चारण साहित्य का इतिहास – सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान) – [Part-B]

(ख) आलोचना खण्ड: पद्य साहित्य

१. प्रशंसात्मक काव्य (सर):- क्षत्रिय जाति के उज्जवल नक्षत्रों का गुण-गान करना चारण कवियों की वंश परम्परागत विशेषता है और इस काल के अधिकांश कवियों में यही प्रवृत्ति पाई जाती है। कहीं वीरता की प्रशंसा है तो कहीं दानशीलता की, कहीं तेजस्विता का वर्णन है तो कहीं प्रसुता का, कहीं आभार प्रदर्शन है तो कहीं शील निरूपण, कहीं धर्मवीरता है तो कहीं काव्य-अनुराग। इन विविध गुणों की व्यंजना करना ही कवियों का ध्येय रहा है। व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए कोई रचना लिखी हुई नहीं दिखाई देती। कतिपय कवियों ने अपने समकालीन प्रसिद्ध कवियों, लेखकों एवं धार्मिक महापुरुषों के चरणों में श्रद्धा के पुष्प चढ़ाये हैं। इनके अतिरिक्त राष्ट्रीय नेताओं को लक्ष्य करके भी स्फुट छंद-रचना की गई है। इस प्रकार आलोच्य काल में आकर प्रशंसात्मक काव्य-क्षेत्र का अभूतपूर्व विकास हुआ। कवियों की संख्या अधिक होने से यहाँ चुने हुए उदाहरण दिये जाते हैं।

वीरता का वर्णन करने वाले प्रतिनिधि कवियों में सूर्यमल्ल, कमजी, शिवबख्श, मोड़सिंह, पाबूदान आसिया, शेरजी उज्वल, ऊमरदान, जुगतीदान देथा, रामनाथ, केसरीसिंह, अमरदान बारहठ, किशोरसिंह, उदयराज एवं सादूळदान सांदू के नाम उल्लेखनीय हैं। सूर्यमल्ल कृत ‘रामरंजाट’ एवं ‘बलवद विलास’ की रचना इसी उद्देश्य से हुई प्रतीत होती है। प्रथम में रामसिंह (बूँदी) और द्वितीय में बलवन्तसिंह (भिणाय) की वीरता का वर्णन है। कालान्तर में ‘वंशभास्कर’ की रचना करते समय भी कवि ने अपने आश्रयदाता रामसिंह की वीरता का बराबर ध्यान रखा है। इनके अतिरिक्त जोरावरसिंह (मालव), मानसिंह (जोधपुर), गुलाबराव (अलवर), खुशालसिंह (आउवा) एवं रणजीतसिंह (देवगढ़) की वीरता ने भी कवि को मुग्ध किया है। खुशालसिंह के लिए कही हुई कवि की उक्ति का उदाहरण दिया जाता है-

खग्गन तें खेती निपजाई तैं खुशालसिंह।
मिश्रण को तापर जय श्री रंगनाथ है।।

कमजी ने रावत जोधसिंह चहुआन (कोठारिया) की वीरता पर जो दोहे कहे है वे इस प्रकार हैं-

जोध भलां ही जनमियो, सत्रुआं रै उर साल।
रावत सरणै राखियौ, कमंधां तिलक कुशाल।।
खग ऊंचै खड़िया सरब, भुज रजवड़िया भार।
जड़िया रावत जोध रै, सम वड़िया सरदार।।

राजपूत वीर माना हुआ आखेट-प्रेमी है। महाराजा मंगलसिंह (अलवर) के पैदल सिंह का शिकार करने पर शिवबख्श का यह शब्द-चित्र मनोहर है-

लड़वै लथवत्थांह, भड़वे चख आतस झलांह।
हाकिल नवहत्थांह, मारे निज हत्था मंगल।।
रोसायल जमरूप, अजकायल साम्हा उड़े।
भले बिलाला भूप, मारै सिंह डाला मथा।।

मोड़सिह ने इस कवित्त में महाराणा फतहसिंह (उदयपुर) के शिकार का वर्णन किया है

जाहरी करोल करैं अंक हत्थै बब्बर की,
ठाहरी सुने तैं रान थिरता रचै नहीं।
थाहरी घिराय काढ लागनी लगावैं तोक,
खा हरी गुरांट पैंड एकहू खचै नहीं।
हाहरी अवाज छोड़ आहरी करन लागै,
ताहरी करै तीको कोउ उपमा जचै नहीं।
बाहरी गऊ के फतहसिंह तूप धारैं जब,
ना हरी करै तो नार नाहरी बचै नहीं।।

पाबूदान ने आखेट के समय उम्मीदसिंह जी (जोधपुर) द्वारा बंदूक से हाथी मारने का वर्णन किया है (१९२६ ई०)-

भूपज उम्मेद बंधु रूप नरसींग धर्‌यो। नीलगिरी चहुं ओर दूर कर्‌यो डरपे।
हटावन फील पर्‌यो, डाहीवेर जेथ ही सो। दुनाली उठात हद काज सर्‌यो करपे।
मरु भूम देश तर्‌यो सुकृत हो पुंज हर्‌यो। लक्ष्मण वीर लर्‌यो बीखृत भरपे।
तेजवृत ताथी पर्‌यो ब्रीच अम्भ बाथी पर्‌यो। विंध्याचल साथी पर्‌यो हाथी पर्‌यो धरपे।

शेरजी उज्वल कृत ‘राजा बलवंतसिंह रे घोड़ों रो वर्णन’ बड़ा ही ओजस्वी है-

के काठी के काबली, केई धरा धाट कही जै।
षुराषांण कंधार लखी कसमेर लही जै।
पनंग केई पांचाल अवर ढांगी थल आला।
अरब थान ऐराक वळे बैराठ बडाला।
कोकंणी असल दिखणी केई, दिपै देस देसंतरा।
इण खूंटे रहै बंधिया इसा बाज राज बळवंत रा।।

ऊमरदान कृत ‘जसवंत जस जलद’, ‘जोधारां रो जस’, ‘राठौड़ दुरगदास री औरंगजेब ने अर्जी’, एवं ‘प्रताप प्रशंसा’ नामक रचनायें नर काव्य के अन्तर्गत आती हैं जिनमें प्रशंसा ही प्रशंसा देखने को मिलती है। ‘प्रताप-प्रशंसा’ में कर्नल प्रताप (जोधपुर) की वीरता का उदाहरण दिया जाता है-

मुरधर में पातळ मरद, इक्को रतन अमोल।
लोकां ने तो लादसी, मरियां पाछें मोल।।
सूतो लख संसार सब, पातल पुल-जाय।
मरण दशा में मइँद रे, जीव न नेड़ो जाय।।
सांचो तूं-तूं सूखों, तूं दाता दै त्याग।
पौहुमी में पातळ प्रसिद्ध, खळां बिडारण खाग।।

जुगतीदान देथा ने महाराजा गंगासिंह (बीकानेर) के विषय में कहा है-

रजा गंग रा राज में, जुल्मी करै न जोर।
धाडा करै न धाड़वी, चोरी करै न चोर।
रुकी न अँगरेजों रही, फैल रही चौफेर।
रिसपत बिल्कुल रोक दी, नृप गंग बीकानेर।।

रामनाथ कृत यह दोहा मेवाड़ के बीते गौरव की याद दिलाता है-

लखन कुंभ सांगै पते, जवन जोर दिय तोड़।
तेहिं रविकुळ चिर थिर फता, सब हिन्दुन नृप मोड़।।

केसरीसिंह ने महाराव रघुवीरसिंह के लिए कहा है-

हाड़ा घर लाडा रह्या, ठाठा नर कंठीर।
तिण जाड़ा कुळ में तूही, राजे तूं रघुवीर।।
वीर शत्ता रा वंश में, महपत तू शिर मोड़।
हूं छोरू हरदास रो, जुड्‌यो जुगारी जोड।।

अमरदान बारहठ ने सिंह और शुकर का शिकार करने पर अलवर-नरेश को ये पद्य सुनाये थे-

केशरिया उण दिन करै के शिर देवण काज।
मैं केशरिया जनमते, मरण किया महाराज।।
बीजा भूप बराह पर, भाला वाहण हार।
मरद जसा मंगलेसरा, तू वाहे तरवार।।

किशोरसिंह उन चारण बंधुओं पर न्यौछावर है जो युद्धभूमि में जाकर वीरता प्रदर्शित करते हैं-

धूंकळ री हूंकळ सुण खाथा रण खड़ता, रुंडां सूं लड़ता अर मुंडां हड़हड़ता।
मैंगळ मद माटां पर बीजड़ यूं बहती, ज्यूं मेचक जळहर में चपळा लहलहती।।
बळिहारी भारत-हित-चिंतक चारणां रे, जनु-भूमी-भगतां रा लीजै वारणा रे।।

उदयराज ने बदनोर (मेवाड़) के मेड़तिया राठौड़ ठाकुर गोविंदसिंह की वीरता पर लिखा है-

वीर धणी बदनोर रो, गयो कमंध गोविंद।
धारक बेडी धूड़ रो, सद गुण तणो समंद।।

सादूळदान साँदू ने आसोप-ठाकुर के अनेक गुणों की भव्य व्यंजना की है-

छकां जोर आनंद फतैसिंघ घर छावियौ, इस्ट फल पावियौ आज आछौ।
ग्यांन सूं करनला तणो गुण गावियौ, सेवहर पावियौ सुतन साचौ।।
थिरु रवि चंद लग कंवर इळ थावसी, गुणी गुण गावसी हरख गाढै।
लाल रौ अंजस भड़ ईढरा लावसी, चावसी जिकां घर आभ चाढै।।
हरो चेनेसरौ चैन मग हालही, धेसरां घालही हिये दहला।
मेस रतनेस ज्यों प्रथी पर मालही, सत्रुआं सालही रमण सहला।।
वंस रौ भांण भळ पुन वाधावतौ जबर जग चावतौ मात जायौ।
भागरौ पुंज सेणां मन भावतौ आवतौ सरब सुख लेर आयौ।।

दानशीलता का वर्णन करने वाले कवियों में श्यामलदास, केसरीसिंह (मेवाड़), सांवलदान, उदयराज एवं हेमदान सांदू के नाम लिये जा सकते हैं। श्यामलदास ने महाराणा सज्जनसिंह (उदयपुर) के दिये हुए पुरस्कारों का वर्णन इस छंद में किया है-

जिम जुहार ताजीम, पाय लंगर हिम पटके।
पूरण बांह पसाव, खळां अदवां मन खटके।।
जाहिर छड़ी जळेब, थरु बीड़ो जस थापण।
मांझो पाघ मंझार, छाप कागळ बड़ छापण।।
कविदास तेण कविराज कर, कठिन अंक विधि कापिया।
करि शुभ निगाह श्यामल कुरब, सज्जन राण समापिया।।

केसरीसिंह (मेवाड़) ने भामाशाह के लिए कहा है-

तूटी सरब अतीव, अड़बप त्यांरी एकठी।
साजी रही सदीव, कावड़ियारी कावड़ाँ।।

महाराणा भूपालसिंह के द्वारा दान में दी हुई भूमि का बन्दोबस्त उठाने का आदेश सुनकर सांवलदान निम्न गीत मेँ उनकी दानशीलता की प्रशंसा करता है-

सँहस दोय विक्रमाण बिये लगत साल रे, पाख सुद चवेदस चेत पेले।
उदय रिव किरण ज्यूं बचन हर-उदय रा, फता-सुत ताहरा हुकम फेले।।
अघाहट सांसणा कूड़की उठंतर, खतीजे सबूतां वगसखा़ने।
नृपत भोपाळ किव पटा कर नवीना, महर हर हिंद रा कबज माने।।
अपी रघुनाथ निज अजे नह ऊथपी, लुभ्यो नहं सोवनी लंक लेणे।
रही घर रीत यण सदा कुळ रघू री, दिवाकर चंद दुहुँ साख देणे।।
लंक पत विभीखण कर्यो बिन लोभ रे, पती अवधेस रे उदक पाणा।
महीपत दूसरा कळू विच मनायो, रघू कुळ कथन रो सांच राणा।।

उदयराज ने अपने ग्रन्थ ‘धूड़सार’ में अनेक दानवीर राजाओं एव ठाकुरों की प्रशंसा की है। रीयां ठाकुर विजयसिंह एवं पोकरन ठाकुर मंगलसिंह (मारवाड़) का उदाहरण दिया जाता है-

वंदों सतधारी विजो, रीयों धणी राठौड़।
धारी बेड़ी धूड़ री, मुरधरियो रो मौड़।।
मउवों पाली मुरधरा, मंगल छपना माय।
पुन अखंड पति पोकरण, पह बेड़ी धर पाय।।

आसोप-ठाकुर फतैसिंहजी पर लिखा हुआ हेमदान सांदू का यह गीत देखिये-

इळा लेवणौ सुजसां आथ दुथियां समापै आचां, सुर चंद येते वाचां कीरती सहीप।
धराधीस ज्योंही धिनो आपरा हाथ सूं ध्रवे, मांगणां अमोल चीजां ब्रवै तूं महीप।।
सेवाहरा कूंपा इंद सराहे मुनिंद सारा, पेखे यों कमंध थारा दान रा प्रमाण।
दाखे यों सुरिंद रीझां देण रौ माहेस दूजौ, भाखें यों कविंद फता ताहरा बाखांण।।
राखणौ जुगादू रीत सिरे यों जोड़रा सारां, ईटगारां भड़ां आगे प्रभता अपार।
जोर फैली दधां पार जाहरां जाहांन जाणै, अनेका बखांणे थारा आंदरा आचार।।
रेणवा काटणौ रोर आहंसी आसोप राजै, बार अेंण ब्राजै कूंपौ वधंते सुवेस।
सराहे जोधांण स्याम सेवा ज्यों प्रवाड़ा साजे, दादा ज्यो अग्राजे फतौ वंस रौ दिनेस।।

मारवाड़ में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ने पर (१९३९ ई०) प्रजा कराह उठी। अतः मरुधराधीश उम्मेदसिंह ने अनेक जन-कल्याणकारी कार्य आरम्भ किये। यह देखकर हरदान गाडण ने उनकी प्रशंसा में एक सिलोका बनाया जिसका नमूना इस प्रकार है

च्यारु तरफों ने सड़कों चलाई, घर-घर आगे तो मोटर घुमाई।
हालक चालक तो मंजुरी हालो, पंगा टूंटा तो बैठा पैसा लो।।
राजा सायब ने आखे मारोणी, बौळा प्रेमो सु मिठी सी बांणी।
पैली भारी तो पुनही करवायो, परबल राजस तो जोधोणो पायो।।

वर्षा ऋतु के आते ही अगले वर्ष धरती की काया पलट हो गई-

अेता दिन बीता वीरखा रुत आयी, दाता सायबजी बरषों सुखदायी।
आखै परमेशर कर रै असवारी, वाशव धरणी पर वरषा दै वारी।
नोमी धराऊ वादळ निकळीया, ज्यों में चमकावे मुदरी बिजळिया।
जैठें मईनें तो हळिया जोताया, पालर पोणी तो हिरणो नै पाया।
मास आसाड़ों सोमासों जोरों, धणी विरखा नै खावै चै घोरों।
बोले मोरुड़ा सुरंगीजी बांणी, सगली दुनिया नें लागै सुवाणी।।

राजा-महाराजाओं की तेजस्विता एवं प्रभुता का चित्रण करने वाले कवियों में सर्वश्री सूर्यमल्ल, जवाहरदान, लक्ष्मीदान बारहठ, अलसीदान रतनू एवं मुरारिदान आसिया के नाम उल्लेखनीय हैं। मालवाकाश के नक्षत्र जोरावरसिंह के लिए सूर्यमल्ल ने लिखा है-

दीपक मालव देस रा, आलम रा आधार।
रंग जोरावर राज नै, सूजा रा सिरदार।।
तन बूंदी मन माळवै, रहे सदा दिन रात।
रण दूलह गोपाळ रा, अमर करी अखियात।।

जवाहरदान कृत जयसाह (अलवर) विषयक ये दोहे दिये जाते हैं-

अडिग मेरु अहि शशि अरक बसुधा कमठ वराह।
राजो खट ब्रनरा रछिक जिते भूप जयसाह।।
पृथीनाथ परनायके बख्तावर वर वीर।
वखत पाट बन राजसी हुवो सूप हमगीर।।
सुत शिवदान वनेश रे सेवा सुत मंगलेश।
बख्त मंगल जै सिंह त्यौ तपौ दिन रुखंड देश।।

