चारण साहित्य का इतिहास – सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान)

५. श्रृंगारिक काव्य:- इस काल में आकर श्रृंगार रस की धारा विकास की ओर उन्मुख हुई और उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की रचनायें होने लगीं। सूर्यमल्ल, शिवबख्श, ऊमरदान, फतहकरण, किशोरसिंह, अमर सिंह देपावत प्रभृति कवियों के मुक्तक काव्य में यह प्रवृति पाई जाती है। सूर्यमल्ल ने करुण घटनाओं को सँजोकर वियोग का मार्मिक चित्रण किया है। नायक की युद्धवीरता में श्रृंगार का पुट देना उनके जैसे पहुँचे हुए कवियों का ही काम था। एक युद्ध के बाद ज्योंही प्रियतम के घाव भरने को आते त्योंही दूसरा युद्ध छिड़ जाता। इस प्रकार योद्धा के स्वस्थ होने पर नायिका यौवन का उपभोग करने के लिए अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करती ही रही। जीवन बीत चला पर वह अवसर नहीं आया-

किण दिन देखूं बाटड़ी, आतां पड़वै तूझ।
घाव भरंतां आवगो, बीत्यो जोबन मूझ।।

राजपूतों में विवाह के अवसर पर नैहर में ही एक दिन सुहाग रात मनाने की प्रथा है। नायिका को केवल यही नसीब हो सकी। घर आने पर तो बराबर दुगुना दुहाग ही प्रतीत हुआ क्योंकि पति सदा रण-निरत रहता-

हेली पीहर देखियौ, एकण रात सुहाग।
घर आयाँ धण जाणियौ, दूणा दूण दुहाग।।

वियोग-वर्णन में शिवबख्श सिद्धहस्त हैं। रीति काल के अंतिम चरण के कवि होने से प्राचीन काव्य-प्रथा से बच नहीं पाये। उन्होंने अन्य कवियों के सदृश षड्ऋतु, नायिका-भेद, अलंकार-शास्त्र, छंद-शास्त्र आदि विषयों को साधन न मानकर साध्य माना है। इन पर लिखे बिना जैसे कोई कवि होने का अधिकारी नहीं। सावन के महीने में वियोगनी नायिका पर बादल विरह का दल लेकर धावा बोलने आया है-

वादळ नहिं दळ बिरह रा, आया मिलि अप्रमांण।
सोर सिखंड्‌या नहिं सखी, जोर नकीबां जांण।।
जोर नकीबां जांण, घोर घंणरी नहीं।
ठई त्रमागळ ठोर, मदन जीपण मही।।
संपा नहि समसेर, कढ़ी नृप काँमरी।
अबकी जीवण आस, बियोगण बााँमरी।।

घटाओं के उमड़ आने पर सारा संसार, चर-अचर, सभी खेल रहे हैं। अभागिन है तो अकेली वह-

घूंमी घंण हर री घटा, बिरछां लूंभी बेल।
नराँ बिलूंमी नारियाँ, खरो हजूमीं खेल।।
खरो हजूमीं खेल, केल थिर चर करै।
पाज सरोवर पेल, भली छबि सूं भरै।।
मिली धरा मधघवाँण सरित संमदाँ चली।
अली रही मैं आज, अभागण एकली।।

मोर एवं पपीहे का स्वर उसके घावों पर नमक छिड़कता है। वह पपीहे से पीव-पीव न करने की प्रार्थना करती है-

सोर मोर सुणताँ सखी, जोर दुखी छै जीव।
बैरी तूं तो बक सिरे, पपिहा बोल न पीव।।
पपिहा बोल न पीव, कहै मैं के कियो।
मारी नैं मत मारि, हिलोला ले हियो।।
लागे दाझै लूंण, जळण व्है जीव रो।
बैरी बोल न बोल, पपीहा पीव रो।।

और सावणी तीज के दिन तो यह विरह अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है-

मन भाँमण साँभण मंहीं, कीधो आँमण कोल।
तरसाज्यो मत तीज नैं, बलंम निभाज्यो बोल।।
बलंम निभाज्यो बोल, बचाज्यो विरह सूं।
पिय बिंण रहसी प्राण, तीज किंण तरह सूं।।
दिल मति धारो देर, पधारो पाँम्हणा।
समझूँ जणाँ सनेह, अचाँणक आँम्हणा।।

यह बात नहीं कि कवि ने संयोग-वर्णन न किया हो! ‘हिंडोला-वर्णन’ में चारों ओर आनन्द ही आनन्द छाया हुआ है-

ऊँचो अंब शोभा अधिक, रेशमरी तणियाँह।
झोटा दे-दे झूलवै, त्याँ चढ़ि तीजणियाँह।।
त्याँ चढ़ि तीजणियाँह, भिड़ै आय भूंम सूं।
आँब तोड़ि उण बार, लियावै लूंम सूं।।
सिर साड़ी सरकंत, तीज तिण बरगलै।
हुय अति हास हुलास, मोह फंदा मलै।।

ऊमरदान की रुचि श्रंगार की ओर नहीं अत: उनके काव्य में स्वतंत्र रूप से इसका चित्रण नहीं हो पाया है। जहाँ कहीं ऐसे चित्र देखने को मिलते है वहाँ विलासिता के प्रति विरोध भावना प्रकट हुई है, यथा-

स्वतन्त्र नृत्यसाल में नितम्बिनीं नचैं नहीं।
सुहागिनी स्वराग राग रागनी रचै नहीं।।
तथुंग थुंग तत्थ थेइ ताल साजती नहीं।
बधू उमंग संग में मृदंग बाजती नहीं।।
सुरंग रंगभोमि में तरंग हे न ताँनकी।
ढमंक ढोलकी न त्यूँ घमंक घुग्घराँन की।।
छमंक बिच्छवाँन की दमंक ना दरीन की।
झमंक जेहराँन की चमंक नाँ चुरीन की।।

इसी प्रकार-

प्यारा थां सूं पलक ही, बांछूं नहीं वियोग।
उर वसिया मुहि आवज्यो, रसिया थांरो रोग।।
अंग घणां आलंगियो, अधर घराणी अैठ।
नर मूरख जाणै नहीं, पातर री आ पैठ।।

फतहकरण का उदयपुर के मनोहर घाटों पर जल भरती हुई पनिहारनियों का यह चित्र कितना आकर्षक है?-

लसै अलकैं मुख पै बल खाय, जची अलि पंक्ति कि पंकज जाय।
किधों विधुमंडल की गह कोर, कढ़ी धनकी कि लकीर दु ओर।।
लसै अलकैं मुख पैं बल खाय, जची अलि पंक्ति कि पंकज जाय।
किधों विधुमंडल की गह कोर, कढ़ी धनकी कि लकीर दु ओर।।
किधों दृग मत्त करींद्र प्रचंड, बन्यो जिनके जनु बीच वरंड।
किधों रद मोक्तिक तोलन काज, रयो बिच कंटक हैम विराज।।
कढ़ै मुख कांति इकत्रकिं होय, लगी जनु तैजस दीपक लोय।
सबै अनिभेष रहै रस छाक, निहारत नारिन के हम नाक।।
लखी कति कामिनि श्यामल चीर, सधूम कि अग्निशिखा ससमीर।
भुजंगम वेष्टित चंदन भ्रांति, किधों घन मध्य दिवाकर कांति।।
कसौटिय में कस हेम कि कीन, लसै मनु मंगल अंबर लीन।
मनो जमना जल में जल जात, किधों तड़िता घन में चमकात।।

किशोरसिंह को ‘बना’ की छवि अत्यन्त प्यारी लगती है अत: वह उस पर न्यौछावर हो जाना चाहता है-

वारी जावाँ लाल हो बना (स्थाई)
म्हे तो थाँरा डेरा निरखण आई, बारी जावाँ लाल हो बना।।
बना रो व्याघ्र-चरम रो डेरो, जिकण रो गज दो सौ से घेरो।
फिर रह्यो राती कनात रो फेरो, वारी जावाँ लाल हो बना।।
बना रे ध्वजादंड सोनारी, दंड पर पीली ध्वजा पसारी।
ध्वजा पर मंडिया कृष्ण मुरारी, वारी जावाँ लाल हो बना।।
जीवण जन्म-भूमि हित जाण, ध्वजा पर बांचे वाक्य पुराण।
उमंडियो मोद तणो महराण, वारी जावाँ लाल हो बना।।
बना री राजै रोहित गादी, सील पर बाँधी पाघ म्रजादी।
अंग पर सुद्ध केसर्‌याँ खादी, वारी जावाँ लाल हो बना।।

राजस्थानी साहित्य में श्रृंगारिक रचनाओं के अभाव को देखते हुए स्व. अमरसिंह देपावत ने अन्य भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों का अविकल अनुवाद प्रस्तुत किया। इससे सबका ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ। कवि ने सर्व प्रथम ऊमर खय्याम की रूबाइयों का सरस अनुवाद किया और इससे उसे अपार यश मिला। फिर उसने महाकवि कालिदास की प्रख्यात कृति ‘मेघदूत’ का भाषान्तर कर श्रृंगार में वियोग की प्रतिष्ठा बढ़ाई। कहना न होगा कि इसमें यक्ष की विरह-वेदना पूर्ण रूप से व्यंजित हुई है। भाषा अत्यन्त सरस एवं भावपूर्ण है। कुछ चुने हुए उदाहरणों से इस कथन की पुष्टि हो जायगी-

छळ-छळ भर्‌या पलक में आँसू, पळ-पळ हिवड़ो बहे पिघळ।
जळ बळ सजग हुई सुख सुधियाँ, देख-देख नम रा बादळ।।
हुवै सँजोग्याँ रो चित चंचळ, विषम वीजोग्याँ विरह विथा।
असह दरद सूँ मौन यक्ष री कहे नैण जळ करुण कथा।।
छोड़ साज सिणगार सीस रा धण बाँधे बेणी सुनी।
डसे हाथ बैरण नागण-सी व्यापे दिल पीड़ा दूणी।।
बण्यां मीत संजोग मिलण रो धणे हेत सूं निज कर सूं।
गूंथ सीस में विध-विध गहणा फूलां सूं बेणी सज सूं।।
दुरबळ देह अडोळी अँग-अँग झरै नैण आँसू झर-झर।
खाय पछाड़ गिरै धण सेजां छावै मुखड़ै केस बिखर।।
देख हाल इण विरहण बादळ होसी थांरा नैण सजळ।
बहे पराये दुख हुय कातर दिल सज्जनां रो मीत ! पिघळ।।

और भी-

पँच पोरी लाँबी रातडल्यां कटै किंयाँ पळ में छण में।
लाय लपट सी आ झळबळती दाह नहीं दाझै दिन में।।
चीत-चीत हिवड़ो अणहोणी पळ-पळ घणो अधीर हुवै।
मृगनैणी यूं विरह दाह में दाझै तन मन नैण चुवै।।
कलप-कलप काया आलीजी झुरझुर नैण न खोये।
धीरज धार मिळण आसा रो मन में दीप सँजोये।।
थिर न रह्या जे सुख रा दिनड़ा दिन दुखड़े रा जासी।
मधुर मिळण री सुख री घड़ियां आसी मरवण आसी।।

६. राष्ट्रीय काव्य:- कई वर्षों तक भारत भूमि पर अंग्रेज अपनी कूटनीति से आधिपत्य जमाते रहे और देश अंधकार के गर्त में धँसता ही गया किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रहने पाई। सन १८५७ ई० के आते ही समूचे देश में राष्ट्रीय चेतना की लहर दौड़ पड़ी और अंग्रेजों को निकाल बाहर करने के लिए भयंकर युद्ध छिड़ गया। फलत: राजस्थान में भी सोई हुई शक्ति जाग उठी। अंग्रेजों की संधियों में जकड़े हुए राजा-महाराजा तो उनके संकेतों पर ही चलते रहे किन्तु कतिपय राष्ट्र प्रेमी राजाओं एवं जागीरदारों ने सम्पूर्ण शक्ति के साथ विदेशी सत्ता का सामना किया। स्वतंत्रता के इतिहास में तेजस्वी आउवा ठाकुर खुशालसिंह का नाम अमर रहेगा। रावत जोधसिंह (कोठारिया) ने उन्हें शरण देकर देशभक्ति एवं सच्ची वीरता का परिचय दिया। इनके अतिरिक्त मारवाड़ के आसोप, गूलर, आलनियावास, बाजावास, लाँबिया, बाँता, भिवाळिया एवं मेवाड़ के रूपनगर, सलूंबर, लसाणी आदि स्थानों के सरदार भी अँग्रेजों के विरुद्ध थे। ऐसे समय में चेतनाशील चारण कवियों ने बिखरी हुई राजपूत शक्ति को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्र-देवता के चरणों में न्यौछावर होने की बलवती प्रेरणा दी। कहना न होगा कि अँग्रेजों के विरुद्ध वीर राजपूतों को युद्ध के लिए उत्तेजित करने में इन कवियों का योगदान रहा है। यद्यपि इतिहास में इसका उल्लेख नहीं मिलता तथापि उनकी स्फुट रचनाओं से ऐसा ही ज्ञात होता है। उदाहरण के लिए सूर्यमल्ल मिश्रण के ठाकुर फूलसिंह (पीपल्या) को लिखे हुए पत्र का यह अंश दिया जाता है-

‘ये राजा लोग देसपति जमी का ठाकर छै जे सारा ही हिमालय का गळ्याई नीसर्‌या, सो चाळीस से लेर साठ-सतर बरस तांई पाछा पटक्या छै तो भी गुलामी करै छै। पर यो म्हारो वचन याद राखोगा कि जै अबकै अंग्रेज रह्यो तो ईंको गायो ही पूरो करसी। जभी को ठाकर कोई भी न रहसी। सब ईसाई हो जासी, तींसों दूरन्देसी विचारै तो फायदो कोई कै भी नहीं, परन्तु आपणो आछो दिन होय तो विचारै और राज जिसो सुहृत म्हारे होय तो लड़ाई तरीके लिखी जावै, तींसूं थोड़ी में बहुत जाण लेसी।’

इस प्रकार अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध प्रकट करने वाले क्रांतिकारी कवियों में मोहबतसिंह, गिरवरदान, तिलोकदान, विसनदान, सूर्यमल्ल मिश्रण, नवलदान, शंकरदान, राघवदान, केसरीसिंह (शाहपुरा), नाथूसिंह, चमनसिंह, फतहकरण, हरीदान, रामलाल, उदयराज, अलसीदान रत्नू, यशकरण, साँवलदान आसिया, नाथूसिंह महडू एवं सूर्यमल आसिया के नाम उल्लेखनीय हैं जिन्होंने गदर, आउवा, सलूंबर, नृसिंहगढ़ एवं भरतपुर की गतिविधियों से प्रभावित होकर काव्य-रचना की है। इनके अतिरिक्त प्रमुख राष्ट्रवादी कवियों में हरीदान, ऊमरदान, रामलाल, नाथूसिंह, उदयराज आदि के नाम आते हैं जिन्होंने देश-प्रेम के गीत गाकर राष्ट्रीय भावनाओं का विकास किया है। अस्तु,

