चारण साहित्य का इतिहास – आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव चरण (उपसंहार)

(१०) साहित्यिक अवस्था

साहित्य विशिष्ट शब्द-रचना के रूप में नवीन भावों तथा विचारों से बना हुआ जीवन का रस है। भाषा भावों तथा विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है जिसे अपनाये बिना काम नहीं चलता। मनुष्य अपने जीवन-जगत् में किसी न किसी भाषा का प्रयोग करता है और उसमें साहित्य-रचना करना भी कवियों तथा लेखकों का कर्म रहा है। प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक किसी भी भाषा में साहित्य की इस रस-गंगा के दर्शन किये जा सकते हैं। जैसा देश-काल होगा वैसा ही उसका साहित्य भी ! इतिहास इस कथन की पुष्टि करता है कि भारतीय साहित्य विभिन्न कालों में वीर, भक्ति, श्रृंगार एवं राष्ट्रीय रचनाओं का अमित भण्डार रहा है। कहना न होगा कि साहित्य ने गद्य-पद्य की नाना विधाओं में स्वतंत्रता का चित्रण कर उसकी प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

भारतीय भाषाओं में सदियों से मान्य तथा प्रतिष्ठित हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने का गौरव मिलना ही था। स्वतंत्र भारत के संविधान ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी को राष्ट्रलिपि घोषित किया (१४ सितम्बर, १९४९ ई०)। अत: हिन्दी का प्रचलन बढ़ा। इसके साथ पन्द्रह प्रान्तीय भाषाओं को भी अपने-अपने क्षेत्र में काम-काज करने की सुविधायें प्रदान की गई। इनमें संस्कृत, असमिया, उडिया, बंगला, पंजाबी, काश्मीरी, गुजराती, उर्दू, तमिल, तेलगू, कन्नड, मलयालम, मराठी एवं सिन्धी के नाम सर्वविदित हैं। हिन्दी का शेष प्रांतीय भाषाओं के साथ घनिष्ट सम्बंध स्थापित हुआ और वे एक-दूसरे की पूरक बनीं। हिन्दी राष्ट्रीय जन-जीवन की अनिवार्यता बनती जा रही है। यह हिन्दी-भाषी क्षेत्रों की मातृभाषा है और शेष प्रांतों की राष्ट्र भाषा। शासन का काम-काज हिन्दी में होने से वह राजभाषा भी है। शिक्षा का माध्यम हिन्दी होता जा रहा है और राष्ट्रीय एकता की भावना जोर पकड़ती जा रही है। केन्द्रीय एवं प्रांतीय हिन्दी संस्थान, निदेशालय, अकादमियाँ तथा सभा-संस्थाओं के सद्प्रयत्नों से अनेक उल्लेखनीय रचनात्मक कार्य हो रहे हैं। भाषा-कोष, पारिभाषिक शब्दावली तथा इतिहास लेखन में गति आई है। सभी क्षेत्रों में हिन्दी आगे बढ़ रही है। इस दृष्टि से नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी; हिन्दी-साहित्य सम्मेलन, प्रयाग; राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा; दक्षिण हिन्दी प्रचार सभा आदि की सेवायें कदापि नहीं भुलायी जा सकतीं। हर्ष का विषय है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन, नागपुर के प्रथम अभूतपूर्व आयोजन से (१०-१३ जनवरी, १९७५ ई०) हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में उभर रही है। विदेशों में इसके प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन तथा अनुवाद-अन्वेषण की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। एकता के मार्ग में दलीय राजनीति एवं क्षेत्रीय संकीर्णता के कारण भाषा के नाम पर उपद्रव भी हुए जिनमें जन-धन की क्षति हुई। राष्ट्रभाषा के प्रश्न को लेकर मद्रास में आग भभक उठी। बम्बई में गुजराती-मराठी को लेकर निरीह रक्तपात हुआ। तेलगू के लिए आन्ध्र प्रदेश बना। पंजाब में भी आंदोलन उठ खड़ा हुआ और अन्तत: पंजाबी सूबा बनकर रहा। राजनैतिक दृष्टि से राजस्थान हिन्दी-भाषा-भाषी प्रान्त माना गया।

साहित्य-रचना की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि होती है। प्रत्येक युग का साहित्य एक सुनिश्चित परम्परा का प्रतीक होता है। हिन्दी कविता-विशेषत: आधुनिक हिन्दी कविता की भी एक अविच्छिन्न परम्परा है। युगचेतना के अनुरूप इसी परम्परा में नये-नये प्रयोग होते रहते हैं और प्रत्येक युग की काव्य-रचना-प्रक्रिया भिन्न-भिन्न प्रकार की काव्य-सृष्टि प्रदान करती रहती है। छायावाद (१६१५-‘३५ ई०), प्रगतिवाद (१९३५-‘४२ ई०) और प्रयोगवाद (१९४३-‘५० ई०) का बोलबाला इसका परिणाम था। इन्हीं विकास सरणियों का उत्कर्ष नई कविता है। अकविता, लघु कविता, मिनी कविता या काव्यहीन कविता आदि भी इस विकास-क्रम के विभिन्न सामयिक सृष्टि-सोपान हैं। आज समय नहीं, क्षण महत्त्वपूर्ण है अत: भिन्न-भिन्न क्षणिकायें ही उत्पन्न हो रही हैं, लम्बी-चौड़ी जीवन-गाथायें नहीं। ये कणिकायें ही मणिकायें बन रही हैं। साहित्यिक मान-मूल्य बदल रहे हैं, उनका विघटन हुआ है। विज्ञान फैल रहा है, साहित्य सिमट रहा है। संवेदनायें क्षत-विक्षत हो गई हैं, जीवन में कोई तारतम्य नहीं रह गया है। अस्तु, सन् १९५० ई० से लेकर आज तक की काव्य-धारा के विश्लेषण-विवेचन की एक यही ऐतिहासिक पीठिका है। यही अध्ययन-प्रक्रिया साहित्यिक इतिहास की नींव रखती है।

आधुनिक हिन्दी गद्य के विकास का ऐतिहासिक स्वरूप भी कम क्रांतिकारी नहीं है। हिन्दी निबन्ध और आलोचना को शुक्लोत्तर युग की बहुमुखी विकासोन्मुख प्रगतिशीलता तथा प्रयोगशीलता का सम्पर्क लाभ करने से पूर्व उन्हें भारतेंदु, द्विवेदी तथा शुक्ल युग की समस्त रचना-प्रक्रियाओं से होकर निकलना पड़ा है। इसी प्रकार ‘नई कहानी’ और ‘नये उपन्यास’ को देवकीनन्दन खत्री और प्रेमचंद युग की रचना-कला की चारदीवारी को तोड़ने में कितना अधिक संघर्ष करना पड़ा है-इसी का आलेखन उसका उपयुक्त इतिहास है। गद्य की अन्य विधाओं जैसे नाटक, एकांकी, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपातार्ज आदि के विकास का भी ऐसा ही ऐतिहासिक तारतम्य है। कहने का आशय यह कि स्वतंत्रता के उपरांत से आज तक के साहित्य की विभिन्न विधानों की पृष्ठभूमि में एक अविच्छिन्न परम्परा का योगदान है जिसे सहज ही नकारा नहीं जा सकता। साहित्य-रचना की पृष्ठभूमि का यही परम्परा-बोध इतिहास-बोध कहा जाता है जिसकी पीठिका पर साहित्य का विश्लेषण-विवेचन स्यात् अधिक सार्थक होता है।

यह लक्ष्य करने की बात है कि स्वतंत्रोपरांत हिन्दी साहित्य राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों से प्रभावित होकर नव-नव विधाओं में एक नई दिशा की ओर अग्रसर हुआ। शनैः शनैः इसमें राजनैतिक दलों की विचारधारायें प्रवाहित होने लगीं। नये-नये विचारों का समावेश होता गया। साहित्य को राजनीति से जोड़ने का प्रयास चलता रहा। इसके फलस्वरूप साहित्य में राजनैतिक विचारधाराओं के समानान्तर अनेकानेक क्रांतियां तथा उत्क्राँतियां चलती रहीं। यह देखकर प्रसन्नता है कि स्वतन्त्र भारत में प्रतिभासम्पन्न कवियों तथा लेखकों को विभिन्न सभा-संस्थाओं, अकादमियों तथा ज्ञान-पीठ ने पुरस्कृत किया है। ये पुरस्कार हजार रुपये से लेकर लाख रुपये तक के हैं जिनके प्रति आज का साहित्यकार कम आकर्षित नहीं हुआ है ? जिस कवि तथा लेखक के पास प्रचार, प्रकाशन और सम्पर्क साधना की सुविधा है वह प्रकाश में अधिक आया है। राजकीय प्रश्रय देकर अनेकानेक व्यवस्थाओं से जोड़कर तथा अन्यान्य सुख-सुविधायें प्रदान कर उनके स्वतन्त्र चिन्तन को शासकीय उपस्कारिता के लिए उपयोग किया जाने लगा। यही कारण है कि साहित्य के दर्पण में समाज की सही तस्वीर नहीं दिखाई दी। आज पूर्वापेक्षा लिखने के लिए विषय और उपादान इतने अधिक हो गये हैं कि जिनका रस खींचकर साहित्यकार समाज का मार्गदर्शन कर सकता है। राष्ट्रीय उत्थान के लिए नवीन आकांक्षाओं एवं आवश्यकताओं के अनुसार मौलिक साहित्य का सृजन अपेक्षाकृत कम हो पाया हैं। विज्ञापन और प्रकाशन के इस युग में परिमाण की दृष्टि से पर्याप्त रचनायें लिखी गई। कोई स्थान कवि तथा लेखक से रिक्त नहीं किन्तु महत्त्व की दृष्टि से इनकी संख्या कम है। यह देखकर गर्व होता है कि हिन्दी साहित्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचनाओं की साहित्यिक गरिमा आज के विश्व-साहित्य की विशिष्ट रचनाओं की गरिमा के समकक्ष है। कविता के क्षेत्र में अज्ञेय, मुक्तिबोध तथा शमशेर बहादुरसिंह का स्थान ऊँचा है। इनके अतिरिक्त कुँवर नारायण, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, गिरिजाकुमार माथुर, दुष्यंत कुमार, भवानीप्रसाद मिश्र, भारतभूषण अग्रवाल, रघुवीर सहाय, धूमिल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। नाटक के क्षेत्र में लक्ष्मीनारायण मिश्र, लक्ष्मीनारायणलाल और मोहन राकेश तथा कथा के क्षेत्र में अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, अमृतलाल नागर, धर्मवीर भारती, नागार्जुन, राजेन्द्र यादव और मनु भण्डारी विशेष लोकप्रिय हुए हैं। अन्य लेखकों में जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, कमलेश्वर, भीष्म साहनी, श्रीकांत वर्मा आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आलोचना के क्षेत्र में विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्राध्यापक प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। इनमें प्राचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० नगेन्द्र, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, डॉ० रामविलास शर्मा, डॉ० नामवरसिंह एवं प्राचार्य डॉ. विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने नेतृत्व किया है। सन् १९५० ई० के पश्चात् के चारण साहित्य को भी हिन्दी के इसी ऐतिहासिक विकास-क्रम में देखा जाना चाहिए।

(११) सांस्कृतिक अवस्था

प्राय: ‘संस्कृति’ का शाब्दिक अर्थ सुधरे, संशोधित एवं परिष्कृत संस्कारों से लिया जाता है। आजकल यह शब्द एक व्यापक अर्थ ग्रहण करता जा रहा है। संस्कृति मनुष्य, जाति, समाज और राष्ट्र के कला-कौशल, भाषा-साहित्य, धर्म-दर्शन, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, बोल-चाल, रुचि-अरुचि, ज्ञान-विज्ञान, रीति-रिवाज एवं विधि-विधान की सूचक है। इन समस्त तत्त्वों के ज्योति-पुञ्ज को संस्कृति की संज्ञा दी जाती है। सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक एवं आर्थिक सभा-संस्थाओं की आचार-संहिताओं में इसका रूप निखरकर सामने आता है। वस्तुतः संस्कृति जीवन का एक विशेष दृष्टिकोण है। सभ्यता संस्कृति की आधारशिला है। भौतिक उन्नति सभ्यता है तो आत्मिक उन्नति संस्कृति। एक स्थूल है दूसरी सूक्ष्म। सभ्यता नश्वर है, संस्कृति शाश्वत।

