवासी थे। ये अकबर के दरबारी कवि जाडा के वंशज थे। ये अंग्रेज और अंग्रेजियत के विरोधी थे। इनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी। इनकी फुटकर रचनायें मिलती हैं।

१२५. वखतराम:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और खाण ग्राम (सिरोही) के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१२६. पाबूदान बारहठ:- ये रोहड़िया बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और गोड़ास ग्राम (सरदारशहर) के निवासी थे। इनके पिता हरनाथ भी अच्छे कवि थे। ये प्रसिद्ध कवि शंकरदान सामौर के सम-सामयिक एवं उनके मामा के लड़के थे। इनकी कतिपय फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं। इनके लिखे हुए मरसिये भी प्रसिद्ध हैं।

१२७. भोपालदान:- ये सामौर शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव हरासर (सुजानगढ़) के निवासी थे। इनके लिखे हुए स्फुट कवित्त उपलब्ध होते हैं।

१२८. पनजी:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव भादासर (सरदारशहर) के निवासी थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत उपलब्ध होते हें।

१२९. महताब कंवर:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुई थीं और गाँव भादासर (सरदारशहर) इनका निवास-स्थान था। इनके पिता का नाम भैरुंदान था। इनका विवाह बडाबर के हरजी सामौर के साथ हुआ था। ये एक अच्छी कवयित्री थीं। इन्होंने फुटकर कवितायें लिखी हैं।

१३०. सादूळदान:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव दां (सुजानगढ़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम राजसिंह था। इनका विवाह बोबासर के गिरवरदान सामौर की पुत्री दीपकंवर के साथ हुआ था। इनकी गणना उत्तम कोटि के कवियों में की जाती है। इनकी लिखी हुई ‘भगतमाळ’ नामक रचना उपलब्ध होती है। साथ ही फुटकर कवितायें तथा मरसिये भी मिलते हैं।

१३१. गणपतदान:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव राजासर (सरदारशहर) के निवासी थे। इनकी ‘गणपत विनोद’ नामक कृति उपलब्ध होती है।

१३२-१३४ भोमसिंह, फूसा एवं भैरूंदान:- ये मोखा शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव कंकराली (तारानगर) के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१३५-१३८. डूंगरसिंह, शिवनाथ, रावतदान एवं महेशदान:- ये चाहड़ोत शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम खुंड़िया (सरदारशहर) के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१३९. शिवनाथसिंह:- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु ये ग्राम चारणवासी (चूरू) के निवासी थे। इनकी गणना अच्छे कवियों में की जाती है। इन्हें राजगढ़ क्षेत्र में कई जगह जमीन प्राप्त हुई थी। इनकी फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

१४०. हमीरदान:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम गोगरिया (तारानगर) के निवासी थे। इनकी एक रचना ‘करनी-कृपा’ चतुरसिंह अप्पूवाला ने प्रकाशित की थी। साथ ही इनके फुटकर छन्द भी मिलते हैं।

१४१-१४२. हुकमदान एवं आसूदान:- ये मिश्रण शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव बिलासी (सुजानगढ़) के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१४३. महताबसिंह:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव खेतारण (सरदारशहर) के निवासी थे। इनकी फुटकर कविता मिलती है।

१४४. खुस्यालसिंह:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम आसपाल पर लालेरां (सरदारशहर) के निवासी थे। इनकी फुटकर कविता मिलताी है।

१४५. खींवपाल हरपाल:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बूचावास (सरदारशहर) के निवासी थे। इनकी फुटकर कविता मिलती है।

१४६. रामलाल बरसडा:- ये बरसडा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के ग्राम पीथासणी के निवासी थे। ये इतिहासवेत्ता थे। इन्होंने ‘शनिश्चरजी री कथा’ लिखी है। इसके साथ स्फुट छन्द भी उपलब्ध होते हैं।

१४७. कानदान:- ये देवल शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जैतारण परगने के ग्राम बळूंदा के निवासी थे। इनका देहान्त सन् १९७१ ई० मेँ हुआ। इनकी लिखी हुई फुटकर कविता मिलती है।

१४८. जवाहरदान सांदू:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के ग्राम भदोरा के निवासी थे। इनके पिता भोपालदान प्रसिद्ध कवि हो चुके हैं। ये एक वीर एवं साहसी व्यक्ति थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१४९. मूलदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत मेड़ता परगने के सूरपुरा ग्राम के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१५०. पूसाराम:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत मेड़ता परगने के भुंवाळ ग्राम के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य रचना की हैं।

१५१. अर्जुनसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के लोळावास ग्राम के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कविता मिलती है।

१५२. जवाहरदान आढा:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परनने के पाँचेटिया गाँव के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कविता मिलती है।

१५३. मोतीसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के मोरटहूका गांव के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कविता मिलती है।

१५४. नाथूदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत गुड़ा नगर के पास स्थित गाँव डाबड़ के निवासी थे। इनके लिखे हुए ‘सांवरिया के दोहे’ उपलब्ध होते हैं। साथ ही फुटकर कविता भी मिलती है। कुछ वर्ष हुए इनका देहान्त हो चुका है।

१५५. मुंकनदान खिडिया:- ये खिड़िया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत मेड़ता परगने के ग्राम भुंवाळ के निवासी थे। इनके पिता का नाम पूसारामजी था जो डिंगल के अच्छे कवि थे। इनका डिंगल-पिंगल दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। इनकी लिखी हुई ‘वीर सतसई’ (क्षत्रिय चेतावणी) , ‘शंकर ईश’ नायिका संग्रह, ‘संगीत निर्णय’ ग्रंथ, ‘विनय बत्तीसी’ आदि रचनायें उल्लेखनीय हैं।

१५६. रामदान:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बिलाड़ा परगने के ग्राम कूंपड़ावास के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य लिखा है।

१५७. विसनदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पाली परगने के गांव रामासणी के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१५८. जसकरण:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे (१९०९ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के चौपासनी गाँव के निवासी थे। इनका दृष्टिकोण सुधारवादी था। इन्होंने अपनी कविताओं का संग्रह ‘खीर प्याला’ के नाम से प्रकाशित कराया है। साथ ही फुटकर रचनायें भी उपलब्ध होती हैं।

१५९. बुधा:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्य के निवासी थे। सम्भव है, राजनगर के समीप मंडा गाँव इनका मूल स्थान रहा हो। ये स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति थे और डिंगल के अच्छे कवि थे। इनकी फुटकर रचनायें मिलती हैं।

१६०. फतहकरण:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्य के निवासी थे। सम्भवत: बीजोलियां गाँव के निवासी हों क्योंकि इन्होंने वहाँ के सत्याग्रह में भाग लिया था। इनके कई राजनैतिक साथी थे। ये निर्भय प्रकृति के थे। जब कोई उच्चाधिकारी अत्याचार करता तो उसकी खुलकर निन्दा करते थे। आज भी कई लोगों को इनकी रचनायें याद हैं जो स्फुट हैं।