मोहबतसिंह के इस दोहे में अंग्रेजों के एजेन्ट का खुशालसिंह के द्वारा मारे जाने का उल्लेख है-

आउवा में बरघू बाजे, विठोरा में बांकियो।
अेजेन्ट रो शिर तोड़ ने, दरवाजे टांकियो।।

गिरवरदान ने ‘आउवा रा गदर’ नाम से नामी छप्पय लिखे हैं जिनमें खुशालसिंह के युद्ध में कूद पड़ने का वर्णन है। संदेह नहीं कि उस निडर योद्धा के हृदय में भारत को स्वतंत्र करने की उमंगें हिलोरें ले रही थीं-

सुण चांपै रच सला, मित्र परधानां मेले।
खामन्द बगसो खून, बंधो मत दुसहां बेले।।
सह मंत्री मिळ सला, थाप जुध करण थटाई।
होणहार ज्यूं होय, मिटै किण भांत मिटाई।।
भरोसे खुसाळ सक्ति भिड़ण, संभियो सगळां साथ रै।
आजाद हिंद करवा उमंग, निडर आउवा नाथ रै।।

तिलोकदान ने अपने गीत में खुशालसिंह के युद्ध-चातुर्य का ओजस्वी शैली में वर्णन किया है-

चोळ चखचूर वीरां मनां चाविया, धीट बतळाविया हियै धरिया।
सुत वगत प्रबळ तप तेज सरसाविया, मारवा आविया जिकै मरिया।।
कायरां चेत उड़ प्रेत जोगण किलक, उप्रवट भूभट विरदेत अड़िया।
जेत हर जीत पाई समर जीतियो, पांच अर असी जुध खेत पड़िया।।
रेण भरतार खुसियाळ अवचळ रहौ, बेर हर सार अण पार वीधौ।
भूसळ खळ भार संसार जस भाखियो, खुसळ हर खुसळ करतार कीधौ।।

इसी प्रकार विसनदान के गीत में खुशालसिंह एवं अंग्रेजों का युद्ध-वर्णन है-

जबर अभंग जुघ सुभट अंग कड़ां जरद्दां जड़ै, प्रगट हद राग जांगड़ौ हाका पड़ै।
धाक सुण उरां प्रसणन दिल घड़हड़ै, खाग कर तांण कित पमंग खाता खड़ै।।
खिमै कूंतां अणी गजां लंगर खळळ, भांण कर प्रगट अत तेज तन में भळळ।
दध चलै प्रलय कज बहुलै अतरदळ, कवण सिर आज री सीस दूजा खुसळ।।
फबै दळ कुंजरां सीस झंडा फरक, तुरंगां हांफ रड़ सधर त्रबंक त्रहक।
थयो रज तिमर दिगपाळ पवै थरक, रीस री झाळ किण माथ कमधां अरक।।

सूर्यमल मिश्रण स्वतंत्रता के जागरूक प्रहरी थे। इस दृष्टि से ‘वीरसतसई’ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण रचना है। इसके लिखने का उद्देश्य वीर धर्म का आदर्श उपस्थित करते हुए क्षत्रिय वर्ग को सन् १८५७ ई० के स्वातंत्र्य-सँग्राम में गतिशील करना था किन्तु उसकी विफलता के साथ ही यह भी अधूरी रह गई। इस समय समूचे देश में विद्रोह की अग्नि भभक रही थी और राजस्थान में भी इसका प्रभाव बढ़ रहा था। कवि की हार्दिक अभिलाषा थी कि कायर वीर बने और विद्रोही सेना टक्कर लेकर अंग्रेजों का तख्ता उलट दे। आरम्भ एवं अंतिम दोहों में इस ओर चतुराई भरे संकेत मिलते हैं। समय के साथ-साथ राजपूत भी बदल गया था। जन-समाज में नैराश्यता छाई हुई थी जिसे दूर करना कवि का कर्त्तव्य था। यह उल्लेखनीय है कि उसने क्षात्र-धर्म की सीमा में ही अपने राष्ट्रीय विचार व्यक्त किये हैं। वीर भावों का साधारणीकरण कराकर उसने युद्ध-प्रिय राजपूतों को राष्ट्रीय-धारा मेँ कूद पड़ने का मौन निमन्त्रण दिया है। संदेह नहीं कि राजपूत जाति के आदर्श को लक्ष्य करके कवि ने जो भाव-कण बिखेरे हैं, वे राष्ट्रीय आभा से दीप्तिमान हैं। यथा-

बीकम बरसां बीतियो, गण चौ चंद गुणीस।
बिसहर तिथ गुरु जेठ बदि, समय पलट्‌टी सीस।।
इकडंकी गिण एकरी, भूले कुळ साभाव।
सूरां आळस ऐस में, अकज गुमाई आव।।
इण वेळा रजपूत वे, राजस गुण रंजाट।
सुमिरण लग्गा बीर सब, बीरां रौ कुळबाट।।
सत्तसई दोहामयी, मीसण सूरजमाल।
जंपै भड़खाणी जठै, सुणै कायरां साल।।
नथी रजोगुण ज्यां नरां, वा पूरौ न उफांण।
वे भी सुणतां ऊफणै, पूरां वीर प्रमांण।।
जे दोही पख ऊजळा, जूझण पूरा जोध।
सुणताँ वे भड़ सौ गुणा, वीर प्रकासण बोध।।
सूता घर-घर आळसी, वृथा गुमावै बेस।
खग-धारां घोड़ां-खुरां, दाबै अजका देस।।
टोटै सरकाँ भींतड़ा, घातै ऊपर घास।
वारीजै भड़ झूपड़ाँ, अधपतियाँ आवास।।
जिण बन भूल न जावता, गैंद, गवय गिड़राज।
तिण बन जंबुक ताखड़ा, ऊधम मंडै आज।।
डोहै गिड़ बन बाड़ियां, द्रह ऊंडा गज दीह।
सीहण नेह सकैक तौ, सहल भुलाणौ सीह।।

उपर्युक्त दोहों में राज्य-क्रांति का आभास मात्र है। उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति आउवा क्रांति के समय देखने को मिलती है। सूर्यमल्ल कृत ‘गीत आउवा रो’ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है-

लोहां करंतो झाटका फणां कंवारी घड़ा रो लाडौ,
आडो जोधांण सूं खेंचियो वहे अंट।
जंगी साल हिंदवांण रो आवगो जींनै,
आउवो खायगो फिरंगाण रो अजंट।
भागे भीच गोरा सिंधांपरां रा जिहांन भाळो,
दावो तेगां झाट दे उत्तालो दसूं देस।
तीसूं नींद न आवै, कंपनी लगाड़े ताला,
कालो हिये न मावै अगंजी खुसळेस।।

सूर्यमल्ल का निम्न गीत इस बात का साक्षी है कि खुशालसिंह के सदृश नृसिंहगढ़ के चैनसिंह ने भी अंग्रेजों के साथ भीषण युद्ध किया था। धोखे से अचानक घिर जाने पर भी उसने अर्जुन का सा शौर्य प्रदर्शित किया और अंत में रण-क्षेत्र में ही सदैव के लिए सो गया-

हीकां धरै साहंसी बैरियां धू चलाया हाथ,
आहंसी नत्रीठा काछी मलाया औसांण।
पाथ ज्यूं अनम्मी खंध वंसनूं चाढियौ पांणी,
यूं पछै ऊमटां नाथ पोढियौ आरांण।
बांना अंग धारण भू जाहरां करेगो बातां,
उधरेगो हाथां दंत बारणा ऊबाड़।
उछाहां भरैगो खाग धारंगां खरेगो अंग,
बारंगा बरेगो चैन लोहड़ा बजाड़।।

नवलदान गाडण के इस गीत में भरतपुर नरेश एवं अंग्रेजों के युद्ध का वर्णन है-

….हिन्दूथांन रे अभागां…होवे फिरंगी थाटां रो हल्लो,
मन्त्र खट घाटां रो उपायो पाप माग।
भाई भड़ाँ थाटां रो हरी कां हाथ दीधो भेद,
उभा टीकां वाळे कीन्हो जाटां रो अभाग।।
माल खायो ज्याँरो त्याँरो रती ही न लायो मोह,
कुबुद्धि सूँ छायो नंही भायो रमा कन्त।
विस्सवास घाती कांम कमायो वुराई वाळो,
माजनो गमायो …………………… रे महन्त।।

शंकरदान ने सन् १८५७ ई० की राज्य-क्रांति के समय अंग्रेजों को अव्वल नम्बर का अत्याचारी, निर्लज्ज एवं मक्खीचूस तक कह दिया-

अंगरेजां जिसड़ो अवर, जुळमी मिलै न जगत में।
निचोयले माखी निलज, घरू नफै हित घिरत में।।

इस अवसर पर राजा और प्रजा को उत्तेजित करता हुआ कवि कहता है कि ऐसा अवसर हाथ आने का नहीं-

आयो अवसर आज प्रजा पख पूरण पालण।
आयो अवसर आज गरब गोरा रो गाळण।।
आयो अवसर आज रीत राखण हिन्दवाणी।
आयो अवसर आज बिकट रण खाग बजाणी।।
फाळ हिरण चूक्यां फटक पाछो फाळ न पावसी।
आजाद हिंद करबा अवर, औसर इस्यो न आवसी।।

उदयपुर के महाराणा भीमसिंह के साथ हुई संधि के अनुसार राज्य एवं जागीर के बहुत से अधिकार अँग्रेजों के हाथ में चले गये। जब संधि-पत्र रावत केसरीसिंह (सलूम्बर) के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा गया तब उसने उसे निधड़क होकर फाड़ फेंका और कह दिया कि इन हाथों में अभी तक अँग्रेजों का सामना करने की ताकत बाकी है। राघौदान के इस गीत में यह वर्णन है-

जंगी रिसाला हलंतां प्रळै, सामंद हिलोळां जेहा,
छात-रंगी हसम्मां भळंतां काळ चोट।
जोर दीधौ फिरंगी लिखायो कौल नांमौ जठै,
आप-रंगी चूंडा तें मेवाड़ राखी ओट।
धमै तोपां जिसूं अहिराट रा सिनांण धूजै,
रोक जंगां ले खोहो ओघाट रा रकत।
थें मुदेत थाट रा फड़ाया भुजां आभ थांबै,
लाट रा लिखाया मैद पाट रा लिखत।।

केसरीसिंह (शाहपुरा) प्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि एवं प्रमुख राजनैतिक सेनानी थे। राजस्थानवासियों के हृदय में स्वाधीनता की चिनगारी उत्पन्न करने का श्रेय इसी चारण कवि को है। महाराणा फतहसिंह (मेवाड़) तत्कालीन वाइसराय लार्ड कर्जन के विशेष आग्रह पर दिल्ली दरबार में सम्मिलित होने के लिए रवाना हो गये थे (१९०३ ई०)। [ हिन्दू कुल-सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना शेखावाटी के क्रान्तिकारियों को अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिये उन्हें रोकने के लिये शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूरसिंह ने ठाकुर करणसिंह जोबनेर व राव गोपालसिंह खरवा के साथ मिल कर महाराणा फ़तहसिंह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी केसरी सिंह बारहठ को दी। केसरी सिंह बारहठ ने महाराणा के नाम डिंगल में 13 सोरठे रचे जो साहित्य के साथ साथ राजस्थान के राजनीतिक इतिहास की भी निधि बने हुए हैं। ]* सरेरी स्टेशन पर महाराणा को ये तेरह सोरठे सुनाये गए। कहना न होगा कि कवि के इन प्रभावशाली सोरठों को सुनकर महाराणा दिल्ली पहुँचकर भी दरबार में सम्मिलित नहीं हुए। ये सोरठे ‘चेतावणी रा चुंगटिया’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह उद्‌बोधन देखिये-

पग पग भम्या पहाड, धरा छांड राख्यो धरम।
(ईंसू) महाराणा’र मेवाड़, हिरदे बसिया हिन्द रै।।
घण घलिया घमसांण, (तोई) राण सदा रहिया निडर।
(अब) पेखँतां, फ़रमाण हलचल किम फ़तमल! हुवै?।।
अब लग सारां आस, राण रीत कुळ राखसी।
रहो सहाय सुखरास, एकलिंग प्रभु आप रै।।
नरियंद सह नजरांण, झुक करसी सरसी जिकाँ।
(पण) पसरैलो किम पाण, मान छतां थारो फ़ता !।।
सकल चढावे सीस, दान धरम जिण रौ दियौ।
सो खिताब बखसीस, लेवण किम ललचावसी।।
सिर झुकिया शहंशाह, सींहासण जिण सम्हने।
(अब) रळणों  पंगत राह, फ़ाबै किम तोने फ़ता !।।
देखे अंजस दीह, मुळकेलो मनही मनां।
दंभी गढ़ दिल्लीह, सीस नमंताँ सीसवद।।
मान मोद सीसोद, राजनीत बळ राखणो।
(ईं) गवरमिन्ट  री गोद, फ़ळ मीठा दीठा फ़ता।।

इस विषय को लेकर नाथूसिंह महियारिया, चमनसिंह दधवाडिया एवं फतहकरण उज्वल ने भी काव्य-रचना की है। फतहकरण उज्वल ने महाराणा फतहसिंह के लिए कहा है-

माळा ज्यूं मिलिया महिप, दिल्ली में होय दाण।
फेर-फेर अटकै फिरंग, मेरू फतो महराण।।

नाथूसिंह महियारिया का यह निम्न सोरठा एवं गीत दृष्टव्य है-

।।सोरठा।।
तोलै भुज तरवार, बोलै मद भरिया बयण।
दिल्ली रे दरबार, राण फतो अनमी रियो।।

।।गीत।।
अकबर पतसाह बिचै बळ अधकै, हथनापुर दरबार हुओ।
गुणसठ साल लिख्यो मिल गोरां, हाजर सह नृप आय हुओ।।
आप तणो अनमी घर आहड़ा, कीधी घणा नरिंदा क्रीत।
जस करणो म्हारो ध्रम जाती, राजद्रोह कहसी किण रीत।।
कूरम कमध जसी गत करबा, फरबा जद लागो फिर गाँण।
डग भर भाण-हिन्दू नह उगियो, ऊ रवि उग उगियो आथाण।।
राण सरूप सकै लिख राख्यो, वो वरताव कियो जिण वार।
नह पतसाह अगै सिर नमियो, उण इकलिंग तणै ओतार।।
राण फता गौरव सह राख्यो, पातळ जसो भुजां रै पांण।
केलपुरा अनमी कहलायो, आछै छक आयो उदियाण।।