लक्ष्मीदान बारहठ के प्रभावशाली दोहों के कुछ नमूने देखिये-

जबर हितैषी जात रो, वाधू रत्ती न बत्त।
वणियों राखे वीसहथ, दिन थारो शिवदत्त।।
ओ उंचो आडोवळो, सुख रो वहै समीर।
दी रोटी दाता घणी, क्यूं जाऊँ कश्मीर।।
तूटो थंभ सतजुग तणो, सजसी कळू समाज।
आसी मंगळो अधपती, आंख फरूके आज।।
सुसरो नाठो बेशरम, कायर भागो कंत।
कीकर हूं भागूं कहो, धरती शिर धूणंत।।

जब जोधपुर-नरेश उम्मेदसिंहजी जैसलमेर-नरेश जवाहरसिंहजी के वहाँ गये तब वहाँ के कवि अलसीदान रतनू ने दोनों की प्रशंसा में काव्य-रचना की। उदाहरण के लिए यह दोहा देखिये-

आज गोरहर ऊपरा, भळहळ ऊगा भांण।
महिपत हेकण मींढ़ रा, जैसळ नै जोधांण।।

कविराजा मुरारिदान आसिया (जोधपुर) ने विद्यानुरागी जोधपुर-नरेश जसवंतसिंहजी (द्वितीय) की प्रशंसा में जो उद्‌गार प्रकट किये, उसका एक उदाहरण देखिये-

देखै नह अवगुण दिसा, गुण ही ग्रहण करंत।
दीजे औ खामंद दई, जनम-जनम जसवंत।।

अपने प्रति किये हुए उपकारों का स्मरण कर कृतज्ञता प्रकट करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इस दृष्टि से बालाबख्श एवं औनाड़सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं। अनेक विपत्तियों से लोहा लेते हुए राणा प्रताप ने म्लेच्छों के आगे नतमस्तक होना अपने धर्म के प्रतिकूल समझा, जिसके लिए कवि का कथन है-

राज्य-द्रंग-दुर्ग-देश वैभवज सुःख हेय,
राखी दृढ वंश परिपाटी की प्रभत्ता कों।
खग्‌ग बल विस्तरि अकब्बर से शत्रु अग्‌ग,
इक्कल निबाह्यौ जिहं वेद धर्म नत्ता कों।
आसमुद्र उविंवासी अज्ज कृत मन्य देत,
धन्यवाद वीर अग्रगण्य रान पत्ता कों।।

औनाड़सिंह का तो स्पष्ट कथन है कि इस पापी पेट को भरने के लिए कई राजाओं के पास रहना पड़ेगा किन्तु रावत जोधसिंह (कोठारिया) याद आता रहेगा-

पापी भरवा पेट, रहसां के राजां कनै।
थरू मरण लग थेट, नृप जोधा भूलां नहीं।।

फतहकरण ने इस दोहे में महाराणा फतहसिंह (उदयपुर) की स्वभावगत विशेषताओं का अंकन किया है-

घणी रीझ थोड़ो घमंड, चित सध सरली चाल।
दीन सहायक काछ दृढ, महाराण फतमाल।।

प्रशंसात्मक काव्य के अन्तर्गत धर्मवीरता की अवज्ञा नहीं की जा सकती। इस काल के कवियों ने राजा-महाराजाओं के इस गुण की भी प्रशंसा की है जिनमें बालाबख्श, फतहकरण, केसरीसिंह सौदा प्रभृति कवियों के नाम लिये जा सकते हैं। बालाबख्श के शब्दों में महाराणा फतहसिंह (उदयपुर) की धर्मवीरता देखिये-

धर्म मतानैं चित धर्‌यौ, गिण प्रभुता ने संग।
अवल पतानै ज्यैं अबे, राण फता नै रंग।।

फतहकरण राणा प्रताप के चरणों में नमस्कार करता हुआ कहता है-

रयो इक धर्म तुंही दृढ़धार, तुंही भव में भव को अवतार।
तुंही मनुदेव तुंही अवधेश, नमामि-नमामि प्रताप नरेश।।
तुही वह मच्छ बन्यो जगतीश, तर्‌यो बल बाहु तरुष्क न दीश।
उधारिय आर्य सधर्म अशेष, नमामि-नमामि प्रताप नरेश।।

जयपुर-नरेश माधोसिंह धर्म का पालन करते हुए इंग्लेंड की यात्रा कर आये और वहाँ भी अपने इष्ट गोपालजी की मूर्ति का विधिवत् झालर बजवा कर नित्य पूजन करते रहे। फतहकरण का यह दोहा इसका प्रमाण है-

यादगार योरुप गये, कछु छोरे कछु वेश।
आप सुयश छोर्‌यो उतै, अवरन धर्म अशेष।।

केसरीसिंह सौदा ने बीकानेर-नरेश गंगासिंह के लिए ये दोहे कहे हैं-

इष्ट सनातन आपरो, सह जांण्यो संसार।
करणी मंदिर रो कियो धिन नृप जीर्णोद्धार।।
पुष्कर पर जूना पड्‌या सूना मंदिर साथ।
करनी भवन करावियो, नमो बीक पुर बाथ।।

चारण-प्रशंसात्मक काव्य में प्रसिद्ध कवियों, लेखकों एवं धार्मिक महापुरुषों का गुणगान भी किया गया है। इस दृष्टि से सूर्यमल्ल, भवानीदान, केसरीसिंह मेवाड़, ऊमरदान एवं रायभाण के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सूर्यमल्ल ने अपने समकालीन बूंदी के प्रसिद्ध दरबारी कवि गुलाब राव के लिए लिखा है-

सुनि गुलाब तव गुन सुजस, मस्तक सवन घुमात।
इहि विचार पाताल तजि, खिल्लटां पठवहु ख्यात।।

भवानीदान ने सूर्यमल्ल मिश्रण की प्रशंसा में इस गीत की रचना की है-

वज्रधार अरजुन मुकट हुवौ सर बुहाकां, दूनी जसरहाकां प्रेम दूजो।
राव हद रिझाकां मुकट दुहुंरहाकां, सदगुणां कहाकां मुकट सूजो।।
हुकम पत रखण बजरंग असुर हणांकां, भणाकां साच मुख जुजीठळ भाव।
संभरी भूपकां मुकुट गुण सुणाकां, रूपकां बणाकां मीसणां राव।।
सुरां सुरयंद गरुड़ परांधारां सरै, सरे तारां मयंक क्रांत साजा।
सुतन चंड सरारां अखर जोड़ां सरै, रीझवारां सरै राव राजा।।
लखां मुख हूंत अणमाप सुसबद लियौ, जगतसिर थियौ सोभाग जाडो।
बधारे मुरातब रखै सत्रसल बियो, हिया रो कियां ताईत हाडो।।

और केसरीसिंह (मेवाड़) ने तो अपनी जन्म-भूमि को कवियों की बताया है-

उदयनगर उन दिनन महँ, सुन्दर कविन समाज।
सुकविन सर्व सिरोमनी, हो स्यामल कविराज।।

सींथल (बीकानेर) के जोशी ब्राह्मण संत हरिरामदास की प्रशंसा में ऊमरदान कहते हैं-

नमो हरिराम नमो निज नाम, गुरू हरिराम नमो गृह गाम।
मही हरि राम नमो जिन मात, पिता हरिराम नमो धिन पाय।।
प्रभू हरिराम नमो बल पास, विभू हरिराम नमो थल बास।
नमो हरिराम नमो हरिराम, हरीहर ब्रह्म समो हरिनाम।।

इसी प्रकार कवि ने ऋषि दयानन्द की वन्दना में कहा है-

नमो स्वामी दयानन्द दिव्य ज्ञानदाता,
आर्य्य धर्म आप बिना हाथ नहीं आता।
वेद ध्वनी हाट बाट, दुष्टन के थाठ दाठ,
कलि युग को काट, जुग सत्य ना सुझाता।।

आलोच्य काल में विविध राष्ट्रीय आन्दोलनों के फलस्वरूप चारण कवियों ने राजनैतिक नेताओं की भी प्रशंसा की है। ऐसे कवियों में नाथूसिंह, उदयराज प्रभृति कवियों के नाम आदरपूर्वक लिये जा सकते हैं। नाथूसिंह ने विश्ववंद्य बापू के विराट्-रूप को इन शब्दों में अंकित किया है-

फौजां रोकै फिरंग री, तोकै नहँ तरवार।
गाँधी ! तें लीधो गजब, भारत रो भुज भार।।

उदयराज ने प्राय: सभी राष्ट्रीय नेताओं के चरणों में श्रद्धाजंलि के पुष्प चढ़ाये हैं। युग के महान नेता जवाहरलाल नेहरू के लिए कवि का कथन है-

ओ परळै-री आग, जावै जठी जवाहरो।
भाख-भाख परतंत्र मांग भसम करै रे भानिया।।

कहीं-कहीं क्रांति का स्वर भी है-

कांगरेस क्रामात भारत-काया पाळटै।
धर सगळी धड़कात भूकंप आवै भानिया।।
रटता दुसमण राग, कांगरेस मिटगी कळा।
आ दवियोड़ी आग भारत भभकै भानिया।।

और तो और, प्रस्तुत इतिहास के लेखक की प्रशंसा में भी कतिपय कवियों ने छंदोबद्ध रचनायें लिखी हैं जिनमें स्व० उदयराजजी उज्वल, स्व० रायभाणजी सिंढायच, माधोसिंहजी सिंढायच एवं देवकरणजी बारहठ के नाम प्रमुख हैं। स्व० रायभाणजी के सोरठों का यह अंश देखिये-

जगत समझ सब झूट, अक्रम कियो न एक ही।
लियो सुजस तें लूट, जिज्ञासू धिन जगत में।।
सच भाषण खाटण सुजस करण अविद्या काट।
मोहन रै हिय में वसै निरमल बुद्धि निराट।।
धरै न दूजो ध्यान करै न कोई छळ कपट।
निरमळ बुद्धि निधान मोहन नर पारस मणी।।
कर कर पर उपकार जस लीधो सह जगत में।
औ मोहन इण वार प्रोफेसर राजै प्रकट।।
भाव राख कीरत भणी मोहन री सुध मन्न।
रायभांण पर राखजो चित नित होय प्रसन्न।।

कविराजा का क्या कहना? भोपालदान सामौर ने तो अपने यहां एक नये कुए में मीठे जल का अक्षय भंडार मिल जाने पर प्रसन्न होकर कहा-

बीदासर बरबीर, उभै मांणस इधकाई।
माळी बनो महीव, बीयो देवा बरदाई।
सपनै मैं सांपरत, देव मुख साची दरसी।
हणमत कीयो हुकम, नीर मीठो नीसरसी।
उण हुकम कूप खोदे इळा, इमरत नीर अथाह रै।
गजराज बाज दौलत घणी, सत सोनग सिव साह रै।।

२. निन्दात्मक काव्य (विसहर):- इस काल में वर्गगत विसहर सूचक अनेक उत्तम कवितायें देखने को मिलती हैं। इनमें राजपूत एवं चारण जाति को सम्बोधित करते हुए व्यंग्य किया गया है। साथ ही कहीं-कहीं प्रबोध-वचन भी सुनाये गये हैं। सर्वश्री सूर्यमल्ल मिश्रण, कृष्णसिंह सौदा, ऊमरदान, केसरीसिंह सौदा, विजयनाथ, मुरारिदान कविया, उदयराज, नाथूसिंह महियारिया, चंडीदान सांदू, शम्भूदान आसिया, जुगतीदान देथा, पाबूदान बारहठ, गणपतदान वीठू, सिरेदान सांदू, धनदान लालस, वांकीदास वीठू प्रभृति कवियों ने इस काव्य का विस्तार किया है।

सूर्यमल्ल ने क्षत्रियत्व को झाड़-बुहार कर स्वच्छ बनाने की महत्वाकांक्षा से समय-समय पर खरी-खोटी सुनाई है। ‘वंश भास्कर’ के अधूरेपन में यही मर्म छिपा हुआ है। आलस्य एवं प्रमाद में पड़े हुए राजपूत वर्ग के लिए कवि का कथन है-

खाटी कुळ री खोवणां, नेपै घर-घर नींद।
रसा कँवारी रावतां, बरती को ही बींद।।
सीह न बाजो ठाकुरां, दीन गुजारौ दीह।
हाथळ पाड़ै हाथियाँ, सौ भड़ बाजै सीह।।

‘वीरसतसई’ में कायर व्यक्ति को शब्द-चाबुक से रण-भूमि की ओर लौटाया गया है। वीरांगनाओं की व्यंग्यात्मक उक्तियों ने इस निन्दा में और भी विष घोल दिया है। कवि के सिद्धांतानुसार युद्ध से भागा हुआ पति एवं दूध को लज्जित करने वाला पुत्र दोनों ही त्याज्य हैं। इन दोनों की ऐसी धज्जियां उड़ाई गई हैं कि वे मुँह दिखाने योग्य नहीं रह जाते। सूर्यमल्ल की वीरांगना कायर पति का उपहास ही नहीं करती प्रत्युत उसे व्यंग्य-बाण से बेध देती है-

पोतां रै बेटा थिया, घर में बधियौ जाळ।
अब तो छोडौ भागणौ, कंत लुभायौ काळ।।
कंत घरे किम आविया, तेगां रौ घण त्रास।
लहँगे मूझ लुकीजियै, बैरी रौ न बिसास।।

माता की यह आत्म-ग्लानि देखिये-

पूत महादुख पाळियौ, बय खोवण थण पाय।
एम न जाण्यौ आवही, जामण दूध लजाय।।

कायर पत्नियाँ भी नहीं बच पाई हैं-

कायर री धण यूँ कहै, छानै कंत छिपाय।
सीस बिकै जिण देसड़ै, सांई सौ न दिखाय।।
भोग मिलीजै किम जठै, नरां नारियां नास।
यौ ही मायड़ डायजौ, दीजै सूबस बास।।

कृष्णसिंह ने प्रजा की रक्षा न करने वाले राजा की निन्दा की है। ‘कृष्णोपदेश’ नामक रचना के ये दोहे इस कथन की पुष्टि करते हैं-

घणी स्त्रियां रा घेर में रचियोड़ा दिन रात।
राजा मदमाता रहै, प्रजा महा दुख पात।।
कौडी नहँ खरचै कदै, पहु मेटण पर-पीर।
हाकम राजी करण हित, धन धूपटै सधीर।।

ऊमरदान सुधारवादी कवि थे। उन्होंने कविता के द्वारा राजनीति, समाज एवं धर्म की कुरीतियों का जो भंडाफोड़ किया है उसके पीछे यही भावना दिखाई देती है। ‘कर प्रगट दोष खंडन करूं धीठ रोश मत धारज्यो’ कहकर उन्होंने पहले ही क्षमा मांग ली है। राज-दरबारों को माँस, मदिरा, अफीम, तमाखू, स्त्री आदि दुर्व्यसनों में बुरी तरह फँसा देखकर उनकी अन्तरात्मा कराह उठी अत: उन्होंने इनके प्रति बारम्बार क्षोभ प्रकट किया है। ‘दारू रा दोष’, ‘अमल रा ओगण’ आदि रचनायें इसके उदाहरण हैं। वस्तुत: नशा नाम की वस्तु से ही उन्हें विशेष चिढ़ है–

नसा काड लीवी नसां नसां कियो सब नास।
नसां न्हाखिया नरक में, अड़ी नसां में आस।।

इसलिए कवि अपने स्वजातियों को सावधान करता हुआ यही उपदेश देता है-

चारण बरण चकार ख्यातकर जहर न खावो।
बणै जठा लग बिहसि अमल री धूल उडावो।।
महि अपणा मां बाप प्राण हूँ छत्री प्यारा।
इण आफत हूँ अळग बचै जदि तरुण बिचारा।।
निज करम परम निरसंक व्है वीदग धरम बजाबणूं।
हित हरख सवाया पूंण हुय लूण न कदे लजावणूं।।

कहना न होगा कि रोग-ग्रस्त राज-समाज को कवि ने एक कुशल वैद्य की नाई काव्य-रसायन से स्वस्थ बनाना चाहा है। ऊमर-काव्य देश-काल का प्रतिबिंब है। विदेशी प्रभाव में आकर नकल के पीछे असल से हाथ धो बैठना उन्हें नहीं सुहाता। ‘अबार रा राजपुरुषां रा आचरण’ नामक रचना का एक उदाहरण दिया जाता है-

पढे फारसी प्रथम, म्लेच्छ कुल में मिल जावे।
अंगरेजी पढ अवल, होटलां में हिल जावे।।
पच्छ ग्रहे प्रालब्ध, नहीं पूरुषारथ नेड़ो,
चोखे मत नहि चाय, भाय आवे मत भेडो।
नित असल त्याग सीखे नकल छाज न व्हे-व्हे छाणणी।
कुलखणां मांय मोटी कसर, आदत खोटी आंणणी।।

‘अबार रो हाल’ नामक रचना में वह सीधा प्रहार करता हुआ कहता है-

छत्री धर्म छोड़ियो छेलां, चौड़े हुय व्यभिचारी रे।
परण्योड़ी रे पास न पोढे, पातर लागे प्यारी रे।।