१६१. चांपा:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के निवासी थे। इन्होंने ‘गुण चंद्रायणा रामचंद्र गोपालदासोत’ नामक ऐतिहासिक कृति लिखी है।

१६२. गोरधन:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे और बीकानेर राज्य के निवासी थे। इनके पिता का नाम लिखमीदासजी था। इनकी लिखी हुई दो कृतियां उपलब्ध होती है- एक, ‘करमसेण हिम्मतसिंहोत री झमाळ’ और दूसरी ‘कुंडळिया महाराजा पद्मसिंह रा।’

१६३. खीमराज:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के निवासी थे। इन्होंने ‘गोपालदास चांपावत रा कवित्त’ नामक रचना की सृष्टि की है।

१६४. पेमाजी:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम मोगड़ा (मारवाड़) के निवासी थे। इन्होंने ‘झूलणा चांपावत रा’ नामक रचना लिखी है।

१६५. कृष्णराम:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्य के निवासी थे। इनका लिखा हुआ ‘रासा विलास’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ उपलब्ध होता है।

१६६. फतहराम:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और बीकानेर राज्य के निवासी थे। इन्होंने ‘रूपक महाराजा गजसिंह रो’ नामक रचना का सृजन किया है।

१६७. नरसिंहदास:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम खराड़ी (मारवाड़) के निवासी थे। ये ‘महाराज कुमार बजरंगसिंहजी रो रूपक’ नामक कृति के रचयिता हैं।

१६८. मुरारिदान कविया:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१८९१ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत सेवापुरा ग्राम के निवासी हैं। ये हिंगलाजदान के छोटे भाई हैं। इनकी शिक्षा घर पर ही हुई। ये जयपुर प्रांतीय चारण सम्मेलन, सीकर के सभापति रह चुके हैं। इनकी दानशीलता प्रसिद्ध है। ये बालाबक्स चारण राजपूत पुस्तक माला ट्रस्ट के सदस्य रह चुके हैं। इन्होंने ‘बाँकीदास ग्रंथावली’ का सम्पादन भी किया है। इनका कोई ग्रंथ तो नहीं मिलता किन्तु स्फुट रचनायें अवश्य उपलब्ध होती हैं।

१६९. गुलाबबाई:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुई थी और जयपुर राज्यान्तर्गत सांडियों का टीबा नामक गाँव की थी। ये जयपुर के कविराजा मुरारिदान जी के बहिन थे। इनके पिता का नाम मानसिंह कविया था। इनका विवाह कोट-जेवर (हापावत चारणों की प्राचीन जागीर) के रामरतनजी के साथ हुआ था किन्तु दुर्भाग्य से थोड़े समय बाद ही इनके पति का स्वर्गवास हो गया। इससे इनका मन ईश्वर-भक्ति की ओर उन्मुख हुआ और तब से लेकर अंत तक हरि-सुमिरन में ही लीन रही। इन्होने “शक्ति सुयश” का संकलन किया था और इनकी फुटकर कविता मिलती है।

१७०. विजयदान (प्रज्ञाचक्षु):- ये बोगसा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सिवाना परगने के सरवडी गाँव के निवासी हैं। इनकी स्मरण-शक्ति गजब की है। ये डिंगल-पिंगल दोनों भाषाओं के विद्वान हैं। ये कवि होने के साथ इतिहास-वेत्ता भी हैं। इनका काव्य-पाठ करने का ढंग निराला है। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१७१. जुँझारदान:- ये देथा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम खारची (बाड़मेर) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

१७२. भँवरदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम झिणकली (शिव) के निवासी हैं। इनके पिता का नाम हेमजी है। अनोपदानजी इनके बड़े भाई हैं। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१७३. रूपदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के ग्राम मोरटहूका के निवासी हैं। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१७४. लालदान:- ये बोगसा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत सिवाना परगने के गाँव सरवडी के निवासी हैं। इनकी स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

१७५. जसकरण:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत शिव परगने के समूलियाइत गाँव के निवासी हैं। इन्होंने सन्यास ग्रहण कर लिया। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें उपलब्ध होती हैं।

१७६. आसुदान:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए हैं और जैसलमेर राज्यान्तर्गत माड़वा गाँव के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें उपलब्ध होती हैं।

१७७. प्रेमदान:- ये उज्वल शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलोदी परगने के गाँव ऊजलां के निवासी हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१७८. नरसिंहदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पचपदरा परगने के बाळाउ गाँव के निवासी हैं। इनकी फुटकर कविता मिलती है।

१७९. चालकदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम मृगेश्वर के निवासी हैं। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की हैं।

१८०. डालूराम:- ये देवल शाखा में उत्पन्न हुए हैं और जयपुर राज्यान्तर्गत नेतड़ार गाँव (शेखावाटी) के निवासी हैं। इन्होंने कई गीत लिखे हैं।

१८१. बलदेवदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और जयपुर के निवासी हैं। ये हिंगलाजदानजी के बड़े पुत्र है। इन्होंने अलवर-नरेश के यहाँ रसोड़ा-खास के मुंतजिम पद पर भी काम किया है। इनकी फुटकर रचनायें मिलती हैं।

१८२. सादूळदान सांदू:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०० ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के ग्राम भदोरा के निवासी हैं। इनके पिता का नाम गोपालदान था। इन्होंने आसोप ठिकाने के कामदार पद पर कार्य किया है। ये ठाकुर फतहसिंह के विशेष कृपा-पात्र रह चुके हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

१८३. ईश्वरदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम मेंगटिया के निवासी हैं। ये केसरीसिंह सौदा (शाहपुरा) के दामाद हैं और राष्ट्रोय आन्दोलन में भी सक्रिय भाग ले चुके हैं। इन्होंने मेवाड़ में चारण जाति के उत्थान के लिए यथेष्ट योगदान दिया है। इनके फुटकर गीत मिलते हैं।

१८४. जवाहरदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और अलवर के निवासी है। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है और अपनी रचनायें समय-समय पर राज-सभा में भी सुनाई हैं।

१८५. जोगीदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०४ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत सेवापुरा ग्राम के निवासी हैं। इनके पिता का नाम मुरारिदानजी है। इन्होंने १९२४ ई० में शिक्षा समाप्त कर जयपुर शिक्षा-विभाग में नौकरी कर ली। ये डिंगल, पिंगल एवं हिन्दी तीनों भाषाओं के ज्ञाता हैं। इनकी लिखी हुई अनेक रचनायें देखने को मिलती हैं जिनमें ‘राम-केवट संवाद’, ‘भरत मिलाप’, ‘मोरध्वज महिमा’, ‘तवर वंश का संक्षिप्त इतिहास’ एवं ‘हठी हमीर’ हिन्दी के ग्रंथ हैं। ‘प्रह्लाद नाटक’ एवं ‘लवकुश संवाद’ इनकी अप्रकाशित रचनायें हैं। इन्होंने श्री गणेशपुरी का एक पद्यमय जीवन-चरित भी बनाया है। डिंगल में इनके पाँच शतक मिलते हैं-वीर शतक, श्रृंगार शतक, वैराग्य शतक, सती शतक एवं अन्योक्ति शतक। साथ ही फुटकर कविता भी मिलती है।