महाराणा शंभूसिंह (उदयपुर) का देहान्त हो जाने पर जब राज्याधिकार के लिए ब्रिटिश अधिकारी ने हठपूर्वक आदेश दिया तब वीर रावत जोधसिंह चूण्डावत (दूसरा) सलूम्बर ने उसका डटकर विरोध किया। इस विषय में सूर्यमल आसिया ने यह गीत लिखा है-

हूँ थपू भूप मुलक म्हारो हुकम, बराबर न पूछूं कवण बीजे।
पड़ी क्यू सलारी सूझ रख पखैरी, (थारी) लखेरी कोढ़ियां उरी लीजे।।
तस धरे मूँछ खतेस बोळै तमख, हुआ विद लेख म्हें कीध हाथां।
पौळ बाहर हमै छावणी पधारौ, वधारौ फैल किम सहज वातां।।
तवां परताप सगराम बापा तसो, समै परमाण अवसाण साजै।
तणा केहर अनम किलौ चीतोड़ रौ, (जीने) ऊजळौ दिखायो भलां आजै।।
माण रख राण जेठाण हिंदू मुगट, कथन जग जाण सैबास कहसी।
तिको कसना वतां छात जोधा न्रपत, रसासिर वात अखियात रहसी।।

हरीदान ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का स्मरण कराकर राष्ट्रीय भावना को दृढ बनाया-

आयो अंग्रेज देश रे ऊपर, भूधर दुखद भारती भू पर।
राजावांली ओढ रजाई (थने) बोहला रग लछम्मी बाई।।
सोषणिया रत हिन्द सुजावां, घोळविया भोमी खग घावां।
लच्छी लड़े लाज भूज लीधां, गोरा माँस धपाया गीधां।।
अमर कलो पाबू रण आवै, सूजो रणजी सिवा सरावे।
राजल पिरथी लाज रुखाली, हाडी पदमण आई हाली।।
रंग दिया सह झांसी रांणीं, करगी अम्मर वीर कहाणी।
दरप पातसाहां रा दळगी, रांणी जोति जोत में रळगी।।

ऊमरदान ने पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान एवं आधुनिक शिक्षा की निंदा करते हुए उससे बचने की सलाह दी है। ‘अंगरेज मुलक दाबण अडे ऐ जूवां सू आथडै’ कहकर उन्होंने देशवासियों के आलस्य की ओर संकेत किया है। अंग्रेजों की एकता और भारतीय अविद्या के लिए उनका कथन है-

मिलके लख गोरन मती एक, इत एक-एक की मत अनेक।
उत रेल तार उद्दम अपार, गौरव, इत विद्या बिन गिंवार।।

रामलाल ने ‘देश मित्र’ रचना में अँग्रेजों के विरोधियों का वर्णन किया है-

वीर रुधो बगतो विशन, निर्भय चिमन नरांण।
गोरा माण गमाणिया, भू रजथांनी भांण।।
समरथ सिवो कुसाल सी, जोरो डूँगर जांण।
गोरां मांण गमाणिया, भू रजथांनी भांण।।

राष्ट्रीय कवि नाथूसिंह ने देश के लिए बलिदान के महत्व को लक्ष्य करके कहा है-

सुत मरियौ हित देस रै, हरख्यो बंधु-समाज।
मा नहँ हरखी जनम-दिन, जतरी हरखी आज।।
सुत ! करजे हित देस रौ, झड़जे खागां-हूंत।
बूढापा री चाकरी, जद भर पाऊं पूत।।
जिण पायौ मानव जनम, फिर धन पायौ लाख।
पायौ मरण न देस हित, पायौ सरब नहाक।।
धर कज धन कज धाम कज, जस ले सीस कटार।
जे मरसी हित देस रै, बार-बार बळिहार।।
सह कुटँब रण मेलियौ, देस हेत र काज।
पोतां पोतै राखणौ, दादी चहै न आज।।

उदयराज मातृभूमि एवं उसके साहित्य के अनन्य प्रेमी हैं यह प्रेम इन शब्दों में व्यक्त हुआ है-

राजनीति रै रोग सूँ, बढै विपद जद पूर।
मेटै संकट मुलक रो, कै साहित कै सूर।।
सत ऊजल संदेश, ऊजल चारण ऊचरै।
दीपै वांरा देश, ज्याँरा साहित जगमगै।।

अलसीदान रत्नू ने ब्रिटिश सत्ता के विद्रोही नाथूसिंह भाटी (जैसलमेर) के शौर्य सम्बंधी अनेक छंद रचे जिनमें अनेक स्थानों पर उनकी राष्ट्रीय भावनाओं की झलक मिलती है। एक उदाहरण देखिये-

चढों न परतक चाकरी, करों न करसण कांम।
ले लसकर धर लूटस्यों, गवरमिंट रा गांम।।

राष्ट्रीय काव्य में यशकरण का नाम उल्लेखनीय है। सीकर काण्ड के सम्बन्ध में महाराजा मानसिंह (जयपुर) को शिक्षा देते हुए उन्होंने लिखा है-

मानो मानो मान, सेखावत न सतावजे।
देसी सिर रा दान, आफत जैपर आवतां।।
झडिया जैपर वासते, सीकर रा रणसेर।
वां री वा अब चाकरी, हे राजा हय-हेर।।
जरा नैं जैपर राज नै, बैरी सकै न बिगाड़।
उत्तर मैं रहिया अटळ, बण सेखावत बाड़।।

यही नहीं, देशी राज्यों में उच्च पदों पर अँग्रेजों की नियुक्ति देखकर कवि को गहरी ठेस लगी है-

परदेसी पद सचिव पर, आणै नृप कर आघ।
कढै न फिर वै काढिया, बुढिया रै घर बाघ।।
तठै रहे नृप तंग, जठै सचिव गोरा जमै।
पकड़्यां पछै भुजंग, छांड न सकै छछूंदरी।।
परदेसी सरपंच, बण राजा घर मैं बड़ै।
पूरण रच परपंच, सब री सुख सम्पत हरै।।

सांवलदान आसिया अँग्रेजों को मार भगाने के लिए संगठन को अधिक महत्व देते हैं, प्रचार को नहीं-

नंह सत्रु मरै अखबारा छपियां, बैरी न भगै रेडियां बोल।
घण रण-भोम तदै नभ गाजै, बड़बड़ती गूंज मसीनां बोल।।
बळ क्षात्रव बाढीजै जुध बेळा, संगठण अधिक करीज सैन।
पोसण कुटम कीजे म्रत पाछे, (जी सूँ) चित भिड़बा लागै भड़ चैन।।

भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में शस्त्र-बल से विजय प्राप्त करना कठिन था। वस्तुत: महात्मा गाँधी का शास्त्र-बल ही एक मात्र आधार रह गया था। अतः चारण कवि उनकी विचार-धारा से प्रभावित हुए और उन्होंने उनके व्यक्तित्व को उजागर किया। नाथूसिंह महडू ने सत्य ही लिखा है-

खारक दोय खुराक में, अजा दूध अहार।
डोकरियो डिगतो फिरै, धूजै सब संसार।।

इसी प्रकार नाथूसिंह महियारिया ने ‘गाँधी शतक’ में उनके अद्भुत आत्मबल को सर्वोपरि माना है-

फ़ौजां रोकी फिरंग री, तोकी नह तरवार।
गांधी तैं लीधौ गजब, भारत रौ भुज भार।।
आतम बळ सो बळ नहीं, आतम बळ अदभूत।
जे जरमन सूं जीतिया, हार्‌या गांधी हूंत।।
साइंस हूं साहस बड़ौ, विजय हुई विखियात।
गांधी मन साहस भर्‌यो, साइंस भरी विलात।।

७. रीति काव्य:- इस काल के रीतिकारों में गणेशपुरी, मुरारिदान (जोधपुर), मुरारिदान (बूंदी) एवं उदयराज के नाम आते हैं। गणेशपुरी कृत ‘मारु महराण’ एवं ‘जीवन मूल’ दो ग्रंथों का उल्लेख किया जाता है किन्तु इनकी प्रतियाँ उपलब्ध न होने से न्याय नहीं किया जा सकता। पहले ग्रंथ में साहित्य के सम्पूर्ण अंगों का तथा दूसरे ग्रंथ में अलंकारों का विवेचन बताया जाता है।

मुरारिदान (जोधपुर) कृत ‘जसवंत जसो भूषण’ (जसवंत भूषण) एक अलंकार ग्रंथ है जो सबसे बड़ा है। यह कविता की जाति, भेद, रस, अलंकार आदि पर प्रकाश डालने वाला अमूल्य ग्रंथ है। इसमें कविता के भेद इतनी उत्तम रीति से समझाये गये हैं कि इसके विषय में राजस्थान में यह दोहा प्रचलित है-

भोज समय निकसी नहीं, भरतादिक की भूल।
सो निकसी जसवँत समय, भये भाग्य अनुकूल।।

यह लक्ष्य करने की बात है कि मुरारिदान ने अलंकारों के नामों को ही उनका लक्षण माना है और उदाहरण में अपने आश्रयदाता महाराजा जसवंतसिंह का यशोगान किया है। इस ग्रंथ से कवि का संस्कृत एवं हिन्दी वाङ्गमय के ज्ञान का भी परिचय प्राप्त होता है। नाम में लक्षणा की सर्वत्र खोज करते रहने से कहीं-कहीं अनावश्यक तोड़-मरोड़ भी देखने को मिलती है। इसमें परम्परागत अलंकारों के अतिरिक्त तीन नये अलंकार भी बनाये गये है-अतुल्ययोगिता, अनवसर एवं अपूर्व रूप। इनकी दृष्टि में प्रमाण कोई अलंकार नहीं है। ग्रंथ का शिल्प-तंत्र एवं विवेचन-शैली कलापूर्ण है जिससे हमारे हृदय पर प्रभाव पड़ता है। यथा-

गोकुल जनम लीन्हौ, जल जमुना को पीन्हौ,
सुबल सुमित्र कीन्हौ ऐसो जस-जाप है।
भनत ‘मुरार’ जाके जननी जसोदा जैसी,
उद्धव ! निहार नंद तैसो तिंह बाप है।।
काम-बाम तें अनूप तज बृज-चंद-मुखी,
रीझे वह कूबरी कुरूप सौं अमाप हैं।
पंचतीर-भय को न बीर मेह-बय को न,
बय को न, पूतना के पय को प्रताप है।।
सुर-धुनि-धार घनसार पारबती-पति,
या बिधि अपार उपमा को थौभियतु है।
भनत ‘मुरार’ से विचार सौं विहीन कवि,
आपने गँवारपन सौं न छौभियतु है।
भूप अवतंस, जसवंत ! जस रावरो तो,
अमल अतंत तीनों लोक लौभियतु है।
सरद पून्यौ-निसि जाये हंस को है बन्धु,
छीर-सिंधु-मुकता समान सौभियतु है।।

मुरारिदान (बूंदी) कृत ‘डिंगल-कोष’ एक पद्य बंध पर्यायवाची कोष है जो अपने ढंग का सबसे बड़ा ग्रंथ है। कोष परम्परा में यह महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक है। इस कोष में अनुमानत: सात हजार शब्द मिलते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें १५ गीतों के लक्षण भी दिये गये हैं। साथ ही अलंकारों पर भी हल्का प्रकाश डाला गया है किन्तु कोष ही इसका मुख्य ध्येय है। इसका प्रकाशन पुराने ढंग से बहुत पहले ही हो चुका था जिसकी प्रतियां आज उपलब्ध नहीं होती। यह उल्लेखनीय है कि इसमें डिंगल ग्रंथों में प्रयुक्त शब्दों को ही स्थान दिया गया है, अपनी ओर से गढ़े हुए अथवा अप्रचलित शब्दों को नहीं रखा गया है। संस्कृत शब्द कई स्थानों पर निःसंकोच भाव से अपनाये गये हैं। ग्रंथ कई अध्यायों में विभक्त किया गया है और शैली की दृष्टि से अमर-कोष का अनुकरण किया गया है। इस कोष की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आरम्भ के अध्यायों में जहाँ गीत के लक्षण दिये गये हैं वहाँ उदाहरण में भी पर्यायवाची कोष का ही निर्वाह किया गया है। ऐसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। इसका निर्माण आधुनिक काल में होने से डिंगल से अनभिज्ञ पाठकों की। सुविधा के लिए नामों के शीर्षक प्राय: हिन्दी में दिये गये हैं और अनुक्रमणिका में भी ऐसा ही किया गया है। यहाँ गीत सुपंखरो का लक्षण एवं उदाहरण दिया जाता है-

।।दोहा।।
अखर अठारै आद तुक, बीजी चवुदह बेख।
बिखम अखर सोळह बळे, सम चवुदह संपेख।।
मेळ तणी झड़ मांहिनै, गुरु लघु अन्त गिणाय।
पैखो गीत सुपंखरो, बीदग ऐम बणाय।।

।।गीत – सुपंखरो : घोड़ा नांम।।
बाजी तोखार तुराट तुरी ऐराक बैंडूर बाह, बैंडाक केसरी हरी काछी खैंग बाज,
होवास ब्रहास धाटी बडंगी निहंग हंस, बाजिंद तारखी प्रोथी घोड़ो बाजराज।
उडंड चांमरी ताजी हैराव सारंग अस्व, भिंडज्जां काठियावाड़ हींसी बाहभाण,
पमंगाण हैजमा हैवरा लच्छीवाळा पूत, कुंडी हयांराज तुरां धुड़ल्ला केकाण।
अलल्लां वितंडां हयां सपत्तासवाळां अंसी, रेवंतां साकुरां अस्सां जंगमां तुरंग,
क्रमाणंकां पमंगां हैवरां सिंहविक्रमाका, चंचळां तुरग्गां धजांराज है सुचंग।
मासासी पकल्ल देव सिंधुजात बासू मुणां, बंगळी जंगळी रूमी अरब्बी कंबोज,
जोवो पांच दोय नांव खेत सूं उपाया जिके, नामी पात तुरी नाम बखाणै हनोज।।

।।दोहा।।
मात अठारा प्रथम तुक, आगै सोळह आण।
सोळह-सोळह तुक सकळ, गीत त्रंबकड़ै जाण।।