प्राचीन आर्य-संस्कृति एक प्रकाश-स्तम्भ बनकर सारे विश्व को आलोकित करती रही। संस्कृत संस्कृति बन गई। वैदिक काल के त्रिकाल-दर्शी ऋषियों ने काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और अटक से लेकर कटक तक के वनों, पर्वतों, नदियों, झरनों, तीर्थों और त्यौहारों का अपनी कृतियों में अनुपम चित्रण कर इस देश की अखण्डता एवं एकता का दिग्दर्शन कराया है। इनके तप-तेज ने ही व्यापकता, समन्वयता, अनुकूलता, धर्म-प्रियता एवं आध्यात्मिकता का मंत्र देकर इसे महान बनाया है। अनेकता में एकता इसकी अन्यतम विभूति है। कालांतर में जो जातियाँ भारत में आईं वे यहाँ की संस्कृति में समा गईं। यवनों के शासन-काल में मुस्लिम-संस्कृति का उद्भव हुआ जिसके साथ भारतीय संस्कृति ने सामञ्जस्य स्थापित किया। अँग्रेजों के शासनकाल में इस संस्कृति को ठेस पहुँची। मुसलमान उनके कहने में आकर अपने हिन्दू भाइयों को भूल गये जिससे देश विभक्त हुआ। यह हमारी संस्कृति की विशाल-हृदयता नहीं तो और क्या है कि पाकिस्तान बन जाने पर भी उससे अधिक मुसलमान बन्धु भारत में शान से रहते हैं और हिन्दुओं के साथ एकता का प्रदर्शन करते हैं। कहना न होगा कि पाश्चात्य संस्कृति के फलस्वरूप भारतीय जनता में विदेशी भावना आई और उसने विज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश किया। स्वतंत्रता प्राप्त करते ही सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान की योजना बनी। यह स्वीकार करना होगा कि इस क्षेत्र में अत्यन्त कम कार्य हुआ है।

आज हम संस्कृति के क्षेत्र में कहाँ खड़े हैं, इसका परिचय किस प्रकार दिया जाय ? वर्तमान भारतीय संस्कृति बाह्य संस्कृतियों का सम्मिश्रण है। नवीन दलीय राजनीति ने इसे प्रभावित किया है। जीवन में भौतिक चमक-दमक तो आई किन्तु आत्मिक तप, तेज और त्याग जाता रहा। नई-नई विचारधाराओं के कारण संस्थाओं की बाढ़ आई। अर्थ का अनर्थ हुआ तथा इनके केन्द्र भोली जनता को ठगकर झोली भरने लगे। गाँव और शहरी संस्कृति का भिन्न-भिन्न विकास होने लगा। आज मनुष्यता का लोप होता जा रहा है। मानवीय मूल्य बदल गये हैं। संस्कृति का मूल्य पैसा रह गया है। यही कारण है कि दुर्लभ चित्रों एवं अलभ्य कलाकृतियों को उड़ाने में कलाबाजी मानी जाती है। नैतिकता का इतना अधःपतन पहले कभी नहीं हुआ। सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि पुराने और नये में समन्वय नहीं हो पाता। वेश-भूषा में नवीन पीढ़ी ऐसी हो गई है कि लड़के-लड़कियों को पहिचानना कठिन हो गया। हिप्पीकट, बेलबॉटम, फैशन, नशा, सिनेमा आदि की मस्त-मौज में वह अंधी हो रही है। खान-पान बदल गये हैं। जातीय संस्कृति नष्ट होती जा रही है। भ्रष्ट आचार-विचार के कारण लोग पतित होते जा रहे हैं। रीति-रिवाज लेन-देन बन गये हैं। त्यौहार दिखावे के हैं, भीतर से उनका कोई सम्बंध नहीं है। बोलचाल शिष्टता को भी लजाती है। विज्ञान के प्रभाव से हमारी संस्कृति भौतिकता पर आधारित है। विलासप्रिय उपकरणों को सँजोना ही मनुष्य का ध्येय रह गया है। आज जिस वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्कृति का विकास होता जा रहा है उसमें सूर्य, चन्द्र और सितारों के पार जाकर घर बसाने की योजना बन रही है। रूस तो इतना आगे बढ़ गया है कि शुक्र ग्रह से बातें करने लग गया है (२२ अक्तूबर १६७५ ई०)। समय की गम्भीरता को देखते हुए हमें आज प्राचीन संस्कृति का समयानुकूल नवीनीकरण करने की आवश्यकता है।

संदेह नहीं कि साहित्य, संगीत और कला के बिना सभ्यता एवं संस्कृति स्थिर नहीं रह सकती अतः इन्हें राष्ट्रीय भावनाओं से भरना होगा। जब तक साहित्य सत्यं, शिवं एवं सुदरम् का प्रतीक न होगा तब तक सारे प्रयत्न निष्फल ही रहेंगे। नेताओं को चाहिए कि वे चिर पुरातन राम-कथा से शिक्षा ग्रहण करें। राम के बनवास जाने पर भरत राज्य करने के लिए भी तैयार नहीं हुए और राजधानी में न रहकर बनवासी के रूप में नंदीग्राम में बड़े भाई की चरणपादुका की ओट से शासन चलाते रहे। स्वतंत्र भारत में सांस्कृतिक चेतना अभिनंदनीय है किन्तु इस क्षेत्र में हमें सतर्कता, सजगता एवं सावधानी रखनी होगी। आत्म-बल के अभाव में संस्कृति का दृढ़ होना सम्भव नहीं। यह सतोष का विषय है कि केन्द्र एवं राज्य सरकारें इस दिशा में कार्यरत हैं। विभिन्न देशों से भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो रहे हैं। अनेक शिष्ट-मण्डल आते रहते हैं और परस्पर समझौते भी होते हैं। विदेशों में भारतीय संस्कृति को आदर मिला है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि पाश्चात्य देशों का अंधानुकरण हमारे जलवायु के अनुकूल नहीं। देश में अनेक सरकारी, अर्द्ध सरकारी एवं गैर सरकारी सभा-संस्थायें संस्कृति के उत्थान हेतू सक्रिय हैं। इन्हें सरकार से आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। आपात स्थिति में व्यर्थ की झूठी सांस्कृतिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने शुभ कार्य किया है। स्थान-स्थान पर युवकों का जो मुंडन-संस्कार हो रहा है, उससे भारतीयता की रक्षा होगी। भविष्य में संस्कृति का रूप क्या होगा, यह कहना कठिन है किन्तु इतना निश्चित है कि विधि-विधान को लेकर उच्चतम न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद (७ नवम्बर, १९७५ ई०) अपने पद की गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखकर प्रधानमंत्री ने जो कदम उठाये हैं, उनसे स्वतंत्र भारत सही दिशा में उन्नति के पथ पर उत्तरोत्तर आगे अग्रसर होगा और उसकी संस्कृति सारे विश्व में उजागर होगी।

(१२) राजपूत एवं चारण

स्वतंत्रता-काल के इस विवरण, विश्लेषण तथा विवेचन से स्पष्ट है कि राजस्थान में राजपूतों की वह स्थिति नहीं रह गई जो पहले थी। यह उनका पतन-काल था। समय की तेज धारा में सामंतवाद बह गया और पूंजीवाद भी डूबने लगा। जीवन के नाना क्षेत्रों में अभूतपूर्व परिवर्तन होने से सामान्य राजपूत का भविष्य भँवर में पड़ गया। नई व्यवस्था ने राजा-महाराजा एवं जागीरदार को हिला दिया। वे अपने वंश-परम्परागत शासन से च्युत हो बैठे। अँग्रेजों के चले जाने के बाद उन्हें विजयी काँग्रेस के आगे नत-मस्तक होना पड़ा। जनता दूर जा पड़ी थी और उसमें मिलने-जुलने का समय जाता रहा था। अत: उनका प्रभाव दिन-दिन कम होने लगा। राजपूत जाति विभिन्न दलों में विभक्त हो गई। ऊँच-नीच का जातीय भेद-भाव मिटने लगा। सदियों से पद-दलित अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जन-जातियाँ तथा अन्य पिछड़े वर्ग ने सामंतवादी शोषण से मुक्त होकर संतोष की साँस ली। पराधीन काल में स्वयं काँग्रेस ने उनके उत्थान के लिए संघर्ष किया। सत्ता में आते ही इस दल ने सर्वप्रथम इन आहत लोगों को राहत पहुँचाने के लिए कानून बनाये और अनेक योजनाओं का श्रीगणेश किया। फलत: शताब्दियों से पिछड़ी जातियाँ धीरे-धीरे ऊपर उठने लगीं और ऊपर की जातियां नीचे आने लगीं। आज सभी जातियों के व्यक्ति जीवन के समान धरातल पर खड़े हैं।

स्वतंत्र भारत में राजपूत सामान्य नागरिक बनकर रह गये। समाजवाद ने उन्हें झकझोर दिया। प्रारम्भिक वर्षों में राजपूतों को जो विशेष सुविधायें प्राप्त थीं, वे भी समाप्त हो गईं। राजपूत नई शासन-व्यवस्था में अपने को नहीं संभाल पाया और न परिस्थितियों के अनुरूप ढाल पाया। इससे वह दुविधाओं में पड़ गया। आर्थिक दृष्टि से वह शनैः शनैः क्षीण होता गया। अतुल सम्पदा के वे ‘धणी’ अपनी सम्पत्ति पर अधिकार खोने लगे। निश्चित सीमा से अधिक की जर-जमीन से वे हाथ धो बेठे। महल सूने पड़ गये और विशाल दुर्ग काँप उठे। इनका उपयोग जनता के हित में किया जाने लगा। राजपूतों को अपनी स्थिति बनाये रखना कठिन हो गया। स्वार्थ ने सबको घेर लिया। और तो और, जयपुर की भूतपूर्व महारानी सम्प्रति लोकसभा-सदस्या श्रीमती गायत्री देवी तक को विदेशी विनिमय तथा तस्करी गतिविधि निरोधक कानून के अन्तर्गत बंदी बनाया गया और सामान्य जनता श्रेणी में रखा गया (३० जुलाई, १९७५ ई०)। यह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना है।

आज राजपूत जीवन के एक नये मोड़ पर खड़ा है। समय और परिस्थितिवश उसे खेती, व्यापार एवं नौकरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा है। कृषि के क्षेत्र में सागड़ी (बंधक मजदूरी) प्रथा की समाप्ति से उसे स्वयं कड़ा परिश्रम करना पड़ रहा है। कुछ महानुभावों ने शिक्षा प्राप्त कर केन्द्र एवं राज्य-सेवा में महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त किये हैं। कुछ नवीन राष्ट्रीय साँचे में ढलकर पंच से लेकर मंत्री तक के पद पर आसीन हुए। यह लक्ष्य करने की बात है कि इस जाति के बहादुरों ने पुलिस तथा सेना की नौकरी में प्रशंसनीय सेवायें कर अच्छा नाम कमाया। यही बहादुरी जब नगर की सड़कों पर मारपीट के रूप में प्रकट हुई तब कायरता कहलाई। व्यापार में विचार तथा व्यवहार का सामञ्जस्य नहीं हो पाया। ऐसे लोग अपनी झूठी ऐंठ और थोथी शान में गाँठ का भी गँवा बैठे। व्यापार राठोड़ी से नहीं, भाईचारे से चलता है। उचित व्यवहार तथा नैतिकता ही सफल व्यापार को कुजी है। जन-जीवन में जोर-जबरदस्ती से भय-आतंक उत्पन्न करना आज की सबसे बड़ी हिंसा है। इन चरणों में फौज का भगोड़ा एक भूतपूर्व तोपची बैठा है जिसके पास अपनी व्यावसायिक दुर्गन्ध को सूंघने के लिए नाक ही नहीं है। इस प्रकार जो राजपूत जाति कभी भौतिक उत्कर्ष पर पहुँची थी, इस काल में विशेष प्रभावित हुई।

आलोच्य काल में चारण-कवियों ने राजपूतों को लक्ष्य करके जिन रचनाओं की सृष्टि की है, उनसे उनमें पनपी बुराइयों का ही बोध होता है। स्वर्गीय कवि नाथूदान बारहठ (डाभड़) की दृष्टि में वह पथ-भ्रष्ट हो चुका है। उन्होंने अपनी खीझ इन शब्दों में प्रकट की है-

वाज मती रे वायरा, खाली मत कर खेत।
रही नहीं (तो) की राळस्यों, रजपूतों सिर रेत।।

वयोवृद्ध कवि श्री बद्रीदान कविया के शब्दों में-

ब्रिटिश हकूमत व्ही बिदा, छिन में भारत छोड़।
राजा-महाराजा रुळ्या, ठाकरड़ों की ठोड़।।
क्यारे-क्यारे कट पड्या, जमीं काज खग झेल।
हुँस-हँस दीधी हींजडो, पृथ्वी हाथ पटेल।।

प्रसिद्ध जन-कवि रेवतदान कल्पित की कविता का यह अंश देखिये, जिसमें स्वतंत्रोपरांत राजपूतों का यथ्य-तथ्य चित्र अंकित किया गया है-

भंवर नै नित आवै भटका, भंवर नै नित आवै भटका।
वे सौ-सौ नौकर संग, कठै वो मैलां रौ बसणौ।
वे ऊंधा गोडा घाल, कठै वो मरजी रौ हसणौ।
रे जाजम गदरा ढाळ, कठै वो चौपड़ रौ रमणौ।
रे मूंछां रै बट देय, कठै वो सभा बीच जमणौ।
सुण करसा साची बात, बायरौ उलटौ ही बै’गौ।
रे मिटगी ठकराई, नाम ठाकर सा बस रै’गौ।
वे चरका फरका मांस, कठे वे दारू रा गटका।।
भंवर नै नित आवै भटका, भंवर नै नित आवै भटका।
सुण करसा सांची बात, भंवर नै नित आवै भटका।।