१८६. हेमदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०४ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के ग्राम भदोरा के निवासी हैं। ये डिंगल काव्य-पाठ करने में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। इनकी प्रशंसात्मक एवं भक्ति की स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

१८७. साँवलदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०४ ई०) और मेवाड़ राज्यान्तर्गत गोगुन्दा तहसील के कडिया गाँव के निवासी हैं। ये डिंगल गीतों का उच्चारण करने में दक्ष हैँ। इन गीतों का इनके पास विपुल भण्डार है। कतिपय संग्रह साहित्य संस्थान विद्यापीठ, उदयपुर से प्रकाशित हो चुके हैं। आकाशवाणी जयपुर से भी इनकी रचनायें प्रसारित होती रहती हैं। इन्होंने डिंगल गीतों के लक्षण ग्रंथ रूप में ‘महाभारत रूपक’ की सृष्टि की है। फुटकर गीत भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैँ। आजकल अपने गाँव में रहकर साहित्य-साधना कर रहे हैं।

१८८. यशकरण:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०४ ई०) और भीलवाड़ा जिले की आसीन्द तहसील के जेतपुरा ग्राम के निवासी हैं। इनके पिता का नाम शक्तिदान था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा प्रतापगढ़ एवं उदयपुर में हुई। समाज-सुधार में इनकी विशेष रुचि है। इनकी लिखी हुई ‘शिवस्तव’, ‘सवैयावली’, ‘विविध छंदावली’ एवं ‘हृदयोद्‌गार’ नामक अप्रकाशित रचनायें उपलब्ध होती हैं। इनके अतिरिक्त फुटकर रचनायें पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं।

१८९. गणेशदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०४ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत मेड़ता परगने के ग्राम भूंभळिया के निवासी हैं। ये एक सशक्त एवं बेजोड़ कवि हैं। इन्होंने ‘शिव तांडव स्तोत्र’ नामक रचना लिखी है। इसके अतिरिक्त प्रशंसात्मक एवं भक्ति की फुटकर रचनायें भी उपलब्ध होती हैं।

१९०. पाबूदान कविया:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और जयपुर राज्यान्तर्गत सेवापुरा ग्राम के निवासी हैं। इनके पिता का नाम मुरारिदानजी है। इन्होंने फुटकर कवितायें लिखी हैं।

१९१. शम्भूदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम मेंगटिया के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें मिलती हैं।

१९२. बिसनदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाड़मेर परगने के ग्राम भाद्रेस के निवासी हैं। ये कविता-पाठ करने में सानी नहीं रखते। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

१९३. रामदान:- ये अचलावत बारहठ (रोहड़िया) शाखा में उत्पन्न हुए थे (१९११ ई. ) और मारवाड़ में पचपदरा तहसील जिला बाड़मेर में गाँव बागुण्डी के निवासी थे। इनके पिता का नाम भैरूदाँन जी था। आजादी से पूर्व तत्कालीन मारवाड़ राज्य जोधपुर के इंस्पेक्टर आँफ स्कूल ए. पी कोक्स ने इन्हें जोधपुर की चौपासनी स्कूल में अध्यापक तथा वहाँ हार्डिंग हाँल का वार्डन नियुक्त किया था। तत्पश्चात् ये जोधपुर रेजिडेंसी स्कूल के हैडमास्टर रहे तथा चार दशकों तक अध्यापन करते रहे। प्रख्यात शब्दकोशकार स्व. सीतारामजी लालस एवं स्व. मुरारीदाँन जी किनिया के साथ अध्यापन कार्य किया। आजादी के पश्चात राजस्व विभाग में कार्यालय अधीक्षक रहे तथा १९६५ में सेवानिवृत्त हुए। सरकारी सेवा के दौरान तथा सेवानिवृत्ति के पश्चात भी डिंगल में काव्य सृजन करते रहे। ये जोधपुर चारण छात्रावास के अभिरक्षक (प्रोक्टर) भी रहे। इन्होंने ईशभक्ति, देशप्रेम, जनरंजन विषयों पर स्फुट काव्य रचना की है। ०९ फरवरी १९९९ को इनका देहावसान हुआ।

१९४. सगतीदान:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मेवाड़ राज्य के झालरा गाँव (भीलवाड़ा) के निवासी हैं किन्तु आजकल ढोकलिया गाँव में रहते हैं। कविराजा श्यामलदास के उत्तराधिकारी होने के कारण महाराणा भोपालसिंहजी ने इन्हें कविराजा की उपाधि प्रदान की एवं स्वर्ण से अलंकृत किया। इनकी स्फुट रचनायें मिलती हैं।

१९५. सौभाग्यवती (प्रभा बाई):- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुई हैं और मेवाड़ राज्यान्तर्गत जेतपुरा गाँव इनका निवास-स्थान है। काव्य-जगत में ये प्रभा नाम से विख्यात हैं। इन्होंने काव्य-पाठ की शिक्षा अपने बड़े भाई यशकरण से ग्रहण की। इनका विवाह उदयपुर के कविराजा सगतीदानजी के साथ हुआ है। इन्हें उदयपुर की महारानी ने पैर में स्वर्ण प्रदान कर विशेष प्रतिष्ठा दी। ये सामाजिक कार्यों में विशेष रुचि रखती हैं। ईश्वर में इनकी अटूट आस्था है। इनकी लिखी हुई देवी की स्तुतियां (चिरजा) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अन्य रचनाओं में ‘प्रभा सतसई’, ‘प्रबोध पच्चीसी’ एवं ‘करणी करुणा-कुंज’ के नाम लिये जा सकते हैं। साथ ही स्फुट कवितायें भी लिखती रहती हैं।

१९६. मुरारिदान आसिया:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्य के नोखड़ा गाँव के निवासी हैं। ये अपने क्षेत्र के पंच हैं और जनता की सेवा में संलग्न हैं। इनकी भक्ति विषयक रचनायें प्राप्त होती हैं।

१९७. भैंरूदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्य के छीला गाँव (नागौर) के निवासी हैं। इन्हें अनेक कवितायें कंठस्थ याद हैं तथा बात कहने का ढंग अनोखा है। इनकी लिखी हुई ‘रतोड रासो’ नामक हास्य-रचना उपलब्ध होती है। साथ ही फुटकर भक्ति विषयक रचनायें भी मिलती हैं।