।।गीत – त्रंबकड़ो : ब्रह्मा नांम।।
बेदोधर कमळसुतन बिध बिधना अज चतुरानन जगतउपाता,
सतानंद कमळासन संभू ध्रुव लोकेस पतामह धाता।
परजापत ब्रहमाण पुराणग ब्रहमा बहम बेह कबि बेधा,
सनत हंसबाहण सुरजेठो मुखचवु आठद्रगन बड मेधा।
सुरसतजनक स्वयंभू सतध्रत बेदगरभ अठश्रवण बिधाता,
आतमभू सावत्रीईसर नाभीसंभव कमन सुहाता।
सत्यलोक गायत्री ईस क बेधस लोकपता (बिव्याता),
हिरणगरभ बिरंची द्रूहिण द्रुघण बिश्वरेतस (बरदाता)।।

उल्लेखनीय है कि उदयराज एवं सीताराम दोनों के सहयोग से जिस ‘सबद कोस’ का शुभारम्भ इस काल में हुआ, उससे आगे चलकर राजस्थानी साहित्य के एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हुई। अस्तु,

८. शोक काव्य (मरसिया):- इस काल में आकर चारण कवियों ने प्रसिद्ध साहित्यकारों एवं राष्ट्रीय नेताओं के प्रति भी गहरी संवेदनायें व्यक्त की हैं। अतः शोक-काव्य का जितना विकास इस काल में हुआ उतना पहले नहीं। व्यक्ति विशेष के प्रति करुण क्रन्दन होते हुए भी यह काव्य पाठकों के हृदय को द्रवीभूत करने में सक्षम है। इसमें कवियों ने दिवंगत आत्माओं के गुणों का गान कर उनके पुन: अवतरित होने की अभिलाषा प्रकट की है। विषय की दृष्टि से इसे चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- १. राजाओं पर लिखा शोक-काव्य जिसमें सूर्यमल्ल, गणेशपुरी, ऊमरदान, केसरीसिंह, राघवदान, नाथूसिंह, उदयराज एवं नवलदान २. जागीरदारों पर लिखा शोक काव्य जिसमें केसरीसिंह, जवानसिंह, उदयराज एवं अंबादान ३. स्वजातीय कवियों पर लिखा शोक-काव्य जिसमें रामनाथ, भवानीदान, गणेशपुरी, पाबूदान फोगा बारहठ, ईश्वरदान, चंडीदान सांदू एवं रूपसिंह और ४. राष्ट्रीय नेताओं तथा प्रसिद्ध चारणेतर लेखकों पर लिखा शोक-काव्य जिसमें सांवलदान, लालसिंह, यशकरण खिड़िया एवं रूपसिंह के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सूर्यमल्ल ने महाराजा मानसिंह (जोधपुर) के निधन पर उनके विद्यानुराग को लक्ष्य करके उन्हें ‘मीठा मानसरोवर’ की संज्ञा दी है-

विद्या हंस विनोद, कारंडव कविजन तरै।
मन जाणै तव मोद, मीठो सागर मानसी।।

गुसाईं गणेशपुरी ने प्रताप के अंतरंग चेतक के शोक में लिखा है-

नच्चन बेर निहारि, पुत्त कहि चारु प्यार चहि।
उहि छिन उमंगि उडात, कंध धर हाथ भ्रात कहि।।
बग्ग उठत रन रुप्पि, बप्प कहि अप्प विरुदवर।
तात भ्रात सुत लोक, गजब भिक परिग आरिग गर।।
कट्टिग न पैर कट्‌टिग यकृत, कट्‌टिग मान निसान धन।
हय मरिग नहिं न चेटक अहह, मरिग रान पत्ता सु मन।।

महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय (जोधपुर) के स्वर्गवास से ऊमरदान के हृदय को गहरी ठेस लगी। इस विषय के अनेक दोहे एवं गीत ‘जसवंत जस जलद’ में उपलब्ध होते हैं। महाराजा की ‘अंतिम असवारी’ का यह वर्णन हृदय में करुण भावनाओं का संचार करता है-

हा-हा दिये घरोघर हेला, पुरजण हिए प्रलापा।
जिये जिके नहिं जिये जांण जग, किये अनेक कलापा।।
धुबी चराकां हा दिन धौले, मा दिन सोर मचायो।
नाद सुवाद्यन पत्ति निसा दिन, सा दिन नहीं सुहायो।।
व्याकुलतां घुलतां वलतां वह, मरघट पुलतां माळी।
अकुलतां अंतिम असवारी, चवरां ढुलतां चाली।।
झग-झग उठै हिया में झालां, दग-दग दृग जल डारै।
मग-मग लखै आव तौ मारू, पग-पग प्रजा पुकारै।।
बरसण लागा वैण बिरंगा, तरसण लागा तीठा।
परसण लागा पाव दुहेला, दरसण छैला दीठा।।

केसरीसिंह (शाहपुरा) ने महाराव उम्मेदसिंह (कोटा) के स्वर्गवास पर अपने हृदय की व्यथा इस प्रकार प्रकट की हैं-

गुन गाहक उम्मेद ने, किय पयान सुर थान।
छटपटाय हा ! रह गये, कढ़े न ये धिक प्रान।।

राघवदान ने महाराव उम्मेदसिंह (सिरोही) पर अनेक मरसिये लिखे हैं। एक उदाहरण पर्याप्त होगा-

पग-पग रच धांम-धांम क्रत पावन गांम-गांम प्रती राख गुणी।
विद्या पढ दांम-दांम अत बालक सांम नांम नत कथा सुणी।।
कीनो वश कांम तमांम कला कर ठांम-ठांम ध्रम अडग थयो।
छत्रपत उमेद वेद मत चालण गुण ग्राहक शिव लोक गयो।।

नाथूसिंह ने महाराजा उम्मेदसिंह (जोधपुर) के स्वर्गारोहण पर करुण रस से ओतप्रोत दोहे लिखे हैं। उदाहरण देखिये-

कै मैं मोटो अघ कियो, कै हर कियो अकाज।
श्रवणां मरण सुणावियो, नृष उम्मेद रो आज।।
आज मरूधर ऊपरां, अंबर पड्यो करूर।
नृप उमेद दीसे नहीं, दीसै सुरपुर दूर।।
बरसै आज उमेद बिण, नेणा नीर हमैस।
मेह न अतरो मालवे, जतरो मरुधर देश।।
मन उमेद रहगी बणी, रहगी बात न जोर।
कुण उमेद पूरी करे, नृप उम्मेद बिण ओर।।

उदयराज ने भी महाराजा उम्मेदसिंह (जोधपुर) के आकस्मिक स्वर्गारोहण पर ५० सोरठे लिखे हैं जिनमें उनके द्वारा किये हुए लोक कल्याणकारी कार्यों का वर्णन है। इनमें करुण रस का अच्छा संयोजन हुआ है। प्रकृति भी उनके वियोग में विलाप करती दिखाई गई है। यथा-

रैयत हित राजाह, राज सता देतो रयो।
करगो शुभ काजाह, इल पर भूप उमेदसी।।
मुरधर री माताह, कुरळावै कुरजां कळी।
आजे अनदाताह, इण भव फेर उमेदसी।।
करसा कुरळावेह, दूणा मरूधर देस रा।
घर-घर गरळावैह, आज न भूप उम्मेद सी।।
पूरा दुखी पहाड़, रोय-रोय राता थया।
बळती दयै बराड़, अधपत गयो उमेद सी।।
रोवै रूखंडलाह, कुम्हळाणी जीवण कळी।
तापै तावड़लाह, अधिपति गयो उमेद सी।।

नवलदान ने महाराव सर केसरीसिंह (सिरोही) के बैकुंठवासी होने पर यह मरसिया रचा है-

विमल धरम धरवरम, परम पथ जोग प्रकाशक
शरण अभय निर्शरण, तीव्र तरणिय अरि त्रासक।
कुशल काछ दृढ वाक्य, नैमवृत अडग निभावन,
पंडित कवि प्रतिपाल, पाठ प्रोक्ता श्रुति पावन।
निर्णय जु सुभासुभ गुनकरन, हद समाज दंभी हरन्,
नवलेश कहत केहरी नृपत, स्वर्ग गयो अशरन शरन।।

जागीरदारों पर लिखे शोक-काव्य में संखवास ठाकुर प्रताप सिंह (मारवाड़) के गुणों का चित्र खींचते हुए केसरीसिंह ने लिखा है-

आस बिसासरु आसरो, हो कवियन को खास।
हा ! हा !! वह सुरबास किय प्रिय प्रताप सँखवास।।
नामी बीरां-मुकट मण, स्वामी पख गुणसाण।
हो हाँमी कुळ हेतवां, चामीकर चहुवाण।।
धुरी सुभट जोधाणरो, सूर सिपह-सालार।
सुरग सिधातां संभरी, करी बुरी करतार।।
जींहैं पातल जूटतो, बाँवाळी बळभद्द।
हा ! चुहाण-जोड़ी हरी, हरी करी दुःख हद्द।।

जवानसिंह ने राजराणा फतहसिंह (देलवाड़ा) के चल बसने से चारणों की अपार क्षति बताई है-

करतौ उपकार दीन हितकारी, नहँ करतौ दत देण नकार।
भरतौ लोभ न लाभ भँडारां, सुध सागर तरतौ संसार।।
सुत अरिसाल ढाल सुभ टांरौ, है उण बिन सेवक बेहाल।
भाल विसाल होय कद भेटौ, पोहमी कद करही प्रतपाळ।।
मता तणौ अडग मकवाणौ, सता धरम जिण रखी सरै।
फता जिसौ धणी को फत ही, खता न देतौ खून खरै।।
रहतां दूर घड़ी नहँ सरतौ, रघुवर खोसी हेम रड़ी।
जातां जीव जड़ी नृप झालौ, पात मोटी कसर पड़ी।।

ठाकुर जवाहरसिंह (पाटौदी) पर उदयराज ने सोरठे लिखे हैं-

सेणों रो सिरताज, वीर दलंतो वैंरियों।
ओ ठाकुर गो आज, जोधो सरग जवारसी।।
मन जिण रो गिरमेर, सदगुण रो मीठो समँद।
लाखों रो चित लेर, जग सूं गयो जवारसी।।
सेवा करी सपूत, वीर छतीसों वंश री।
रखवालो रजपूत, जातो रयो जवारसी।।

अंबादान ने ठाकुर प्रतापसिंह (डिग्गी) पर ३८ सोरठों का एक मर्मस्पर्शी शोक-काव्य लिखा है जिसमें उनके समस्त गुणों का वर्णन है। उदाहरण इस प्रकार है-

तूटी रीति तमाम, छत्रीध्रम वाळी छिती।
ब्रन चारण बिसराम, अरक पतौ आथम्मियो।।
ईस्वर करी अजोग, तो वियोग वाळी पता।
उर दुख थयौ अयोग, भूलां किम भीमेण रा।।
राखण कुळ मरजाद, अधपतियां ढांकण अडिग।
आवै बर-बर याद, भूलां किम भीमेण रा।।
मचियौ सोच मथाण, पचियौ नहँ मन प्राजलै।
गवण सुरंग खांगांण, भूळां किम भीमेण रा।।
पेटज भरण उपाय, करस्यां म्हैं जग में किता।
जिय सूं रंज न जाय, तो वियोग वाळौ पता।।

रामनाथ ने सूर्यमल्ल पर जो गीत लिखा है वह स्वजातियों पर लिखे शोक-काव्य में उल्लेखनीय है। यह अत्यन्त हृदयद्रावक है-

देस कविंद दूजाह रहिया सो आछां रहो, सामँद गुण सूजाह तो मरतां बिनस्यों त दिन।
करवा अपका जाह सप्पूती धारै सकळ, रजवाड़ा राजाह सब जग जाणे सूजड़ा।।
थई मृत्यु थारीह कुण मेटे करतार सूं, खतम लगी खारीह सुणतां कानां सूजड़ा।
जिण सूं ऊजळ जात दिस-दिस सारै दीसती, रैणव थारी रात सुकवि न जनम्यौ सूजड़ा।।
थूंक्यौ थुथकारोह गाडण बीकाणै गुड्‌यौ, ह्वै जग हैकारोह सुकवी मरतां सूजड़ो।
जळ कायब जस जोग ये सब साथै ऊठिया, भामी कीरत भोग सुरग सिधातां सूजड़ा।।

शंकरदान के लिए रामनाथ का उद्‌गार है-

शिकस्या देवण साथ, हो शंकर स्रष्टि तणो।
(अब) किण संग करस्यां बात, शेर सुवन सुरगां गयो।।

भवानीदान कृत सूर्यमल्ल विषयक यह मार्मिक मरसिया भी महत्वपूर्ण है-

आई राशी आदि यह, सुणियो कायब सार।
जब सूजा मैं जाणियौ, ईहग तूं अवतार।।
कायब रचना तैं करी, आतम बुद्धि उदार।
जेम सिकंदर पूतळी, नीरधि पंथ निवार।।
भाण इखू रस घट भयो, चूंछ भयो कवि चंद।
नर बाणी सूजा करी, वर बाणी सुर वन्द।।
हायन एक हजार में, आदि हुवौ नहिं अंत।
सुरसत बाणी सूजड़ा, पड़ी पदारथ पंत।।

गुसाईं गणेशपुरी ने शंकरदान सामौर के लिए ‘गिरवर डिंगल रो गुड़यो, इण मरुधर में आज’ ‘बळी बीकपुर बाजतो, हो शंकर सिरताज‘ कहकर अपना शोक प्रकट किया है।

ईश्वरदान की दृष्टि में राजस्थान-केसरी केसरीसिंह के उठ जाने से क्षत्रिय एवं चारण जाति की जो क्षति हुई है वह अकथनीय है-

तो जातां हीणी थई, खत्र वट चारण खान।
केहर ! किण विध कह सका, मन री व्यथा महान।।

चंडीदान सांदू ने कविराजा दुर्गादान (कोटा) के निधन पर कई गीत लिखे हैं। निम्न गीत में उनके गुण-वर्णन के साथ ईश्वर को कोसा गया है-

इळ सत रौ दुरग अथमायौ, चित म्हारौ घायौ कर चोट।
लहरी दया-दया नहँ लायौ, खगपत चढण करी बड खोट।।
देसभगत विदवान दयानिध, भलपण रौ सागर कुळभूप।
कीधन पाय लियौ करुणाकर, रे हरि विणठ जात रौ रूप।।
घण गंभीर अनूपम गाढम, मृदुभाखी राजा महियार।
जाण अजाण बणे जोखमियौ, कीधौ अक्रत घणौ करतार।।
महा उदार मोट मन महपत, कायब कंत अटळ कुळ काण।
असमय में कविराज उठायर, (तैं) भूल करी भारी भगवाण।।
जिता सास जीसां की जोरी, सहसां औ सांसौ धर सीस।
कहलां बिलख न्याय नहँ कीधौ, अनरथ बढ़ कीधौ जग ईस।।