रे अैंठौ मांजै आज कुण, कुण दै आटौ पीस।
कांम बिगाड़ै आज कुण, किण पर काढां रीस।
अणगिण हुती वे दासियां, रहती चहल-पहल।
वां बिन लागे हाय रे, सूना आज महल।
हमै वे डावड़ियां कठै, जकै करती नित मटका।।
भंवर नै नित आवै भटका, भंवर नै नित आवै भटका।
सुण करसा सांची बात, भंवर नै नित आवै भटका।।

आगी गई बेगार, रही हमैं न लाग।
पूंख गया वे आगडा, दै न टकै रौ साग।
जे पैली आ जांणता, (कै) लुट जासी अै बाग।
तौ गुण गांधी रा गावता, बांध तिरंगी पाग।
पर बात पुरांणी वे करै, ज्यां रै घर घाटौ।
मीठा री मन में रही, नै मिळै नहीं खाटौ।
खारौ जैर पीवां तौ कींकर, फांसी में लटकां।
भंवर नै नित आवै भटका, भंवर नै नित आवै भटका।

सुण करसा सांची बात, भंवर नै नित आवै भटका।।

लकीर के फकीर ठाकुरों के प्रति श्री भँवरदान वीठू ‘मधुकर’ की यह भर्त्सना देखिये-

ठाकर विष छोड़ साकर रो ठाकर, आखर आखर संमज अरोड़।
चाकर खिसक गया कर चौरी, छौरी पण नाठी घर छोड़।
भारत भयो सुतंतर भोला, डोला फाड़्यां कोण डरै।
चटी फसाद डकेत्यां चौरी, क्यां कोरी करड़ाण करै।।
वरतमान वखत वोटां रो, सोटां रो आथंमियो सूर।
रंग खाटण सेवक वण रांगड़, वांगड़ पण रौ मूंडो बूर।।

इन कवियों ने पुरुषों के साथ नारी-समाज का वर्णन निर्भीकता से किया है। ब्रजलाल कविया (बिराई) ने महारानियों और ठकुरानियों की तस्वीर उतारते हुए लिखा है-

केई ठकरांणियां कनातों कोट कर, देखती कदे नह जाय डौढी।
जके महारांणिया खेत लग जावसी, अकेली सीस पर धार ओडी।
सत्रुवां तणै मन हरख दरसावसी, करैला माजनो एक कौडी।।

राजपूत जाति के साथ चारण जाति भी प्रभावित हुई। राजा के साथ कविराजा की स्थिति भी बड़ी डाँवाडोल हो गई। जब आश्रयदाताओं का ही कहीं ‘ठिकाना’ नहीं रहा तब कवियों को आश्रय कैसे मिलता? क्षत्रिय राजवंशों का सूर्य-अस्त हो जाने से इन कवियों का भविष्य धूमिल हो गया। अतः वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए इन्हें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। उत्तम तो यह होगा कि कवि व्यक्ति की कविता का परित्याग कर स्वार्थ एवं प्रलोभन को सदैव के लिए विदा कर दे। अब व्यक्तिगत कविता का युग बीत चुका है। स्वर्गीय ठा० किशोरसिंह बार्हस्पत्य ने ऐसे कवियों को आड़े हाथ लेते हुए लिखा था- “आज अपने देश या हिंदू जाति के हित के लिए अपनी बलि देने वाला एक भी महाराणा प्रताप या शिवाजी दिखाई नहीं देता, जिसकी प्रशंसा कर हम अपने को कवि कहलाना सार्थक समझें। अब तो ओदी में बैठकर राईफलों द्वारा शेर या सूअर का शिकार करने वाले वीरों की गणना में समझे जाते हैं और चारण कवियों से अपनी वीरता के झूठे काव्य सुन पाइयों में उनको प्रसन्न भी करते हैं। एक रुपया देकर चारण कवियों द्वारा कर्ण कहलाना आजकल बहुत सुलभ है। चोरों, लुटेरों, व्यभिचारियों आदि की प्रशंसा हमने अर्थ-लोलुप चारण कवियों से सुनी हैं।”

वर्तमान समय में विभिन्न जातियों का प्राचीन रूप शनैः शनै: मिटता जा रहा है। एतदर्थ चारण साहित्यकारों को दूरदर्शी बनकर अपनी रीति-नीति में समयानुकूल परिवर्तन करना होगा। एक निश्चित लक्ष्य के अभाव में यह जाति अपना साहित्यिक मार्ग तय नहीं कर पाई है। चारण कवि एवं लेखक देशकालानुसार लोक-जीवन सम्बंधी विषयों पर ही कविता लिखकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रख सकते हैं और इधर स्वतंत्रता-काल में ऐसा होने लगा है। राज्याश्रय के अभाव में अब धीरे-धीरे ‘चारण’ शब्द का वह वंश-परम्परागत अर्थ प्राय: लुप्त होता जा रहा है। ‘चारण’ का शुद्ध साहित्यिक अर्थ देवत्व अथवा क्षत्रियत्व अथवा मनुष्यत्व की कीर्ति का प्रचार करना है और जो कविता एवं इतिहास के द्वारा इनमें से किसी को भी अपना विषय बना लेता है वह है चारण ! अत: इस समाज को अपने काव्य-क्षेत्र का विस्तार कर जीवन एवं जगत् की व्यापकता देखनी होगी। सम्पूर्ण राष्ट्र के हित-अहित को ध्यान में रखते हुए साहित्य का सृजन करना होगा। जिन राज्य-दरबारों में रहकर वे मलार गाया करते थे, अब न तो वे महल ही रह गये हैं और न वे राजा ही। अब राज्य प्रजा का है। तलवार और तोप बीते युग की बातें हैं। समय प्रतिपल इतना तेजी से बदल रहा है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। जल-थल-वायु पर विज्ञान का अधिकार हो गया है। अणु-आयुध क्षण भर में ही सृष्टि का नाश कर सकते हैं। भयभीत होकर बड़े-बड़े राष्ट्र नि:शस्त्रीकरण की वार्ता कर रहे हैं। ‘जीओ और जीने दो’ का नारा गूंज उठा है। अहिंसा के इस युग में युद्ध-वर्णन शोभा नहीं देता। संसार सदियों की शिक्षा के पश्चात् आज मार-काट बंद करने के लिए विचार-विमर्श कर रहा है। अत: चारण कवि का कर्त्तव्य है कि वह स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं तथा आकांक्षाओं के अनुरूप काव्य-रचना करे। इस हेतु यदि वह सत्तारूढ़ दल की गतिविधियों का सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए उसे कर्त्तव्य-पथ पर चलाने के लिए उपदेश देता रहे तथा निष्काम सम्पर्क रखकर लोक-रक्षा में हाथ बँटाये तो यह उसकी परम्परा के अनुकूल होगा और राष्ट्र के लिए श्रेयस्कर भी। सच्चाई, ईमानदारी तथा समझदारी से लिखा हुआ साहित्य चिरन्तन होता है।

संदेह नहीं कि आज का युग परस्पर वार्तालाप का है। अब सब समस्याओं का एक ही हल रह गया है- बातचीत। हमें नहीं भूलना चाहिए कि वार्ता की भी एक सीमा होती है। जब कोई भी विकल्प न रह जाय तब अंततः शस्त्र उठाना ही पड़ता है। आत्म-रक्षा पौरुष है। वीर रस चिरन्तन। जीवन में अहिंसा के साथ हिंसा का भी महत्त्व है। यदि कोई अहिंसा से सीधे मुंह बात भी न करे तो बाध्य होकर राष्ट्रीय जन-रक्षा एवं कर्त्तव्य-पालन के लिए लड़ना-भिड़ना भी पड़ता है। हिंसा समय और परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में कभी-कभी वरदान सिद्ध हो जाती है। यदि कोई स्वतंत्र राष्ट्र की सीमा को चुपचाप पदाक्रांत करने लगे और समझाने-बुझाने पर भी न माने तो प्रतिरक्षा लिए बल-प्रयोग करना ही पड़ता है। डाकुओं का पीछा करने वाला सिपाही तो रात-दिन लड़ाई के नशे में ही रहता है। अँधेरी रात में सेंध लगाकर आया हुआ कोई व्यभिचारी यदि शयन-कक्ष से किसी की काँता उड़ा ले जाय तो क्या पंचशील का मंत्र पढ़ने से वह संकट टल जायगा? चाहे जिस दृष्टि से देखा जाय- युद्ध की आवश्यकता सदैव रही है, आज भी है और भविष्य में भी रहेगी। हाँ, रूप एवं मात्रा में भेद अवश्य हो सकता है। वीर-काव्य के प्रणेता चारण को विचलित होने की कोई आवश्यकता नहीं। संकटकालीन साहित्य का ही दूसरा नाम चारण साहित्य है। संकट की घड़ियों में यह साहित्य एक प्रकाश-स्तम्भ है। स्वतंत्रोपरांत इन कवियों ने चीन तथा पाक से हुए युद्धों को लक्ष्य करके जो गीत रचना की है, वह बड़ी ही प्रेरणादायक है।

चारण जन्मजात कवि है और इतिहास का ज्ञाता भी। वह सत्तारूढ़ शासक-दल का सनातन समालोचक है। अत: वह अजर-अमर है। उसने सत्तारूढ़ शासक दल के अच्छे कार्यों की प्रशंसा और बुरे कार्यों की निंदा की है। पहले वह राजपूत के गीत सुनाता था तो आज जनता के गीत सुना रहा है और उसके द्वारा पुरस्कृत भी हुआ है। इन वर्षों में केन्द्र तथा प्रांत में काँग्रेस का शासन होने से वह उसकी गुण-दोष व्यंजना करने लगा है। शासन को सत्पथ पर लगाना चारण का कर्तव्य है। इसके लिए वह कविता तथा इतिहास का पाठ पढ़ाता है। इससे प्रेरित होकर जो प्रांत या देश के लिए कुछ कर गुजरता है उसका नाम अमर हो जाता है। सच पूछिये तो अब चारण साहित्य का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक हो गया है। कवि तथा लेखक सम-सामयिक जीवन तथा जगत् की व्यवस्था करने लगे हैं। उसके विषय और उपादान भले ही बदले हों, साहित्य-सेवा में किसी प्रकार का अंतर नहीं आया है। चारण चुस्त, साहसिक, परिश्रमी, दृढ़, कर्त्तव्य-परायण एवं शासन-पटु है। उसने कई राजवंशों का उदय तथा अस्त होना देखा है। उसके स्वयं के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आये हैं। भू-भवन की सीमा निर्धारित हो जाने से धनाढ्य चारण प्रभावित हुए हैं। सामान्य चारण जीविकोपार्जन के लिए कृषि, पशु-पालन एवं राज्य-सेवा करता आया है और आज भी कर रहा है। शेष व्यक्ति व्यापार में सूझ-बूझ से कार्य करते हैं। कृषि के क्षेत्र में श्री अचलदान आढा, तेजदान वणसूर, बद्रीदान किनिया, प्रभुदान कूंपड़ावास, चंडीदान देथा, सूर्यदेवसिंह बारहठ आदि ने विशेष ख्याति अर्जित की है। इनमें से श्री सूर्यदेवसिंह बारहठ (माहुँद) तथा चंडीदान देथा (बोरूंदा) राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री की उपाधि से अलंकृत किये गये हैं।