१९८. हरदान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०५ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम थूंबली के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई दो रचनायें उपलब्ध होती हैं- ‘अरज बहोत्तरी’ एवं ‘सांगरिया छंद’। इसके अतिरिक्त फुटकर कविता भी लिखते रहते है।

१९९. अम्बादान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए (१९०६ ई०) और अलवर के निवासी हैं। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२००. बलवंतसिंह:- ये रोहड़िया बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०६ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत ग्राम हणूंतिया के निवासी हैं। बाल्यावस्था में ये महाकवि सूर्यमल्ल की रचनाओं से विशेष प्रभावित हुए अत: उन्हें पढ़ते-सुनते १२ वर्ष की अवस्था से ही कविता करने लग गये। इन्होंने ‘पुष्पोहार’, ‘श्री जयसिंह श्रद्धांजली’, ‘चंद्रचूर चमत्कार’, ‘श्री भुवपाल सुयश’ एवं ‘हल्दीघाटी की हुँकार’ नामक रचनायें लिखी हैं जिनका प्रकाशन हो चुका है। इनके अतिरिक्त अप्रकाशित फुटकर रचनायें भी बहुत हैं।

२०१. धनेसिंह:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०६ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के ग्राम भदोरा के निवासी हैं। इनके पिता का नाम चालकदान है। इन्होंने काव्य-पाठ अपने गुरू एवं कवि शंकरदानजी बारहठ से ग्रहण किया। इनकी लिखी हुई ईश्वर सम्बन्धी स्तुतियाँ, भजन एवं देवी विषयक गीत अधिक मिलते हैं। आजकल आप कृषि में रत हैं।

२०२. रूपसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम वरबाड़ा के निवासी हैं। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२०३. लालसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं। निवास-स्थान अज्ञात है। इन्होंने फुटकर कवितायें लिखी हैं।

२०४. आईदान:- इनकी शाखा का पता नहीं चलता किन्तु निवास-स्थान जयपुर है। इनके पूर्वज प्रसिद्ध कवि हुए हैं। इनकी शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने डिंगल-पिंगल दोनों भाषाओं में काव्य-रचना की है। कविता करते समय ये ‘आदिल’, ‘आदल’ और ‘आदू’ उपनाम रखते हैं। इन्होंने स्फुट रचनायें लिखी है।

२०५. फूसाराम:- ये किसनावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम साँखला का बास (जयपुर) के निवासी हैं। इनके फुटकर दोहे एवं छप्पय मिलते हैं।

२०६. श्रीदानसिंह:- ये पाल्हावत शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०८ ई०) और ग्राम कल्याणपुरा (जयपुर) के निवासी हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

२०८. धनदान:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९१५ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत चांचळवा गाँव के निवासी हैं। इनके पिता का नाम हेतुदान था। ये समाज-सुधारक हैं और स्पष्ट वक्ता भी। इनकी लिखी हुई स्फुट रचनायें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं।

२०९. नरसिंहदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम बछवास (मारवाड़) के निवासी हैं। इनके पिता का नाम हरिसिंह था। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२१०. व्रजलाल:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९२० ई०) और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई कई स्फुट कवितायें उपलब्ध होती हैं।

२११. बद्रीदान गाडण:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९२३ ई०) और जयपुर राज्यान्तर्गत हरमाड़ा गाँव के निवासी हैं। इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने चाचा जवाहरदानजी से ग्रहण की। जब ये मैट्रिक मेँ पढ़ते थे तब इनके गाँव में मातमी का केस चालू था। इस सिलसिले में हरमाड़ा जब्त कर दिया गया। इससे दुखी होकर इन्होंने अपनी इष्टदेवी श्री करणीजी की प्रार्थनायें तथा दोहे बनाये। यहीं से इनकी साहित्य-सेवा आरम्भ होती है। इनकी स्फुट रचनायें ‘क्षात्रधर्म’ नामक पत्र में प्रकाशित हुई हैं।

२१२. नाथूसिंह महडू:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मेवाड़ राज्यान्तर्गत भीलवाड़ा जिले के ग्राम बाड़ी के निवासी हैं। इनकी राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

२१३. अजयदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और सिरोही राज्यान्तर्गत रेवदर तहसील के गाँव मलावा के निवासी हैं। वर्षों से अध्यापक के रूप में शिक्षा-विभाग की सेवा कर रहे हैं। इनकी फुटकर कवितायें मिलती हैं।

२१४. विजयसिंह:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मेवाड राज्य के निवासी हैं। ये प्रगतिशील कवि हैं। इनकी फुटकर रचनायें मिलती हैं।

२१५. किशोरसिंह:- ये भादा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और जयपुर राज्यान्तर्गत कचोलिया ग्राम के निवासी हैं। आजकल ये चारण छात्रावास, जयपुर की कार्यकारिणी समिति के प्रमुख सदस्य हैं। इन्हें समाज-सुधार का विशेष ध्यान है तथा साथ-साथ राजनीति के क्षेत्र में भी दिलचस्पी रखते हैं। ये एक कुशल वक्ता हैं और अपने क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इनकी लिखी हुई भक्ति विषयक स्फुट रचनायें उपलब्ध होती हैं।

२१६. चंडीदान:- ये सांदू शाखा मैं उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत नागौर परगने के हिलोड़ी गाँव के निवासी हैं। इन्होंने ‘मरु-भारती’ (त्रैमासिक शोध-पत्रिका, पिलानी) के प्रकाशन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही सादूळ रिसर्च इंस्टीट्‌यूट, बीकानेर से प्रकाशित ‘डिंगल गीत’ का भी सम्पादन किया है। इनकी गणना डिंगल के उच्च श्रेणी के कवियों में की जाती है। आजकल आप पटवारी के रूप में राज्य-सेवा कर रहे हैं।

२१७. शुभकरण:- ये देवल शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम कूंपड़ावास के निवासी हैं। इन्होंने बी० कॉम० की उपाधि जोधपुर विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। इस समय ये भारतीय बीमा निगम में सेवारत हैं। इन्होंने भक्ति, नीति एवं शृंगार विषयक कई कवितायें लिखी हैं।

परिशिष्ट

२१८. जयलाल:- ये मिश्रण शाखा में उत्पन्न हुए थे और बूँदी के निवासी थे। ये महाकवि सूर्यमल के अनुज एवं अच्छे वैयाकरण थे। इनकी फुटकर रचनायें बताई जाती हैं।

२१९. वल्लभजी:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और गोध्याणा गाँव (किशनगढ़) के निवासी थे। ये महाकवि सूर्यमल्ल के साले एवं शिष्य थे। इन्होंने चारण जाति पर सबसे पहले इतिहास लिखा है। इनकी फुटकर रचनायें बताई जाती हैं।