रूपसिंह ने इन्द्रबाई रत्नू एवं राजस्थान-केसरी केसरीसिंह पर शोककाव्य लिखा है। प्रत्येक का उदाहरण क्रमश: यहाँ दिया जाता है-

१.
मेळौ रहतौ मंडियौ, तव दरसण रै काज।
खटकै हिय देख्याँ खुड़द, आप बिना वा आज।।
जनमी तूं जिण जात में, वा गारत व्है आज।
एका रूं फिर इन्द्र माँ, आवो राखण लाज।।

२.
हो सांचो कविराज, गो जग तज गो लोक में।
भौ सूनो सह आज, कवि कानन बिण केहरी।।
बन केहर री हाक तो, पल में ही मिट जाय।
(पण) अमर नाद कवि सिंघ री, जतन क्रोड नहँ जाय।।
चारण केहरि चल बसा, रहिगे नकली रूप।
जैसे वारिधि नाम के, वाजत पय बिन कूप।।

ब्रजलाल कविया ने भांडू (शेरगढ़) निवासी करणीदान के प्रति शोक व्यक्त करते हुए कहा है-

रोहड़ कुळ रा रूप, आला भांडू ऊपनौ।
भव अगलै रा भूप, कुळ में फिर आजे करन।।

इसी प्रकार यशकरण ने ठाकुर गोपालसिंह (खरवा) के निधन पर यह मरसिया लिखा है-

खरवा वाळी खोह रो, बीत गयो वो बाघ।
सूरापण साहस तणो, अब कुण करसी आघ।।
गूजरियो गोपाल, विधवा रजपूती वणी।
होसी कवण हवाल, अब इण राजस्थान रो।।
गोपाला हिव घाव, थारा बिन कोजो थियो।
एक रस्या फिर आव, भारत रो करबा भलो।।

राष्ट्रीय नेताओं तथा प्रसिद्ध चारणेतर लेखकों में सांवलदान ने सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता गौरीशंकर ओझा के प्रति काव्यबद्ध श्रद्धांजलि अर्पित की है-

लीधौ हर लूटेह, भारत इतिहासी भवन।
ओझा विन ऊठैह, हिंदवां रै ज्वाळा हियै।।
ओझा भल ओप्योह, हीये भारत हार ज्यूं।
करतावर को प्योह, हार हर्यो इतिहास रो।।
जणही नहँ जणणीह, संकर गौरी द्विज जिसा।
जस सारै नर-जीह, ओझौ सह भारत अमर।।
मरसी वे जग मांय, करतब जे नहँ कर सक्या।
मुख नर-नर रै मांय, ओझौ इतिहासी अमर।।
भारत देस अभार, तोसूं हीराचँद तणा।
सुगँध करी संसार, अमर लता इतिहास री।।

रूपसिंह बारहठ ने लोकमान्य तिलक पर कवित्त लिखकर अपनी संवेदना प्रकट की है-

हाय तिलक भारत तनय, तिलक गंगधर बाल।
सुरग तिहारे गमन ते, है हमरो जो हाल।।
सुनै कौन जासौ कहैं, हाय विरह की बात।
आवत तव गुन याद जब, रोवत सब अध रात।।
लाल त्रिलोकी तें विनय, है मम बारम्बार।
तनय हिंद को तिलक सो, दीजे सरजन हार।।

लालसिंह ने कराल काल के झंझावात में राष्ट्रपिता गाँधी जैसे रत्न के खो जाने पर अपार शोक प्रकट किया है-

विविध विचार वांधि वणंत है लाल आज।
हाय ! काल आंधी मांझ, गांधी रत्न खो गयौ।।

इसी प्रकार यशकरण खिड़िया ने प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है-

लाल बहादुर निधन से, देश हुआ दुःख लीन।
जहँ तहँ जनता तड़पति, जैसे जल बिन मीन।।

और रूपसिंह को विश्वकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर के उठ जाने का दुख है-

गिरा वज्र माँ हिंद पर, दुख बंधन बिच डार।
रक्षा-बंधन दिन रवी, गो भव-वध निवार।।
हरि कीधो की हाय, हिन्द खी हर ने हमैं।
इळ हित इक अध्याय, आफत रो जोड़्यो अधक।।

शोक की यह प्रवृत्ति मनुष्यों तक ही सीमित नहीं, पशु-पक्षियों तक भी फैली हुई है। यह लक्ष्य करने की बात है कि चारण कवियों ने अपने परम प्रिय पशुओं के बिछुड़ जाने पर जो आँसू बहाये हैं, उससे उनका रागात्मक स्नेह प्रकट होता है। जसवंतदान कविया अपनी गाय के चल बसने पर कहते हैं-

घेरो काळ ज घालियौ, कारी लगी न काय।
देखो हीरादेर में, (म्हारी) गारत हुयगी गाय।।

इसी प्रकार व्रजलाल कविया को अपने पाडा के मर जाने का अपार दुख है-

गुण गाडा सुरगां गयो, असली पाडा ओध।
तूं लाडा भैंस्यां तणा, जाडा महखां जोध।।
सींग सुघट्टां अंग सांवळ, अंजण थट्टां अंग।
सुरग झपट्टां साजणो, जूटण भट्टां जंग।।
महिखी सुत माडाह, कांकड़ पग काडा कदन।
पड़तां धर पाडाह, तो ताडा मांही तिरै।।

९. सती-माहात्म्य:- इस काल के सती-माहात्म्य में सूर्यमल्ल, उदयराज, भारतदान एवं अर्जुनसिंह की रचनायें उल्लेखनीय हैं। सूर्यमल्ल ने ‘सती रासो’ नामक रचना का निर्माण किया किन्तु वह उपलब्ध नहीं होती। ठा० बलवंतसिंह ने इसकी एक प्रति अलवर में बताई है जिसके कुछ पद ‘बलवद्विलास’ में भी आये हैं। यह रचना भिणाय (अजमेर) की रानी के सती होने पर वचन निर्वाह हेतु लिखी गई थी।

उदयराज एवं भारतदान दोनों के भाव का विषय एक है जिसमें ठाकुर जबरसिंह (बेड़ा) की पत्नी सुगन कुंवर के सतीत्व की महिमा गाई गई है। उदाहरण के लिए यहाँ उदयराज के ये दोहे दिये जाते हैं-

गई हरी गुण गावती, सती पती रै संग।
सुगन कँवर तोनै सदा, रखपूताँणी रंग।।
जळी अगन में जीवती, अेक न मुड़ियो अंग।
सत कीधौ सुगनां सती, रजपूताँणी रंग।।
सौ वरसाँ पैली सती, आगे हुती अभंग।
सुगन हुई इण पुळ सती, रंग भटियाँणी रंग।।
जद खूटौ पत जबरसी, गुण जैंरा जळ गंग।
संग जळी सुगनां सती, रंग भटियाँणी रंग।।
गौ राँणावत जबरसी, अंत सुरत अरधंग।
सत करणी सुगनां सती, रंग भटियाँणी रंग।।

अर्जुनसिंह ने ठा० जीवराज (रूपनगर) की पत्नी खुशाल कुमारी के सती होने के विषय में कई छप्पय एवं गीत लिखे हैं जिनमें सती होने की रीति का उत्तम ढंग से वर्णन किया गया है। यथा-

मंजन अंजन करे, करे पौसाक सुरंगी।
कुटँब भ्रात मिल करे, दुनी दुख होय दुरंगी।।
भूखण धारण करे, करे त्याग न घर अंगण।
करे अतर भर कपड़, अमरपुर करे उमंगण।।
चाळकांछात लारै चलण, इन्द्र परी जिम आवळी।
जतरी न हुई परणी जदी, अतरी हुई उतावळी।।

कवि ने प्रतीक शैली में सती की विचित्र वेश-भूषा का वर्णन करते हुए लिखा है-

राचै मन इसौ न छत्री रहियौ, वीर समोभ्रम गयौ वर।
बोलै नहीं उणमणी बैठी, कीरत भगमा भेख कर।।
सुधौ बाळ न नकौ सँवारै, काजळ सारे नयणै केम।
भूपत गयौ जीवसा भोगण, जोगण पंगी थाई जेम।।
आछै चित जिण नै आदरतौ, अत रीझां देतौ उरड़।
बीरम तणा जिसौ इण वारै, भेख उतारै किसौ भड़।।
किरत एम कहै अनकारां, पल नहँ दूजौ सूरत पाक।
ऊ ज़िवराज फेर जग आवै , पहखै भूखण पोसाक।।

तेजदान आढ़ा ने चारण महासती सजनाँ बाई की पावन स्मृति में इस गीत के द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की है-

वरण न आवै जीह मने इण वार रौ, भुयण किरतार रौ धरण भजनां।
पैंड असमेद रा भरण अन पार रौ, साथ भरतार रौ करण सजनां।।
कराळों वात सह जगत लागौ कहण, बराळों पाल मुख ओपियो वांन।
थिती मन त्रंवालों साद विखमे थियाौ, सती झाळों विचे कियौ असनांन।।
उमाया देव वरखंत फूलां अतर, निभाया वचन पट ग्रंथ माथे।
अंत नंदराम रै सुणे ऊठी उमंग, सिंधु सुख भाळ री कंत साथे।।
दिखावत साच देवत पणौ दुनी मझ, चित सधर लखावत सोह चाढ़ा।
रयण थिर नांम जुग चार लग रखावत, अखावत ऊजळा किया आढ़ा।।

इसी प्रकार चारण महासती सायबाँ बाई के पति का साथ देने पर गुलजी आढ़ा का यह गीत देखिये-

निरख असाचो जगत पिव नेह साचो निरख, परख तंत हरीरस अछक पीधौ।
सुणे वे हरख निज तन तजण सायबां, कंत संग तरण मन हरख कीधौ।।
वेद तंत सार मत तोलड़ा विचारे, ग्रहे अण डोलड़ा सरण गाढी।
दिराया ढोलड़ा ध्राह ऊपर दुसह, उबारण बोलड़ा आप आढी।।
मिटावण फेर जांमण मरण मासती, चरण असमेद रा भरण चाली।
ध्यांन तारण तरण राम उर वीच धर, हरख कर कंत कर संग हाली।।
ऊजळी रहाई क्रीत उर ऊजळी, पतिव्रता उमाहे ऊमा पाहै।
जांण तन वृथा लालां अगन जळ गई, मळ गई जोत श्रग लोक माहै।।

१०. प्रकृति-प्रेम:- आधुनिक शिक्षा के फलस्वरूप इस काल में चारण कवियों का ध्यान प्रकृति की ओर उन्मुख हुआ अत: उन्होंने इसका सुन्दर चित्रण किया है। मुख्यत: यह चित्रण दो रूपों में पाया जाता है- आलम्बन रूप में तथा उद्दीपन रूप में। आलम्बन रूप में प्रकृति का चित्रण करने वाले कवियों में फतहकरण, किशनदान, प्रभुदान, लक्ष्मीदान, मोडजी, चैनजी, फतहदान और उद्दीपन रूप में चित्रण करने वाले कवियों में शिवबख्श, ऊमरदान, अर्जुनसिंह, पाबूदान आसिया, मुरारिदान आसिया, अमरसिंह देपावत आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कहीं-कहीं एक ही कवि में ये दोनों रूप पाये जाते हैं। अन्य फुटकर कवियों ने भी इस ओर अपनी रुचि प्रदर्शित की है जिनमें हरीसिंह, मूळजी, रणजीतदान आदि के नाम आते हैं। विस्तार-भय से यहाँ कुछ चुने हुए कवियों का विवेचन प्रस्तुत किया जायगा।

फतहकरण कृत ‘पत्र प्रभाकर’ में राजस्थान की रमणीय नगरी उदयपुर की प्राकृतिक शोभा का वर्णन है जिसे पढ़कर हृदय पुलकित हो जाता है। एक उदाहरण इस प्रकार है-

लगे घन नीलक कंठ ललाम, शुधोज्वल सन्तत है सह वाम।
शशी शिर पै जलजंत्र विशेष, उदैपुर के गृह तुल्य उमेश।।
स्वभावज वृक्ष लतासुम तोय, गृहो गृह बाग बिना श्रम होय।
द्विरेफ जहाँ मधुछत्त बनाय, सकाकलि कोकिल शब्द सुनाय।।
रचै शिखि ताण्डव बोलत कीर, सुशीतल मंद सुगंध समीर।
लसै गृह वापि सकंज ललांम, करै तिय कर्णन पुष्प सकाम।।
सदा जल शीतल निर्मल जास, हिमानिय को कि करै उपहास
पराभव ग्रीष्मक कोकि प्रसिद्ध, जहाँ घन को ननु आश्रय सिद्ध।।

इतना होते हुए भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कला की दृष्टि से कवि का चित्रण सफल नहीं बन पड़ा है क्योंकि पांडित्य प्रदर्शन के लोभ में सारे ग्रंथ में दुरूह कल्पनाओं एवं अलंकारों की प्रचुरता है। साथ ही चित्रात्मक वर्णन के स्थान पर वस्तुओं का परिगणन ही अधिक कराया गया है। यथा ‘पिछोला’ की महिमा गाते हुए कवि कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है-

स्वभू हरनाभिज ब्रह्म समांन, पुरंदर सागर तीर्थ प्रमान।
नमो सरनाथ पिछोलक नांम, करां नुति पीवन जीवन कांम।।
तुही इक दान अहर्निश देत, तुही सब जंतु तृषा हर लेत।
तुही परमारथ धारत देह, तुही कबहू न दिखावत छेह।
तुही शरणागत रक्खनहार, तुही करता सबको उपकार।
तुही जग निर्मित निर्मल काय, तुही कुल तीर्थन तैं अधिकाय।।

किशन ने अर्बुद की शोभा का वर्णन करते हुए वहाँ के फल-फूलों के नाम दिये हें-

चंपक कदंब अंब जंबु वो गुलाब वृंद, केतकी रु केवरे चमेली पुष्प छावे हैं।
दाड़िम अनार दाख सेवती जसूल केते, मोगरे नरंगी नींबू ग्राम कूँ निसावे हैं।।
सँकुलित नाना ब्रछ कोकिल मयूर पुंज, डम्मर सुगंधी तें भोंर छक जावे हैं।
अष्टोत्तर तीरथ को प्रगट प्रभाव लिये, अरबुद की शोभा कैलाश सी दिखावे हैं।।