इन वर्षों में कई योग्य एवं प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति जीवन के नाना क्षेत्रों में आगे बढ़े और अपने विशिष्ट गुणों के कारण चमके। अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्रसंघ के अन्तर्गत विश्व स्वास्थ्य संगठन के सचिव डॉ. मुरली मनोहर आढ़ा (पांचेटिया) सबसे आगे हैं। वैज्ञानिकों में नेहरू पुरस्कार से विभूषित डॉ. के० डी० सिंह तथा श्री रघुराजसिंह अग्रज हैं। श्री मोहनसिंह कविया फिल्म डायरेक्टर के रूप में उन्नति कर रहे हैं। राष्ट्रीय क्षेत्र में श्री हेतुदान उज्वल, साँवलदान उज्वल, कैलाशदान उज्वल, चरणदास आढा एवं फतहसिंह देवल भारतीय प्रशासनिक सेवा के अत्यन्त उज्ज्वल नक्षत्र हैं जिन्होंने कठोर घड़ी में भी अपने कर्तव्य का सफलतापूर्वक निर्वाह किया है। इसी प्रकार श्री बाघदान (बघ्घोमल) केन्द्र में सहायक सचिव के पद पर नियुक्त हुए। रेल-सेवा में श्री लालसिंह उज्वल बेजोड़ हैं और उच्च पद पर प्रतिष्ठित हैं। जल-थल-वायु सेना में भी इस जाति के वीरों का योगदान रहा है। नौसेना में देशनोक के अश्विनीकुमार सिंढायच तथा सांवलदान रतनू (चौपासनी), थल-सेना में अमर शहीद लेफ्टिनेंट देवपालसिंह, केप्टिन जोधसिंह उज्वल, केप्टिन फतहसिंह सिंढायच, केप्टिन रूपसिंह सिंढायच, वासुदेव देवल, केप्टिन महावीरसिंह सांदू, केप्टिन जसवंतसिंह बाटी, सुरेन्द्रसिंह वीठू तथा वायुसेना में लेफ्टिनेंट चक्रवती सांदू, ओमप्रकाश आढा आदि के नाम सगर्व लिये जा सकते हैं। राज्य-प्रशासन में श्री शुभकरण कविया, मोहनसिंह महियारिया, शुभकरण आढा, जोरावरसिंह सांदू, फतहसिंह मानव, मघराज उज्वल, भवानीशंकर वीठू, शक्तिदान महडू, चंडीदान देवल, सहसकरण आढा, चावंडदान देवल, ईश्वरदान सांदू, देवीसिंह बारहठ, जयसिंह कविया, भँवरसिंह खिडिया आदि की सेवायें उल्लेखनीय हैं। तहसीलदार के पद पर श्री रूपसिंह सिंढायच, प्रभुदान उज्वल, थानसिंह खिड़िया, बालूसिंह सांदू, शिवराज उज्वल, देवीसिंह आढा, कानदान बारहठ, वचनदान देवल, शक्तिदान वीठू, जीवनसिंह बारहठ, दुर्गादान वीठू, उदयसिंह देवल, के० के० लधाणी आदि सुशोभित हैं। न्यायाधीश के रूप में श्री लक्ष्मीदान सांदू, सुमेरदान देवल, विजयकरण आढा, गणेशदान आसिया, सवाईसिंह कविया आदि आदरणीय हैं। विधिवेत्ताओं में श्री बैजदान बारहठ, प्रभुदान बारहठ, बद्रीदान कविया, जयकरण बारहठ, सुखदेव किनिया, हणवन्तदान बारहठ, उदयकरण आढा, अभयकरण बारहठ, सादूलसिंह बारहठ, मोहनसिंह बारहठ, शत्रुशालसिंह बारहठ, चालकदान बारहठ, चावंडदान सांदू, माधोसिंह सांदू, जोरावरसिंह वणसूर, बद्रीदान सांदू, दुर्गादान सांदू, वसुदेव सांदू, गुमानसिंह बारहठ, मनमोहन किनिया आदि अग्रगण्य हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ० शिवदत्त उज्वल, डॉ. जोरावरसिंह, उज्वल, डॉ० करणीसिंह रतनू, डॉ. वासुदेव कविया, डॉ. देवेन्द्रकुमार उज्वल, डॉ० नरपतसिंह, डॉ० दलपतसिंह, डॉ. सुमेरसिंह बारहठ, डॉ. अश्विनीकुमार कविया, डॉ० रविन्द्रसिंह सौदा, डॉ० मूलसिंह बारहठ, डॉ० जीवनसिंह उज्वल, डॉ० तेजसिंह उज्वल, डॉ० चन्द्रसिंह उज्वल, डॉ० भीमदान देथा, डॉ० दुर्गादान देवल, डॉ० सोहनसिंह बारहठ, डॉ. जोरावरसिंह बारहठ, डॉ. गिरवरसिंह हापावत, डॉ० हरीसिंह सांदू, डॉ. नरेन्द्रकुमार जुगतावत आदि लोकप्रिय हुए हैं। इनमें से प्रसिद्ध सर्जन डॉ० जोरावरसिंह उज्वल तथा होनहार डॉ. देवेन्द्रकुमार उज्वल से और अधिक आशायें थीं किन्तु क्रूर काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। पशुचिकित्सकों में डॉ० दुर्गादान कविया, डॉ० कल्याणदान सांदू, डॉ० गुमानसिंह वीठू, डॉ. जयसिंह खिड़िया, डॉ० हरकरण उज्वल, डॉ. नरेन्द्रसिंह बारहठ आदि की सेवायें नहीं भुलाई जा सकतीं। पुलिस सेवा में श्री रामसिंह बारहठ, जैतदान उज्वल, धनसिंह लालस, कुबेरदान देथा, सुल्तानसिंह सांदू, खंगारसिंह सांदू, जयसिंह उज्वल, महताबसिंह महियारिया, ब्रजराजसिंह जगावत, रामसिंह जगावत, करणीदानसिंह आढा आदि ने नाम कमाया है। उच्च माध्यमिक स्तर तक कई अध्यापक सेवारत हैं, किन्तु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में डॉ० शक्तिदान कविया, डॉ० ब्रजलालसिंह गाडण, डॉ० सोहनदान बारहठ, डॉ. वासुदेव देवल, भँवरसिंह सामौर, अम्बादान सिंढायच आदि प्राध्यापक ख्याति अर्जित कर रहे हैं। श्री नारायणसिंह कविया ने आबकारी अधीक्षक, श्री अक्षयसिंह रतनू ने राज्य सचिवालय, जयपुर तथा श्री बुद्धकरण उज्वल ने आयकर अधिकारी के रूप में सराहनीय सेवा की है। लेखा-विभाग में श्री भोपालदान उज्वल, मेघदान उज्वल आदि अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय दे रहे है। बैंक सेवा में श्री जयकरण किनिया, इन्द्रदान रतनू, माधोसिंह सांदू, नारायणसिंह उज्वल, माधोसिंह सिंढायच, नरपतसिंह सांदू, हिम्मतसिंह आदि निष्ठा से कार्य कर रहे हैं। नई व्यवस्था में कई लोग पंच, सरपंच, पार्षद, प्रमुख तथा प्रधान के रूप में जनता की सेवा कर रहे हैं। यह लक्ष्य करने को बात है कि इस सेवा के उपलक्ष में स्व० भैरुसिंह देवल (जैतारन) का स्मारक उनकी अक्षय कीर्ति का द्योतक है। श्री सुखदेव वीठू नगर-परिषद के अध्यक्ष रह चुके हैं। पंचप्रधान के रूप में श्री सूर्यदेव सिंह बारहठ, देवकरण बारहठ, केसरीसिंह मूंदियाड़, तेजसिंह वरणसूर आदि की सेवायें सराहनीय हैं। लोकप्रिय श्री केसरीसिंह मूंदियाड़ चुनाव में विजयी होकर विधानसभा के सदस्य बने। पुरुषों के सदृश नारी-समाज में भी चेतना आई और शिक्षा की ओर ध्यान गया। शुभ श्री सोहनकुंवर इस समाज की प्रथम मैट्रिक, पद्मजा प्रथम बी० ए०, आनंदकुंवर प्रथम एम० ए० तथा शोभाकुंवर प्रथम एल० एल० बी० हैं। महिला चिकित्सकों में डॉ० श्रीमती मदनकुंवर तथा डॉ. उमा उज्वल ने यश कमाया है। यह देखकर प्रसन्नता होती है कि राजस्थान के तपस्वी नेता केसरीसिंह सौदा की पौत्री नगेन्द्रबाला विधान-सभा-सदस्या के रूप में कुशल नेतृत्व कर रही हैं। इन विशिष्ट व्यक्तियों में कई पुरस्कृत हैं।

(१३) राजस्थानी भाषा और साहित्य

राजस्थानी ढाई करोड़ नरनारियों की जीवन्त भाषा है। भूतपूर्व राज्यों के एकीकरण से अब इसकी सीमायें सुनिश्चित हो गई हैं। यह वीरों की भाषा है और बड़ी स्वाभिमानिनी है। इसकी आन, बान और शान ही निराली है। इस भाषा का इतिहास सहस्रों वर्ष प्राचीन है। इसमें स्वतन्त्र सम्प्रेक्षण की क्षमता है। जो भाव या विचार अभिव्यक्त होता है, उसे उसी रूप में समझा जाता है। यह एक सशक्त, समृद्ध एवं स्वतंत्र भाषा है। इसकी अनेक बोलियां हैं। राजस्थानी में ऐसे भाव-बोधक शब्द मौजूद हैं जिनका पर्याय अन्य भाषाओं में दुर्लभ है। यहाँ के किसी निवासी से बात कीजिए, संदेह दूर हो जायगा। राजस्थानी अपने संस्कार, स्वभाव, प्रकृति, स्थिति एवं वातावरण में जुदा है, इसे कौन अस्वीकार करेगा ? जो चारण-गीत राजस्थान में गूँज रहे हैं वे पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण कहीं पर भी नहीं सुनाई देते। जो रस राजस्थान और राजस्थानी में है, वह भूमण्डल में और कहीं नहीं। फिर भी राजस्थानी को पृथक् महत्त्व न देना आँखों को धोखा देना है।

जहाँ तक प्रान्त का सम्बन्ध है, स्वाधीनता की स्वर्ण किरण ने बिखरे हुए भूतपूर्व राज्यों का एकीकरण कर इसे एक विशाल रूप प्रदान कर दिया है किन्तु जब तक ये विभिन्न राज्य भावात्मक एकता के सूत्र में नहीं पिरो दिये जाते तब तक राजस्थान का यह नवनिर्मित स्वरूप अपूर्ण ही माना जायगा। इस अभाव की पूर्ति के लिए चारणों को राजस्थानी का रूप सुधारना होगा, कलाकारों को अपनी उपयोगी एवं ललित कलाओं में रंग-बिरंगे चित्र चित्रित करने होंगे और कवियों तथा लेखकों को अपने काव्य-कलश में रस का पंचामृत तैयार करके अकुलाई धरती की चिर तृषा को शांत करना होगा। वस्तुत: भाषा के माध्यम से ही राजस्थान का जन-जन, चाहे वह यहाँ का निवासी हो अथवा प्रवासी, एक-दूसरे के सन्निकट आकर मन और मन का तथा हृदय और हृदय का सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। जब राजस्थान का अतीत वर्तमान के लिए नव-संदेश लेकर खड़ा है तब सबसे पहले आत्मा के आनन्द-भाव में मग्न होकर कहना होगा-राजस्थान की धरती हमारी माता है और हम उसके पुत्र ! इस उदात्त भावना के आगे कोई भी कठिनाई नहीं आ सकती। हम अपनी संस्कृति को कितना ही गौरव क्यों न प्रदान करें, इस उर्वर भाव को हृदयंगम किये बिना सारा रूप कुरूप है, रंग निरंग है और रस नीरस है।

राजस्थानी की वर्तमान अवस्था का परिचय किस प्रकार दिया जाय? सत्य और अहिंसा की दीप-शिखा ने दासता के निविड़ अंधकार को विदीर्ण कर हमें आलोक में खड़ा कर दिया है। पन्द्रह अगस्त का शुभ दिन हमारे राष्ट्रीय इतिहास में एक महान् पर्व का प्रतीक है। विभाजन का निर्मम नश्तर सहकर जब राष्ट्र का हृदय छटपटाता हुआ देश के अन्य भागों में बिखर गया तो उसके करुण आर्तनाद को सुनकर जहाँ एक ओर हमारी लोकप्रिय सरकार ने तत्परता के साथ उसके पुनर्वास का प्रबन्ध किया वहाँ दूसरी ओर राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने की महत्त्वाकांक्षा से हिन्दी को राष्ट्रभाषा के परम पद पर आरूढ़ किया। राजस्थानी को अन्य पन्द्रह प्रांतीय भाषाओं के सदृश पृथक भाषा मानने की आवश्यकता नहीं समझी गई। एक ओर आधुनिक काल की अंग्रेजी और अंग्रेजियत ने प्रांतवासियों के मन-मस्तिष्क को जकड़ रखा है तो दूसरी ओर हिन्दी की सर्वव्यापकता ने सबका ध्यान अपनी ओर केन्द्रित कर दिया है। इन दोनों के बीच राजस्थानी अपना भाग्य-निर्णय नहीं कर पाती। नवशिक्षित वर्ग अपनी मातृभाषा की अवहेलना करने लग गया है, यहाँ तक कि उसे परस्पर राजस्थानी में बातचीत करने में भी लज्जा का अनुभव होने लगता है। जिस राजस्थानी के एक दोहे में सिंहासन को पलट देने की अद्भुत क्षमता थी, उसमें लिखना पढ़ना तो दूर रहा, बोलना तक सभ्य समाज की शान के विरुद्ध समझा जाने लगा है। यही कारण है कि राजस्थानी में रचना करने वाले इने-गिने ही रह गये हैं।

दुर्भाग्य से दलीय राजनीति के चश्मे ने दृष्टि-भेद उत्पन्न कर दिया है। निम्न नेता भाषा को अपना-अपना रंग देकर स्वार्थ-पूर्ति में लगे हैं। कुछ वर्षों पूर्व राजस्थानी साहित्य में जिनका नाम-निशान तक नहीं था, वे नव-नव विधाओं के स्वयंभू बन बैठे हैं। ये लोग पक्ष-विपक्ष बनाकर राजस्थानी का झंडा लिये घूमते हैं, झूठा प्रचार करते हैं और सरस्वती के पवित्र मन्दिर में घुस-बैठकर घटिया किस्म की राजनीति चलाते हैं। इनकी पढ़ने-लिखने में कोई रुचि नहीं। साहित्य-रचना से ये कोसों दूर हैं। सभा-संस्थानों को ये बातें शोभा नहीं देतीं। इससे उदर-पूर्ति भले ही हो जाय, राजस्थानी भाषा और साहित्य का कल्याण कदापि नहीं हो सकता। साहित्यिक एवं शैक्षिक दासता के कारण व्यक्ति ने अपना मत खो दिया है।