२२०. सीताराम:- ये पाल्हावत शाखा में उत्पन्न हुए थे और जयपुर राज्यान्तर्गत किशनपुरा गाँव के निवासी थे। इन्हें महाकवि सूर्यमल्ल का शिष्यत्व प्राप्त था। इन पर जयपुर-नरेश रामसिंहजी की बड़ी कृपा थी। उन्होंने इन्हें कान्याळो गाँव प्रदान किया था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२२१. हरदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और श्यामपुरा के निवासी थे। इन्हें भी महाकवि सूर्यमल्ल का शिष्यत्व प्राप्त था। इनकी स्फुट रचनायें बताई जाती हैं।

२२२. विजयनाथ खिडिया:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और गंगावती के निवासी थे। ये भी महाकवि सूर्यमल्ल के शिष्य थे। इनकी स्फुट रचनायें बताई जाती हैं।

२२३. मोतीराम रतनू:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और धानणवां ग्राम (मारवाड़) के निवासी थे। ये भी महाकवि सूर्यमल्ल के शिष्य थे। इनके स्फुट गीत कहे जाते हैं।

२२४. बख्शीराम:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और बडे धानणवां ग्राम (मारवाड़) के निवासी थे। ये भी महाकवि सूर्यमल्ल के शिष्य थे। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२२५. धूंकळजी:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए थे और लीलेड़ा ग्राम (बूंदी) के निवासी थे। ये भी महाकवि सूर्यमल्ल के शिष्य थे। इन्होंने फुटकर रचना की हैं।

२२६. हरदान किसनावत:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और डांसणोली का बास के निवासी थे। ये भी महाकवि सूर्यमल्ल के शिष्य थे। इनके स्फुट गीत कहे जाते हैं।

२२७. अनजी:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम नेतजी था। इनका निधन १८८८ई० में हुआ था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२२८. हेतुदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और गाँव सिंयावधा (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम मेहरदान था। इन्होंने फुटकर कवितायें लिखी हैं।

२२९. नाथूराम:- ये उज्वल शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत फलौदी परगने के गाँव ऊजलां के निवासी थे। ये अपने समय के एक कुशल प्रशासक, राजनीतिज्ञ एवं समाज-सेवी थे और अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे। मोतीसरों तथा रावलों द्वारा इन की प्रशंसा में कहे हुए दोहे इसके प्रमाण हैं। इनके फुटकर छंद कहे जाते हैं। इनका स्वर्गवास सन् १८९९ ई० में हुआ था।

२३०. रामवल्लभ:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८४३ ई०) और सिउ ग्राम (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम लादूरामजी था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२३१. पृथ्वीसिंह:- ये सामौर शाखा में उत्पन्न हुए थे और बीकानेर राज्यान्तर्गत सुजानगढ़ तहसील के गाँव बोबासर के निवासी थे। ये संस्कृत और राजस्थानी के विद्वान थे। साथ ही स्वाभिमानी एवं निर्भीक भी थे। इनके कोई संतान नहीं थी। बोबासर में इनका बनाया हुआ एक ठाकुरजी का मंदिर है। इन्होंने अनेक सामन्तों की समय-समय पर सहायता की है। इनके फुटकर गीत बताये जाते हैं।

२३२. जेठूदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम चैनदान था। इनका निधन १८९३ ई० के आसपास हुआ था। इनकी फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२३३. मूलजी:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। ये फुटकर कविता करते थे। इनका स्वर्गवास सन् १८९४ ई० में हुआ था।

२३४. आवड़दान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। वे स्फुट रचनाकार हैं।

२३५. जसवंतदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम जगजी था। इनका निधन १९१८ ई० में हुआ था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२३६. केसरी सिंह महियारिया:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और मेवाड़ राज्यान्तर्गत ग्राम बांदरवाड़ा के निवासी थे। इनके पिता का नाम जउकरणजी था। इनका स्वर्गवास सन् १९०० ई० में हुआ था। इनका फुटकर काव्य बताया जाता है।

२३७. मेदराम:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और अलवर के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२३८. नाथूदान:- ये आढ़ा शाखा में उत्पन्न हुए थे और सिरोही राज्यान्तर्गत ग्राम पेसुआ के निवासी थे। महाराव उम्मेदसिंह इनके समकालीन थे। उन्होंने इन्हें प्रसन्न होकर धनारी गाँव में ‘नवा’ अरट पुरस्कार में दिया था। इनके गीत कहे जाते हैं।

२३९. सुखदान:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और दुलचास की कलमी गाँव (शेखावाटी) के निवासी थे। इनकी फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२४०. चतुर्भुज:- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम सौन्याणा (मेवाड़) के निवासी थे। केसरीसिंह इनके भाई हैं। इन्हें दुलहसिंह ने गोद लिया था अत: गाँव पानेर में रहे। महाराणा सज्जनसिंह की इन पर विशेष कृपा थी। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२४१. गंगादान कविया:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८४६ ई०) और अलवर के निवासी थे। इनके पिता का नाग रामनाथजी था। इनका रचना-काल सन् १८८३ ई० से आरम्भ होता है। ये डिंगल भाषा के गुरू हैं। इनकी बनाई हुई ‘छनेद प्रबंध’ नामक पुस्तक एवं कतिपय गीत कहे जाते हैं। इनका निधन सन् १८९९ ई० में हुआ था।

२४२. शिवदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८५० ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम मृगेश्वर के निवासी थे। इनके पिता का नाम मोहकमसिंह था। इन्होंने ‘जोरजी चांपावत री झमाळ’ नामक सुन्दर रचना लिखी है। साथ ही स्फुट कविता भी मिलती है।

२४३. भोपालदान:- ये रोहडिया बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के मथाणिया गाँव के निवासी थे। इनके फुटकर गीत बताये जाते हैं।

२४४. ईश्वरीदान:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और अलवर राज्यान्तर्गत गजुकी ग्राम के निवासी थे। इन्होंने अपनी शिक्षा पंडित देवी प्रसाद से प्राप्त की थी। ये उर्दू एवं फारसी भाषाओं को भी जानते थे। ये तीन भाई थे और तीनों ही कवि थे तथा मिलकर काव्य-रचना करते थे। इनका अवसान सन् १९१४ ई० में हुआ था। इनका लिखा हुआ ‘तवारीख हिन्द खुश बयान’ नामक ग्रंथ बताया जाता है।

२४५. जान:- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम सौन्याणा (मेवाड़) के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

२४६. डालजी:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और जयपुर राज्यान्तर्गत हणूंतिया ग्राम के निवासी थे। बालाबख्शजी इनके भाई थे। इन्होंने फुटकर कविता लिखी है।