मुरारिदान आसिया ने प्रकृति के आलम्बन एवं उद्दीपन दोनों रूपों का चित्रण किया है और इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। पत्नी के वियोग में चैत की चाँदनी उन्हें कितनी दारुण लगती है?-

दीजिये ‘सज्जन’ रान रजा मन, मज्जत है व्रह सिंधु कढे जिन।
दैत की भांति लगै अति दारुन, चैत की चांदनी चंदमुखी बिन।।

वर्षा-ऋतु में सर्वत्र हरियाली देखकर कवि की तबियत भी हरी-हरी हो जाती है। मुरारिदान आसिया के ही शब्दों में-

कारी घटा धर जात ढरी-ढरी, फेर ‘मुरार’ भरी-भरी आवे।
बीज परी-परी सी ह्वै चढे जु, डरी-डरी दौर कहाँ लपटावै।।
नाचत कुंज गरी-गरी मोर, घरी-घरी चातक बोल सुनावे।
हाय हरी बिन भूमि हरी-हरी, हेरि के आँखैं जरी-जरी जावै।।

शिवबख्श कृत ‘षड् ऋतु वर्णन’ प्रकृति पूजा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें १३० झमाल हैं जिनमें ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ अलवर की शोभा का सुन्दर वर्णन किया गया है। प्रकृति के ऐसे रंग-बिरंगे चित्र अन्यत्र दुर्लभ हैं। महाराजा बख्तावरसिंहजी के समय में बना हुआ जलाशय कैसा शोभायमान हो रहा है और कितना सुन्दर लगता है उस पर बना हुआ राजमहल!-

सोभा अति सागर तणी, जो नहि बरणीं जाय।
देखि भर्‌यो मंजार दधि, पथ भोलै पी जाय।।
पय भोलै पी जाय, भलो इण भाँत सूं।
हंसा संभ्रम होय, क्षीर सिंधु खाँत सूं।।
बणियो ताल विहद्द वखत नृप बार रो।
उण पर अधिक अराम धाम, छत्र धार रो।।

वहाँ जल भरती हुई पनिहारिनों को देखकर कवि ने जो कल्पना की है, वह सर्वथा दृष्टव्य है-

महलां तळ छळियो महण, सागर जल सरसार।
आवै मिंल लंझा उठै, पंणघट पर पणिहार।।
पंणघट पर पणिहार, नीर कज्ज नीसरी।
श्रीफल तणै प्रमाणक, शोभा शीसरी।।
कच बैणीं गुंथि कुसम, लपेटा लागणीं।
साँपड़ि क्षीर समुद्रक, निकसी नागणीं।।

सावणी तीज के दिन इस जलाशय को देखकर लोगों का हृदय-सागर उमड़ आया है। सुरंगे ओढ़ने ओढ़कर पद्‌मिनी नायिकायें अट्टालिकाओं पर चढ़कर लहरों का आनन्द मन भरकर लूट रही हैं-

आय सांमणीं तीज अब, सरसांमणी सनेह।
ऊठि घटा उतराध सूं, छूटि पटा अणछेह।।
छूटि पटा अणछेह, मेह झड़ मंडवै।
चमंकि छटा चहुँ ओड़, घटा घूमंडवै।।
सुरंग दुपट्टा शीस घटा सुघटा घणीं।
लहर अटा चढ़ि लेत, पटा भर पदमणीं।।

मेघों का गरजना और बिजली का चमकना, कभी प्रकट होना और कभी छिप जाना यह दृश्य ऐसा दिखाई देता है मानो बिजली बादल से आँखमिचौनी खेल रही हो-

झुकि बादल लागी झड़ी, उघड़ै घड़ी न इंद।
बायु त्रहूं बागी बहण, शीतल-मंद-सुगंद।।
शीतल-मंद-सुगंद, वायु त्रहूं बाजावै।
मधुरो-मधुरो मेह क, गहरो गाजवै।।
छटा चमंकि छिप जात, घटा मधि यौं घणीं।
मिलि खेळत घण माँहि, मनौं तुक मीचणी।।

कवि ने परम्परागत साहित्यिक रूढ़ियों को भी सहृदयता के साथ अपनाया है। वर्षा-ऋतु के फलस्वरूप वसुधा का यह नव श्रृंगार बड़ा ही आकर्षक है-

हरिया तरु गिरवर हुवा, पांघरिया बन पात।
सर तालर भरिया सुजल, बसुधा सबज बनात।।
बसुधा सबज बनात, बिछायत ज्यौं बणीं।
जिलह ओस कंण जोति, कि नां हीरा कणीं।।
इंद बधू अण पार, क बसुधा बित्तरी।
मनु तूटी मणिमाल, मदन महिपत्तरी।।

ऊमरदान की प्रकृति ऋषि दयानंद के शुभागमन से लहलहा उठी है-

अन्त असाड दयानन्द आयो, छोणी ज्ञान घुमड घण छायो।
सावण हरिकर सुख सरसायो, भादो अम्मृत झड़ बरसायो।।
बहे व्याख्यान बळोबळ बाळा, नीर निवाण ताल नद नाळा।
पड़े प्रेम घर-घर परनाळा, जुगति जळ मेटी त्रिस ज्वाळा।।

और शोक में यही प्रकृति अर्जुनसिंह द्वारा चित्रित खुशालकुमारी को सती होने के लिए प्रेरित करती है-

परवाई वज पवन, वाहळ अनड़ां रा वाजै।
दिस-दिस रींछी दौड़, छटा झळमळ रुत छाजै।।
हर वल बुग पँथ हलै, स्याम घण बदळ सुरंगा।
बन गेहरा रँग वणै, तणै इँद धनख दुरंगा।।
कंक धार अखँड मोरां कुहक, गहरै अंबर गाजतां।
खुसहाल उमँग हरख र चली, वर सँग ढौल व़जावतां।।

हरीसिंह ने अठारह वर्ष की आयु में अपने भाई जसकरण को सर्वप्रथम सवैये में एक पत्र लिखा जो उनके प्रकृति-प्रेम का सूचक है-

घुमंडी इत्त सावन की जो घटा, बिच बादल के बिजली झलके।
हरियाली बिलोकी में केकि नचे, सुउदग्घ वियोगन के दलके।।
सरितापति हूत्त मिले सरिता, लघु खोय न माज मधु ढलके।
जसकरण पति घर आवत ना, सखी मोही गयो छलिया छलके।।

मूलजी कविया ने मंडोर मार्ग पर स्थित ‘किशोर बाग’ के विषय में यह उद्‌गार प्रकट किया है–

कोयलियों गहका करै, मुधरा बोलै मोर।
बागों हुई बिछायतों, कमधज भूप किसोर।।

रणजीतदान लालस ने ‘सूरम दे रूपक’ नामक ग्रंथ में भांडू स्थान का जो वर्णन किया है, वह उनके प्रक्रति-प्रेम का परिचायक है-

इळ भांडू थळ ऊजळा, तरवर वधतै तौर।
नाळ हवाई नौबतां, जस वाजा घण जोर।।

प्रकृति के आधुनिक कवियों में स्व० अमरसिंह देपावत का विशिष्ट स्थान है। संदेह नहीं कि इस यशस्वी कवि ने ‘मेघदूत’ का राजस्थानी में सफल भाषान्तर कर साहित्य को समृद्ध बनाया है और सिद्ध कर दिया है कि राजस्थानी भी प्रकृति के सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों को प्रकट करने में अन्य भाषाओं के सदृश सक्षम है। इस भाषान्तर में शब्द और भाव दोनों की समुचित रक्षा हुई है। चारण साहित्य का यह प्रकृति-वर्णन उनकी अमर लेखनी से और भी खिल उठा है। उदाहरण देखिये-

परभाते शिप्रा तट रो बह बायरियो झीणो-झीणो।
मधरी कूँज लियाँ कुरजाँ री पोयण रे गँध रस भीणो।।
सुख सेजां में मन-मेळू रे बोल जिसो मन मोद भरे।
सिथळ अंग रति रस सूँ धण रो सहलावे तन क्लेश हरे।।
झीणी-झीणी महक झरोखां उड़-उड़ घन मनड़ो हरसी।
नाच-नाच मन मुदित मोरिया कोड घणां थां रा करसी।।
महल माळियाँ झाँक झरोखाँ मीत मौज भरपूर करे।
पी-पी छिब वाली नैणां सूं तब थाकेलो दूर करे।।
नीळकंठ उणियार निरख घन हर गण घणां कोड करसी।
पूजी-जे हर घणे हेत सूँ मन चींत्या कारज सरसी।।
कमळ फूल कामण केसां री गँध पती तट तणी समीर।
ले सुगन्ध विचरे उण बागाँ घन मेटण तन मन री पीर।।

११. ऐतिहासिक काव्य:- इस काल के ऐतिहासिक काव्यकारों में सूर्यमल्ल मिश्रण, श्यामलदास, बालाबख्स एवं किशनजी के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वैसे तो वीर काव्य के रचयिताओं ने इतिहास की सामग्री प्रदान की ही है फिर भी ऊमरदान एवं केसरीसिंह मेवाड़ ने महत्वपूर्ण घटनाओं को लिपिबद्ध कर बड़े उपकार का काय किया है। अन्य ऐतिहासिक रचनाकारों में मोडजी आसिया, पदमजी आड़ा, उदयभाण बारहठ, शिवदान सांदू, सागरदान कविया, हरीसिंह आदि का विस्मरण नहीं किया जा सकता। अस्तु,

सूर्यमल्ल कृत ‘वंश भास्कर’ इतिहास है अथवा काव्य, इस विषय को लेकर विद्वानों में मतभेद है। राजस्थान के चारण-बंधुओं ने दोनों का अपूर्व सामञ्जस्य बताते हुए कवि की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। श्री कृष्णसिंह सौदा के शब्दों में- ‘हम शपथपूर्वक कह सकते हैं कि ऐसा सत्यवक्ता इतिहासवेत्ता अद्यावधि कोई नहीं हुआ और अब होना भी कठिन है।’…. इसके विपरीत डॉ० गौरीशंकर हीराचंद ओझा का कथन है- ‘सूर्यमल्ल एक अच्छा कवि था परन्तु इतिहासवेत्ता न होने से उसने वंशभास्कर में प्राचीन इतिहास भाटों की ख्यातों से ही लिया है।’ हमारी तुच्छ सम्मति में सूर्यमल्ल कवि अधिक था, इतिहासवेत्ता कम। इतिहास तो उनसे लिखवाया जा रहा था जिसकी सामग्री के दो स्रोत थे- १. प्राचीन काव्य, नाटक, भाण, चम्पू आदि में वर्णित घटना। २. वंशावली रखने वाले भाटों की पोथियाँ। प्रथम स्रोत शुद्ध नहीं माना जा सकता क्योंकि काव्य और इतिहास का क्षेत्र भिन्न-भिन्न है। आज की वैज्ञानिक शिक्षा पुराणों के ब्यौरों को संदिग्ध दृष्टि से देखती है। इतिहासवेत्ता के रूप में सूर्यमल्ल की सबसे बड़ी असफलता तो यह है कि वह १६ वीं शताब्दी (पूर्वार्द्ध) तक कृत्रिम पीढियां रखने वाले बड़वा भाटों से प्रभावित है। इससे कहीं-कहीं झूठा विवरण भी आ गया है किन्तु इसमें उनका इतना दोष नहीं। उन्होंने तो सामग्री मिलने पर उसका उसी रूप मैं समावेश कर दिया है। सूर्यमल्ल ही क्यों, राजस्थान का कोई भी चारण कवि इतिहास को उस दृष्टि से नहीं देखता, जिस दृष्टि से आज का इतिहासकार देखता है। वह तो ऐतिहासिक भूमि पर काव्य का महल खड़ा करने में ही अपने कर्तव्य की इति-श्री समझता है। १६ वीं शताब्दी से आगे का इतिहास अपेक्षाकृत ठीक है। इसकी घटनायें विश्वसनीय हैं जिनका उपयोग अन्य लेखकों ने भी किया है परन्तु इसमें भी छान-बीन की प्रवृत्ति नहीं दिखाई देती। कहना न होगा कि कवि का लक्ष्य कविता की ओर होने से ऐतिहासिकता दब गई है। इन कारणों से यह एक ऐसा ऐतिहासिक काव्य बन गया है जिसमें काव्य का अंश अधिक एवं इतिहास का अंश कम है। इतना होते हुए भी इसमें बुंदी राज्य का विस्तृत वर्णन है तथा राजपूताना के भिन्न-भिन्न राज्यों एवं राज-वंशों का भी संक्षिप्त इतिहास दिया हुआ है। इसके साथ गौण रूप से अनेकानेक विषयों एवं कथाओं का वर्णन पृथक महत्व रखता है।

श्यामलदास कृत ‘वीर विनोद’ इतिहास का एक प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें मेवाड़ का इतिहास दिया गया है पर प्रसंगवश जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर आदि अन्य राज्यों एवं बहुत से मुसलमान बादशाहों का विवरण भी इसमें आ गया है। इससे ग्रंथ की उपादेयता और भी बढ़ गई है। प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों, बादशाही फरमानों इत्यादि का इसमें अपूर्व संग्रह हुआ है।

बालाबख्श कृत ‘नरूकुल सुयश’ १३४ झमाल छंदों का एक छोटा सा ग्रंथ है जिसमें कवि ने अलवर के राजा मंगलसिंह का वृतान्त दिया है। इसमें एक धार्मिक घटना को लेकर मुसलमान एवं राजपूतों के युद्ध का विस्तृत वर्णन है जिसका उल्लेख इतिहास-ग्रंथों में नहीं मिलता। कवि ने प्रमुख-प्रमुख योद्धाओं के नाम भी दिये हैं।

किशनजी कृत ‘उदय प्रकाश’ की ऐतिहासिक महत्ता कम नहीं है। इसमें ४५५ छंदों में कवि ने डूंगरपुर के महारावल उदयसिंह का जीवन-चरित दिया है। साथ ही उनके पूर्वजों पर भी यत्किंचित प्रकाश डाला गया है। इस ग्रंथ का निर्माण महारावल की आज्ञा से हुआ था।

ऊमर्‌दान ने बताया है कि ऋषि दयानन्द आषाढ़ महीने के अंत में जोधपुर आये थे और पाँच मास तक जोधपुर के हजारों नर-नारियों को वेदोपदेश देते रहे। प्रसिद्ध वेश्या नन्ही भगतन ने अपने एक विशेष कृपा-पात्र को लालच दिया और उसके कहने से ऋषि के ब्राह्मण रसोइये ने कलिया (कल्लाजी) जगन्नाथ को बहकाया जिसने उन्हें दूध में विष घोलकर पिलाया। इससे वे चिरशांति की गोद में सो गये।