राजस्थान का एकीकरण शांतिपूर्वक सम्पन्न हुआ लेकिन राजस्थानी का रह गया। अतः इसके स्थिर एवं निश्चित रूप की ओर विद्वानों का ध्यान गया। समय के साथ-साथ आवाज़ उठी कि इसके सम्भाव्य स्वरूप पर भी विचार कर लिया जाय। यह विषय विचार का नहीं व्यवहार का है, वक्तृता का नहीं लेखन का है और कामना का नहीं साधना का है। भाषा की एकरूपता के लिए सभी बोलियों का उचित प्रतिनिधित्व ही इसका हल है। सम्भव है, सीमा-परिवर्तन के कारण नवागंतुक ब्रज, गुजराती एवं सिन्धी भाषाभाषियों को कुछ कठिनाई हो किन्तु प्रांत के व्यापक हित में उन्हें राजस्थानी अपनाना होगा। शब्द एक सिक्का है। जिन लोगों ने यहाँ बसकर इसमें आदान-प्रदान किया है, उनका काम जमा है। ऐसे लोगों को राजस्थानी से रागात्मक तादात्म्य स्थापित कर ऐसा घुल-मिल जाना चाहिये जैसे वे यहीं के हों। हिन्दी जानने वाला राजस्थानी सीखने में देर नहीं करता क्योंकि ये दो भाषायें परस्पर एक दूसरे से आबद्ध हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘वीर गाथा काल’ (चारण काल) के रूप में राजस्थानी को जो मान्यता मिली है, वह इसका उदाहरण है। आलोच्य अवधि के नवोदित साहित्य का अनुशीलन करने से पता चलता है कि कवि एवं लेखक अपने-अपने भूतपूर्व राज्यों की सीमाओं से बँधे हुए हैं। यह वर्ग क्षेत्रीयता से ग्रस्त है और क्षुद्र भावनायें उस पर हावी हैं। लगता है, जहाँ जो हुआ है उससे बढ़कर और कहीं कुछ नहीं है। संकीर्ण जातीय भावनाओं से साहित्य कलुषित होता है। शब्दों की अनावश्यक कपाल-क्रिया में क्या रखा है ? जैसे बांडी, खारी, सूकड़ी, जोजरी, जवाई आदि सहायक नदियाँ लूनी में मिलकर एकाकार हो जाती हैं वैसे ही विभिन्न बोलियों को राजस्थानी में मिलकर एकाकार हो जाना चाहिये। जिस दिन राजस्थानी में अखिल भारतीय स्तर पर मौलिक गद्य-पद्य की रचनाओं का प्रकाशन हो जायगा, उस दिन इस पर राजकीय मुद्रा अंकित होने में देर नहीं लगेगी। अतः कवियों तथा लेखकों का दायित्व है कि वे रात-दिन इसमें अनवरत काव्य-रचना करते रहें और आलोचक इनका सही मार्ग-दर्शन करें। भाषा निर्मल नीर है, इसके बहते रहने में ही भला है। हाँ, प्रजातन्त्र में भाषा जन-साधारण की होनी आवश्यक है। इस प्रकार साहित्य-साधना करने से समस्यायें स्वयं अपना समाधान ढूँढ लेंगी और राजस्थानी आप ही आप स्थिर तथा निश्चित हो जायेगी। भाषा के इस परिवर्तन काल में साहित्यकारों से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे अपने सृजन में मानव के चिरन्तन सिद्धान्तों की रक्षा करने के साथ नव-समाज की सम-सामयिक समस्याओं से चेतन जनभावना की ओर ध्यान देंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में राजस्थानी की जो उपेक्षा हुई, वह किसी से छिपी नहीं। स्वतन्त्रता-काल के प्रारम्भ में राजस्थानी ने एम० ए० हिन्दी की उच्चतम कक्षा में वैकल्पिक विषय के रूप में प्रवेश किया। राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर की स्थापना हुई ही थी (१९४७ ई०) और वहाँ सर्वप्रथम आठ प्रश्न-पत्रों में सातवाँ प्रश्न-पत्र राजस्थानी का रखा गया। यह सातवाँ प्रश्न-पत्र तीन भागों में विभक्त था। प्रथम भाग में उर्दू, मराठी, बंगाली तथा गुजराती, द्वितीय भाग में संस्कृत, पाली, अपभ्रंश तथा डिंगल और तृतीय भाग में पाँच हिन्दी कवियों का विशेष अध्ययन निर्धारित हुआ। इस प्रकार इन तीनों भागों के कुल तेरह विषयों में से अपना मनोनुकूल कोई एक विषय विद्यार्थी को लेना पड़ता। फलत: इने-गिने विद्यार्थी ही राजस्थानी में प्रवेश लेने लगे। पाठ्यक्रम सरल होने पर भी विद्यार्थियों की संख्या नहीं बढ़ी। केवल दो पुस्तकें निर्धारित थीं- पृथ्वीराज कृत ‘वेलि’ का अंश और ‘चौबोली’ संग्रह की चार कहानियाँ। आगे एक-दो पुस्तकें और जुड़ गई किन्तु कोई विशेष अन्तर नहीं आया। षटमासी प्रणाली के क्रियान्वित होने पर इस परीक्षा के तीसरे-चौथे प्रश्न-पत्र में भी राजस्थानी को स्थान प्राप्त हुआ। इसी प्रकार बी० ए० कक्षा में भी हिन्दी कवियों के साथ कतिपय राजस्थानी कवि-कृतियों का अंश भी निर्धारित किया गया। इस विश्वविद्यालय के पद-चिन्हों का अनुकरण कर उदयपुर विश्वविद्यालय ने भी एम० ए० हिन्दी पाठ्यक्रम में राजस्थानी को वैकल्पिक विषय बनाया (१९६२ ई०)। दो-तीन पुस्तकों की घटत-बढ़त को छोड़कर विशेष भिन्नता नहीं दिखाई देती। हाँ, षटमासी प्रणाली के लागू होने पर नवीनता यह आई कि राजस्थानी के आधुनिक कवियों तथा लेखकों को भी पाठ्य-क्रम में स्थान प्राप्त हुआ।

राजस्थानी की शिक्षा में जोधपुर विश्वविद्यालय (१९६२ ई०) सबसे आगे है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना के पश्चात् सन् १९७१-‘७२ ई. तक तो राजस्थानी का रूप जयपुर और उदयपुर जैसा ही रहा किन्तु सन् १९७२-‘७३ ई० में उपकुलपति प्रो० वी० वी० जॉन के शासन में हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ० नामवरसिंह ने राजस्थानी पाठ्यक्रम को एक नया रूप प्रदान किया। एम० ए० (उत्तरार्द्ध) हिन्दी के चार प्रश्नपत्रों में ‘साहित्य सिद्धान्त और आलोचना’ तो अनिवार्य कर दिया गया किन्तु शेष तीन प्रश्न-पत्रों में चार-पाँच वर्ग रखे गये जिनमें से एक वर्ग लेना पड़ता। प्रत्येक वर्ग के तीन प्रश्न-पत्र रखे गये। इनमें से एक वर्ग ‘राजस्थानी भाषा और साहित्य’ का था। इसके प्रथम प्रश्न-पत्र में राजस्थानी भाषा, राजस्थानी साहित्य का इतिहास तथा संस्कृति, द्वितीय में राजस्थानी काव्य के नये-पुराने सँग्रह और तृतीय में राजस्थानी गद्य की नई-पुरानी विधाओं का अध्ययन-अध्यापन आरम्भ हुआ। कहना न होगा कि राजस्थानी वर्ग के इन तीनों प्रश्न-पत्रों से राजस्थानी भाषा और साहित्य की गहराई तक पहुँचने का प्रयास किया गया किन्तु अनावश्यक छूट मिलने से कक्षा में विद्यार्थी बहुत कम प्रवेश लेने लगे। उपकुलपति प्रो० पी० एन० मसालदान के कार्यकाल में सर्वप्रथम राजस्थानी के एक पृथक विभाग की स्थापना का प्रस्ताव पारित हुआ। फलतः एक समिति का निर्माण हुआ जिसने विस्तृत प्रतिवेदन दिया। वर्तमान उपकुलपति प्रो० सतीशचन्द्र गोयल ने इतिहास में सर्वप्रथम बार एक पाठ्यक्रम समिति का गठन किया जिसकी अध्यक्षता करने का सौभाग्य मुझे मिला। इस समिति ने सूझ-बूझ के साथ बी० ए० प्रथम वर्ष से लेकर एम० ए० उत्तरार्द्ध तक का पाठ्यक्रम निर्धारित किया किन्तु स्वार्थवश एम० ए० राजस्थानी का श्रीगणेश नहीं हो पाया। हाँ, जुलाई १९७४ ई० से ऐच्छिक विषय के रूप में बी० ए० प्रथम वर्ष की कक्षाएं प्रारम्भ हुई जिन्हें इन पंक्तियों के लेखक तथा डॉ० शक्तिदान कविया ने अपने सामान्य कार्यभार के अतिरिक्त निःशुल्क पढ़ाकर अपनी मातृभाषा के प्रति अनन्य अनुराग का परिचय देकर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।

हिन्दी उत्तीर्ण छात्र-छात्रा राजस्थानी भाषा और साहित्य से सम्बद्ध विषय पर शोध-प्रबन्ध लिखकर पी०एच०डी० तथा डी०लिट की उपाधियाँ प्राप्त करते हैं। राजस्थान के तीनों विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की नियमावली प्रायः समान है। यह लक्ष्य करने की बात है कि स्वतन्त्रोपरांत राजस्थानी में जितने विषयों पर शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत किये गये हैं, उतने पहले कभी नहीं किये गये। वस्तुत: यह एक शोध का युग है। अब पहले की अपेक्षा राजस्थानी के ‘डाक्टर’ भी अधिक दिखाई दे रहे हैं फिर भी रोग का इलाज नहीं हो पाता और नई-नई बीमारियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। राजस्थानी में मौलिक विषयों की कमी नहीं है। खोज की दृष्टि से यह क्षेत्र खाली पड़ा है। अन्वेषकों को चाहिए कि वे अस्पर्शित विषयों पर अनुसंधान करें और उसे संसार के सामने लायें। यह क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों का कर्तव्य है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के साहित्य का पता लगायें और उसके संग्रह, सम्पादन एवं प्रकाशन का प्रबन्ध करें। शोध राष्ट्रीय भावनाओं की पूर्ति में योग दे और इसके लिए विषय-चयन में सावधानी रखना अत्यंत आवश्यक है।

गत तीस वर्षों से राजस्थानी की एम० ए० कक्षा का अध्यापन करने से यह लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि राजस्थानी को लोकप्रिय बनाना है तो इसकी शिक्षा का आरम्भ ऊपर से न होकर नीचे से होना चाहिए। हर्ष का विषय है कि ‘राजस्थान माध्यमिक शिक्षा मंडल’ ने इसे बारहवीं कक्षा तक वैकल्पिक विषय के रूप में पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का निर्णय किया है (१४ नवम्बर, १९७५ ई०)। आगामी सत्र से जब राज्य में ‘हायर सेकेन्डरी’ का बारह वर्षीय (१०+२+३) पाठ्यक्रम लागू होगा तब राजस्थानी भाषा को उसमें वैकल्पिक विषय के रूप में सम्मिलित कर लिया जायेगा। अब ९ से १२ वीं कक्षाओं में राजस्थानी भाषा की शिक्षा वैकल्पिक विषय के रूप में दी जायेगी। ६ से ८ वीं कक्षा तक इसे वैकल्पिक विषय में पढ़ाये जाने का निर्णय पहले ही लिया जा चुका है। इस प्रकार अब विश्व में प्रथम बार कक्षा छः से लेकर स्नातकोत्तर कक्षा तक राजस्थानी भाषा और साहित्य का अध्ययन-अध्यापन किया जा सकेगा। देखना यह है कि हर कक्षा में कम से कम दस विद्यार्थी आते हैं या नहीं ? जहाँ तक एम० ए० का प्रश्न है, इस वर्ष सन् १९७५-७६ ई. के सत्र में केवल सप्त ऋषि ही रह गये हैं।