२४७. समर्थदान:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम नेठवा (सीकर) के निवासी थे। इनके पिता का नाम मंगलजी था। युवावस्था में दयानंद सरस्वती की संगति से ये आर्य समाजी हो गये। इन्होंने स्वामीजी के साथ अनेक स्थानों का भ्रमण किया। इससे इन्हें अच्छा साहित्यिक ज्ञान प्राप्त हो गया। इन्होंने अजमेर में ‘समर्थ यंत्रालय’ के नाम से एक छापाखाना खोला और ‘राजस्थान समाचार’ नामक एक साप्ताहिक पत्र निकाला। इनका अनेक राजा-महाराजा आदर करते थे। काश्मीर-नरेश ने इन्हें ताजीम एवं कविराजा की उपाधि से अलंकृत किया था किन्तु बाद में ये वहाँ से चले आये। इनका अंतिम समय बहुत कष्टमय बीता। इन्होंने गणेशपुरी कृत ‘कर्ण पर्व’ का सम्पादन किया है। इसी प्रकार मतिराम कृत ‘रसराज’ के सम्पादन का श्रेय भी इनको है।

२४८. किसनदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम हठजी था। इनका निधन १९२२ ई० में हुआ था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२४९. जगतदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और सिरोही राज्यान्तर्गत ग्राम मलावा के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२५०. रामलाल:- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु निवास-स्थान गोलावास है। इनका रचना-काल सन् १८९३ ई० से आरम्भ होता है। ये स्फुट रचनाकार कहे जाते हैं।

२५१. प्रमुदान:- ये देथा शाखा में उत्पन्न हुए थे और दौलतगढ़ के निवासी थे। इनका रचना-काल सन् १८९३ ई० है। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२५२. रामसिंह:- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम सौन्याणा (मेवाड़) के निवासी थे। इन्हें महाराणा ने अपना पोलपात नियुक्त किया था। इनका रचना-काल सन् १८९४ ई० है। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२५३. हीरदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम मृगेश्वर के निवासी थे। ये शिवदानजी के भाई थे। इनकी फुटकर कविता उपलब्ध होती है।

२५४. वेळुदान:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८४३ ई०) और ग्राम चांचळवा (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम हेमराज था। इनका निधन १९१८ ई० में हुआ। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२५५. बिहारीदान:- ये देथा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ के निवासी थे। इनका रचना-काल सन् १८९५ ई० से आरम्भ होता है। इनकी फुटकर रचनायें कही जाती हैं।

२५६. शम्भुदान (नागौर):- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु निवास-स्थान नागौर है। इनका रचना-काल सन् १८९५ ई० से आरम्भ होता है। ये फुटकर रचनाकार हैं।

२५७. भैरोदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत देसूरी परगने के ग्राम अटाटिया के निवासी थे। इनका रचना-काल सन् १८९५ ई० से आरम्भ होता है। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२५८. भोपालदान रतनू:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम धानणी (मारवाड़) के निवासी थे। इनका रचना-काल १८९५ ई० है। इनके फुटकर गीत कहे जाते हैं।

२५९. किशोरदान:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और शाहपुरा के निवासी थे। इनका रचना-काल १८९५ ई० है। इनकी फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२६०. चालकदान आसिया:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम मंदार (मेवाड़) के निवासी थे। इनका रचना-काल १८९५ ई० है। इनकी फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२६१. चतरसिंह:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम कर्णवास (मेवाड़) के निवासी थे। इनका रचना-काल १८९५ ई० है। इनके फुटकर गीत बताये जाते हैं।

२६२. हमीरदान:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम तोलेसर (मारवाड़) के निवासी थे। इनका रचना-काल १८९५ ई० है। इनकी फुटकर रचनायें बताई जाती है।

२६३. सूरजदान:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम कूपड़ास (मारवाड़) के निवासी थे। इनका रचना-काल १८९५ ई० है। इनके लिखे हुए स्फुट गीत बताये जाते हैं।

२६४. सिरेदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाली परगने के ग्राम मृगेश्वर के निवासी थे। ये आशु कवि थे और हास्य-व्यंग्य की कविता करने में निपुण थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

२६५. देवीदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम आवड़दान था। इनका निधन १९५३ ई० में हुआ था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२६६. वख्तावरदान:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८६८ ई०) और गजुकी ग्राम (अलवर) के निवासी थे। इनके पिता का नाम रामबख्शजी था। इन्हें अलवर राज-सभा में स्थान प्राप्त था। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२६७. गंगादान रतनू:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम ओढाणिया (मारवाड़) के निवासी थे। इनका रचना-काल १९०० ई० है। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२६८. चंडीदान बारहठ:- ये रोहडिया बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और गोध्याणा गाँव (किशनगढ़) के निवासी थे। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२६९. सालजी:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और जयपुर राज्य के हणूंतिया गाँव के निवासी थे। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२७०. जादूराम:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के गाँव मोगड़ा के निवासी थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है जिसमें आखेट सम्बंधी गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

२७१. दौलतदान:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम खाण (सिरोही) के निवासी थे। इनकी फुटकर रचनायें कही जाती हैं।

२७२. लक्ष्मण:- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम सौन्याणा (मेवाड़) के निवासी थे। केसरीसिंह इनके छोटे भाई थे। इनकी स्फुट रचनायें बताई जाती हैं।

२७३. खेतसिंह:- ये मिश्रण शाखा में उत्पन्न हुए थे और ब्राह्मणवाड़ा गाँव (सिरोही) के निवासी थे। इनका देहांत १९३८ ई० में हुआ। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२७४. खेतदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम मगनीराम था। इनकी स्फुट काव्य-रचना बताई जाती है।

२७५. भैरवदान:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और बीकानेर राज्यान्तर्गत सींथल गाँव के निवासी थे। इन्हें कविराजा का उपटंक मिला था। इन्होंने ‘चारणोत्पत्ति मीमांसा मार्तण्ड’ नामक ग्रंथ लिखा है।

२७६. तेजराम:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और सिरोही राज्यान्तर्गत झाँखर गाँव के निवासी थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत बताये जाते हैं।

२७७. मोडजी:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे। इनका निवास स्थान अज्ञात है। इनके लिखे हुए स्फुट गीत बताये जाते हैं।

२७८. महकरण:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए थे। इनका स्थान अज्ञात है। इनके लिखे हुए स्फुट गीत बताये जाते हैं।

२७९. करणीदान:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम खेमपुर के निवासी थे। इनके पिता का नाम चमनसिंह था। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२८०. करणीदान सिंढायच:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम नोगावां (डूंगरपुर) के निवासी थे। इनके पिता का नाम लालदान था। इन्हें कविराजा का उपटंक मिला था। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२८१. रायभाण:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे (१८८७ ई०) और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के गाँव मोगड़ा के निवासो थे। ये डिंगल के आचार्य थे और अनेक विद्याओं में पारंगत थे। ये पंचांग भी बना लेते थे और वैद्यक के विद्वान थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है। इनका स्वर्गवास सन् १९६७ ई० में हुआ था।