‘चेटक चतुर्दशी’ में-

अटका तू ठाकुर अबै, बटका भरणां बोल।
भला मिनख भटका लिये, गटका खावै गोल।।

ऊमरदान ने समाज को नशे से बचाने हेतु उसकी हानियां बताई हैं। ‘तमाखू री ताड़ना’ में उसका सवाल यह है कि ब्रह्ममुहूर्त के समय टाट में टके का यह टोला क्यों?-

कंथा तूं कांई करे हाय तमाखू हेत।
टका एक री टाट में दिन उगांई देत।।

उसका तर्क है कि पशु-पक्षी जिसे अपनी बुराई समझकर छोड़ देते हैं, मनुष्य उसी का सेवन करने लग जाता है-

समज तमाकू सूगली कुत्तो खाये न काग,
ऊंट टाट खावे न आ अपणो जाण अभाग।
अपणो जाण अभाग गजब नहिं खाय गधेड़ो,
शूकर, भूंडी समज निपट निकलै नहिं नेड़ो।
बुरा पशू बच जाय अहर निस खाय न आखू
बड़ा सोच री बात तिका नर खाय तमाखू।।

‘अमल रा ओगण’ में अफीमची की यह सूरत देखिये, कैसा अजीब तमाशा है?-

सळ पड़ियोड़ा सिथळ गोळ भुज हे गळियोड़ा।
गळियोड़ी छिक गुंमर गिरे ढूंगा गळियोड़ा।।
गळियोड़ो सब गाथ गजब कांधो गळियोड़ो।
अमल खाण नें अजे बळै मूंडो बळियोड़ो।।
अण हूंत सरब गळगी उमग भूंडो मलो न भाळणों।
गळ गयो देस हा हा गजब गजबी तज्यो न गाळणों।।

व्यभिचार के लिए कवि का कथन है-

पिंड री गई प्रतीत मांण मिटग्यो मरदां में,
ग्यांन मिल गयो गरद दांम रूलग्यों दरदां में।।

ऊमरदान पाश्चात्य संस्कृति के विरोधी थे। विभिन्न कार्यालयों की स्थापना ने उनके मस्तिष्क में एक हलचल उत्पन्न कर दी है-

खारी रे आ समें दुखारी, हा हा बड़ी हत्यारी रे।।टेर।।
अदालतां सूं होय आगती, पिरजा रोय पुकारी रे।
सूंक दुकांनां मडी सरासर, धोले दिवस अंधारी रे।।
फिर जंगलायत कियो फायदो, जुल्म कायदो जारी रे।
टोगड़ियां रा गला टूंपतां, भयो कष्ट अति भारी रे।।

धर्म के नाम पर अधर्म का प्रचार होते देखकर ऊमरदान काँप उठते हैं। इसलिए ढौंगी साधुओं को आडे हाथ लिया गया है। जो लोग वाह्याचारों का स्वांग रचकर जनता को लूटते फिरते हैं और विषय-वासना के उपकरण सँजोया करते हैं, उनकी धज्जियां उड़ाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। ‘विलाप-बावनी’ में वे कहते हैं-

बांम-बांम बकता बहे, दांम-दांम चित देत।
गांम-गांम नांखे गिंडक, राम नाम में रेत।।

‘खोटे सन्तां रो खुलासो’ में मुफ्त का माल उड़ाने वाले मोडे संतों को देखकर वे कहते हैं-

मारवाड़ रो माल मुफत में खावे मोडा।
सेवक जोसी सेंग गरीबां दे नित गोडा।
दाता दे वित दांन मोज मांणें मुरसंडा,
लाखां ले धन लूट पूतळी पूजक पंडा।
कटा कनफटा जोगटा खाखी पर धन खावणां,
मरुधर में कोड़ा मिनक करसा एक कमावणां।।

नाथ-सम्प्रदाय के बहुधंधियों की धज्जियां उड़ाते हुए कवि ने ‘असन्तां री आरसी’ में लिखा है-

मांरो थांरो कर माया में, उळज्योड़ा उलजावे।
कुलबे लगे गुरां री कूंची खट ताळा खुल जावे।।
नाभ कवळ में नाच नचावे सब रग-रग सणणावे।
अनहद नाद बजे इकतारा गगन मंडल गणणावे।।

रोष में आकर कहीं-कहीं कवि ने साहित्यिक मर्यादा का उल्लंघन भी कर दिया है। यथा-

सांडां ज्यूं ऐ साधड़ा, भांडां ज्यूं कर भेस।
रांडां में रोता फिरे, लाज न आवे लेस।।
भांत भांत रा सांग भर, प्रभु सूं करे न प्रेम।
सोधे लिछमीं साधड़ा, नाभ कवळ रो नेम।।

केसरीसिंह सौदा ने ‘शुभेच्छु चाबुक-स्पर्श’ में वर्तमान राजाओं को लक्ष्य करके लिखा है-

अवधी अब ओछीह, सोचीजै सह भूपत्यां।
पड़गी पख पोचीह, नीत सलोची नहँ रखी।।
साज्यो बणकां साज, रजवट बट खोवे रधू।
रहसी नहँ ये राज, आज लगा जिण बिध रह्या।।
निरभै हित निरभेळ, जे नर चाहै राज रो।
बस चुगलां इण वेळ, जेल मांह पटको जिकां।।
हुकमत गी पर हात, घर में खूणै घालिया।
बालक भी या बात, जाण चुक्या जग मांहिने।।
परजा ही पलटाविया, अणचींत्या बिन फौज।
काल्ह जिके घर गंजता, आज मिलै नहँ खोज।।
नृप ! नहँ व्हो नाराज, स्वीकारे सत सांपरत।
आखी ईहग आज, हित री बातां हेत थी।।
खत्रवट मांहे खोट, देखे दुख पावै दुसह।
जद चारण चुभती चोट, हिरदै सबदां री हणै।।

इसी प्रकार बहादुरों की निन्दा करते हुए उनका कथन है-

खग धारा साम्हे खड़ी, उर न चढ़ी आतंक।
जिका बहादुरा जातड़ी, पड़ी थरहेर पंक।।

मुरारिदान कविया मरुधर देश की इस विपरीत रीति को देखकर क्षुब्ध हैं-

पाड़ाँ हन्दी पीठ पर हाथी चढ़ै हमेश।
गति उलटी गोविन्द की देखी मुरधर देश।।

राजपूत जाति में ‘रजवट’ का पतन हुआ देखकर कवि उदयराज भी कम दुखी नहीं हैं-

आप लियो नह एक, उत्तम गुण अंगरेज रो।
भवगुण गह्या अनेक, सिरदारों लीजो समझ।।
जनम भोम रो जोश, रग रग में अंगरेज रे।
रयो न रजवट रोश, सिरदारों लीजो समझ।।

नाथूसिंह ने आधुनिक काल के राजपूतों एवं चारणों को लक्ष्य करके निम्न दोहों में क्षोभ प्रकट किया है-

राजस करणा देखिया, नर गुणवान बहूत।
पण विरळा दीसै प्रथी, रण मरणा रजपूत।।
वे रण में विरदावता, वे झड़ता खग-हूंत।
वे चारण किण दिस गया, किण दिस गा रजपूत।।
ठाकर रहिया नाम रा, ठा करली सह ठाम।
ठाकर होता देस में, देस न हुतौ गुलाम।।

कायरों का भी विश्व में कुछ अस्तित्व है और महत्ता भी! ये ईश्वर से छिपकर काल-यापन कर सकते हैं, बैरियों से छिप रण छोड़कर भाग सकते हैं किन्तु कवि की दिव्य दृष्टि से ओझल नहीं हो सकते। नाथूसिंह ने कायर पति को वीरांगना के द्वारा ऐसा लज्जित कराया है कि उसका जीना दूभर हो गया है-

नाह निलज्जा ! नहँ लजै, रण हूँ आयौ भाग।
मो हथ लाजै चुड़लौ, तो हथ लाजै खाग।।
क्यूँ नहँ लड़िया समर में, क्यूँ मन खाधी लांच।
खांच लजाई चूड़लै, खग नहँ वाही खांच।।
कंथा घर आवण चह्यौ, चह्यौ न रण मरबोह।
थांरै मुख आवण चहै, म्हारौ गूंघटड़ोह।।
रण छंडे घर आवियौ, घर धण लेवै अंत।
घर रौ रह्यौ न घाट रौ, धोबी रौ खर कंत।।
पिउ सिर होती चूँदड़ी, मो सिर होती पाग।
मर जाती नहँ मेलती, अरियां चरणां खाग।।

चंडीदान सांदू ने निम्न गीत में बडे आदमी की निन्दा की है-

आवै घर करै एक पग ऊभा, खातर खलल पड़्यां व्है खीज।
संको करां नटां न सरम सूं, चित्त चढ़ै बा ले ले चीज।।
कठै ही मिलां पिछाणै कोनी, सदन गयां नहिं बूझै सार।
करां सलाम, दखे करड़ा पड़, काम पड़्यां कुछ करे न कार।।
देवां पत्र जवाब न देवै, हां भर भूले काम हुवै न।
कदे ऊठ सतकार करे नहँ, जोड़ां कर, तो धकै जुवै न।।
सांची झूठी सुणां अर सहवां, पड़ै समरथन करणौ पूर।
जे ओड़ौ दे देय जरा सो, जोस जणावे लड़े जरूर।।
बहुतां में बैठां बतळावां, मुँह बोलतां सरम मरंत।
काम भुळांण बाण ज्यां खासा, तेड़ावै घर हूंत तुरंत।।

जुगतीदान देथा ने जैसे सर प्रतापसिंह के गुणों की प्रशंसा की है वैसे ही अवगुणों की निन्दा भी

पढ़ियो कम पड़दे प्रिया, अटक्यो पोले ओह।
सोनो पातळ सोळवो, (जिमें) लगीं मेष तृण लोह।।

ऊमरदान एक कदम और आगे बढ़ते हुए कहते हैं-

जार पणा में जोधपुर, बेटी गिणे न बाप।
राजघराणा डूब गो, पातल रो परताप।।
डाढ़ी मूंछ मुंडाय कै, सिर पर धरियौ टोप।
परतापसी तखतेसरा, (थारै) बाकी घटे लँघोट।।

पाबूदान बारहठ ने फूहड़ स्त्री पर इस कवित्त में प्रहार किया है-

बैठै नळा पसार, जरख ज्यूँ जाड़ बजावै।
गंडक ज्यूँ गुरराय, सेर ज्यूं साम्ही आवै।।
ओछो घाघर पैर, देय मचकोळा चालै।
लग ज्यावै जिण लार, हियो डोढत्थो हालै।।
घरणी इसी आवै घरां, ज्यांरै पुन्न पूरज्या पुरबलो।
बारठ पाबू साचोब कै, ईं परणे स्यूं रंडवो भलो।।

गणपतदान वीठू ने शराब की निन्दा करते हुए लिखा है-

आदि जात इज्जत छीजत सरीर नित, बाम कळह कीजत सु सुने निरधारू में।
काम सुन हित्त नित्त चित्त रहै चोरी मांय, आवै दाम हाथ मार जाय मिलें यारूं में।।
मात तात भ्रात बहिन बेटी की न लाज कछु, सोचै ना समाज आप बकत बारू में।
गणपत दान कहै सब मेढ सिरदार सुनो, ओगण अपार गुण एक नांय दारू में।।

धनदान लालस ने देहातों में चाय के कारण बिगड़ी दशा का सजीव चित्र खींचा है

नत भर हांडी नीर, चूल पर प्रात चढावे।
थौड़ी न्हाखे चाय, लाठियौ गुळ अति लावै।।
दूध तणौ दसतूर, कदेक न्हाखे कोई।
ठीकर भर अणदीठ, दुस्ट पियै टंक दोई।
नाड़िया सबे तन नीसरी, काळौ व्हियौ मुख कोयलौ।
अधमरा जेम दीसे अपत, जग में ज्यांने जोयलौ।।

शम्भूदान आसिया ने इन दोहों में मदिरा पीने वालों का तिरस्कार किया है-

घर ओढण नहँ गूदड़ी, फाकण नहँ फूलाह।
तो पण प्यालौ नहँ तजै, वाह दुबारा वाह।।
पीतां ही सुख व्है प्रगट, दुखद हिया रौ दाह।
स्वान देह चाटै सरब, वाह दुबारा वाह।।

जान पड़ता है चारण कवि अँग्रेजी संस्कृति के विरोधी थे। क्षत्रिय जाति अपनी परम्परा का विसर्जन कर इसे अपनाती जा रही थी जिसे देखकर उन्हें दुख हुआ। सांवलदान आसिया ने अपने मन की वेदना इन शब्दों में प्रकट की है-

धरम नीत तज रीत मेळी सरव धूळ में,
चाल अध-धेल री जके चालो।
पास इंगलिश रा कलंक नव पावणा,
हिंदवा धरम ने छोड़ हालो।।
जेज नंह राज री रीत घट जावता,
मूंछ कट होट री चाह मोटी।
रह खर्च चून रो सेर भर रसोड़े,
रावळै तासळी डबल रोटी।।

इसीलिए इन कवियों को पूर्वाभास हो गया था कि यही अवस्था बनी रही तो ये राजा-महाराजा राज्य से हाथ धो बैठेंगे। विजयसिंह दधवाडिया ने क्षत्रिय जाति का यथार्थ चित्र अंकित करते हुए कहा है-

रब्बड़ रा थण धाविया, पळिया मेमां पास।
इण विध उछरिया जके, वाहे किम वाणास।।
जिण मुख पर रण जोश में, मूंछों भौंह मिलंत।
होणहार ते तिण जगह, रेजर रोज फिरंत।।
बिन माथे रण वाहता, दुहु माथै तरवार।
मग जाते निरखे जके, शिर री मांग सँवार।।
मंझ सन्नाह आवध सरब, देता अरियाँ हाथ।
पहर गिरारा पातळा, वे अब करे बणाव।।

शंकरदान ने वर्गगत एवं व्यक्तिगत दोनों प्रकार के विसहर लिखे हैं। उन्होंने अंग्रेजों को फटकार बताते हुए लिखा है- ‘तंह जिसो फिरंग तेज, कोई निलज्जो नफीटो।’ इसी प्रकार कवि ने डूंगरसिंह (बीकानेर) के शासन की कमजोरियों पर व्यंग्य करते हुए लिखा है-

पत्थर पाट बिराजतां, बटो लग्यो बीकांण।
डफ ही डफ भेळा हुया, (जद) बाज्यो डफ बीकाण।।

अपने पुत्र बलदेव की सेवाओं से अप्रसन्न होकर हिंगलाजदान ने ‘गीत कपूत रौ’ लिखा है-

पढ-पढ ठीक सीख पड़वा मां, कड़वा वचनां दगध करै।
जीमै घी गोहूं जोडायत, मां तोड़ायत भूख मरै।।
बरते सोड़ सोड़िया बेटो, पैमद हेटौ बाप पड़ै।
मूंडा हूंत न बौलै मीठो, लालौ बूढां हूंत लड़ै।।

केसरीसिंह ने पिता-पुत्र में विरोध होने पर महाराजकुमार भूपालसिंह (उदयपुर) को ये दोहे लिखे थे-

मठठ सदा मेवाड़ री, राखी फतमल राण।
क्लीब पणारा काळ में, है बब्बर हिन्दवांण।।
चूंड़े हसतां छाडियो, सुख संपत सह राज।
पितु भगती रो पारखू, जग सपूत सिरताज।।
यो घर रहियो आपरो, आज लगा अकळंक।
है आसा तो हात हूं, पड़े न छींटा पंक।।

बूंदी-नरेश शत्रुशाल (द्वितीय) ने विश्वासघात कर फिरंगियों से घेरा दिलाकर गोठडा-पति बलवंतसिंह चौहान को मरवा दिया था। इस विषय को लेकर रामकरण ने निम्न गीत में बूंदी-नरेश की निन्दा की है-

दगौ धारणौ नहीं छौ फेरे फिरंगी चोफेर दोळा, सता बीजा हारणो नहीं छौ सब छेस।
भाराथ जूटतां काज सारणौ सही छौ भूप, बूंदीनाथ मारणौ नहीं छौ बळूतेस।।
उभै राहां तोक बागां बैंडाक झौकतौ आडौ, सामराथां रोकतौ सत्राटां जाडै साथ।
तणो बहाद्रेस माडां जौखम्यौ न होतौ तो तौ, वळा आडौ ढाल हाडौ होतौ बळानाथ।।
जंगां में अढंगौ छौ छटा में पाराथ जेहौ, माथै राव लीधौ रौळ दट्टा मैं मथोग।
छत्री बळूतेस खलां थट्टां में हकालणौ छौ, जिको सैज सट्‌टा में न भांजणौ छौ जोग।।
पढायां बिया रै काँय मारियो गोठड़ा-पत्ती, उदासी धारियौ सारे हिन्दू आसुराण।
रागां सिंधू काना लागां पछत्तासी रावराजा, चद्रहासां बागां याद आसी चाहुवाण।।