विलम्ब से ही सही, राजस्थानी के नाम पर अब तक जो हुआ है वह ऊँट के मुँह में जीरे के तुल्य है। इन दिनों इस स्थिति में परिवर्तन दिखाई देने लगा है और राजस्थानी साहित्यकारों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। जनमत उभरने लगा है। लोग परस्पर राजस्थानी का अधिकाधिक व्यवहार करने लगे हैं। प्रान्त के निवासी-प्रवासी, कवि-लेखक, छात्र-छात्रा और अध्यापक-प्राध्यापक सभी इसमें विचार-विमर्श करते हैं। यह भविष्य का शुभ संकेत है। राजस्थानी साहित्य की प्रकाश-किरणें अब धीरे-धीरे स्कूलों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों के प्रांगण को आलोकित करने लगी हैं। विश्वकवि टैगोर तथा पं०. मालवीय की भावनाओं को मूर्त रूप देने का समय आ गया है। वह दिन दूर नहीं जब संविधान द्वारा स्वीकृत अन्य प्रांतीय भाषाओं के सदृश राजस्थानी भी अपना स्थान ग्रहण कर लेगी। राजस्थानी का पक्ष प्रबल है। जब राजस्थान हिन्दी भाषा-भाषी प्रांत है तब समझ में नहीं आता, हिन्दी पाठ्यक्रम में राजस्थानी कवियों तथा लेखकों को स्थान क्यों नहीं दिया जाता ? और जब राजस्थान राजस्थानी भाषा-भाषी प्रान्त है तब यहाँ की प्रांतीय भाषा राजस्थानी को मान्यता क्यों नहीं प्रदान की जाती ? भाषा का प्रश्न अनन्त काल तक नहीं टाला जा सकता। हमें किसी एक स्थिति को स्वीकार करना होगा। राजस्थानी दुविधा में न रहकर सुविधा में रहना चाहती है। ज्ञान-विज्ञान जन्म-भाषा में ही गले उतरता है, अन्य भाषाओं में नहीं। उच्च प्राथमिक स्तर पर एक अनिवार्य विषय है-तीसरी भाषा। यह तीसरी भाषा बालकों के लिए राजस्थानी होनी चाहिये क्योंकि घर में जब वे अपने माता-पिता से अन्य भाषा में बातें करते हैं तो उन्हें अटपटा लगता है। उन्हें हिन्दी तथा अँग्रेजी अनिवार्यतः पढ़नी पड़ती है। इस प्रकार त्रिभाषा सिद्धान्त का भी पालन हो जाता है-मातृभाषा राजस्थानी, राष्ट्रभाषा हिन्दी और अन्तरराष्ट्रीय भाषा अँग्रेजी। अन्य प्रांतीय भाषाओं को यहाँ थोपना न्यायसंगत नहीं। विश्वविद्यालयों में राजस्थानी को एम०ए० हिन्दी में अनिवार्य कर देना चाहिये। जिस प्रकार अन्य प्रांतों में वहाँ की भाषा अनिवार्यतः पढ़ाई जाती है उसी प्रकार राजस्थानी साहित्य तथा संस्कृति के कीर्ति-स्तम्भ इन तीनों विश्वविद्यालयों में यहाँ की भाषा को यह गौरव मिलना ही चाहिए। किस-किस कक्षा में कौन-कौन सी पुस्तकें उपयुक्त रहेंगी, इसके लिए खींचतान की आवश्यकता नहीं। अभी जो मिले, उनसे शिक्षा दी जाय और आवश्यकतानुसार इन्हें तैयार कराया जाय। क्रम-क्रम से आगे बढ़ने में ही बुद्धिमत्ता है। अध्ययन-अध्यापन ऐसा हो कि जिससे विद्यार्थी आकर्षित होकर यह विषय ले। इसी प्रकार पाठ्य-क्रम ऐसा होना चाहिए कि जिससे इस प्रांत की भाषा, साहित्य और संस्कृति दूर-दिगन्त तक फैले।

भाषा के क्षेत्र में तुष्टिकरण का त्याग कर स्थायी हल की चेष्टा करनी होगी। ऐसी स्थिति न आ जाये कि न तो हिंदी हिंदी ही रहे और न राजस्थानी राजस्थानी ही। राजस्थानी हिन्दी से मुक्त होकर विधिवत् स्वतंत्र विभाग के रूप में प्रतिष्ठित, पोषित एवं विकसित हो, ऐसी मंगलकामना हिन्दी के विद्वान भी करते हैं। अत: कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में इसके पृथक् विभाग खुलें जहाँ प्रथम वर्ष बी. ए. से लेकर एम. ए. तक की शिक्षा दी जाये और आगे शोध का मार्ग प्रशस्त हो। हिन्दी की वेश-भूषा में राजस्थानी-रमणी की शोभा मारी जाती है। राजस्थानी के अध्यापकों की पृथक नियुक्ति हो और बी० ए० तथा एम० ए० के उत्तीर्ण विद्यार्थियों को राज्य-सेवा में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोई भी भाषा राजकीय अनुकम्पा के अभाव में विकसित नहीं हो सकती। हर्ष का विषय है कि राज्य-सरकार राजस्थानी के संवर्द्धन की ओर ध्यान दे रही है। वह मुक्त कर से वर्तमान सभा-संस्थाओं को आर्थिक अनुदान देती है। राजस्थानी का प्रचार-प्रसार इन्हीं पर निर्भर है। इस दृष्टि से आकाशवाणी, जयपुर की सेवायें सर्वथा स्तुत्य हैं। प्रथम बार श्री विजयदान देथा को केन्द्रीय अकादमी द्वारा पाँच हजार की राशि से पुरस्कृत किये जाने तथा श्री कोमल कोठारी को ‘नेहरू फैलोशिप’ का सम्मान दिये जाने से (नवम्बर, १९७५ ई०) राजस्थानी का गौरव बढ़ा है और उसे अखिल भारतीय मान्यता प्राप्त हुई है।

(१४) चारणेतर साहित्य

संदेह नहीं कि राजस्थानी भाषा एवं साहित्य की रचना सभी जातियों ने की है किन्तु इस क्षेत्र में सदियों से चारण, जैन, राजपूत, मोतीसर तथा भाट जातियाँ विशेष सक्रिय रही हैं। स्वतंत्रताकाल में जातीय महत्त्व का ह्वास होते रहने से इन जातियों का वर्चस्व शनैः शनैः क्षीण होने लगा। अब पहले की तरह रचना करने का विधि-विधान जाता रहा। इनके साथ अन्य जातियों के शिक्षित युवक भी सम-सामयिक परिस्थितियों से प्रेरित होकर इस ओर प्रवृत्त हुए। यहाँ तक कि अनुसूचित जातियां, जन जातियां एवं पिछड़ा वर्ग भी पीछे नहीं रहा। यही कारण है कि स्वतंत्रता के इस सुनहरे समय में सभी जातियों के द्वारा साहित्य-सेवा हो रही है। कहना न होगा कि इन वर्षों में साहित्य में प्रचलित प्रायः प्रत्येक विधा विकसित होने लग गई है। राजस्थानी का चारणेतर साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है और पृथक अध्ययन का विषय है। पद्य में प्रबन्ध और मुक्तक दोनों ही हैं। गद्य में निबन्ध, कहानी, रेखा-चित्र, गद्य-गीत, उपन्यास तथा नाटक अपना अलग महत्त्व रखते हैं। बाल कथाओं, प्रौढ़ कथाओं तथा लोककथाओं का भी अभाव नहीं। अन्य भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद भी हो रहा है। संक्षेप में देश, काल और परिस्थिति के अनुसार नया-नया साहित्य प्रकाश में आ रहा है जो मात्रा में कम होने पर भी अन्य भाषा-भाषियों की टक्कर का है।

आलोच्य काल में पूर्वापेक्षा साहित्य-प्रकाशन भी अधिक हुआ। इसका श्रेय पत्र-पत्रिकाओं को है जिनके माध्यम से कवियों तथा लेखकों की रचनायें जनता के बीच लोकप्रिय होने लगीं। इनमें हरावळ, जागती जोत, जलते दीप, मरु भारती, राजस्थान-भारती, मधुमती, ओळमो, जळम भोम, मरुवाणी, जाणकारी, लाडेसर, वरदा, ललकार, परम्परा, अमर ज्योति आदि के नाम लिये जा सकते हैं। इनके आधार पर चारणेतर दिवंगत विभूतियों में सर्वश्री शिवचंद भरतिया, सुकदेवप्रसाद ‘काक’, रामकरण आसोपा, श्रीनारायण अग्रवाल, भगवतीप्रसाद दारुका, मुकुनदास रामसनेही, महाराज चतुरसिंह, जानकीदास निरंजनी, शिवकरण रामरतन दरक, केशवलाल राजगुरु, अमृतलाल माथुर, ठाकुर फतहसिंह, जयनारायण व्यास, साधु मोहनराम, जगन्नाथ उपाध्याय, हीरालाल शास्त्री, माणिक्यलाल वर्मा, वीरदास ‘वीर’, मोहनराज शाह, गणेशीलाल ‘उस्ताद’, दौलतसिंह लोढ़ा, गुलाबचंद नागोरी, मदनमोहन सिद्ध, शोभाराम जम्मड़, मथरादास भट्टड़, ठाकुरदत्त दाधीच, सूर्यकरण पारीक, जगदीशसिंह गहलोत, निरंजननाथ आचार्य, व्रजलाल बियाणी, गिरधारीसिंह पड़िहार, सुमनेश जोशी, मोहनसिंह, धूंधलीमल, मानक मेहता, विष्णुदत्त प्राचार्य आदि के नाम आदर-सम्मान के साथ लिये जाते हैं। इनकी काव्यसाधना से राजस्थानी भाषा एवं साहित्य का समुचित विकास हुआ है। भविष्य के लिए वर्तमान कवियों तथा लेखकों को दृढ़ संकल्प एवं अनवरत परिश्रम करना होगा। यह प्रबुद्ध वर्ग अपनी अजस्र लेखनी से लिखता ही रहे, कहीं रुकने का नाम न ले। निःस्वार्थ भाव से लिखी गई रचना का मूल्य सबसे अधिक है। ऐसा साहित्य समाज की सेवा है। आज साहित्य समाज के साथ अपना घनिष्ट सम्बंध स्थापित करने में लगा हुआ है। वर्तमान साहित्य-सेवियों में बदरीप्रसाद साकरिया, श्रीलाल नथमल जोशी, अन्नाराम सुदामा, किशोर कल्पनाकांत, भूपतिराम साकरिया, मुरलीधर व्यास, नानूराम संस्कर्ता, लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, सौभाग्यसिंह शेखावत, नृसिंह राजपुरोहित, दीनदयाल ओझा, मूलचंद प्राणेश, बैजनाथ पँवार, भँवरलाल नाहटा, श्रीचंदराय माथुर, गोविन्दलाल माथुर, सत्यप्रकाश जोशी, पुष्कर मुनिजी, जगदीश माथुर, गुलाबकंवर शेखावत, नारायणदत्त श्रीमाली, पारस अरोड़ा, सूर्यशंकर पारीक, भगवानदत्त गोस्वामी, अश्विनीकुमार चित्तौड़ा, श्रीनाथ मोदी, गणपतिचन्द भण्डारी, कल्याणसिंह राजावत, लक्ष्मणसिंह ‘रसवंत’, मनोहर शर्मा, मनोहर प्रभाकर, चंद्रशेखर व्यास, कन्हैयालाल सेठिया, विश्वनाथ ‘विमलेश’, भीमराज ‘मंगळ’, मनोहरलाल शर्मा, कान्ह महर्षि, भगवतीलाल शर्मा, पुष्पेन्द्र झाला, बजरंगलाल पारीक, सवाईसिंह धमोरा, गणपतिलाल डांगी, सुमेरसिंह शेखावत, बनवारीलाल मिश्र ‘सुमन’, दयाशंकर आर्य, श्रीमंतकुमार व्यास, बुद्धिप्रकाश, नारायणसिंह भाटी, गजानन वर्मा, भीम पांडिया, मुकुनसिंह राठौड़, भरत व्यास, आज्ञाचंद भंडारी, हस्तीमल जैन, दामोदरप्रसाद, अंबालाल जोशी, मुनि पुनमचंद, रावत सारस्वत, रामदत्त सांकृत्य, नागराज शर्मा, फूलचंद डांगायच, जमनादास पचोरिया, देवेन्द्र मुनि, कुमेरसिंह राष्ट्रकूट, जेठमल बिस्सा, तोलाराम हीरावत, दामू सांगाणी, प्रेमचंद रावळ, गणपत स्वामी, नंद भारद्वाज, तेजसिंह जोधा, सत्येन जोशी, राजेन्द्र बोहरा, भातमल जोशी, मांगीलाल चतुर्वेदी, कल्याणसिंह शेखावत, वेंकट शर्मा, गोवर्द्धन हेड़ाऊ, नागराज शर्मा, यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’, हरमन चौहाण, मरुधर मृदुल, मणि मधुकर, मेघराज मुकुल, कोमल कोठारी, वेद व्यास, हनुमंतसिंह देवड़ा, कन्हैयालाल सहल, नरोत्तमदास स्वामी, अगरचंद नाहटा, देवीलाल पालीवाल, शंभूसिंह मनोहर, भगवतीलाल शर्मा ‘अरुण’, दीनानाथ खत्री, मोहनलाल पुरोहित, भूरसिंह राठौड़, मदनराज मेहता, रामप्रसाद दाधीच, राजकृष्ण दूगड़, महावीरसिंह गहलोत, पतराम गौड, ब्रजमोहन जांवलिया, मोहन आलोक, सांवर दइया, रामनिवास शर्मा ‘मंयक’, जबरअली सय्यद, जगदीशसिंह शिशोदिया, राधाकृष्ण शर्मा, हीरालाल माहेश्वरी, मदनगोपाल शर्मा, प्रतापसिंह राठौड़, ब्रजनारायण पुरोहित, निर्मोही व्यास, विनोद सोमाणी ‘हंस’, उम्मेदसिंह राठौड़, दामोदरप्रसाद शर्मा, छत्रपालसिंह, ठाकुर कानसिंह भीकमकोर, मांगीलाल व्यास, रमेशचंद्र ‘मयक’, उदयवीर शर्मा, महेन्द्र भानावत, नरेन्द्र भानावत, शांता भानावत, विद्याधर शास्त्री, अमोलकचंद जांगिड, गोविन्द अग्रवाल, कल्पना शर्मा, त्रिलोक गोयल, सत्यनारायण स्वामी, ठाकुर रामसिह, रतन शाह, रामनाथ व्यास ‘परिकर’, रामस्वरूप ‘परेश’, किरण नाहटा, मोतीलाल मेनारिया, पुरुषोत्तम मेनारिया, शिवसिंह चोयल, श्रीलाल मिश्र, अम्बू शर्मा, लक्ष्मीकमल, सुरेन्द्र अंचल, आशा शर्मा, शिखरचंद कोचर, अद्भुत शास्त्री, नेमीचंद पुगलिया, परमेश्वर द्विरेफ, जुगल परिहार, कुसुम जोशी, मदनमोहन माथुर, कृष्ण कल्पित, बंशीधर जड़िया, हेमराज बाड़मेरा, गोविन्दराम हेड़ाऊ, भंवरलाल सुथार, मदनलाल डागा, दीनदयाल कुंदन, सत्यनारायण अमन, लीला मालवीय, अर्जुनसिंह शेखावत, शांतिलाल भारद्वाज ‘राकेश’, जमनाप्रसाद टाड़ा, छत्रपालसिंह, रामेश्वर लाल श्रीमाली, मानक तिवारी ‘बंधु’, ओंकार पारीक, आत्माराम भाकल, रामबक्ष जाट, भागीरथसिंह भाग्य, नारायणसिंह ‘पीथल’, परमेश्वर बगड़का, मीठालाल खत्री, ब्रजभूषण भट्ट, हरिनारायण महर्षि मोहन ‘माधुरी’, सरनामसिंह शर्मा, गोपालनारायण बहुरा, गोवर्द्धन शर्मा, कन्हैयालाल शर्मा, चंद्रशेखर भट्ट, नाथूलाल, दुर्गादत्त नाग, प्रेमजी प्रेम, चंद्रसिंह, बशी बेकारी आदि के नाम प्रकाश में आये हैं। इस नामोल्लेख में किसी विशेष क्रम का ध्यान नहीं रखा गया है। इनमें कवि, लेखक, अनुवादक, आलोचक एवं सम्पादक सभी सम्मिलित हैं। इनमें से कई साहित्यकार पुरस्कृत हो चुके हैं। इन सबसे भविष्य में बड़ी-बड़ी आशायें हैं।