केसरीसिंह (मेवाड़) का इतिहास-प्रेम उनकी रचनाओं में भली भाँति प्रकट हुआ है। प्रताप, राजसिंह, दुर्गादास एवं जसवंतसिंह के स्वभाव पर कवि ने सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया है और महत्वपूर्ण घटनाओं की तिथियाँ भी दी है। युद्ध में उपस्थित उसने दोनों ओर की सेनाओं के सुभटों के नाम भी दिये हैं।

इसी प्रकार मोडजी आसिया कृत ‘पाबू प्रकाश’ (बड़ा), पदमजी आढ़ा कृत ‘जोरजी चांपावत री झमाळ’, उदयभाण बारहठ कृत ‘बूलीदान री झमाळ’, शिवदान सांदू कृत ‘जोरजी चांपावत री झमाळ’, सागरदान कविया कृत ‘रतन जस प्रकास’ एव हरीसिंह कृत ‘जोधपुर महाराजाओं की तवारीख’ नामक रचनायें भी ऐतिहासिकता से ओतप्रोत हैं।

१२. भाषा, छन्द एवं अलंकार:- इस काल में राजस्थानी भाषा का रूप बदलने लगा और उसमें अन्य भाषाओं के शब्द भी निःसंकोच अपनाये जाने लगे। ब्रजभाषा का प्रभाव तो पहले ही पड़ चुका था अत: चारण कवि उसके शब्दों से वंचित नहीं रह पाये। कतिपय कवि हिन्दी के व्यापक प्रसार को देखकर उसकी ओर भी उन्मुख हुए। साथ ही उर्दू, फारसी यहाँ तक कि अँग्रेजी के शब्द भी राजस्थानी में प्रयुक्त किये जाने लगे। कहने का अभिप्राय यह कि अब भाषा पर वह प्रतिबंध नहीं रहा जो पहले था। इससे शब्द-भण्डार बढ़ा। विशुद्ध राजस्थानी में रचना करने वाले कवियों में सूर्यमल्ल मिश्रण, कमजी, भवानीदान, शंकरदान सामौर, हरीदान, हरसूर, शिवबख्श, कृष्णसिंह, भीखदान, मोतीराम, मोडसिंह, श्यामलदास, राघवदान, किशोरसिंह, गुलाबसिंह, सूर्यमल आसिया, सांवलदान, चंडीदान सांदू, अर्जुनसिंह, बिजैदान, रामकरण महड़ू, हरदान गाडण, लालसिंह आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सूर्यमल्ल कृत ‘वीर-सतसई’ की भाषा उत्तरकालीन राजस्थानी का उत्कृष्ट उदाहरण है किन्तु रूढ़ि का गलन करने से कहीं-कहीं प्राचीन प्रयोग भी पाये जाते हैं। उन्होंने नाटकीय शैली में चमत्कार उत्पन्न करने की चेष्टा की है। बीच-बीच में हास्य-व्यंग्य का भी पुट दिया गया है। शिवबख्श का भाषा पर पूर्ण अधिकार है। उन्होंने भी संलाप-शैली को अपनाया है। अन्य कवियों में भाषा का समुन्नत रूप देखने को मिलता है। कुछ कवि ऐसे हैं जिन्होंने भाषा के सरल रूप की ओर ध्यान दिया है। इनमें ऊमरदान, अमरदान, बावनदान रतनू सुपुत्र श्री मुरारिदान, सन् १८८०-१९४० ई०, चौपासनी (जोधपुर), गणेशदान लालस (चांचळवा), फतजी सांदू (हिलोडी, नागौर), नाथूसिंह, उदयराज, आदि मुख्य हैं। ऊमरदान की भाषा व्यावहारिकता के समीप पहुँच गई है। अत सरलता, स्वाभाविकता एवं सजीवता उसके आवश्यक गुण हैं। उसमें उच्च कोटि के पांडित्य के दर्शन नहों होते। प्रायः सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग कवि ने किया है। भाषा चुभती हुई है। बीच-बीच में मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी आ गई हैं। साथ ही उसमें हास्य-व्यंग्य का पुट भी दिया गया है। अमरदान एवं नाथूसिंह की भाषा सीधी-सादी एव कर्णमधुर है। शेष कवियों ने जन-साधारण की रुचि को ध्यान में रखते हुए भाषा को क्लिष्ट होने से बचाया है। सूर्यमल्ल मिश्रण, गोपालदान, गणेशपुरी, समानबाई, मुरारिदान आसिया, शिवबख्श, जुगतीदान, बालावस्था, फतहकरण, श्योबख्स, हिंगुलाजदान, केसरीसिंह (शाहपुरा), केसरीसिंह (मेवाड़), जवानसिंह, शेरादान, बलदेवदान, बलवंतसिंह, पाबूदान, जोगीदान, रामदान, रूपसिंह, आईदान प्रभृति कवियों ने ब्रजभाषा में भी रचनायें लिखी हैं अतः इनमें भाषा का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। सूर्यमल्ल मिश्रण की भाषा का दूसरा रूप ‘वंशभास्कर’ में देखा जा सकता है। यह एक अत्यन्त गूढ़ एवं क्लिष्ट रचना है। इसमें शब्दों की मनोनुकूल तोड़-मरोड़ देखने को मिलती है। आचार्य केशव के सदृश यहाँ भी पांडित्य-प्रदर्शन हेतु नवीन शब्दों का आविष्कार मिलेगा अत: कवि को शब्दों का जादूगर कहा जा सकता है। केवल ब्रज ही नहीं, षड्-भाषा प्रवीण होने के कारण इन पर अनेक भाषाओं का प्रभाव पड़ा है। यही बात गोपालदान में देखने को मिलती है। उनमें अरबी, फारसी, संस्कृत एवं डिंगल शब्दों के प्रयोग के साथ खड़ी बोली एवं पंजाबी का भी पुट है। गणेशपुरी के कवित्त-सवैयों की भाषा पिंगल के सन्निकट है। ‘वीर विनोद’ में क्लिष्ट शब्दों की बहुलता के कारण प्रसाद गुण का लोप हो गया है। शेष कवियों की रचनायें भी ब्रजभाषा की शब्दावली से ओतप्रोत है। केसरीसिंह (शाहपुरा), ऊमरदान, शंभूदान, मुरारिदान कविया, यशकरण, अर्जुनसिंह, पाबूदान, रामदान, धनेसिंह आदि की रचनाओं में खड़ी बोली के अनेक शब्द आ गये हैं।

आलोच्य काल के कवियों ने अधिकांश में प्राचीन छन्दों का ही प्रयोग किया है। छंद-विविधता इने-गिने कवियों में ही देखने को मिलती है जिनमें सूर्यमल्ल मिश्रण, गोपालदान, गणेशपुरी, समानबाई, ऊमरदान, केसरीसिंह (मेवाड़), किशन आदि के नाम मुख्य हैं। सूर्यमल्ल मिश्रण छंद-शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता थे। ‘वंशभास्कर’ में उन्होंने इस ज्ञान का प्रकाशन किया है। यह उल्लेखनीय है कि वीर रस की ध्वनि के लिए कवि ने कवित्त, छप्पय आदि छंदों का प्रयोग किया है और इनमें भी अनूठे छन्द दोहे को उपयुक्त माना है। ‘वीर सतसई’ में रीति की दृष्टि से विशेष प्रयोग भी हैं यथा पारिजाऊ दूहा, रंग रा दूहा आदि। गोपालदान ने रस के अनुकूल ही छन्दों का प्रयोग कर वर्णनीय दृश्य में रंग भर दिया है। उन्होंने दोहा, सोरठा, छप्पय, दुर्मिल, भुजंग प्रयात, मोतीदाम, भुजंगी, त्रोटक, निसाणी एवं पद्धरी छन्दों का बहुलता से प्रयोग किया है। साथ ही त्रिभंगी, बेक्खरी, नाराच, दीर्घनाराच और बेताल का भी प्रयोग देखने को मिलता है। इन विविध छन्दों के प्रयोग में कवि ने चतुराई से काम लिया है। किस वर्णन में अथवा किस विषय में कौन सा छन्द उपयुक्त होगा, इसका कवि को ध्यान है। गणेशपुरी कृत ‘वीर विनोद’ के छन्द तो ऐसे शक्तिशाली हैं कि पढ़ते-सुनते ही वक्ता और श्रोता का रोम-रोम खड़ा हो जाता है। समान बाई ने अधिकांश में पद, भजन, कवित्त और सवैये लिखे हैं। ऊमरदान ने विविध छंद अपनाये हैं जिनमें छप्पय, शिखरिणी, नाराच, त्रोटक, दोहा, सोरठा, मोतीदाम, मधुभार, गीत सावझडो, लावनी, सवैया, गीत जांगडो, गगरनिसांणी, पंझटिका, कुंडळिया, चौपाई एवं सिलोका मुख्य हैं। इनमें सिलोका की छटा देखने योग्य है। भजनी भक्त होने से ऊमरदान अनेक प्रकार की राग-रागनियाँ भी जानते हैं यथा-राग आसावरी, भैरव, कलिंगड, सोरठ, भैरवप्रभाती, आसा, सारंग, सोरठ पश्चिमी और बिलावल। केसरीसिंह (मेवाड़) का दोहा, सोरठा, कवित्त, और सवैया पर पूरा अधिकार है। किशन ने ‘उदय प्रकाश’ में दोहा, कवित्त, पद्धरी और त्रोटक छन्द प्रयुक्त किये हैं। फुटकर कवियों ने प्रधानत: दोहा, सोरठा, गीत, छप्पय एवं सवैया छन्द का ही प्रयोग किया है। प्रमुख दोहा-सोरठा लिखने वालों में गोपालदान, रामनाथ रतनू, सुजानसिंह, केसरीसिंह (शाहपुरा), अमरदान, उदयराज, बद्रीदान, औनाड़सिंह, विजेदान, हरदान गाडण, केसरीसिंह (मेवाड़) आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। गीत के रचयिता तो अनेक हैं जिनमें कुछ प्रमुख नाम ये हैं-कमजी, शंकरदान सामौर, कृष्णसिंह, मोतीराम, जवानसिंह, गुलाबसिंह, सूर्यमल आसिया, सांवलदान, औनाड़सिंह, चंडीदान सांदू, अर्जुनसिंह, रामकरण, जोगीदान, अम्बादान, रूपसिंह एवं लालसिंह। इसी प्रकार छप्पय लिखने वालों में शिवबख्श, श्यामलदास, मोडसिंह एवं हिंगुलाजदान के नाम नहीं भुलाये जा सकते। सवैये मुरारिदान आसिया तथा जुगतीदान देथा के हाथ से खिल उठे हैं। इनके अतिरिक्त शिवबख्श ने झमाल छंद का भी सफल प्रयोग किया है।

आलोच्य काल में कवियों की सँख्या अधिक होने पर भी अलंकारों का निर्वाह अत्यन्त कम कवियों में देखने को मिलता है। इस विद्या में सूर्यमल्ल मिश्रण, गोपालदान, गणेशपुरी, कमजी, मुरारिदान मिश्रण, शिवबख्श, कृष्णसिंह, मोडसिंह, ऊमरदान, जुगतीदान, फतहकरण, रामनाथ रतनू, केसरीसिंह (शाहपुरा), किशोरसिंह, नाथूसिंह, प्रभूति कवि विशेष निपुण हैं। सूर्यमल्ल काव्य-शास्त्र के धुरन्धर पंडित हैं। उनका पांडित्य बाधक बनकर नहीं, साधक बनकर आया है। अत: पांडित्य, अलंकार एवं ध्वनि के योग से जो भाव खड़े किये गये हैं, वे मन पर चोट करने वाले हैं। अन्य आचार्यों के सदृश कवि हाथ धोकर अलंकारों के पीछे नहीं पड़ा है। अलंकारों का समुचित प्रयोग होने पर भी कहीं कोई प्रयत्न नहीं दिखाई देता। उपमायें, रूपक एवं उत्प्रेक्षायें स्थानीय वातावरण से ओतप्रोत हैं। प्रश्नोत्तर अलंकार का विशेष प्रयोग किया गया है। इनके अतिरिक्त अन्योक्ति, अनुमान, काव्यलिंग, विकल्प, पर्यायोक्ति आदि के उदाहरण भी पाये जाते हैं। कहना न होगा कि वीर रस का वातावरण खड़ा करने में इन अलंकारों से पर्याप्त सहायता मिली है। कहीं एक ही दोहे में स्वभावोक्ति, यमक एवं अनुप्रास इन तीनों अलंकारों को जड़ दिया है। यह उल्लेखनीय है कि कवि काव्य-शास्त्र की बंधी-बंधाई लकीर का फकीर नहीं है। काव्य-शास्त्रियों ने वयण-सगाई अलंकार की अनिवार्यता पर बल दिया है। डिंगल के नियमानुसार इसका प्रयोग निर्दोषता का द्योतक है किन्तु सूर्यमल्ल वीर रस की कविता में इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध स्वीकार नहीं करते। हाँ, रसानुभूति के लिए इसका प्रयोग अवश्य करते हैं। गोपालदान ने काव्य-रीति के अनुसार स्थान-स्थान पर वर्णन को सजीव करने हेतु उपमा, रूपक, संदेह, उत्प्रेक्षादि का प्रयोग किया है जो सुन्दर है। गणेशपुरी के प्रिय अलंकार हैं- उपमा, रूपक और सन्देह। कमजी ने वयण-सगाई और उत्प्रेक्षा का अच्छा निर्वाह किया है। मुरारिदान मिश्रण की कविता भी बड़ी सानुप्रास है। शिवबख्स का उक्ति-चमत्कार सहज ही में पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है। कृष्णसिंह एवं मोडसिंह ने सामान्य अलंकार ही अपनाये हैं। ऊमरदान भी उपमा, रूपक एवं अनुप्रास से आगे नहीं बढ़े। जुगतीदान, फतहकरण, रामनाथ रतनू, केसरीसिंह (शाहपुरा) एवं किशोरसिंह में यही बात पाई जाती है। नाथूसिंह ने अनेक अलंकारों का सफल निर्वाह किया है जिनमें काव्यलिंग, वयण सगाई, यमक, अतिश्योक्ति, दृष्टान्त, दीपक, अर्थान्तर-न्यास, रूपक, व्यतिरेक, विभावना, तद्‌गुण, स्वभावोक्ति, उत्प्रेक्षा, पर्यायोक्ति, अन्योक्ति, परिसंख्या, सम, सहोक्तिं, स्मरण एवं भ्रांति मुख्य हैं।