वांकीदास वीठू झूठे गुरु-शिष्यों से क्षुब्ध हैं-

मझधर पिछ छमांण करै चत्र मासौ, लख पुळ साधां पंथ लियौ।
मारग मिलै माड़ रा माझी, दोय संतां उपदेस दियौ।।
चह अपराध गांठियौ चित मै, धारै सिखां छांटियौ ध्यांन।
चारु प्रसाद वांटियौ चेलां, गुरां इसौई छांटियौ ग्यांन।।
बाबा सिक्ख मिलै बाथां सु, थळ जातां सुं हरख थुवौ।
सिख वातां सु नही सलूधा, हाथां सुं परमोद हुवौ।।
बेड़ परायण इसी वचाइ, मही सरायण सुण ज्यौ मूठ।
निज नारायण गुरु निवाजै, फजर गइ तारायण फूठ।।
लागौ ग्यांन धरा पर लोटै, सुध बुध भूला भोम सिलै।
विहद कपाळ हुवा परवरती, मुगती पोहरां मांय मिलै।।
जांम घड़ी मुरछागत जागा, हर कर आगा वितन हरै।
लांठा गुरां पंजा सिर लागा, कम भागां डंडोत करै।।
पुर पुरस मिळै पुन पैलै वैगी समरण जुगत वणी।
वलती डांग पछमणी री वाटी, त्रिगुटि फाटी सीस तणी।।
वांट प्रसाद वलौवल वागा, त्रसना भागी लोभ तणी।
चेलां गुरां वेड़ री चरचा, साधां सौ सौ कोस सुणी।।
हीरदास दमोदर हुंता, ओर संकै लेता उपदेस।
डांगा जिका सिखां नै दीनी, वां संता थानै आदेस।।
खट मिळ आया खोसबा, सोदां साधां पास।
हीरदास ही हदकरी, दाद दमोदर दास।।

गोकुलदान कविया ने चिमनसिंह की व्यक्तिगत निन्दा करते हुए लिखा है-

चिमनै रौ घर पूछ नै, आई धार अचूक।
डेरा मैड़ी में दिया, भेळी हुय नै भूख।।

कवयित्री होने के नाते सौभाग्यवती (प्रभाबाई) ने स्वभावतः दहेज-प्रथा पर इन शब्दों में करारी चोट की है-

पाप मूल टीका प्रथा, अबला डर री सूळ।
पटको सभी समाज रा, धोबां-धोबां धूळ।
बैल गाय ने बेचतां, आवे लाज अपार।
बेटा बेटी बेच दै, धिक टीका धिक्कार।।
बेटि ने देवै बित बिना, लावत आवे लाज।
कींकर मिटै कूरीतियां, सुधरै केम समाज।।
एड़ौ करां उपाय, बेटो विष दै बीनणी।
के हूँ देहुँ बलाय, आवे टीको आपणे।।
मीठो गरळ मिलाय, कर सरबत जावै कनै।
पापण देत पिलाय, पकड़र हाथ पिसाचणी।।
खम वै खारा बोळ, बहु तो धरम विचार ने।
पटके वा पेट्रोल, पापण सास पिसाचणी।।

और तो और, सिरैदान सांदू ने पृथ्वीसिंह धाड़वी तक को अपना निशाना बनाया है-

पालणपुर बजार में पीथल चोरिया जूता चार।
चौवटे मांयने चार सौ लगा होटल तांई हजार।
पृथ्वीसिंह धाड़वी पाको रे,
हुवो मारवाड़ में हाको रे।।

३. वीर काव्य:- डिंगल की वीर काव्य-धारा जो पूर्ववर्ती काल में मंद पड़ गई थी, इस काल में सूर्यमल्ल मिश्रण की लेखनी से पुन: त्वरित गति से प्रवाहित होने लगी। उनके पद-चिन्हों का अनुकरण कर कई कवि आगे आये जिनमें गोपालदान, कमजी, शिवबख्श, मोतीराम, ऊमरदान, हिंगलाजदान, माधवदान उज्वल, मुकनदान खिडिया, केसरीसिंह (मेवाड़), राघवदान, गुलाबसिंह, नाथूसिंह, सांवलदान, पाबूदान आसिया, डालूराम एवं विजयदान बोगसा के नाम आदरपूर्वक लिये जा सकते हैं। युद्ध के अभाव में इन कवियों ने परम्परागत वीर काव्य की सृष्टि कर राजपूत जाति के शौर्य-पराक्रम को अक्षुण्ण बनाये रखने का भरसक प्रयत्न किया है। कतिपय कवियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध प्रदर्शित युद्ध-वीरता को लक्ष्य करके स्फुट गीत लिखे हैं।

राजस्थानी के चारण-साहित्य-सागर में महाकवि सूर्यमल्ल का वीर काव्य एक दीप-स्तम्भ है जिसके जैसा प्रकाश अन्यत्र दुर्लभ है। इससे ‘वीर’ का जो पथ-प्रदर्शन हुआ है, वह चारण-कुल का गौरव है। जिस धर्म की प्रतिष्ठा हुई है, वह प्रत्येक काल एवं देश के वीरों को मर-मिटने की प्रेरणा देता है। वह वीर-धर्म धन्य है जो जन-मन का भूमि के साथ तादात्म्य स्थापित कर उसके वासियों को संस्कृति की रक्षा के लिए रण-भूमि में लाकर खड़ा करता है। युद्ध में उपस्थित न होते हुए भी कवि को उसका ज्ञान प्रत्यक्ष दर्शन द्वारा प्राप्त था। एतदर्थ, वह ओजस्वी एवं साँगोपांग वर्णन करने में अपनी सानी नहीं रखता अस्तु,

सूर्यमल्ल कृत ‘वंश-भास्कर’ एक वृहत महाकाव्य है। चंद बरदाई ने जो ज्योति जगाई थी, यह उसकी अंतिम लौ है। आचार्यों द्वारा गिनाये हुए महाकाव्य के कई गुण इसमें विद्यमान हैं। इसका कथावस्तु प्रसिद्ध ऐतिहासिक क्षत्रिय राजवंशों से सम्बद्ध है। इसमें वीर रस की प्रधानता है, अन्य रस उसके उत्कर्ष में सहायक हुए हैं। रसोत्पत्ति में कवि ने उच्च प्रतिभा का परिचय दिया है। युद्ध के फड़कते हुए वर्णन बेजोड़ हैं। कवित्व-शक्ति अद्‌भुत है। कवि ने एक कुशल चित्रकार की भाँति युद्ध को ऐसा रंग दिया है कि जिसके सामने फुटकरिये कवियों के चित्र अत्यन्त फीके प्रतीत होते हैं। वर्णन पढ़ते-पढ़ते पाठक अपनी पृथक सत्ता को भूलकर रणस्थल में जा पहुँचता है जहां वह धावा मारती हुई सेना की पद-ध्वनि सुनता है, सैनिकों की हुंकार से भयभीत होता है और रोमांचकारी दृश्यों को अपनी आँखों से देखने लग जाता है। पाठक की आत्मा वाह्य सीमाओं का उल्लंघन करती हुई काल तथा स्थान के आवरण को चीरकर वीर-वीरांगना के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेती है। प्राय: समस्त चारण कवियों ने युद्ध-वर्णन में कोलाहल, आतंक, भिडन्त, शस्त्राघात, भगदड़ एवं जय-नाद पर समान रूप से शब्द-व्यय किया है किन्तु एक तो उनमें मौलिकता का अभाव है और दूसरे उनकी दृष्टि सूक्ष्म भावों की ओर नहीं जा पाई है। इन दोनों अभावों की पूर्ति सूर्यमल्ल के द्वारा हुई है। भूमि के लिए एक ओर सालमसिंह की सेना खड़ी है, दूसरी ओर बुधसिंह की। योद्धाओं की हुंकार होने पर सारा रूप ही बदल जाता है

दुव सेन उदग्गन खग्ग समग्गन अग्ग तुरग्गन बग्ग लई।
मचि रंग उतंगन दंग मतंगन सज्जि रनंगन जंग जई।।१
लगि कंप लजाकन भीरु भजाकन बाक कजाकन हाक बढी।
जिम मेह ससंबर यों लगि अंबर चंड़ अडंबर खेहू चढी।।२
फहरक्कि निसान दिसान बडे बहरक्कि निसान ऊड़ैं बिथरैं।
रसना अहिनायक की निकसैं कि परा झल होरिय की प्रसरैं।।३
गज घंट ठनंकिय भेरि भनंकिय रंग रनंकिय कोच करी।
पखरान झनंकिय बान सनंकिय चाप तनंकिय ताप परी।।४
धमचक्क रचक्कन लग्गि लचक्कन कोल मचक्कन तोल कढयो।
पखरालन भार खुभी खुरतालन व्याल कपालन साल बढ्यो।।५
डगमग्गि सिलोच्चय श्रृंग डुले झगमग्गि कुपानन अग्गि झरी।
बजि खल्ल तबल्लन हल्ल उझल्लन भुम्मि हमल्लन घुम्मि भरी।।६

बूंदी के बाजार में युद्ध की भयंकरता को देखकर महादेव एवं कालिकादि क्रीड़ा करने लगते हैं

उड़े सिर झेलत उद्धहि ईस, बहैं इत चंडिय के भुज बीस।
चटट्ठहिं रत्त खिलै चउसटि्ठ, बवक्कहिं बावन गावन गट्ठि।।
चुरेलिनि मंडत फालन चाल, लगावत डाइनिं घुम्मर ताल।
बजे लगि खग्गन खग्गन बाढ, गिरैं भट भीरू भजै तजि गाढ।।
उमेद दिनेस रच्यो खग खेल, दुरयो सठ घुग्घुव दुग्ग दलेल।
धवै असि खुप्परि टोपन फारि, बहैं जनु सब्बुवतंति विदारी।।
किरै कटि हड्‌डन खंड करक्कि, झरैं उड़ि धारन बूर झरक्कि।
कटैं सह सात्थिन जानुव जंघ, सुज्यों गंज सुंडिन खंडन संघ।।
फदक्कहिं कढ्ढहिं कालिक फिप्फ, भचक्कहि टोप कपालन भिप्फ।
उडे सिर फुट्‌टत भेजन ओघ, मनों नवनीत भटक्किय मोघ।।
मचक्कहि रीढक बंक अमाप, चटक्कहिं ज्यों मिथिलापुर चाप।
धसै कढि लोचन सोंनित धार, चरै सिसु मच्छ विलोम कि बार।।

यह एक अत्यन्त विस्तृत चित्र का छोटा सा अंश मात्र है, जो अपूर्ण होते हुए भी कितना पूर्ण है! एक शब्द में सूर्यमल्ल की विशेषता वर्णन की पूर्णता है। इसके साथ योद्धाओं की हृदयगत भावनाओं का विश्लेषण एवं उनका काव्यमय अंकन सुघड़ता से किया गया है। कल्पना का ऐसा रूप-विधान पूर्ववर्ती कवियों में नहीं पाया जाता। भाव कितना अभिनव, भाषा कितनी प्रवाहमयी! इनके काव्य-चातुर्य का एक और उदाहरण दिया जाता है-

बड़े दल तोपन को करि अग्ग, मिलै भट उद्धत संगर मग्ग।
इते बिच कौतुक जंग अछक्क, उदो उदयाचल के सिर अक्क।।
भयो नभ धूमित धुंधरि मान, लगे द्रग मींचन देव विमान।
भुजंगम के सिर नच्चत भुम्मि, धरै फनते फन घायल घुम्मि।।
नचे जिम कान्हर कालिय कंध, बनै इम छोनिय तंडव वंध।
सज्यो बढ़ि धूम सुरालय संग, ऊबौ नभ बाहुल राजहि रंग।।

यहाँ युद्ध का नहीं, युद्ध-क्षेत्र का वर्णन है। प्रातःकाल युद्ध आरंभ हुआ, ऐसा न कहकर कवि ने युद्ध-क्रीड़ा देखने के लिए उत्कण्ठावश सूर्य को उदयाचल पर प्रकट कराया है। पृथ्वी डगमगा रही है, यह कहना कवियों का स्वभाव है किन्तु यह कहना कि पृथ्वी शेष के सहस्रफनों पर इधर-उधर लुढक रही है, एक मौलिक सूझ है। इसी प्रकार बादल उस धुयें से काले हो रहे हैं, कवि की नई कल्पना का प्रमाण है।

यह उल्लेखनीय है कि सूर्यमल्ल ने वीर एवं श्रृंगार रसों का विरोध होने पर भी इनका अनूठा सामंजस्य कर दिखाया है। एक ओर कामातुर अप्सरायें अत्यन्त उद्विगनता से अपना श्रृंगार कर रही हैं तो दूसरी ओर युद्धातुर योद्धा सुसज्जित हो रहे हैं। इन दोनों की हृदयस्थ भावनाओं एवं वाह्य वेश-भूषा विषयक यह वर्णन दृष्टव्य है-

हूरों सुरों सत्थ ही बर साज सजाया, यो जावक लगे चरन यो लंगर लाया।
यो नेवर पग अंकुरे यों मुक्कुन आया, यों अद्धोरुक उल्लसे यो दस दिपाया।।
यो आइत विमान के यों बाजि सजाया, यो राधन पाय प्रमुदि यो सिंधुन छाया।
यो वीणागन अग्गहे यों तेग तुलाया, यों कुंकुम कुच लग्गि यो दृढ़ छत्तिन छाया।।

चलता ही रहता है यह वर्णन। रुकने का नाम नहीं। कवि महाभारतकार के सदृश पृष्ठ पर पृष्ठ लिखता चला जाता है। क्या मजाल कि कहीं पर शैथिल्य आ जाय। इस वर्णन में अनुराग और विराग तथा कामातुरता और रणातुरता का मनोहर चित्र खींचा गया हैं। विरोधी भावों का यह अनूठा साम्य निःसंदेह कवि की उच्च काव्य-प्रतिभा का द्योतक है।

ध्वनि द्वारा भावों की व्यंजना करना सूर्यमल्ल जैसे तपस्वी कवियों की ही करामात है। यह ‘वंश-भास्कर’ के पद-पद पर मिलेगी। यह लक्ष्य करने की बात है कि युद्ध के वेग का वर्णन करते समय भाषा भी वेगवती हो जाती है। भूतों, प्रेतों एवं डाकनियों के साथ मानो कवि स्वयं ही ताण्डव करने लग जाता है। यथा-

घरी-घरी घुमाय जाय डाकिनी डरी-डरी, लंजे लजि लुके लुभाय भीरु के भजे-भजे।
सजै सिपाह लेत खेत मार दे भजे-भजे, बटे बटे पिसाच बुक्क फिप्फरे फटे-फटे।।
कंपै-कंपै जुरै कितेक रंग में रूपै-रूपै, लुपै-लुपै ललात पाय धार में धुपै-धुपै।
मनोज्ञ मुंड़ मालिका रचैरु कालिका रमै, विमान जाल देवतान जाल दै घुमै-घुमै।।

‘वीर सतसई’ वीर काव्य की एक मुक्तक रचना है। यह किसी व्यक्ति विशेष से प्रभावित होकर नहीं लिखी गई। आरम्भ शास्त्रीय पद्धति के अनुसार गणेश एवं सरस्वती वंदना से हुआ है। इसके पश्चात् कवि वीर-चरित का नाना प्रणालियों के द्वारा बड़ा ही मार्मिक वर्णन करने लग जाता है। दोहों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि इसमें राजपूत की वीरता, स्त्रियोचित वीरता एवं सतीत्व, वीर राजपूत का स्वभाव, धर्म युद्ध की तैयारी, सपत्नी के प्रति ईर्ष्या एवं योग्य सेनापति की आवश्यकता पर अनेक भावपूर्ण चित्र अंकित किये गये हैं। रसोत्पत्ति के संयोजक द्रव्यों का सम्मिलन देखने योग्य है। सभी रस वीर रस के सहायक होकर आये हैं। कवि की निरीक्षण शक्ति गजब की है। वातावरण की सृष्टि करने में उसे अभूतपूर्व सफलता मिली है। वीर की अंत: प्रकृति एवं उसके वाह्य कार्य-व्यापारों के चित्रण में उसने कमाल कर दिया है। प्रत्येक दोहे की शब्द-व्यंजना अनूठी है। इन विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए इसे वीर काव्य की परमोत्कृष्ट निधि कहा जाय तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी।

अपनी जननी जन्म-भूमि के प्रति मनुष्य में कितना नैसर्गिक प्रेम होता है? उसके कण-कण के साथ न जाने कितनी मधुर स्मृतियां लिपटी हुई होती हैं? जीवन के मूलमंत्र का रहस्योद्‌घाटन करती हुई सूर्यमल्ल की कविता सीधा हृदय को स्पर्श करती है-