१५. (क) चारण साहित्य

इन वर्षों में देश-विदेश तथा राजव्यापी परिवर्तनों को चारण जाति ने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा, मन में समझा और हृदय से स्वीकार किया। वस्तुत: चारण साहित्य विभिन्न राजवंशों के उत्थान-पतन की गाथा है जो अधिकांशतः स्फुट छंदों में प्रकट हुई है। आज भी इस जाति के कवि सत्तारूढ़ शासक दल के नेताओं का पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं। राजतंत्र हो या जनतंत्र वे इसके आगे अपना मंत्र पढ़ते रहते हैं। समय के साथ इस जाति के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है। साहित्यकारों ने देखा कि नवयुग की आकांक्षायें और आवश्यकतायें, स्वरूप और लक्षण पहले से सर्वथा भिन्न हैं। अतीत में जो भाषा ओज तथा उत्साह के बल पर काव्य की भाषा बनी, कालांतर में प्रसिद्ध हुई और उसे मान्यता मिली। किन्तु नवोदित काल का प्रगतिशील चारण परम्परा से दूर हटने लगा तथा उसकी रुचि भिन्न-भिन्न दिशाओं में व्याप्त होने लगी। नामकरण संस्कार तक में उसने ‘दान’ और ‘सिंह’ शब्दों का मोह त्यागकर ‘जयहिन्द’, ‘विश्व विकास’, ‘वंदे मातरम्’, ‘मनुज’, ‘मानव’, ‘साधना’, ‘मधुकर’, ‘मणिधर’, ‘कल्पित’ आदि साहित्यिक तथा राष्ट्रीय नाम रखने की नई परम्परा का सूत्रपात किया। आधुनिक विज्ञान तथा तकनीक से उसके जीवन में परिवर्तन आया। साहित्य पर भी इसका प्रभाव पड़ा। युद्ध, योद्धा और युद्धभूमि का रूप बदल गया। नये-नये अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होने लगा। चारण साहित्य की दृष्टि से यह एक परिवर्तन-काल ही माना जायगा क्योंकि परिवर्तित परिस्थितियों से प्रभावित होकर उसमें नवीन विचारों तथा भावों का सन्निवेश हुआ। साहित्य का क्षेत्र संकुचित न होकर विस्तृत होने लगा। अन्य कवियों के सदृश राजस्थानी के चारण कवियों का ध्यान राजपूत जाति ही नहीं प्रत्युत् समस्त देश एवं प्रांतवासियों की ओर उन्मुख हुआ। फलतः विविध विधानों में प्रांतीय एवं राष्ट्रीय भावनाओं का चित्रण होने लगा। विषय-वस्तु की दृष्टि से उनमें नवीनता आने लगी। वे नये अंदाज के साथ नव-लेखन करने लगे। चारण साहित्य आत्मा, रूप और शैली की दृष्टि से हिन्दी साहित्य का अनुकरण करता हुआ नवीन आवश्यकताओं के अनुरूप गतिशील हो रहा है। यह लक्ष्य करने की बात है कि इन कवियों ने स्वतंत्रता के कुछ वर्ष पूर्व से ही दूरदर्शी बनकर राष्ट्रोपयोगी रचनायें लिखना प्रारम्भ कर दिया था अतः इनकी कद्रदानी अधिक हो रही है। सौभाग्य से इन्होंने परतंत्रता तथा स्वतंत्रता काल की शासन-पद्धतियों को निकट से देखा है। ऐसे कवि साहित्य के सेतु हैं। ये एक ऐसे संधि-काल पर खड़े हैं जहाँ प्राचीन तथा अर्वाचीन दोनों प्रकार की शैलियों का अपूर्व सामञ्जस्य हो रहा है। अतः आलोच्यकाल प्राचीन, अर्वाचीन एवं सम्मिश्रित शैलियों का संगम है। यह देखकर प्रसन्नता होती है कि चारण कवि तथा लेखक स्वतंत्रोपरांत समस्याओं का संस्पर्श करते हुए नई शैली में साहित्य-रचना करने लगे हैं। सीमा-पार बाह्य आक्रमणकारियों को मार भगाने के लिए इन्होंने जो शंखनाद किया वह राष्ट्र को जगाने में पूर्ण सक्षम है। इन समस्त कारणों से यदि इस काल को ‘नवचरण’ की संज्ञा दी जाय तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी।

राजस्थान वीरों की खान है। वीर रस के चित्रण में चारण आज भी अग्रज है। वीरों की प्रशंसा और कायरों की निन्दा करना वह आज भी भूला नहीं है। राष्ट्रीय युद्धों में वीरगति प्राप्त योद्धानों की पुण्य स्मृति में गीत रचना कर इन कवियों ने बड़ा उपकार किया है। राजस्थानी माँ ने अपने शिशु को संस्कृति के श्रेष्ठतम पाठ अपने दूध में घोलकर पिलाया है। इस वीर प्रदेश की मातायें अपने शिशुओं को ‘हालरिया’ गाती हुई क्या कहती हैं, इसे कवि श्री कैलाशदान उज्वल के शब्दों में सुनिये-

हालरिया हाले हरवल में, रण झूंझण री कुल री रीत।
अवश करे सरवस निज अर्पित, गावे मायड़ मीठो गीत।।
अपणी धर माथे अन्यायी, निजर कुटिल जद नोंखे।
हिचके मती हार हीये रा, फोड़े जा पापी ओंखे।।
माथो जद तक धड़रे माथे, आगे की दुशमण आवे।
पावन प्रिय भारत भू उपर, पग नह को देवण पावे।।
सुमुखि धरा र धरम जद संकट, पाप पड़्यो अबखो अप्रमाण।
वध-वध लड़िया तूझ बडेरा, पाछो तक्यो न देतों प्राण।।
रण जीत्यों धरती री राजस, थकियो जीव अलोकिक थाट।।
इन्द्रलोक री अनुपम अपसर, वरमाला ले जोवे बाट।।
उज्वल कुल री कीरत उज्वल, कर राखे सुत उज्वल काम।
उत्तम सीख मानियां इतरी, निश्चय उज्वल होवसी नाम।।

इस प्रकार की रचनाओं से राष्ट्रीय भावनाओं को बल मिला। कवि के हाथों में पड़कर जड़ चेतन हो गया। चीनी आक्रमण के समय ‘हेमाळे रो हेलो’ के रूप में वीरों का आह्वान करता हुआ कवि भँवरदान वीठू ‘मदकर’ की यह ओजस्वी वाणी देखिये-

सुदुर उतराद सूं शत्रु दल सालल्या, धूंसवा हिंद री देव धरती।
चीरती सरहदां चीन फौजां चली, धर्म गुरू शीश पर पांव धरती।।
संग पंच शील रै मित्रता शांयति, ऊझमी हाय तोबां उचरती।
थांभवा कुदरती भींत थरथराती, भारतीय होयजा फौज भरती।
पुरुष पाखर वणो वचावण पाहड़ा वीहड़ा रखावण वाड़ बांधो।
ताटियां रोप बंदूक तोफां तणी, सांपडी भुजावां रीठ सांधो।।
सिकिम भूटान लद्दाख नेफा सुधि अराती टैंक भैंसां उतरती।
थाँभवा कुदरती भीत थरथराती भारतीय होयजा फौज भरती।।

आज भी चारण वीर-धर्म का पुजारी है। इसकी अभिव्यक्ति दूहा, सोरठा, कवित्त, छप्पय, निसाणी, वेलि तथा विभिन्न गीत छंदों में आज भी हो रही है। काश्मीर पर हुए आक्रमण के समय (१८ जुलाई, १९४८ ई०) हवलदार मेजर पीरूसिंह शेखावत, ग्राम बेरी रामपुरा, झुंझनू ने टीथवाल मोर्चे पर वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए प्राणोत्सर्ग किया। इससे चारण कवि अत्यंत प्रभावित हुए। भारत-चीन युद्ध में (१६ नवम्बर, १९६२ ई०) मेजर शैतानसिंह, ग्राम बाणासर (फलौदी) की अद्वितीय वीरता पर मुग्ध होकर चारण कवियों ने जिस प्रशस्ति काव्य का सृजन किया है, वह भविष्य के लिए मार्ग-दर्शक है।

कुमायु रेजीमेंट के इस रण-बाँकुरे ने लद्दाख क्षेत्र के चुशूल (काश्मीर) हवाई अड्डे की रक्षार्थ हँसते-हँसते प्राण न्यौछावर कर दिये (१८ नवम्बर, १९६२ ई०)। इस असाधारण वीरता के उपलक्ष्य में इन्हें ‘परम वीर चक्र’ से अलंकृत किया गया। अधिकांश चारण कवियों ने इस पर गीत लिखे हैं जिनमें सर्वश्री उदयराज उज्वल, मुरारिदान कविया (जयपुर), देवकरण बारहठ, गणेशदान रतनू, अक्षयसिंह रतनू, सांवलदान आसिया, देवकरण सांदू, व्रजलाल कविया, गोपीदान बीठू, उदयसिंह पाल्हावत, रामलाल रतनू, मुकुन्ददान बारहठ, तेजदान पाल्हावत, जोगीदान बारहठ, अजयदान बारहठ, रेंवतदान कल्पित, कानदान कल्पित, डॉ० शक्तिदान कविया आदि के नाम प्रमुख हैं।

स्व० मुरारिदान कविया (जयपुर) के शब्दों में वह जननी धन्य है जिसने उसे जन्म दिया-

धन भाटी बाणास धर, माता धन्य महान।
जेण कूख हूँ जामियो, सूरवीर सैतान।।

डॉ० कविया के गीत ‘सुपंखरो’ का यह उदाहरण उसकी युद्धवीरता की सही तस्वीर है-

महा अड़ीलौ वज्राग वाघ हिंद री फौज रौ मांझी,
केवी नाग लाग खेध विभाड़े कैतांन।
छिबंतौ गैणाग भाटी थाग ले चीणियां थट्टा,
सिंधू राग फाग खळां खेलियो सैतांन।
ऊठी उतराद सूं विछूटी चीणी फौज आंधी,
रूठी झंप झाले झूठी हद्द राड़।
वूठी झड़ी गोळियां री धारली अनूठी वीरां,
पूठी ठोर फोरदी अपूठी भू पछाड़।।
आयौ परवांनौ औढ़ी भोम जोस छायौ अंगां,
सेना लायौ अड़ीखंभ हेम रौ सुजाव।
केहरी रीसायौ काळा नाग नै छिड़ायौ कंना,
रिमां बतळायौ धायौ इसौ भाटी राव।।
डाक धाक मची सीमा मोरचै भिड़ाक डेरां,
लोह रै लड़ाक हाक बाजतां लद्दाख।
इळा चढी चाक नाक बचातां चुसूल अड्डौ,
सूर चंद्र भरै लाख सूरमै री साख।।