२८२. भूरसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम खारी (मारवाड़) के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२८३. शंकरदान आढा:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम पाँचेटिया (मारवाड़) के निवासी थे। ये आरंभ से सोनानवीस थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२८४. इन्द्रबाई:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुई थीं और वेसरोली स्टेशन (मारवाड़) के पास दो मील पर स्थित गाँव खुरद इनका निवास स्थान था। इनके पिता का नाम सागरदानजी था। भक्त-समाज ने इन्हें देवी का अवतार माना है। इनके चमत्कार की अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। इनके स्फुट भक्ति विषयक पद बताये जाते हैं।

२८५. शीशदान:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम किशनपुरा (जयपुर) के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२८६. फतहकरण (जयपुर):- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु जन्म १८८१ ई० में जयपुर में हुआ था। इन्हें एक गाँव जागीर में मिला। इनकी कवितायें ‘सुकवि’ (कानपुर) नामक पत्र में प्रकाशित हुई हैं। इनका देहान्त सन् १९४४ में हुआ था।

२८७. प्रभुदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जोधपुर परगने के ग्राम मथाणिया के निवासी थे। इनके फुटकर गीत कहे जाते हैं।

२८८. सुमेरदान:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाड़मेर परगने के पारलाऊ गाँव के निवासी थे। इनके फुटकर गीत कहे जाते हैं।

२८९. पीरदान सिंढायच:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम मोगड़ा (मारवाड़) के निवासी थे। ये बुधसिंह के पाटवी पुत्र थे और नृसिंहगढ़ के प्रथम श्रेणी के ताजीमी सरदारों में थे। दरबार की इन पर पूर्ण कृपा थी। ये सज्जन व्यक्ति और अच्छे विद्वान थे। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें कही जाती हैं।

२९०. विसनदान:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत मेड़ता परगने के शिव गाँव के निवासी थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत कहे जाते हैं।

२९१. फतहकरण झीबा:- ये झीबा शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम झीबा (झालावाड़) के निवासी थे। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

२९२ जसजी:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम घडोई (मारवाड़) के निवासी थे। ये पोरबंदर के राजकवि रह चुके हैं। साथ ही कच्छ-भुज पाठशाला के अध्यक्ष थे। ये डिंगल के विद्वान थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत बताये जाते हैं।

२९३. हरलाल:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे और वासनी गाँव (मारवाड़) के निवासी थे। ये उच्च कोटि के विद्वान थे और डिंगल-पिंगल के पूर्ण ज्ञाता थे। इन्हें यदि ‘जीवित पुस्तकालय’ की संज्ञा दी जाय तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२९४. शम्भूदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए (१९०९ ई०) थे और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनका देहान्त सन् १९६९ ई० में हुआ। ये फुटकर कविता करते थे।

२९५. रिडमलदान वीठू:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम सींथल (बीकानेर) के निवासी थे। ये बीकानेर-नरेश गंगासिंह जी के साथ विदेश यात्रा भी कर चुके थे। ये चारण-छात्रावास, बीकानेर के अध्यक्ष थे। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

२९६. चंडीदान दधवाडिया:- ये दधवाडिया शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम कूंपड़ास (मारवाड़) के निवासी थे। ये मारवाड़ में चारण छात्रावास, चारण सभा एवं सम्मेलन में स्व० उदयराजजी उज्वल के साथ सक्रिय कार्यकर्ता थे। ये स्फुट रचनाकार हैं।

२९७. हमीरदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए थे (१९११ ई०) और ग्राम बिराई (मारवाड़) के निवासी थे। इनके पिता का नाम खेतदानजी था। इनकी फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

२९८. भोपालसिंह आढा:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम पांचेटिया (मारवाड़) के निवासी थे। ये चारण छात्रावास, जोधपुर की स्थापना में उपस्थित थे। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

२९९. गुलजी:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए थे और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पांचेटिया गाँव के निवासी थे। इनके लिखे हुए फुटकर गीत बताये जाते हैं।

३००. वख्तावरदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम भीखोड़ाई (मारवाड़) के निवासी थे। इन्होंने फुटकर काव्य-रचना की है।

३०१. सूरजमल:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम जुडिया (मारवाड़) के निवासी थे। इनके फुटकर गीत प्रसिद्ध हैं।

३०२. प्रभुदान लालस:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए थे और ग्राम जुडिया (मारवाड़) के निवासी थे। इन्होंने फुटकर गीत-रचना की है।

३०३. कालूदान:- ये मिश्रण शाखा में उपन्न हुए हैं और बूँदी के निवासी हैं। इनके पिता-पितामह का नाम क्रमश: मुरारिदान एवं सूर्यमल्ल है। ये फुटकर रचनाकार हैं।

३०४. रामप्रताप:- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम सौन्याणा (मेवाड़) के निवासी हैं। इनके पिता का नाम चतुर्भुज है। इनके फुटकर गीत कहे जाते हैं।

३०५. फतहसिंह:- ये सौदा बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम आँतरी (मेवाड़) के निवासी हैं। इनके पिता का नाम चतुर्भुज है। इनके फुटकर गीत कहे जाते हैं।

३०६. हेमदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और वासनी गाँव (मारवाड़) के निवासी हैं। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३०७. दुलहसिंह:- ये भादा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और लसाड़िया गाँव (अजमेर) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३०८. रामचन्द्र:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और गाँव कडिया (मेवाड़) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३०९. जसदान:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जैतारन परगने के गाँव खराड़ी के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३१०. परबतसिंह:- ये लखावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१८९३ ई०) और ग्राम करंडिया (प्रतापगढ़) के निवासी हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

३११. भीखजी:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत विणलिया गाँव के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

३१२. हरीसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम खारी (मारवाड़) के निवासी हैं। इन्होंने ‘मगनी भैकेस’ नामक शृंगारिक बात लिखी है। इनकी फुटकर रचनाओं में विषहर काव्य उल्लेखनीय है।

३१३. जसवंतसिंह:- ये आसिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम भांडियावास (मारवाड़) के निवासी हैं। ये आजीवन ब्रह्मचारी भक्त हैं और डिंगल-पिंगल के अच्छे विद्वान हैं। इन्होंने ‘रामचरित’ नामक ग्रंथ बनाया है। साथ ही स्फुट काव्य-रचना भी की है।

३१४. हीरदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और बीकानेर राज्यान्तर्गत पूंगल के पास भाटीयाळी गाँव के निवासी हैं। इनके फुटकर पद कहे जाते हैं।