इळा न देणी आपणी, हालरिया हुलराय।
पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय।।
थाळ बजंता हे सखी, दीठौ नैण फुलाय।
बाजां रै सिर चेतणौ, भ्रूणां कवण सिखाय।।
रण खेती रजपूत री, बीर न भूलै बाळ।
बारह बरसां बाप रौ, लहै बैर लंकाळ।।
बाभी हेकण बैर में, बोळविया दस बीस।
अब तो देवर ओहड़ौ, संचै भार न सीस।।
कुळ थारौ रण पोढणौ, मोनूं कहती माय।
प्राणां गाहक पेखियौ, कसियौ बरजै काय।।
बाप गयो ले माहिरौ, काको जात कडूंब।
तोहि मचाई छोकरै, बैरी रे घर बूंब।।
भोळा जाणौ भूलिया, बरसां आठां बाळ।
एथ घराणै सीहणी, कंवर जणै सो काळ।।

बाल्यकाल में हम जिन संस्कारजन्य वीर भावनाओं का उदय पाते हैं, बड़े होने पर कर्म-क्षेत्र में उनका विकास। यह लक्ष्य करने की बात है कि इन पात्रों में उदात्त भावनाओं के साथ बैर की भावना प्रबल होती है। यह उनका कुल-धर्म है। वस्तुत: राजपूत के लिए भूमि से बढ़कर और कोई मूल्यवान नहीं। इसका उपभोग करने वालों का जीवन बड़ा ही कठिन होता है-

धीरा-धीरा ठाकुरां, जमी न भागी जाय।
धणियां पग लूंबी धरा, अबखी ही घर आय।।
घोड़ां घर ढालां पटळ, भालां थंभ बणाय।
जे ठाकुर भोगै जमी, और किसौ अपणाय।।

सूर्यमल्ल का राजपूत शत प्रतिशत युद्धवीर है जो शौर्य, साहस, पराक्रम, प्रताप, धैर्य, उत्साह, व्यवसाय आदि विशिष्टताओं से अलंकृत है। इस सिंह को देखते ही देवता कूच कर जाते हैं-

पग पाछा छाती धड़क, कालौ पीलौ दीह।
नैण मिचै साम्हौ सुणै, कवण हकालै सीह।।
काळी नाहक की डरै, खेती लाभ म खोय।
धरती रा जेथी धणी, हूंकळ तेथी होय।।

कवि ने वीर राजपूत की स्वभावगत विशेषताओं का वर्णन करते हुए उत्साह, स्फूर्ति एवं ऐंठ को विशेष महत्व दिया है। यही कारण है कि रूण्ड-मुण्ड अलग हो जाने पर भी रजवट ज्यों का त्यों बना रहता है-

गीध कळेजो चील्ह उर, कंकां अंत बिलाय।
तौ भी सो धक कंत री, मूंछां भ्रूँह मिलाय।।

इस धर्म-युद्ध की एक स्वस्थ परम्परा है। दोनों पक्षों के वीर क्या-क्या करते हैं, कवि के शब्दों में-

धीरा-धीरा ठाकुरां, इती उतावळ काय।
लीजै खोबां गाळमा, जमी कठै घुस जाय।।
मिळतां ऊतरिया मरद, साकुर बाधा सेल।
मिजमानां जिम मंडिया, खोबांबाजी खेल।।
संपेखे बाल्हा सगा, मिळ गळबत्थां मार।
पहली बाहण पाहुणां, मंडीजै मनुहार।।

युद्ध में कुशल सेनापति के न होने से सेना की क्या दशा हो जाती है, इसे कवि ने समझा है-

पूरा आकुळ पाठड़ा, भालां पड़तां भार।
हेकण कवला बाहरी, झाडां-झाडां डार।।
सुहड़ा और सिकारसी, मन में या न समाय।
भाला ऊ गिड़ भांजसी, डाढां प्रलय दिखाय।।
रुख-रुख तीरां-रूकड़ां, मुख-मुख बीरां मौळ।
पूंचाळा हेकण पखै, दळ में प्रबळ दरौळ।।
आसां बासां याद कर, जीव निसासां जाय।
बिण एकण बानैत रै, मुख-मुख फौज मुड़ाय।।

धरती के दीवानों और युद्ध के परवानों का चमत्कार पत्नी द्वारा कही हुई उन उक्तियों में देखने को मिलता है जिनमें पति के शौर्य पर आश्चर्य प्रकट किया गया है-

देख सखी होळी रमै, फौजां में धव एक।
सागर मंदर सारखौ, डोहै अनड़ अनेक।।
मूझ अचंभौ हे सखी, कंत बखाणूं कीस।
बिण माथै दळ बाढ़ियौ, आँख हियै के सीस।।
हेली की अचरज कहूँ, कंत परा बळिहार।
घर में देखूँ दोय कर, रण में दोय हजार।।

सूर्यमल्ल द्वारा चित्रित राजस्यानी वीर रमणी का विराट रूप सर्वथा स्तुत्य है। उसका स्त्रीत्व एवं मातृत्व दोनों ही चित्ताकर्षक है। यथा-

सहणी सबरी हूं सखी, दो उर उलटी दाह।
दूध लजाणै पूत सम, बलय लजाणै नाह।।
गोठ गया सब गेहरा, बणी अचाणक आय।
सीहण जाई सीहणी, लीधी तेग उठाय।।
भाभी हूँ डौढी खड़ी, लीधाँ खेटक रूक।
थे मनुहारौ पाहुणाँ, मेड़ी झाल बंदूक।।
घोड़ाँ चढणौ सीखिया, भाभी किसड़े काम।
बंब सुणीजै पार को, लीजै हात लगाम।।
धण नूँ आळगसी घणी, सुणियाँ बागौ सार।
हालीजै उण देसड़ै, प्राणां रौ व्यापार।।
नहँ पड़ौस कायर नराँ, हेली बास सुहाय।
बळिहारी जिण देसड़ै, माथा मोल बिकाय।।

इस वीरांगना के चरित की अन्यतम विभूति मृत्यु को महान पर्व का रूप देकर पातिव्रत धर्म का अनुष्ठान करना है। सूर्यमल्ल के वीर काव्य में सतीत्व की मनोहर अभिव्यंजनायें नारी-सौन्दर्य के आभूषण हैं। वह मोतियों का थाल लेकर विजयी प्राणनाथ की आरती उतारती है तो वीरगति प्राप्त करने पर सती होने की तैयारी करती है-

जे खळ भग्गा तो सखी, मोताहळ सज थाळ।
निज भग्गा तो नाह रौ, साथ न सूनो टाळ।।
काळी करै बधावणो, सतियां आयो साथ।
हथळेवै जुड़ियो जिको, हमैं न छूटै हाथ।।

सती स्त्री की यह स्वभावगत ईर्ष्या कितनी वांछनीय है जो स्वर्ग की अप्सराओं तक को फटकार देती है-

काली अच्छर छक म कर, सूना धव अपणाय।
सूर किसौ परखै सती, बोली सुरग बसाय।।

इस प्रकार ‘वीर सतसई’ भाव एवं कला का एक अभिनव आयोजन है। साथ ही इसमें परम्परा से आती हुई अनेक रूढ़ियों का भी सन्निवेश हुआ है। इस दृष्टि से कवि ईसरदास का ऋणी है। कुछ उदाहरण लीजिए-

धण आखै जागो धणी, हूंकळ कळळ हजार।
बण नूँतारा पाहुणा, मिळण बुलावै वार।।
कंकाणी चंपै चरण, गीधाणी सिर गाह।
मो बिण सूतौ सेजरी, रीत न छंडै नाह।।
आळस जाणै ऐस में, बपु ढीलै बिकसंत।
सींधू सुणियाँ सौ गुणौ, कवच न मावै कंत।।
सुण हेली ढीलै सहज, लेणौ पड़वै लोच।
कंत सजंतां सौ गुणौ, कड़ी बजंतां कोच।।
करड़ौ कुचनूँ भाखता, पड़वा हंदी चोळ।
अब फूलाँ जिम आँग में, सेलाँ री घमरोळ।।

गोपालदान कृत ‘लावा रासा’ वीर रस की एक सफल रचना है। इसमें कवि ने कछवाहों की नरूका शाखा के वीरों द्वारा लड़ी हुई लड़ाइयों का रोचक ढंग से ओजपूर्ण शब्दों में वर्णन किया है। इस ग्रंथ में पाँच युद्धों का पाँच प्रसंगों में वर्णन है- १. महाराजा जगतसिंह (जयपुर) एवं मानसिंह (जोधपुर) का युद्ध २. लावा युद्ध ३. लदाना युद्ध ४. उणियारा युद्ध ५. द्वितीय लावा युद्ध। प्रथम युद्ध को छोड़कर शेष चारों नरूका और मुसलमान लुटेरों के मध्य हुए हैं। लदाना युद्ध के इस दृश्य में सेना के भार से पृथ्वी पर एक अद्भुत हलचल उत्पन्न हो गई है-

चढ़ि चल्लिय मेछान, भान गरदावलि भिल्लिय।
हलचल्लिय हिन्दवान, खखड जुग्गनि खिल खिल्लिय।।
धर हुल्लिय परिभार, पहुमि बसवान उचल्लिय।
हल मिल्लिय परि जोर, शेष अहि फन पर सल्लिय।।
लखि जोर सोर दिल्लिय सदन, तदन तोर दरसावियो।
कर अली-अली माधव नगर, येम सजी कर आवियो।।

और भी-

धरा धूम बित्थुरे, तोय ऊछरे सरोवर।
गिरे श्रृंग नग तुट्टि, ताम प्रज्जरे तरोवर।।
नदी कूप नद सूकि, कूक कातर उर फट्‌टिय।
आवट्‌टिय जल जोर, सोर दुहुं ओर उपट्‌टिय।।
सर धून-धून दिगपाल डरि, कसकि कमठ्‌ठनि पिठ्‌ठि भर।
धर धुज्जि तलातल तल बितल, शेष सलस्सल छड्‌डिधर।।

युद्ध के तेजी पकड़ने पर कवि ने क्या ही सुन्दर चित्र खींचा है ?-

कितेक लत्थ बत्थ ह्वै अचेत भूमि पै गिरै, किते कुठार खग्ग धार सेल खंजरू लरै।
कितेक हाथ पावके बिहीन भूमि पै लुटैं, कितेक सीसके कटे कबंध ऊठिके जुटैं
कितेक गिद्धनीन को धपाय गूद अप्पने, कितेक सुद्धि के विहीन मार-मार जप्पने।
कितेक ईस पोय लीन सीस मुंजकी गुनि, कितेक खप्र खोपरी बनाय जुग्गनी चुनी।।
कितेक बीर जुद्ध में अधीर होय बक्कही, कितेक भूत खेचरी अघाय श्रोन छक्कही।
कितेक हूर अच्छरी बिमान बैठि ऊतरी, कितेक जात व्योम को मनो अरठ्ठ की घरी।।

कमजी ने रावत रणजीतसिंह चुण्डावत (देवगढ़) एवं रावत जोधसिंह चहुआन (कोठारिया) की युद्धवीरता पर स्फुट गीत लिखे हैं। प्रस्तुत गीत में कवि ने अँग्रेजों के अनावश्यक हस्तक्षेप करने पर रणजीतसिंह द्वारा प्रदर्शित शौर्य का बड़ा ही ओजस्वी वर्णन किया है-

लीधां आसतीक रेणसिंग ऊचारे घड़ा रो लाडो, ऊबारो भड़ाळां नाम चाढ़ौ कुळां अंब।
गोरां रे अजंटी बौल सांभळे वीराण गाढो, खंगै ऊभौ मैदपाट आडो जेत खंभ।।
चगे नथो पावां वीरताई ऊफणी रे चखां, बातां हुई गणीरे अभीडा बोलै बौल।
आवतां फरंगी समै जासती वणीरे एळा, रहे तेण वेळा चूंडो धणी रे हरोल।।
माथे शत्रां खांपां घावै गवांवै जिहान माथै, दसुं दसा सोभाग छवायो वीरदाण।
जींहान जाणी जोम छते नाहरेस जायो, अजंठी ऊठायो आयो आपे ही आथाण।।
गाजे धूंसा राणरा फरंगी लगा दीये गेले, ओसाणा साधियो टला हमला खेवाड़।
अई चूडा गराणे हींदवां छात आराधियों, आपरे गळे ही भलां बाधियों मेवाड़।।

वीर रस का वर्णन करने वाले कवियों में शिवबख्श का विशिष्ट स्थान है। अलवर-नरेश महाराजा जालिमसिंह के शिकार का प्रसंग लेकर इन्होंने जिस वीर भाव की सृष्टि की है, वह देखने योग्य है। भैंसे को बँधा देखकर जब सिंह फूला नहीं समाता तब सिंहनी उसे सावधान करती हुई कहती है कि यह विष भरा लड्डू है, खूब सोच-समझ कर खाना-

निरखि कह्यो तद नाहरी, निज मन करि निरधार।
भैंसो जाळम भूप रो, बालंम हतो विचार।।
बालंम हतो विचार, महिष महिपाल रो।
बंधियो आँण बसीठ, कंत तव काल रो।।
भरिया विष भरतार, ‘क मोदक मारका।
कठिण चणां अति कंत समझ चित सारका।।

लेकिन सिंह क्यो मानने लगा? उसने अपने स्वभाववश भैंसे को मारकर खा लिया। उधर आदमियों ने दौड़कर राजा को खबर दी और वे दल-बल सहित आ पहुँचे। सिंहनी ने सोचा, अब खैर नहीं। उसने अपने पति से प्रार्थना की, चलो भागकर पहाड़ों और नगरों के पार चले चलें-

दुरद मचोळा दे रह्या, सुभट सचोळा साज।
बचां न इण खोळा बिचै, भोळा कंथ उठि भाज।।
भोळा कंथ उठि भाज, आज नहिं ऊबरां।
पारां नगर पहाड़, बसां ज्यां बिम्मरां।।
बिकट गहन बनखंड, जठै बसि जीजिये।
पावै तठै न पंथ, कंथ घर कीजिये।।

ऐसे कायरतापूर्ण वचन सुनकर अंग मोड़ता हुआ आलस्य छोड़कर वह वीर केसरी उठ बैठा। उसने अपनी प्रिया को सम्बोधित करते हुए कहा-

इसा बचन सुणि ऊठियो, अंग मोड़ै असळाक।
बाघ कहै सुण बाघणी, तजणौं खेत तळाक।।
तजणौं खेत तळाक, कहाऊँ केहरी।
सहौं गरज नहिं सीस, ‘क माथै मेहरी।।
मरण तणो भय मांनि, भोमि तजि भागवै।
बाघ जनम बेकाज, लाज कुळ लागवै।।

कवि ने यहाँ संलाप शैली में ‘सिंह’ (वीर) नाम को सार्थक कर दिया है।

मोतीराम ने अंग्रेजों एवं हिन्दू नरेशों के बीच विद्रोह के समय रावत जोधसिंह (कोठारिया) की युद्धवीरता पर यह गीत लिखा है-

पड़े अमावड़ द्रोह छत्रधर फरंग पालटे, आंट धर क्रोध भुज गयण अड़िया।
सोध अंगरेज हिंदवाण आया सरब, जोध सिर सेस रै कदम जड़िया।।
पड़े विकट धके चांपा सुदि पुळ गया, भड़ां थट छेक अड़वास लूभो।
तोल खग टेक नहँ छंडे मोहकम तणौ, एक लौ ठोर भुज लड़ण ऊभो।।
जाणता जिसा साभाव रहिया जबर, अड़ीयळ करे खग दाव आछा।
राव बिज पाळ रा भार भुज राखियां, पाँव समहर बिचा न दिया पाछा।।
सुणे बाखाण गढ़ दिली अर सतारा, दाट जित तितारा खळां दीधा।
राव चहुवाण जोधा अडग मतारा, कथन क लकता रा मेट कीधा।।

ऊमरदान कृत, ‘जोधारां रो जस’ (वीर बतीसी), ‘राठौड़ दुरगदास री औरंगजेब ने अर्जी’, ‘प्रताप प्रशंसा’ एवं ‘तोपां री तारीफ’ नामक रचनाओं में वीरता के चित्र देखने को मिलते हैं। ‘वीर बतीसी’ में सच्चे वीरों के लिए कवि का कथन है-

अरे न और के अगे अराक तें अर्‌या करें।
डरें न तीन काल दीन बाल तें डर्‌या करें।।
सनिद्धि स्वामिं के सदा पिनिद्ध पां पर्‌या करें।
लरें नहीं सुलोक तें कुलोक तें लर्‌या करें।।