१३. गद्य साहित्य:- आधुनिक काल (प्रथम उत्थान) तक राजस्थान में गद्य-निर्माण की परम्परा बनी रही किन्तु इसके अनन्तर जब भारत में राष्ट्रीयता की लहर उठी और हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा बनाने के प्रयत्न होने लगे तब से प्रांतीय भाषा के मोह को छोड़कर राजस्थान के चारणों ने भी हिन्दी गद्य लिखना आरम्भ किया। एतदर्थ शुद्ध साहित्यिक राजस्थानी गद्य का विकास मन्द पड़ गया। इतना होते हुए भी कुछ लेखकों ने इस ओर अपनी रुचि ज्यों की त्यों बनाई रखी। ऐसे मातृभाषा प्रेमियों में सूर्यमल्ल, गोपालदान, माधवदान उज्वल, केसरीसिंह (मेवाड़), उदयराज, सीताराम आदि के नाम सगर्व लिये जा सकते हैं।

पद्य के सदृश गद्य के क्षेत्र में भी सूर्यमल्ल की सेवायें सराहनीय हैं। ‘वंशभास्कर’ के बीच-बीच में गद्य का प्रयोग हुआ है। यह गद्य वर्णनात्मक है। उसमें काव्य का पुट पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इस पर ब्रज एवं खड़ी बोली का भी प्रभाव है। यथा-

‘रच्छकन की यह सुनि सत्या कह्यो सिंधु के मंथन तैं सुरा, चंद्र, लच्छी हू निकसे ते जैसें सर्व सामान्य भोग्य है तै सै ही पारिजात कों जानों।। अरु सची कै सकसे पति को गर्ब है तो वाके अधीस कों इहाँ आहवकों आनों।। शक्र कों जानतहू मर्त्यलोक बसिनी मैं पारिजात कों लिवाय जातहों ताकी लज्जा करि जो बलिष्ठ होहु सोही निवारन करहु। तैसें ही रच्छकन की सुनि सची नैं सब सुरन सहित सक्र संग्राम कों पठायो ताके हु बर्णन में श्रवन धरहु।। तहां पास, परिघ, प्रास, कृपान, पट्‌टिस, द्रुघन, दंड, भुसुंडी, भिंदिपाल, सतघ्नी, सूल, गदा, खट्वां, कुंत, कोदंड, परस प्रमुख सब सस्त्र धारत सुरनके सैन्यनैं बासुदेव बेढि लये।।’

कहीं-कहीं तुकांत गद्य के उदाहरण भी मिलते हैं, यथा-

‘इण ही समय राणाँ लक्खण रो पट्‌टपकुमार अरिसिंह आखेट में रमताँ कोई ग्राम रा परिसर में एक चंदाणा जातिरा हळखड़, रजपूत री पुत्री नूँ बळ में अतुळ जाणि प्रसभ-पूर्वक परणियो। अर के ही दिन उठैही रहि चंदाणी कुमराणी नूँ आधान सहित पिउहर ही मेल्हि आयो पछैं जिण प्रसवरै समय हम्मीरनाम कुमार जणियो। सोतो बाळकथको आपरी माता समेत पिता, पितामह रा बुलावण रो अवसर न जाणि नाँनाँ रै घर ही रहै। अर अठी चित्रकूट चंडासिराज हम्मीर रा पुत्र रत्नसिंह नूँ सरणें राखि राणा लक्खणसिंह रो मन आपरै आथाण आवता अलावुद्दीन रा अनीकतूँ चड चंद्रहास चखावण री चहै।।’

इसके अतिरिक्त ‘वीर सतसई’ के सम्पादकों ने राजा-महाराजाओं को लिखे हुए जिन पत्रों के नमूने दिये हैं वे गद्य की दृष्टि से नितान्त उपयोगी हैं। सूर्यमल्ल का गद्य परिमार्जित, पुष्ट एवं प्रांजल है। बलवंतसिंह (भिणाय) के नाम लिखे हुए पत्र की भाषा से इस कथन की पुष्टि होती है-

‘हिन्दुस्तान को दिन खोटो छै तीसूं एकता कोई बिरली ठांव ही रह गई छै. पांच बरस पहली अंग्रेजां ने सती होबा की बात मनै करिबा को हुकम सारा ही रजवाड़ा में लगायो तीं पर ज्यां-ज्यां की जसी-जसी बानगी का जवाब आप आपकी अजंटी में जाहिर किया त्यां में कोयां का बी जबाब एकता की संगति सूं मिल्या नहीं. तीसूं इंग्रेज भी हंस्या अर बिना एकता का जबाब कोई बी यकीन हुवो नहीं त्यां में कोई ने आपकी धर्म की राह सूं ठीक जवाब लिख्यो छै तो ऊबी जुदा-जुदा मत का कारण सूं सारां का जवाब छा जस्यो ही मान्यो गयो. एकता होती अर सबको एक जवाब जातो तो सरकार कंपनी में बी मंजूर ही होतो परन्तु हिन्दुस्थान का राजां में तो या बुद्धि रहि गई सो पैला दीन का इंग्रेज लोक वा मुसलमान पैली विलायती सूं बापर्‌या छै।।’

गोपालदान कृत ‘लावा रासा’ के बीच-बीच में गद्य की सुन्दर छटा को देखकर चित प्रसन्न हो जाता है। लेखक ने गद्य की तीन प्रमुख शाखाओं-दवावैत, वचनिका एवं वार्ता को सींचकर बड़ा बनाया है। दवावैत लावा युद्ध प्रथम को लक्ष्य करके लिखी गई है जो बड़ी ही ओजस्वी है। भाषा पर हिन्दी तथा ब्रज का प्रभाव है। इसमें तुक का ध्यान रखा गया है। एक उदाहरण दिया जाता है-

‘जिस बखत मीर खान, अहलकार दिल मालीक बुलवाये, बड़े-बड़े मीरजादे, अपने डेंरू से चलि आये। कमर्दीखान, जाफरीखान, मीरजहान मीर, असमान खान, यकतारखान, तत्तार कर्नल जमसेर बांई दस्त बांई फिंर दाहनी दस्त समसेर। उसके बीच मीर मन्नु अरज गुजराई, इस किल्ले में बहुत सी मालियत बतलाई। अपनी फौज का भय मान, इन रजपूतों को जबरदस्त जान इन गाऊं के बकाल, जिसके ये हाल हवाल। तमाम इस किल्ले में आया, जिससे अपना है दाया। हुक्म हौ इससे मामला ठहिरावैं, हुकम होय फजर किल्ले गरदावैं। जिस वक्त बोले मीर मुल्ला नवाब के चच्चा, बहुत सच्चा मामले ठहिरायबे की बात सच्ची, किल्ले गदरायबे की बात कच्ची, ये हिन्दु कछवाहे कौम नरुके, देग तेग के मुद्दं में साबत कहूं न चूके, कल्लके रोज नारनोल के चाले द्वादस हजार सैयद सांभर के खेत आये जिस पै आमेर वा जोधपुर के महाराज दोऊ सल्लाह करि जंग करिबे को चलाये। हिन्दु मुसलमान के तीन पहर तलवार चल्ली, आफताब का तेज मंद हुआ बारूद की धूम से रात मिल्ली। सैयद की फौज सिरजोर जानी, राठौर कछवाहों की फौज ने हार मानी। हिन्दू की फौज सिकिस्त खाई, यह बात नरुकोने सुन पाई। ‘. . . .

वचनिका पदबंध है और कसी हुई है। इसमें भी तुक का ध्यान रखा गया है। यह द्वितीय लावा युद्ध के विषय में लिखी गई है-

‘नबाब के सामने आया, हल्ले का जिकर चलाया। किस तौर से आज का दग्गा, कोन भिरा कोन भग्गा। उस बखत बोले कालू मीर, फुरतके फरिस्ता अकल के उजीर। इस किल्ले में सुजान सिंघ ठाकर, जिसके ‘हाजर्‌या’ चाकर। ‘हाजर्‌या’ ने आपा दिखलाया, गलबे के साथ बाहर को आया। ‘हाजर्‌या’ ने जान झोका, आफताब ने विमान रोका। निमक की सरीतीपै सिर दिया, हूरके विमान बैठि आसमान को गया। आज के हल्ले में नवाब की दुहाई, सीना से सीना मिलाकर तरवार चलाई। सब जवान वहाँ गया था, किल्ला लेना में कसूर ना रहा था। उस सुन्ने-रनि मूठ वाले ने जुल्म किया, तमाम मुसलमानों को घेंचि किल्ले की रनी में दिया। क्या अच्छी तरवार चलाई जिस बखत बोले खान दुर्जन, कालपी के सैयद ईलाहीबकस के फरजन। हिन्दु जाति काल के काल, बाडब के ज्वाल। सेरों के झुंड, बलके बितुंड। हूरों के हार, दिल के उदार। काली के चक्र, जलाल्या की टक्कर। उरस की तेज, मारुत का बेग। पोरस का भीम, उतरकी सीम। बीरों के बीर, सागर के धीर। नाहर के थाहर लोह की लाट, जंगू के जालम जमकी सी झाट। लावा के किल्ले में ऐसे रजपूत, सार के संगर बल के मजबूत।।’

गोपालदान कृत ‘शिखर वंशोत्पत्ति’ (पीढ़ी वार्तिक) ग्रंथ गद्य की उत्कृष्ट रचना है। इसमें वार्ता भी आई है। लेखक ने तुक मिलाई है। यथा-

‘स्याम ताज कफनी कमंडल मैं नीर। डाटी सुपेत, सेष सुवरण शरीर। मोकल राव आती देषि माथा कौं नवायो। साँई स्यां भुरांनी सेष नामी पंथ पायो। जंगल में चरे छी सो अव्याई झोटी आई मोकल का कनांसू सेष चीपी में दुहाई। बोल्यो दूध पीकैं सेष नीकी भांति रैणां। तेरे पुत्र होगा राव सेषा नाँव कैणां।।’

राजस्थानी गद्य के क्षैत्र में माधवदानजी उज्वल कृत ‘महात्मा श्री रामदेव जी री जीवनी’ का कुछ भाग उपलब्ध है। यह एक सराहनीय प्रयास है, उदाहरण देखिये-

‘क्षत्री वंश में तुंअर रजपूत जिणों रो राज दिली में हतो सो राजा अंब सूधो तो दिली पर राज कीनो ने पछै अब राजा री गया करावण गया जिसरे चवोंण प्रथवीराज तुंवरों रो भोंणेज हतौ सो प्रथवीराज ने राज सूंप ने गया ने क्यो राज किणी ने दीजे मती ने पछे गया सराध करने पाछा आया जितरे प्रथवीराज बंदोवस्त कर लीनों, ने इण ने क्योके गया ता के किणी ने राज मत दीजे सो हमे थोंनेई राज देउ नहीं। ‘. . . .

केसरीसिंह (मेवाड़) ने अपने काव्य-ग्रन्थों के बीच-बीच में सचरण गद्य भी दिये हैं जिनकी भाषा सशक्त है। पद्य के सदृश इस पर भी हिन्दी एवं ब्रजभाषा का प्रभाव है। यथा-

‘जा समे विशाल चतुरंगिनी के जुरने पर कंवर मानसिंह गजारूढ़ ह्वै सेना के मध्य भाग में स्थित होय ख्वाजा महमूदरफ़ी औ सियाजुद्दीन गुरोह पायन्दाह क़ज्जाक अली, मुराद उजबक़, सैयद हासिम बारहा व बक्षी अली मुराद पातशाही इक्के और राजा लुणकर्ण को हरोल में करन लगे। तथा सैना के वाम भाग में सैयद अहमद को रु दक्षिण में सीकरी के शेखों के समूह सहित काजी अली को स्थिर करि महतरखां को चन्दोल में रखि दुन्दभि पे डंके परन लगे। या प्रकार वीर पुंगव महाराणा ने भी सेना के दो विभाग करि एक सेना का नायक हकीम सूर नामक पठान शाहज़ादा को नियुक्त करि दूसरी प्रबल वाहिनी के संचालक स्वयं बनी अग्रभाग में बदनोर के रामदास राठौर को रु दक्षिण भाग में गवालियर के राजा रामशाह तँवर को तथा वाम पार्श्व में सादड़ी के राजराणा मानसिंह झाला को नियुक्त करने लगे। या तरह व्यूह बनाइ संसार से मोह त्यागि मत्ते गयन्दन की भांति भिरन लगे। ‘

उदयराज उज्वल की साहित्य-सेवा सराहनीय है। उन्होंने जैसे पद्य की सेवा की है, वैसे ही गद्य की भी। व्यवहार में तो राजस्थानी का प्रयोग करते ही थे साथ ही भाषण, निबन्ध आदि भी धारावाहिक भाषा में लिखते थे। ‘विद्वानों री भूल’ नामक वार्ता में उनकी भाषा सरल, सुबोध एवं स्वाभाविक है। उनके गद्य का एक नमूना यहाँ दिया जाता है-

‘राजस्थान में साहित्य संबंधी व इतिहास संबंधी केई वातां लिखण में केई विद्वांन भूलां करता आया है, उणों मांय सूं एक भूल अठै लिखी जावे है। अकसर इण दुहे ने महाराणा श्री भीमसिंहजी ने किणी चारण कयो आ वात मांनी हुई है नै केई लिख भी चुका है-

भीमा तूं भाठौह, मोटा मगरा मायलो।
कर राखूं काठौह, संकर ज्यूं सेवा करां।।

इणा महाराणाजी ने घणा वरस नहीं हुवा है। राजा ने इण तरे केण वाले कवि रो नांम इतो जल्दी नही भूलीजै खास कर कवि रा जात चारण में, सो उण कवि रो नांम कोई नहीं बतावै।’

सीताराम लाळस को अपनी मातृभाषा के प्रति असीम प्रेम है। उन्हें किसी भाषा पर अधिकार है तो वह राजस्थानी पर। अत: गद्य बोलते भी सुन्दर हैं और लिखते भी सुन्दर हैं। उनके प्रकाशित ‘राजस्थानी व्याकरण’ से एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है-

‘मिनख समजदार तथा विचारवान प्रांणी है। वो आपरै मन रा विचार बोले नै अथवा लिख नै दूजां रै सामनै प्रगट किया करै है नै दूजां रा विचार आप खुद सुणिया करै है। इण बिचारां नै खुलासा सूं ठीक प्रगट करण सारू साधन भासा है। आ भासा मिनख रै अनेक विचारां रै मेळ सूं वणै है नै हरअेक पूरा विचारां रै मांय केई तरै री मन री भावनाआं होवै है। हरेक पूरै विचार रो नांम वाक्य नै हरेक भावना नै सब्द कैवै है।’

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