३१५. गोरखदान:- ये देवल शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम कूंपडास (मारवाड़) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३१६. गणेशदान किनियां:- ये किनियां शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९२३ ई० के आसपास) और ग्राम मनरूपजी का बास (सीकर) के निवासी थे। इनके पिताजी का नाम गोपाल दान जी व माताजी का नाम जतन कंवर पालावत था। इनका स्वर्गवास दिसम्बर १९७९ई. में हुआ था। इनके दो पुत्र हुए लक्ष्मण सिंह व दुर्गादान। इनकी लिखी हुई शक्ति-स्तुतियां (चिरजायें) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

३१७. सुभकरण:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम छींडिया (मारवाड़) के निवासी हैं। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३१८. शिवनारायण:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम खेण (मारवाड़) के निवासी हैं। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३१९. नरसिंहदान:- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु निवास-स्थान गाँव पातूंगरी (सिरोही) है। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३२०-३२१. कृपाराम एवं पदमसिंह:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम सीउ (मारवाड़) के निवासी हैं। इनके फुटकर गीत बताये जाते हैं।

३२२. देवीदान:- ये भादा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम गारावास (मारवाड़) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत बताये जाते हैं।

३२३. देवीदान रतनू:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम दासोडी (मारवाड़) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत बताये जाते हैं।

३२४. मूलदान:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम वीठुओं की वासनी (मारवाड़) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३२५. मदनसिंह:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम विसनपुरा (सवाई माधोपुर) के निवासी हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

३२६. लालदान:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम ऊंड (सिरोही) के निवासी हैं। इन्होने स्फुट काव्य-रचना की है।

३२७. किशनसिंह:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम नाऊ (जयपुर) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

३२८. सुखदान:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम सींथल (बीकानेर) के निवासी हैं। इनके पिता का नाम भैरूदानजी है। इन्हें कविराजा का उपटंक मिला है। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३२९-३३०. छोगजी एवं केसूदान:- ये वीठू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम देशणोक (बीकानेर) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३३१. हनुमद्दान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम गेरसर (बीकानेर) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३३२. कृष्णसिंह महडू:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम नाऊ (जयपुर) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३३३. चालकदान महडू:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम संचेई (प्रतापगढ़) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

३३४. मुरारिदान (करणपुर):- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु निवास स्थान ग्राम करणपुर (डूंगरपुर-बांसवाड़ा) है। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

३३५. कृपाराम:- ये वणसूर शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम पारलाऊ (मारवाड़) है। इन्होंने ‘सगुना शत्रुसाल री बात’ नामक श्रंगारिक कृति लिखी है। साथ ही फुटकर कवितायें भी बताई जाती हैं।

३३६. लक्ष्मीदान:- ये अखावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम मोरटहूका (मारवाड़) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३३७. बालाबख्श बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम उदयपुर (किशनगढ़) के निवासी हैं। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३३८. कल्याणसिंह:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम कोटड़ी (अजमेर) के निवासी हैं। इनकी स्फुट रचनायें कही जाती हैं।

३३९. सहस्रकिरण:- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम अतरालिया (कोटा) के निवासी हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

३४०. वेणीदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम ओढाणिया (जैसलमेर) के निवासी हैं। इन्हें कविराजा का उपटंक मिला है। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३४१. मुकुन्ददान:- ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम डांडूसर (बीकानेर) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें कही जाती हैं।

३४२. भवानीसिंह:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम झांखर (सिरोही) के निवासी हैं। इनके स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३४३. चामुंडसिंह:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम जावली (अलवर) के निवासी हैं। इनके स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३४४. विहारीदान (नगरी):- इनकी शाखा अज्ञात है किन्तु निवास-स्थान नगरी (जयपुर) है। इनकी लिखी हुई फुटकर कवितायें बताई जाती हैं।

३४५. जसजी (मेवाड़):- ये महियारिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम टीटोडा (मेवाड़) के निवासी हैं। इनकी फुटकर काव्य-रचना कही जाती है।

३४६. बद्रीदास:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम जैतपुरा (मेवाड़) के निवासी हैं। इनकी फुटकर काव्य-रचना कही जाती है।

३४७. हणूदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम गुमानपुरा (मारवाड़) के निवासी हैं। इनकी फुटकर काव्य-रचना कही जाती है।

३४८. पीरदान (पेसुआ):- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम पेसुआ (सिरोही) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई स्फुट कवितायें कही जाती हैं।

३४९-३५०. जैतदान एवं उदयभाण:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम मथाणिया (मारवाड़) के निवासी हैं। ये डिंगल-पिंगल दोनों भाषाओं के ज्ञाता हैं। इनकी लिखी हुई स्फुट कवितायें कही जाती हैं।

३५१. किशोरदान बारहठ:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम लोलावास (मारवाड़) के निवासी हैं। पहले ये तवारीख महकमे में नौकरी पर रहे फिर पं० विश्वेश्वरनाथ रेउ के कहने से डॉ० टैसीटोरी ने इनको अपने पास सौ रुपये मासिक पर रखा। ये टैसीटोरी के गुरू रहे। ये डिंगल के धुरंधर विद्वान हैं और गणेशपुरी के शिष्य हैं। टैसीटोरी को सफलता इनके कारण ही मिली थी। ये स्फुट रचनाकार हैं।

३५२. भगवानदान:- ये रतनू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत पोकरण ठिकाने के पास लालपुर गाँव के निवासी हैं। इन्होंने कच्छ-भुज की पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की है। ये फुटकर रचनाकार हैं।

३५३. श्यामदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और मारवाड़ राज्यान्तर्गत जैतारन के पास देवलिया गाँव के निवासी हैं। इनके फुटकर गीत कहे जाते हैं।

३५४. रामलाल खिडिया:- ये खिडिया शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम वडवेली (कोटा) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें कही जाती हैं।

३५५. रामकरण मिश्रण:- ये मिश्रण शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम मोलकी (कोटा) के निवासी हैं। इनकी लिखी हुई फुटकर रचनायें कही जाती हैं।

३५६. राजूराम:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम झाँखर (सिरोही) के निवासी हैं। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

३५७. वनजी:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम पेसुआ (सिरोही) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३५८. ईश्वरदान महडू:- ये महडू शाखा में उत्पन्न हुए हैं और हराम ठीकर्‌या (बूँदी) के निवासी हैं। इनके लिखे हुए स्फुट गीत कहे जाते हैं।

३५९. शंकरदान (अखावत) :- ये अखावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम मोरटहूका मारवाड़ के निवासी हैं। इनके लिखे हुए फुटकर गीत कहे जाते हैं।

३६०. सुकदेव:- ये आढा शाखा में उत्पन्न हुए हैं और ग्राम पांचेटिया (मारवाड़) के निवासी हैं। इनके पिता का नाम जवाहरदानजी है। इन्होंने स्फुट काव्य-रचना की है।

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