‘राठौड़ दुरगदास री औरंगजेब ने अर्जी’ एक स्फूर्तिदायक रचना है जिसमें सर्वत्र ओज टपकता रहता है। यह संलाप शैली में लिखी गई है। यथा-

कर में नहिं चूरी करन कानि, पगहै न पगरखी धरम पानि।
करबाल ढाल दिस कर कयास, ओलंदेहै नहिं अनायास।।
मन भ्रमर मनोरथ विरथ मोज, चंपक वत चांपावत सचोज।
जैतावत दैंगे जुद्ध झाट, कूंपावत नवकोटी कपाट।।
कर नोत कुतूहल करत कोड, व्है गोयंदा सोतां न होड।
आहव उछाह उर अधिक ऊह, दूदावत-मेडतिया दुरूह।।
निज कर्म सोत पैंडैं न बीह, उदावत अैंडैंगे अबीह।
उछरंग अंग रिड़मल अभंग, जोधाहर नाहर रूप जंग।।

‘प्रताप प्रशंसा’ का कर्नल प्रताप, कवि की दृष्टि में सिंह के समान वीर है-

केहर टळ जावे कठे, तन सूं ओलो ताक।
हाके सामों हुलसणों, है सूबर हुसनाक।।
साचो तूं-तूं सूखों, तूं दाता दै त्याग।
पौहुमी में पातळ प्रसिद्ध, खळा बिड़ारण खाग।।

हिंगुलाजदान ने तोपों के विषय में लिखा है-

तोपाँ रणताल रै, सकल भूपाल सँवारी।
खै आकाळ खाटणी काळ थाटणी करारी।।
जाजुळ गोळा ज्वाळ गरज जिण काळ उगल्लै।
त्रास सुरग पाताळ दिगज दिगपाळ दहल्लै।।
दाँमणी मेह प्रगटै दग्यां, अधिक देह अधियामिणी।
सामणी कोट कितळाँ सको, गैबर टिल्ला गामणी।।

माधवदान उज्वल कृत ‘सवाईसिंहजी री निसाणी’ में कवि ने जो युद्ध-वर्णन किया है उसमें सवाईसिंह ने बीजड़ टालपुरे की सेना को परास्त किया था। उदाहरण देखिये–

सिंधी लोकन सझ्झ के चढ सैन्य चलाया।
मानों सत्त महोदधी हठयाज हकाया।।
राज विजेपत लेण को सब वीर सवाया।
सो यह भूपत संभ के सब भट्ट सझाया।।

उनकी ‘पोकरणा रा छंद’ नामक रचना भी वीर रस से ओतप्रोत है। ‘मोतीदाम’ का यह उदाहरण देखिये–

चढे रणधीर सुवीर उछाह, धन्या ढ्यन केसु लगे गढ ढाह।
भयो मन अंबरउ चित भाव, दटे किम सत्रु करे सिर दाव।।
हटे मत पीठ देखावण हांन, उछावह आहव पै मन आन।
सझे सब यों कह थांन सुमंत, गहे बहुवा सुर ग्रेह वसंत।।

यथार्थ में सूर-सूर है। मुकनदान खिड़िया कृत ‘वीर सतसई’ के ये दोहे देखिये-

अंग छेद्यो भालां अणी, साहस तजे न सूर।
तोड़ दिया गज तुंडळा, भांज किया भक भूर।।
धर अपणी आपां धणी और करे क्यूं आस।
देस्यां जिण दिन दूसरां, लाखां पड़सी लास।।
मरणा पेली मारणौ, वीरां आहिज वत्त।
जो चाहो धर पाररी, खाग झीकोळौ रत्त।।

केसरीसिंह (मेवाड़) कृत ‘प्रताप-चरित्र’, ‘राजसिंह-चरित्र’, ‘दुर्गादास-चरित्र’, ‘जसवंतसिंह-चरित्र’, ‘अमरसिंह राठौड़’ एवं ‘रूठी राणी’ सभी ग्रंथ वीर काव्य के उत्कृष्ठ उदाहरण हैं। ये समस्त काव्य खण्ड-काव्य की कोटि में आते हैं जिनमें नाना प्रकार की ऐतिहासिक घटनाओं के बीच चरितनायकों के वीरत्व का प्रकाशन किया गया है। वीर रस ही कवि का अपना मौलिक क्षेत्र है। वह स्वयं लिखता है- ‘मुझ से जहाँ तक बन पड़ता है, वीर रस की ही रचना किया करता हूँ। ऐसी दशा में मेरे काव्य का आधार वीरगाथा ही होना-प्रायः निश्चित था। फलत: मैंने महाराणा प्रताप की जीवनी को काव्य-बद्ध करने का साहस किया। वीर केसरी प्रताप के विषय में अनेक गद्य और पद्य ग्रंथ उपस्थित थे परन्तु उनका श्रंखलाबद्ध काव्यमय जीवन मेरे दृष्टिगोचर न होने से मैंने यह प्रयास किया है।’ इन ग्रंथों की भाषा पिंगल होते हुए भी बीच-बीच में डिंगल के छंद देखने को मिलते हैं।

कवि की विशेषता इस बात में है कि उसने काव्य और इतिहास का एक मधुर सामंजस्य उपस्थित किया है। यत्र-तत्र किंवदंतियों का भी आश्रय लिया गया है। सभी रचनायें ओजस्वी एवं मार्मिक हैं। इनमें क्षत्रिय वीरों के प्राचीन एवं अर्वाचीन कुल-गौरव का परिचय मिलता है। यों तो समय-समय पर इन वीरों को लेकर अनेक गद्य-पद्यमय ग्रंथ लिखे गये हैं किन्तु जो मौलिकता, सरसता, सरलता, सामयिकता एवं ऐतिहासिकता इनमें देखने को मिलती है, इस काल के किसी दूसरे कवि में नहीं।

केसरीसिंह के वीर काव्य की प्रमुख विशेषता उसके स्फूर्तिदायक संवाद हैं। प्रश्नोत्तर रूप में चलने से कथानक में क्रमबद्धता का अभाव नहीं। उदाहरण के लिए प्रताप और मानसिंह, प्रताप और शक्तिसिंह तथा नणद और भावज के संवादों को ही लीजिए जिनमें उत्साह ही उत्साह भरा पड़ा है। नणद-भावज का वार्तालाप यहाँ दिया जाता है-

रहणो जाणो राजरो, यो तो नैम संसार।
किणरी बाईजी ! कहो, रण बांकी तरवार।।
भाभी खळदळ भिड़ण री, या साधारण बात।
कर जूँहर शाका करण, योहिज घर विख्यात।।
क्यूँ इण रो अंजश करो? बड़ी बणावो बात।
बाईजी ! जूँहर बळी? जेतो म्हारी जात।।
रावां अरु रंकाँ रहै, शाराँ रै घर नार।
मोड़ तणो नहिं महतपिण, शोड़ तणो संचार।।
बिन माथे खग वाहणा, रण-गहला राठोड़।
बाईजी ! इण बंश री, जुड़े न दूजा जोड़।।
बंशां पैतीसाँ सिरे, हूँ जाणू राठोड़।
पिण भाभी ! शीशोदियां, जग उपरान्त मरोड़।।
बाईजी लीधा बिरद, शोजश कहै सुपात।
जग में अवर न जनमिया, राठोडां री रात।।
कुळवट वाळा धरमरा, जुध मतवाळा जाण।
रजवट वाळा धरमरा, रखवाळा महाराण।।

राधवदान ने महाराव केसरीसिंह (सिरोही) एवं वजावतों के युद्ध पर यह गीत लिखा है। यह युद्ध झाडोली गाँव में हुआ था जिसमें राज्य-सेना की विजय हुई थी-

फौज मुसाहब फबे, जबर साहेब नृप जामंत।
एक-एक से अधिक, जसा पृथीराज के सामंत।।
सोनो भड़ चहुआण, सरस लड़ीयो होए सूरो।
सांमो खागाँ चढ़े, प्रबल कीधो जुद्ध पूरो।।
डुंगर रामींग अरियां दलन, कंठीख जीम कोपिया।
रामींग दियो खगां रमे, एत्र हुआ एल ओपिया।।

गुलाबसिंह के इस गीत में ठाकुर गोपालसिंह (खरवा) के रण-शौर्य की उत्कृष्ट व्यंजना हुई है-

मरद घाट जुजराट लोह लाट बेड़ी मणा, खलां समराथ खग झाट खाधा।
आठ कम साठ चव साठ धूमे उठे, मेर गिर चाढ़ लोह लाट माधा।।
जांगियां ठोर सिंधू गवे जांगड़ा, लड़ण रण खांगड़ा वीर हलके।
भेर तण जठे पीधा अमल भांगड़ा, जो मरद रांगड़ा पणो झलके।।
छोह छक रातंक थटा छावतां, गुमर वगड़ावतां रूप गाढ़े।
घमोड़ा तड़ा अवरी घड़ा घावतां, चमू सगतावतां नूर चाढ़े।।
पटायत लाखरा ज्युँही थहै वजेपुर, उदेपुर भाकरां गुमर आणे।
कंठीरल मधा थारे जसा ठाकरां, तीस खट साखरा मूंछ ताणे।।

वीरसतसई की परम्परा में नाथूसिंह का योगदान कदापि नहीं भुलाया जा सकता। इनकी रचना के ७११ दोहों में वीर रस की विशद व्यंजना देखने को मिलती है। विषय एवं उपादान सीमित होने से कहीं-कहीं सूर्यमल्ल के सदृश भावाभिव्यक्ति भले ही देखने को मिल जाय किन्तु कवि की स्वतन्त्र सूझ-बूझ का अभाव नहीं है। विषय का प्रतिपादन अत्यन्त कलात्मक ढंग से हुआ है और वीरोचित कार्यों पर व्यापक दृष्टि से विचार किया गया है। भाव सरल हैं और वे हमारे हृदय को स्पर्श करते हैं। कवि की दृष्टि वीर-वीरांगना के सूक्ष्म से सूक्ष्म व्यापार की ओर गई है और उनका चित्रोपम वर्णन किया गया है। युद्ध-सामग्री जैसे तलवार, भाला, अश्व, गज आदि का वर्णन भी ओजस्वी है। वीर बालकों एवं पुत्र-वधूओं के कार्यों को देखकर दंग रह जाना पड़ता है। इस प्रकार मुक्तक होते हुए भी यह रचना मौलिक एवं आधुनिक भावों से गठित है। यथार्थ में वीर वह है जो-

रण कर-कर रज-रज रँगै, रिव ढंकै रज हूंत।
रज जेती धर नहँ दियै, रज-रज ह्वै रजपूत।।
सुरग न चाहै सिर पड़ै, समर लड़ै रजपूत।
खग धारां प्रिय जेणनूं, अमृत धारां हूंत।।
भड़ रण चढियौ कट पड़ै, पण घर मुड़ै न पैर।
सूरज ऊगौ आथमै, पाछौ फिरै न फैर।।

ऐसे वीर को रण कितना प्रिय है, यह वीर पत्नी के मुँह से सुनने को मिलता है-

कट-कट बगतर अरि कटै, खग भोटी धव पांण।
केहर नख चाढै किसा, सुण हेली ! खुरसांण।।
नणदल रोक्यौ बारणो, रुकिया राखी हद्द।
लाखां रोकै नहँ रुकै, खग वाहै वधवध्ध।।
सेजां थोड़ा हरखता, हेली ! देख सभाव।
रण चढिया घण हरखवै, म्हां विच वाल्हा घाव।।
हेली! लड़ हिक सांप हूं, किसन हुवा काळाह।
पिव लाखां लड़िया हुवा, कंकू-रँग वाळाह।।
मूंघी खागां मोलवै, हेली! देख सुभाव।
सूंघा बगतर नहँ लियै, घावां करै उपाव।।
पिव अरियां दिस संचरै, अरिघर दिसा सिधाय।
हेली! रिव उगां पछै, उडगण केम दिखाय।।
मद-छकिया नहँ घूमता, पिव पड़वै दिन हेक।
घावां-छकिया घूमता, हेलो! आवै देख।।
खाग कलम कागद धरा, स्याही रगत बणाय।
पिउ नित तेड़ै नवलखा, कंकू पत्र लिखाय।।

पुत्र तथा पुत्र-वधू की वीरता पर माता की यह गौरवानुभूति सर्वथा दृष्टव्य है-

जे हर! तूठै दीजियै, मो मन मोटी चाय।
बेटो रण-मरणौ हुवे, बहु सँग बळणी आय।।

साँवलदान ने युद्धवीर बल्लू चांपावत पर यह गीत लिखा है-

बजर जेम खग झाट, चांपा कमँध बलूड़ा , नाघड़ा जेम खळ सीस लाट्या।
पराजय देण नूं दिली रा पती ने, किलम्मां सेन मझ रूक काट्या।।
सदा खटतीस आवध जड़ सनाहां, रूकड़ां रटक हूँ रह्यौ राजी।
दलीपत खेध कप्पाट चव देसरा, मौड़ सिर वीर भाराथ माझी।।
अमर रौ पाळवा वैर गढ़ आगरै, कमंध चित अजक बिन कळह कीयां।
पटायत बज्यौ नहँ नंद गोपाळ रौ, बाजियौ बँटायत विपत बीयां।।
सार खळ श्रोण छक धकी उर साह रै, पराक्रम सत्रुवां जंग पल्लू।
सूर अन छत्रियां दिवालय सुरग रै, वीर कुँभ पताका थयौ बल्लू।।

वीर काव्य परम्परा में पाबूदान कृत ‘जोरजी री झमाल’ एक उल्लेखनीय कृति है। खाटू निवासी जोरजी चांपावत महाराजा जसवंतसिंह के समय का एक वीर योद्धा था। इसका खैरवा एवं बांता के जागीरदारों से युद्ध हुआ था जिसका वर्णन कवि ने अपनी रचना में किया है। एक उदाहरण देखिये-

विकट कपाटों जड़े भुरजबारा बूंदीया, भड़े शकटों अगे आप भीड़ो।
जगत जेठी सहड़ जोर रे जाबते, विकट रणझालता हुआ बीडो।।
झळहळे वींजको चहुँ दिश झलांणी, बंदूकों घलोंणी तीर बारों।
तिकापुळ देखने जोर आवध तजे, लजे खाटू गिरंद ताप लारों।।

इसी प्रकार ‘प्रतापसिंह री झमाळ’ में कवि ने सन् १९१४ ई० के विश्व-युद्ध में प्रतापसिंह की अद्‌भुत वीरता का वर्णन किया है।

किसी चौहान राजपूत सरदार के लिए युद्ध में मारे जाने पर सलजी रतनू के विषय में डालूराम कवि ने लिखा है-

राड़ै दीसतो कराळौ सदा दोयणां घात रौ घल्लौ, वेढाक अचाळौ तेग पाथ रौ बजाव।
भैरूंदास दूजौ सदा सुणन्ता हाथ रौ भल्लौ, जको केम मूचै ‘सल्लौ’ नाथ रो सुजाव।।
आ सेर घेरियौ घड़ा दोयणां धरा रै आंटै, कवेस करारै कांटै खिझायौ कंठीर।
माधाहरा केक मालाहरा र चढावै मूंढै, वाढे तेगां सरां रै हटाया महावीर।।

विजयदान बोगसा के स्फुट दोहों में वीर रस की निराली छटा पाई जाती है। यथा-

बादळियां जद बरससी, नीपजसी जद नाज।
वीरां खागां बाजसी, रहसी जिण दिन राज।।
बसुधा वीरांरी वधू, जिकान ऊभां जाय।
किण माँगी दीधी कहो, खाग तणै बळ खाय।।
मांस धपाया ग्रीधड़ां, जोगण रगतां पत्र।
खाग धपाया खूनियां, (जद) शीश धराणा छत्र।।
खगवाळो कर कट गयो, सिर कटियो जिण साथ।
खाग संभावे खेत में, लड़वाबा में हाथ।।
रुधर धार घावां बहै, रंगिया भड़ां दकूल।
जाणक रुत्त बसंत में फूल्यो तरु केसूल।।
झड़तां देखे खाग झड़ भाखै मुख चन्द्रभाळ।
सिर तो दो भड़ साबतो हुं करस्यूं रुंडमाळ।।
धारण मुँडमाळा गळे साबत मिळै न सीस।
हड़-हड़ कर तीनू हंसे, गंगा सरप गिरीस।।
सिर तूटो कर कट्टियो धुकै हुतासण धूत।
प्राण जिते धड़ नह पडै रण घूमै रजपूत।।
घुरै त्रंम्बाला वीर रस माँड़े पग मजबूत।
पग-पग पर लोथा पड़े रूठै जद रजपूत।।
साथी कट जावै सरब एकळ रहै अभूत।
घावां छक घूमे घड़ा रोके खळ रजपूत।।

४. भक्ति काव्य:- इस काल के अधिकांश भक्त कवि फुटकर हैं जिन्होंने राम, कृष्ण, इन्द्र, रामदेव आदि देवी-देवताओं को आलम्बन बनाकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। शिव एवं शक्ति काव्य के रचयिता इस काल में भी हुए हैं। नीति एवं उपदेशात्मक उक्तियाँ तो अनेक कवियों ने कहीं हैं जो उनकी धर्म-परायणता की सूचना देती है। इस प्रकार आलोच्य काल का भक्ति-काव्य पूर्व परम्परा का ही एक विकसित रूप है। यह सर्वाधिक मात्रा में उपलब्ध होता है।

राम-कृष्ण आदि देवताओं के चरणों में काव्य-पुष्प चढ़ाने वाले कवियों में सम्मान बाई, भीखदान, ऊमरदान, राधवदान, जुगतीदान सांदू, पनजी गाडण, सादूळदान, हमीरदान, अमरसिंह देपावत, माधवदान उज्वल, हरदान गाडण, गणेशदान रतनू एवं रामदान बारहठ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सम्मान बाई कृत ‘कृष्ण-बाल-लीला’, ‘सोळे’ (वैवाहिक गीत) एवं ‘भक्त चरित्र’ भक्ति की उत्कृष्ट रचनायें हैं। ‘कृष्ण-बाल लीला’ में कृष्ण की बाल-लीला संबंधी पद (गायन) हैं। ये पद भिन्न-भिन्न रागों में हैं जिनकी गणना करना कठिन है। हिन्दी संत-कवियों की प्राय: सभी विशेषतायें इनमें पाई जाती हैं। बाल-लीला का तो बड़ा ही अनूठा वर्णन किया गया है। ‘सोळे’ में विवाह के अवसर पर गाये जाने वाले गीत हैं। इनकी संख्या भी सैकड़ों है। इनमें राजस्थानी संस्कृति का सच्चा चित्रण हुआ है। राजस्थान में विवाहोपरांत वर-वधू के हाथ-पैरों में बँधे डोरे परस्पर उनसे ही छुड़वाये जाते हैं। इन डोरों सम्बंधी गीतों में राम-सीता का यह गायन कितना अनूठा है ?-

मिथिलापुर री कांमणी रेसम गांठ घुळाय।
जद चतुराई जांणस्यां खोलो की रघुराय।। कुंवरी रो डोरो री।।
मिथिलापुर री कांमणी फिर-फिर बोल सुणाय।
कांकण नहीं खूटसी नहीं धनुष रघुराय।। छिनक में तोड़ो री।।
रूप देख आणंद भयो तरक करत श्री बांम।
कर में कर सोहै नहीं तुम हो तन के स्याम।। सिया तन डोरो री।।
हम ही बतावैं लाडलै खोलन एक ऊपाय।
कांकण जद ही खूटसी, दांन करो थांरी माय।। पिता कर न्हौरो री।।
कौसिक सुख (मख) पूरण में मारें असुर अनेक।
धनुख तोड़ सीता वरी रखी रजक री टेक।।भयौ अब मोड़ौ री।।
दीन ‘समनी’ की विनती दसरथ राजकुमार।
भगति दान मोहि दीजियो देत असीस अपार।।

‘भक्ति चरित्र’ में सवैये हैं। प्रत्येक भक्त-चरित्र की घटना के अन्त में एक सवैया ऐसा रचा गया है जो भौतिक शरीर पर घटित होता है। स्फुट पद-रचना का यह एक उदाहरण देखिये जिसमें भगवान का आह्वान कर कवयित्री ने अपने पति की प्राण-रक्षा हेतु प्रार्थना की है-

अब हरि ! आवोजी भीड़ पड़ी!
भीड़ पड़ी राणी रुकमणी में जिण प्रभु आप बरी।
भीड़ पड़ी द्रोपद तनया में साड़ी अनन्त करी।।
भीड़ पड़ी प्रहलाद भगत पै खंभ में देह धरी।
भीड़ पड़ी जद सब पंडवन में रण में विजय करी।।
कहत ‘सम्मान’ सुणोजी निरंजण दुखिया पुकार करी।
भीड़ पड़ी हरि! मो में अब जब है क्यूं देर करी।।

भीखदान को नश्वर जीवन में एक मात्र ईश्वर का ही भरोसा है अत: वह उसके नाम-जप पर विशेष बल देता है-

आँखड़ियाँ छती मती हो आँधो, गोविन्द भज रै गैला।
दीनानाथ पूछसी जिण दिन, कासूँ जाब करैला।।
पहले नह भजियो परमेसर, पछै घणो पछतासी।
कदेक काळ अचानक कपटी, होळावा ज्यूँ आसी।।
लेखो रती-रती रो लेसी, खाँवँद जको खरी को।
लाठी लियाँ बहै छै लारै, शात्रव काळ सरीखो।।
साँस उसाँस राम नै सिंवरो, समझे ऊँडो सोचो।
करताँ जतन जावसी काया, भीखा किसो भरोसो।।

‘ईश्वर स्तुति’, ‘ईश्वरोपासना’, ‘भजन की महिमा’, ‘चेतावनी’, ‘विलाप-बावनी’, ‘संता री महिमा’, ‘वैराग्य वचन’ एवं ‘धर्म्म कसौटी’ रचनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि ऊमरदान एक उच्चकोटि के भक्त थे। इनमें भक्ति, ज्ञान एन सदाचार के तत्व छिपे पड़े हैं। कवि इस निखिल सृष्टि में जिधर देखता है उधर एक उसी विराट स्वरूप की छाया दिखाई देती है-

तुं हीं माता ताता बहिन निज भ्राता भल तुं हीं।
तुं हीं दाता खाता अवल अनदाता बल तुं हीं।।

ईश्वरोपासना में नाम-जप का विशिष्ट स्थान है। भक्त के लिए भगवान का भजन ही सर्वस्व है-

अथ ओमकार, अक्षर उचार। निस दिवस नाम रट राम-राम।
द्वै सुलभ द्वीप, श्रद्धा समीप। रुचि ह्वे सु राख, दुहुँ दिव्य दाख।
मम इष्ट मिष्ट, आदर अभिष्ट। महिमां मनोग्य, जप जपन जोग्य।।

मनुष्य की सारी आयु विषय-वासनाओ में व्यर्थ नष्ट होते देखकर कवि ने उसे चेतावनी दी है-‘समज मन आयू बीत गई सारी, तें करी न भली तिहारी। ‘ शुद्ध ज्ञान के बिना यह कठिनाई दूर नहीं हो सकती। इसके लिए संत-पुरुषों के प्रवचन अत्यंत कल्याणकारी होते हैं अत: उनका सत्संग अनिवार्य है। धर्म की कसौटी तैयार करते हुए कवि ने ऊँच-नीच के भेद-भाव को मिटाकर सच्चे मन से ईश्वरीय भजन करने का उपदेश दिया है-

उंच नींच अन्तर नहिं एको राम भजे सोइ रूड़ो,
परमेश्वर ने नहीं पिछाणें चार बरण में चूड़ो।
आतम अन्तर सार अहर निस तार निरन्तर तोफा,
पांणी पाहण में परमातम बाहर ढूंढत बोफा।
जोग जुगत जगदीश्वर जपणा अपणां जन्म उधारे,
ऊमरदान अनुपम आशय विरला बात विचारे।।

अध्यात्मवाद के ऊँचे धरातल पर खड़े होकर जब कवि की दृष्टि रईसों की धुड़-दौड़ पर पड़ती है तब वह उस पर चुटीला व्यंग्य करने लग जाता है-‘मूढ़ मन क्यूं घुड़ दौड़ मचावे, खाली गोता खावे। ‘ इसी प्रकार राज्य-दरबारों में शतरंज के खेल को देखकर कवि ने जिस रूपक की सृष्टि की है, वह सर्वथा दृष्टव्य है। एक ओर लाल सेना तथा दूसरी ओर पीली सेना डटी हुई है। लाल सेना में जीव स्वयं एक राजा, वैराग्य एक वजीर, ज्ञान व विचार दो ऊँट, उद्यम व पुरुषार्थ दो घोड़ा, शील व संतोष दो हाथी और अशुभ कर्म आठ पैदल हैं। दोनों ओर भीषण-संग्राम छिड़ा हुआ है किन्तु क्या युक्ति के बिना यह जीवन की शतरंज जीती जा सकती है?

जुगत बिन सतरँज जीत न जानी। आतम मूढ अज्ञानी।।टेर।।
चोसट खण रो घर रचवायो, तामें सेन सजानी।
पेदळ, घोड़ा, ऊंट, अनेकफ, मँड्यो जुद्ध मेदांनी।।
उततें फौज अरी की आई, इततें अपनी आनी।
कोपे सूर दोऊ जय कारन, भिरे महा अभिमानी।।
मन मुसकाय खेत के माहीं, बोल्यो मोटी बानी।
चंगी चाल चाहकर चूक्यो, गढ़ नँहँ सज्यो गुमानी।।
लागी फेट किस्त की लखिये, हुई इते बड हानी।
तीखे पग को एक तोरड़ो, कियो प्रथम कुरबांनी।।
दूजो ऊंट मर्‌यो विन दारू, जुगल अश्व कट जानी।
उडती किस्त लगी इक अबकी, धूर करी रजधानी।।
उजीर को एरे कर आतर, कातर टाट कुटानी।
वीती बात पर्‌यो अरि बस में, पीछे लगे पछतानी।।
ऊमरदांन विवेक बिना बषु, पेदल खूब पिटानी।
बुरद भई न भई चोमोरे, प्याद मात भई प्रानी।।

कवि राघवदान कहते हैं कि हे माधव! किसी पति के जीते जी उसकी पत्नी का हरण न करना। तुम्हें वे दिन खूब याद होंगे जब सीता-हरण के अवसर पर तुम बिलख-बिलख कर रोये थे-

कंत पैहला कामणी, माधव मत मारैह।
रावण सीता ले गयो, वै दिन चीतारैह।।

जुगतीदान सांदू का भक्त-हृदय राम-कृष्ण का भेद-भाव मिटाकर प्रभु-चिन्तन में दत्तचित्त है। ‘नाम माला’ एवं ‘करुणा इकीसी’ से इस कथन की पुष्टि होती है।

‘करुणा इकीसी’ का यह उदाहरण देखिये-

प्रीत रखूं सोई आंतरो पावत, भ्रात को नेह दिखावत नूरी।
सेंण हूता सोई होयगा दूसरा, भेळप नाम रही जूं बंधूरी।।
जेंण में फेर अनाज न नीपजै, पेट की दाहना लागत पूरी।
राम कृपाल रखो कर रावळो, हूं सरणागत तूझ हजूरी।।
बेर ही बेर पुकार सुणावत, सांवरा दास की खास सुणीजै।
मो निरधार निरास अनाथ की, कृष्ण सदा सुभ स्याय करीजै।।
देर कियां ईण बेर दुखी अत, छिन ही छिन में घट भीतर छीजै।
पार उतार जदुपत पांमर, राख लजा कदमा रख लीजै।।

कवि ने हरजस (पद) भी लिखे हैं जिनमें राम के चरणों में चित्त लगाकर आवागमन के चक्र से मुक्त होने का उपदेश दिया गया है-

मनारे रांम चरण चित लाय जिण सूं आवागमण मिट जाय।।
मात पिता बंधव सुत धरनी, सब स्वारथ रा सीर।
धरमराज रा दूत ग्रहेला, कोई न आसी भीर।।
मोह ममता में छक मत रहियौ कोई न चाले साथ।
नाम लियौ सोई संग चलेला जीव अकेला जात।।
कठण पंथ को चलणौ हे पंछी, फेर ऊवांणै पाव।
जमरी मार उबारण हांरौ, सायब नाव उपाव।।
हाथ दियौ सोई खावन देसी तन ओढन पन पाव।
जुगत भणै सुण नाथ अजोनी चरण सरण रख पाव।।

पनजी गाडण ने ‘सौ सीख’ नामक गीत में इसी भाव को यों प्रतिपादित किया है-

मोटी सीख कहूँ भल मानो, काम क्रोध मद लोभ निकास।
राम नाम निस दीह रटीजै, पनां जेम छूटै जम पास।।

सादूळदान महडू को एक भगवान का ही आसरा है-

निराकार दा नाम संवारदा सांझ मंझयान हा मांझ ही बक्कना है।
इय फैल फिजूर सै छोड परा दीदार दा दोसत दक्कना है।।
किरतार दा चित्त उचार दा क्या तबियत्त नबी निज तक्कना है।
सादूळ सरासर मान सही, यक रब्बदा आसरा रक्खना है।।

कौन कह सकता है कि बर्षा होगी या नहीं? यह एक ईश्वरीय रहस्य है। इसके बिना मनुष्य को अन्न-जल नहीं मिलता और जीवन-जीवन नहीं रहता। कवि ने इस महत्व को समझा है। हमीरदान ने इन्द्र का आह्वान करते हुए यह मंगलकामना की है-

घणा बणावौ वादळां रूप चौवड़ी रचावों घटा।
छलावौ तळावां, नदी हलावौ अछेह।।
पलावौ पवंन हमै प्रघळा करावौ पाणी।
महाराज इन्द्र आवौ बरस्सावौ मेह।।
बिराजै अंबरां गाज सेहरां वळक्के बीजां।
खळक्के ताल रा सीख पालरां रा खाळ।।
अन्नचरां जळच्चरां थलच्चरां थारी आस।
सुरांपती कीजै धरा ऊपरै सुगाल।।

माधवदान उज्वल रामदेव के दर्शन से गद्‌गद् हुए हैं और इस भक्ति-भावना का प्रदर्शन उन्होंने ‘रामदेवजी रा कवित छपै’ में किया है, यथा-

पिंड तगा सह पाप, दूर ह्वै कीनां दरसण।
चिंता रहे न चित्त, पाव जिन कीना परसण।।
व्यापै कदे न व्याधि, बाध नह ह्वे जग बंधण।
समरन कियो सदेव, ग्रहे नह देह रु गंधन।।
कलिकाल विघ्न व्यापे न कछु, साचो सतगुरु सेव रै।
रामेण कवर अजमाळ रै, दरसण कीनां देव रै।।

हरदान गाडण कृत ‘अरज बहोत्तरी’ भक्ति की सुन्दर रचना है जिसमे परम तत्व को नाना प्रकार से समझाया गया है, यथा-

धिन तोने मोटा धणी, खोटा दूसरां खाय।
भगतां तोरा भांजणा, रख नित ओटा राय।।
भांण धड़ै चवदै भुवन, पल-पल में परचंड।
हुवै मिटै सब हंस ही, सामंद रहो अखंड।।
जाणै कुण जगदीस वर, राज तणी तत राव।
जद परळौ होवै जरी, मेरु कठै समाव।।
चार असी नै चूणही, पूरौ आप अमाप।
जो देवौ करणी मुजब, सुख घण बहु संताप।।
वसै सरब जीवां विचै, न्यारौ वसै निराट।
हद वेहद मांही हरी, घूम रयौ सब घाट।।
वांणी थाकी वेद, कर-कर जस थाका किता।
भगवत थारो भेद, सो कुण पावै सांवरा।।

स्व० गणेशदान रतनू सुपुत्र देवीदानजी, चौपासनी (सन् १८६१-११५० ई०) ने राम-नाम पर विशेष बल दिया है-

राम तणो ले नाम आच किनी नही आवे।
जम री जाट जरूर जका सारी टल जावे।।
दुख दुर होय जाय जबर अध चीत में जारे।
इदक सुख उपजे, बसे बैकीट बीजा रे।।
ओ नाम भगतो तणी, आवागमन मीटावणो।
कर मोड़ जीव गणपत कहे एक दीवस उड़ जावणो।।

रामदान बारहठ ने जगदम्बा, राम, कृष्ण, शिव, गणेश, पवन-सुत आदि अनेक देवी-देवताओं पर भक्ति की अनूठी रचनायें लिखी हैं। अपने समय की मँहगाई और गरीबी से संत्रस्त होकर कवि ने आधुनिक ढंग से इसके निवारण हेतु प्रभु से प्रार्थना की है-

मिटसी कद महाराज, गरीबी-गरीब निवाज।।टेर।।
मजदूरी हम दिन भर करते, मिले न सेर भर नाज।
तन ढकने को वस्त्र नहीं पावै ऐसो साज समाज।।मिटसी।।
कोई चीज हम लेही नहीं सकते, मँहगे नाज के काज।
फेमिन वर्क खुले जब तब ही, तो धींगे आडे पाज।।मिटसी।।
गऊएँ अति ही भूखें मरत हैं, मिलत नहीं तृण नाज।
दूध घृत तो देखे हमको, बीस साल हुए आज।।
राज समाज सब ही एक सो सुधरे न मोरल समाज।
रामदान कहै प्रभू नाज उपजावो, तो जावै गरीबी भाज।।मिटसी।।

सब प्रभु का रहस्य है इसीलिए काव्य में रहस्यवाद है। विधि के अक्षर
कोई नहीं पढ़ सकता। नियति अपनी डोर से विवश मनुष्य को कठपुतली की तरह नाच नचाया करती है। वह बाजीगर है, हम बंदर-बंदरिया। इस रहस्य को देशनोक के स्व० कविरत्न श्री अमरसिंह देपावत ने खूब समझा हैं। उनके ‘शैणी वीजानन्द’ खण्डकाव्य का यह अंश देखिये-

नाच बंदरिया नाच, नचावै ज्यूं बाजीगर नाच।
देख-देख करदे अणदेखी, दिल दूनियां री दूरी।।
तन नहीं नाचे नाच रही है, आ मन री मजबूरी।
नर बांदर रो भेद न कर तूं समझ जगत रो सांच।।
नाच नाचणो और नचाणों, भेद न इण में भारी।
आ थारी मजबूरी है तो, वा उण री लाचारी।।
डाल पात ने देख न, पगली जड़ ने देखरू जांच।
जड़, जंगम, चळ, अचळ सबाँरी आ बस एक कहाणी।।
कठपुतळी जों नाच रह्या है, परबस जग रा प्राणी।
देख्या कुण पगली, दुनियां में विधि रा आखर बांच।।
नाचे निरबळ, सबळ नचावै, दुनिया में आ देखी।
एक-एक सू सबळ, अबळ है, पण म्हैं परतख पैखी।।
दिल मोटो दरपण दुनिया रो समझ सके तो सांच।
बंदरिया नाच, बंदरिया नाच, नचावै ज्यूँ बाजीगर नाच।।

शिव एवं शक्ति की उपासना करने वाले कवियों में शंकरदान सामौर, हिंगुलाजदान, गिरधारीदान गाडण, पाबूदान आसिया, उदयराज उज्वल, जुगतीदान सांदू, बलवंतसिंह, बखतराम, मुकनदान खिड़िया, मुरारिदान कविया, यशकरण खिडिया, हरदान गाडण, धनेसिंह एवं बद्रीदान गाडण के नाम नहीं भुलाये जा सकते। शंकरदान रचित ‘शक्ति सुजस’, ‘साकेत शतक’ एवं ‘भैरवाष्टक’ भक्ति के उत्तम ग्रंथ हैं। ‘शक्ति सुजस’ में भगवती के विभिन्न स्वरूपों का डिंगल गीतों में भव्य चित्रण है। कई गीत चारण कुलोत्पन्न देवियों हिंगुलाज, आवड़, राजबाई, अन्नपूर्णा, करणी आदि के हैं जो बडे ही सबल बन पड़े हैं। ‘साकेत शतक’ में उर्मिला के त्याग के महत्व पर राष्ट्र-कवि मैथिलीशरण गुप्त से भी पूर्व विशेष बल दिया गया है। कवि यहाँ तक कह देता है-

तुलसी धिन-धिन तोय, रची सकल मानस रमण।
महा अंचभो मोय, उर्मिल त्याग न औळष्यो।।

‘भैरवाष्टक’ में भैरव की डिंगल गीतों में वन्दना की गई है। उदाहरण के लिये यहाँ ‘शक्ति सुजस’ का यह गीतांश दिया जाता है-

लीधां खगेस ननेस हंसू गजूं बाज म्रग लीधां, मूसो मोर लीधां सुकूं पेबूं स्वांन मैक।
पालखी बिवाण रत्थ चित्तु मिन्नूं सूर चहूं, बाहण मैकूं अठारों ले चलै चण्डी बैक।।
सातधंके तमे लीळंग, दंती हय सारंगी साथ, ऊंदर केकी तोता चात्रज भूसै सीसा औल।
सुब्बे बोम चल्ले धूरे मत्रु मंजर बराह सिंध, हाकलै नो दूण हेकां भवानी हारौल।।
कासपी भ्रकेस चक्रंग गहीर तुरंग कुरंग, काबा कुंभ कीर बल्बे लाहोरी काळेस।
डंडी सुरंग ह्यण्डो पैड़ें दिल्लुं बिल्लूं सूकर डंकी, दसे नो दाकले मुखां ईसरी दनेस।।
तारक्ख सांडेस मुराल नाग हय वाता तेज, ओ मंखी कळापी चंची बूंदि खरूं झोह।
का-डोळी प्रेषती खोळी लहरी लिक्का क्रोड कंठी, उभय दूण नोखटां बकारै देवि ओह।।

हिंगुलाजदान ने करणी माता के विषय में यह गीत लिखा है-

करना दे कई बार, मन मांही कीधो मतो।
हुकुम बिना हिक बार, देशांणो दीठो नहीं।।
जिण दिन ओयण जाय, श्रवणे बाजा साम्हलूं।
सो दिन धिन सुरराय, मह ऊगो मेहाश दू।।
दिन पलटै पलंटे दुनी, पलटै सोह परवार।
मेहाई पलटो मती, बाई थे उण बार।।

गिरधारीदान ने जैसलमेर भाटियों की कुल-देवी सांगीयोजी के सवैये बना कर अपनी श्रद्धा-भक्ति प्रदर्शित की है। एक उदाहरण देखिये-

आद जुगाद दुर्गा तूं आपै तु गवरी हिंगलाज कहाई।
तुं करनी देसोण धरातप बेचर तु तम राजल बाई।।
सेणल तुं जुडिये पर सोवत मात तु आवड़ मोमड़ियाई।
मेपत ज्वार मनो सुख मांगीयो सांगीयों जैस समेर सहाई।।
चालक नेचीय देवल चामण्डवाडी गोताबर इंदो वदाई।
पात कितों दुख दालद पालण राजत मालण तुज बीराई।।
वाँकल तुं संचाय वीरोवड ओर बीलाड़े तापत आई।
में पत ज्वार मनो सुख मांगीयो सांगीयो जैसलमेर सहाई।।

पाबूदान ने ‘करनल सुयस प्रकास’ में करणी माता का स्तवन किया है। कहते हैं, कवि ने करणीजी से प्रार्थना की कि यदि मुझे पुत्र मिल जाय तो उसका नाम करणीदान रखूँगा और एक ग्रंथ की रचना करूँगा। कवि का मनोरथ सिद्ध हुआ (१९०८ ई०) और उसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दिखाई। इस देवी को लक्ष्य करके आलोच्य काल के अधिकांश कवियों ने पद रचना की है। स्थान के अभाव से यहाँ कतिपय चुने हुए कवियों के उद्धरण ही दिये जा सकेंगे। उदयराज उज्वल ने माँ करणी का माहात्म्य इन सोरठों में गाया है-

हरणी विपद हमेश, भरणी संपत भांणवां।
करणी मेट कळेश, तरणी लोकां तीन री।।
चारण सदा निचंत, जग पांणां जगदम्ब रै।
करणी सफळ करंत, आछा कारण ऊदळा।।

जुगतीदान सांदू ने करणी माँ पर अनेक कवित्त लिखे हैं जिनमें से एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है-

रंक करावे राव राव तन रंक कराणी।
अगति टाळण आप दखां तुंही मोख दिराणी।।
इष्ट रखावण आप चालवड़ सिस्ट चलावे।
मनछा भोजन मात कृपा कर तूंज खिलावे।।
आपरौ जाप जपतां ईता, सगती कारज सारिये।
करनला मात जूगतो कहै, राय देसांणे तारिये।।

बलवंतसिंह ने भगवती करणी की स्तुति करते हुए कहा है-

करनी कर वेग त्रिशूल गहो, अति आरत भारत दुःख दहो।
अभिधा तव ‘शक्ति’ सुसत्य करो, निज भक्तन में पुरुषार्थ भरो।।
हम चारन हों अरि जारन में, अगुआ निज देश सुधारन में।
जननी दृढ़ चित्त हमें करिये, समयोचित भाव हृदय भरिये।।
चौ-सठ्ठिन को संग झूल चढ़ा, भव मार उतारन आच बढ़ा।
पहिले समही हमको फिर से, कर दे जगदम्ब गुणा कर से।।

वखतराम की प्रार्थना इस प्रकार है-

सुणे म्हारी अरज बीकाण वाळी सगत, बार मत लाय रे बड़ा करणी।
आवरे आव थळवाट सूं ईसरी, करूं फरियाद फरियाद करणी।।
कळा साची सगत तूझ घटते कळू, भांजवा भीड़ तुइज भुजाळी।
बगतियो पुकारै रात-दिन बीसहथ, वाग चढ़ आवरे मेहावळी।।
खड़ग तिरसूल बह झूल लीधां खड़े, सांकड़े उबेलण बड़ा सेवी।
धरा आकास वचन को तो वण धणी, दानपुर तखत सूं आव देवी।।

मुकनदान खिडिया रचित ‘विनय बत्तीसी’ शक्ति-पूजा की अनूठी रचना है। एक उदाहरण देखिये-

थेटू मैं थारोह, कियौ भरोसौ काळका।
सगती दे सारोह, बणे जठा लग बीसहथ।।
धाबळियाळी धाय, अरज करूं छूं आपने।
आय सके तो आय, वणे जठा लग बीसहथ।।
अंबा कर-कर याद, जीबड़िया छाला जम्या।
सेवग रौ सुण साद, आई क्यूं नीं ईसरी।।
पूजी नह पारवांण, देवी जांण पूजी दुरस।
अब तो छै तो आंण, जेज न कीजै जोगणी।।

मुरारिदान कविया ने माँ करणी की आराधना में यह गीत लिखा

कूक जन अवर किण सामनै करै तो, ध्यान कुण धरैलो और धरणी।
हरैलों आप बिण कूण दुख हे ववा, कर्‌यो नँह सरैलो विळम्ब करणी।।
निहारे दुश्मणाँ करण बळ नाशरो, दुरावण आसरो अन्नदाता।
आपरो मैं लियो जब अति आसरो, मेटजे दासरो कळेस माता।।
सेवगाँ सगापण सिवा सुख साजरी, जगत सब रावरी बात जाणै।
कथै कवि ‘मुरारो’ करण सिध काजरी, आजरी बखत मत जेज आणै।।

हरदान गाडण की स्तुति इस प्रकार है-

देवी दढ़ाळी कोप काळी खळां जाळी तूं खरी।
अमा उताळी तीज ताळी ह्वै दयाळी तूं हरी।।
विघनां वढ़ाळी गजब गाळी है सिगाळी तूं हरै।
मालण बिराई महंमाई सुरराई तूं सिरै।।
हरदांन बेलो सुणे हेलो पांण झेलो आप ही।
जगतंब मीजे महर कीजे स्याय रीजे तूं सही।।
वसु दीप साता वधी वाता ध्यांन माता को धरै।। मालण….

धनेसिंह के इस गीत का भाव भी यही है-

सदाई अरज सुरराय मो सांभलो, कृपा कर अंबका उछब कीजे।
सगत दिन रात हूं भजूं तोय भाव सूं, दुथिया पुतर रो दान दीजे।।
विनती क्रपा हर करे करे नित भवानी जगत त्रइ लोक में जोत जानी।
इस्ट सुभ आपरो थेट लग आद सूं, बदाइ बंसरी बाक बानी।।
अराधि माल री भदोरे आज दिन, सिंवरिया रेणवां काज सारे।
दिखावौ मनैं दरसाव नित दया कर, मात बढ़ आसरो सदा मारे।।
इळा रिव जिते अकड तूं ईसरी, मात तोय सिंवरियां रिजक पावे।
अमर सुत धना ने समापो ईसरी, ग्यांन सूं चहुं चख सुजस गावे।।

और बद्रीदान गाडण ने जगदम्बा माता की महिमा में लिखा है-

भेद न पूत कपूताँ भाखै, राखै निस वासर रखवाळ।
मूरख सुत तोसूँ मुख मोड़ै, खिण भर तूँ छोडै न खयाल।।
चित में हूँ नित की न चितारूँ, धारूँ नँह विध सूँ कुछ ध्यान।
साँचो करम कदे बित सारू, नँह कारूँ इसडो अज्ञान।।
तो भी भीड पड्ंया जगतम्बा, अम्बा तनै करूँ जद याद।
गजरी बेर हरी ज्यों भागै, माता नँह त्यागै मरजाद।।

नीति एवं उपदेशात्मक काव्य रचयिताओं में सर्वश्री गणेशपुरी, रिडमलदान, हरसूर, बक्सीराम, ऊमरदान, सुजानसिंह, सौभाग्यवती (प्रभाबाई), वेळुदान लालस प्रभृति कवियों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। गणेशपुरी कृत ये दोहे अनुभवपूर्ण हैं-

नर जिण सर ग़ालिब नहीं, दुसमण रा सो दाव।
बिन पढियाँ ही ”बाँकला”, बैपढ़ियां रा राव।।
जवर विरोधी अगन, जळ, ले निज काज लुहार।
जेम विरोधी मन्त्रियाँ, सुपह काज ले सार।।
कतरण, सीवण, केबटण, ले चित दरजी दौर।
रजधानी तम्बू रचै, वह नर नायक और।।
ज्यौं भ्रत अपने आन की, रखे परस्पर टेक।
त्यौं सितार के मेळ ज्यौं, प्रभु हित मैं है एक।।

कविवर रिडमलदान सांदू ने प्रसिद्ध डॉक्टर शिवदत्तजी उज्वल के सेवक श्री आईदान को सम्बोधित कर कतिपय नीति विषयक दोहों की सृष्टि की है, यथा-

टळसी विघन तमाम, मन वचन कारज सुफल।
लीजे पहली नाम, एक रदन रो आदिया।।
मनो अणावे मोद, विध-विध चारण वरण ने।
उजळियो री ओध, आछी सबसूं आदिया।।

हरसूर ने कलयुगी मनुष्य को लक्ष्य करके यह गीत लिखा है-

कुळजुग रा मिनख दिये दुख काया, माया संघ लगावै मोह।
चित पर रहै वादळां छाया, जाया आव घटै इम जोह।।
साचो कांम करै दिन सारौ, खावै कूड़ न पौढ़े खाट।
अनड़ां पणंग पड़ै धर आयां, वेळा इती चालणौ वाट।।
खावौ माल भलौ जस खाटो, द्रिग पाटौ मत बांधौ देख।
घोड़ सराड़ आव रौ घाटौ, लिखिया इता विधाता लेख।।
कव हरसूर कहै विप काचौ, साचो नांम धणी रौ सोय।
मांनव पलम समझ रे मूरख, तवा न मिळणी पाछो तोय।।

जीवन की नश्वरता को देखते हुए बक्सीराम ईश-भजन का उपदेश देते हैं–

थावी केतली नर ऊमर थारी, भाखै-मुख असहा मुख भारी।
बचस्यो नहीं आवियाँ बारी, गावो रै गावो गिरधारी।।
बांटो वित्त आपणै बारै, लाछ नहीं हालैली लारै।
थिर अै दिन रहसी नह थारै, तूँ नर ईशर क्यों न चितारै।।
यूँ तर-तर पड़ता दिन आसी, जीहा कर पद चख थक जासी।
पाकड़ जम घातैला पासी, पापी इण दिन नै पिछतासी।
बपु माया नै जाण विराणी, पांव न धर खोटी दिस प्राणी।
रघुवर साचो दास रसाणी, बोल बगसिया अमृतवाणी।।

ऊमरदान मनुष्य को उपदेश देते हुए कहते हैं-

बींछू बानर ब्याल विष, गंडक गर्दभ गोल।
अै अलगाहिज राखणो, ओ उपदेस अमोल।।
घन्धो करणो धर्म सूं, लोकां लेणों लाब।
पइसो आवे प्रेम सूं, दबके देणों दाब।।

सुजानसिंह रचित ‘सुजान शतक’ नीति के दोहे-सोरठों का अच्छा संग्रह है जो साक्षी रूप में भी व्यवहृत होता है-

निर्मल चित्त हरिनाम, परभातै लीजे प्रथम।
कीजे ग्रहचो काम, नेम धरम असनान नित।।
सूतो जहां समाज, कलम संभाळो तहां कवि।
कर पर सेवा काज, रखो लाख निज देश री।।
बीज न इयां बडोह, खड़ो विरच्छ करदे खटक।
बीज इयांह बडोह, नवा बीज निपजाय दे।।
दोय लडन्ता देख, जोड़ न मोटा री जुवो।
पथ सत पुरषां पेख, राड़ मिटा राजी करो।।

सौभाग्यवती (प्रभाबाई) का नीति विषयक यह सोरठा देखिये-

औरां री औलाद, कर अपणी राखे कने।
आवै न पीहर याद, माता सम सासू मिले।।

वेळुदान लाळस ने इस काया को कच्चे घड़े से उपमित किया है-

एक समै जम आवसी, लेसी जीवण लूट।
काया काचै कुंभ ज्यूं, फटकै जासी फूट।।

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