वीरता में राजस्थान सबसे आगे रहा है और आज भी है। आज भी चारण आवश्यकता पड़ने पर रणभूमि में कूद पड़ता है। कलम और तलवार का अद्भुत सँयोग ज्यों का त्यों बना हुआ है। स्वर्गीय लेफ्टिनेंट देवपालसिंह देवल ने कमला बागान, जयंतियापुर (बंगला देश) में भारतीय सैन्य-दल का जो नेतृत्व किया, वह एक आदर्श है। रक्त से लथपथ होने पर भी शत्रुओं का संहार करते हुए उस वीर योद्धा ने वीरगति प्राप्त की (२८ नवम्बर, १९७१ ई. )। इस उपलक्ष्य में उसे ‘वीर चक्र‘ से विभूषित किया गया। श्री देवकरण बारहठ (इंदोकली) ने इस विराट शौर्य-पराक्रम का प्रकाशन इस सशक्त ‘वेलियो’ गीत में किया है-

भारत पाक सीम जुध भिडतां, झुक तोपां माची बम्ब झाल।
आरंभ समर हरोलां आगे, प्रारभ जुद्ध भिडियो देपाल।
नाथूराम सिंढाईच नांनो, दादो जिण्‌रो माधोदास।
दूषण रहित घरांणा दोनू, कुलभूषण मांमो केलास।।
आद कहावत चलती आवे, तिणने साची करी सतेज।
मामा जिणरा हुवे मारका, भूंडा क्यूं निपजे भाणेज।।
सरणगता विधूषण सारू, भूमी बंग हिन्द बद भाव।
हुवो पाक पहिलो हमलावर, अवसान्ति भारत मे पाव।।
फौजां पाक नील धुज फरकी, हिन्द फौजां चौ नजर हुई।
अस्त्र सस्त्रां सूरा आवडिया, नूवा तरीका राड़ नई।।
धिन सुत भान हिन्द धरती सूं, काढ दिया अरियां ने कूट।
लारे वेह तिरंगो लियां, पाकिस्थान फैर दी पूठ।।
भागा धके छोड़ भारत भू, पूरब बंग में कियो प्रवेस।
लोगां तणी कुसी खां लागी, दोनों भिड़े एक व्हे देश।।
खेल रयो रण खेल खिलाड़ी, ठेल रयो पाछा अरि ठाट।
रण भू रेल गयो रत रेलां, झेल रयो अरियां दल झाट।।
घेर रयो रण पाक घटावां, ठेर रयो रवि रथतन ठांम।
मेर रयो वण शिव माला रो, धुजटि लेर गयो निज धांम।।

साहित्य समाज का दर्पण है। इसमें अपने समय की गतिविधियों का चित्रण किसी-न-किसी रूप में होता ही है। चारण साहित्य में भी वर्तमान समाज, अर्थ-व्यवस्था, राजनैतिक दल, शासन-प्रबन्ध, निर्वाचन, नेता आदि को लेकर नई-नई रचनायें लिखी गई हैं जिन्हें सामान्य जनता बडे चाव से सुनती है। उसे इसका रसास्वादन बड़ा चोखा और अनोखा लगता है। सर्वश्री उदयराज उज्वल, देवकरण बारहठ, रेवतदान कल्पित, भँवरदान वीठू ‘मदकर’, जयकरण बारहठ, अक्षयसिंह रतनू, अजयदान बारहठ प्रभृति कवियों की स्फुट रचनाओं से चारण काव्य के ‘नवचरण’ की पुष्टि होती है। यह तो भविष्य की एक भूमिका मात्र है।

जो सुख स्वाधीनता में है, वह पराधीनता में कहाँ ? स्वाधीन-काल में भारत की सर्वांगीण उन्नति के लिए जितना व्यय हो रहा है उतना पहले कभी नहीं हुआ। गाँवों की ओर विशेष ध्यान दिया गया अत: वहाँ की कायापलट हो गई। अपने गाँव ऊजळा जाने पर जब वहाँ विकास ही विकास दिखाई दिया तब कवि उदयराज उज्वल का मन-मयूर नाच उठा-

पैली गांमां नै कुण गिणता, अब तो गांमां में सत्ता रे।
पैली तो संकट पाता हा, पथ खुलगा सुखरा करता रे।।
काळां में करसा रुळता हा, अब करसा सगळा तिरगा रे।
बेगारां डंडा सूं लेता, हिंसा पथ वाळा गिरगा रे।।
माडां मजदूरी लेता हा, श्रमदान प्रेम सूं देवै रे।
विद्या रो परबंध कमती हौ, इसकूलां इधकी बेवै रे।।
ओखद भी दूरा मिलता हा, घर बैठां आखद आवे रे।
जल रो संकट भी जादा हो, बौतेरो कष्ट मिटावै रे।।
सांवतिया फाटक जूडीशल, चोरी पर अनरथ करता रे।
पसुवां नै संकट पूरौ हौ, निरदोसां जेळां धरता रे।।
अब तो पंचायत गांमां में, थपगी सुखदायक जड़ियां रे।
जल्दी अर सोरौ न्याव मिळै, विन बड़ी कचेड़ी चडियां रे।।
दबियोड़ी जनता हिंसा सूं, जो मुखसूं चूं नह करती रे।
सुख रूप स्वराज मिळतां ही, आणंद री घड़ियां वरती रे।।
वो छूत अछूत रौ रोग गयो, समाजां थपगी समता रे।
सत्ता सूं हिंसा भूत गयौ, सुख पावै भारत माता रे।।
अब गांमौगांम विकास करै, सहयोग र पेम समेत सबै।।
निज गांम ऊजळां देख लियो, ‘उदय’ सह उन्नति पंथ अबै।।

देश में सर्वत्र अनुशासनहीनता को देखकर इस कवि का हृदय क्षुब्ध हो उठा। वह इस समस्या की तह में पहुँचकर इसके कारणों का भी स्पष्ट उल्लेख करता है-

भाव जिकां भगवांन, प्रेम जियां माता पिता।
सझै गुरू सनमांन, अनुसासण मारग उदय।।
फिरंगां तणौ प्रभाव, हिंदवांणै इसड़ौ हुवो।
भूला भगती भाव, अनुसासण निबळौ उदय।।
सत्याग्रह रै सांग, राजकाज अटके रया।
कूवे पड़गी भांग, अनुसासण भूलै उदय।।
सत स्वराज रै साथ, आई वाढ समाज में।
अलटपुलट घण आज, अनुसासण निबळौ उदय।।

श्री देवकरण बारहठ समस्त चुनावों के निर्विरोधी पंच एवं उप-सरपंच हैं। उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में प्रवेशकर अपनी काव्य-धारा को नया मोड़ प्रदान किया है। चुनावों में राग-द्वेष, वैर-वैमनस्य एवं छल-कपट को देखकर कवि को ठेस पहुँची है। अत: वह निर्विरोध चुनाव के पक्ष में है। एक उदाहरण निरर्थक न होगा-

फल सह भोग्या फूट रा, फेर बढ़ रही फूट।
भूत भविष्यत भाल रे, रे भारत रंगरूठ।।
कर रिषी मुनियां जहूं करी, विश्व-प्रेम री वूठ।
विधानिक पथ वेवणो, रे भारत रंगरूठ।।
छोड़-छोड़ छाल छुद्रता, कपट भेद रा कोकी।
पड़ मत जाजे पतन में माडे आंख्यां मीच।।
सुधरयां गांमां कर सके, थूं भारत सब थोक।
कृषक न भाजन कोपरा, वाणी कार्य विलोक।।
वीर करावो विश्व ने, बुद्धिवानी रा बोध।
पंच तथा सरपंच पुनि, वणणा विना विरोध।।
पड़ गुड़ किणी प्रकार सूं, आसण रुध्या आप।
सुभ कारज कर नहीं सक्या (तो) पंच वणण मेंई पाप।।

रेवतदान ‘कल्पित’ तो मानो इंग्लैंड के राजकवि जान मेन्सफील्ड के स्वर में स्वर मिलाकर कह रहा है- ‘अब मैं उन शासकों की और उन पादरियों की प्रशंसा में अपनी काव्य-रचना को कलुषित नहीं करूँगा जो बहिष्कृत हैं, पतित हैं, आहत हैं। अन्य कलाकार आज भले ही विलास, मदिरा एवं वैभव का स्वप्न देखें। मैं तो अब उनके गीत गाऊँगा, उनकी कहानी कहूँगा जो रुग्ण हैं, अंधकार में हैं, जो पीड़ित और शोषित हैं। शायद इसीलिए चारण कवि ‘रजवट’ को उपालम्भ देने लगा और जनता आनंद लेने लगी। कवि रेवत नेहरूजी तक को मीठा ‘ओळबो’ देने लग गया। वह सम्पन्न का विरोधी और विपन्न का पक्षधर है। राजस्थानी का यह होनहार कवि समाजवादी विचार-धारा से प्रभावित है। वह अपने युग के साथ साथ आगे बढ़ रहा है। राजस्थान के शोषित किसान को देखकर उसका हृदय विचलित हो जाता है अतः वह चीख उठता है-

इण माटी में सौ-सौ पीढ़ी, मरगी भूखी प्यासी।
भाग भरोसे रह्यौ बावळा, प्रीत करी आकासी।।
कदै तो पड़ग्यो काळ अभागो, गिण-गिण काढ्यो दोरो।
कदै तो ठाकर लाटो लाट्यो, कदै लाटग्यो बोरो।।
कदै तो बैरी दावो पड़ग्यो, कदै आयगी रोळी।
कितरा दिन तक सबर करेला, माटी हँसने बोली।
रे बंदा चेत मांनखा चेत, जमानो चेतण रो आयो।

वह कहीं भोले किसान को जगाता है तो कहीं आने वाली विपदा से बचाने के लिए सावधान भी करता है। वह पूंजीवाद का कट्टर विरोधी है। इंकलाब पर उसका पूर्ण विश्वास है। अतः कहीं-कहीं उसमें साम्यवादी स्वर भी आ गया है। ‘रोयां रुजगार मिलै कोनी’ का यह अंश देखिये-

व्हे लखपतियां रो राज जठे, भूखां रो पेट पळे कोनी।
आंख्या रै ऊंडै समदर रा, मोत्यां रो मोल घणो मूंघो।।
इमरत नै मद रे प्यालां सूं, आंसू रो तोल घणो मूंघो।
सोना-चांदी रा सिक्कां सूं, मेणत रो कोल घणो मूंघो।
यां लखपतियां री बोली सूं, मजदूरी बोल घणो मूंघो।
भिड़ जावण दो मैल-झूंपड़ा झगडै रो जोग टळै कोनी।।
घण मूंघा मोती मत ढळका, रोयां रुजगार मिलै कोनी।।

लोकप्रिय कवि भँवरदान वीठू ‘मदकर’ कमरे में उड़ आये कपोत से पूछते हैं-

नेक पंखी कलजुग रा नारद भाग भर्यो तूं भाई।
देश हिंद मां कांई दीठो, वतला दे कोक वधाई।।
हेकांता करां हथाई चोखी कोई गप-सप चोल।
हां हां बोल कबूतर बोल रे खोटां रा पड़दा खोल।।

यह सुनकर कबूतर क्या उत्तर देता है, यह भी देख लीजिए-

मैं रमता जोगी महलां सूं झूंपड़ियां लग जावां।
ऊँच नीच रो भेद न आणा, घर घर अलख जगावां।।
गुटकूं गुटकूं कर गावां, मन री वातां अणमोल।। हां हां बोल…

नेता करते नाच देशनां सरग वणावण सारूं।
जूठा कवल करै जंनता सूं, हुड़दंग वाज़ हजारूं।
दशियां नां पावै दारू, ? मूंगो बोटां रो मोल।। हां हां बोल…

मंत्रीजी बैठा महलों मां, खूब मलींदा खावै।
लूंट खसोट करे लौकां सूं अफसर मौज उड़ावै।।
लाखां री रिस्वत लावै, परजा मां दीठी पोल।। हां हां बोल…

पुलिस तो परजा री रक्षक क्यूं भक्षक कहलावै।
कोतवालजी घूंस कतल, चौरी मां बढती चावै।।
मुनसीजी धूम मचावे (जद) मुड़दां रा चूकै मोल।। हां हां बोल…

विना विचारे आज बी० डी० ओ, लाखों बजट लुटावै।
आधी रकमां हड़प इंजिनियर, महंगी कार मुलावै।।
विकाश विनाश करावै, आ, रिस्वत री रांफा रोल। हां हां बोल…

एक रूपइया ले इन्सपैक्टर, मान बेच झख मारै।
जण कारण बाजारां मां, बेईमांनों की पौ बारै।।
हर तरफ हाय तौबां है, पोपां मैं माची पोल।। हां हां बोल…

दलीय राजनीति के घटाटोप में देश की जो दशा हुई और समय रहते प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने जिस महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया, उससे प्रभावित होकर श्री जयकरण बारहठ की कविता का यह उदाहरण देखिये-

गढ़ कोट किले ढह गये, जहाँ मदहोश झूमते राजवंश।
जनता को लूट सुरा पीते निर्बल के शाशक वे नृशंश।।
स्वातंत्र्य लहर कुछ विरळ हुई, खादी कीचड़ से कर मलीन।
शासक नेता लोभी बनकर, झोली को भर दी पकड़ मीन।।
धनी लोग जो निर्वाचित, अर्जित पूंजी के लिए मंत्र।
मिल गये बांध संग वृक्षों के, कर धूली धूसरित प्रजातंत्र।।
गठित मोर्चा के कारण, सन गया रेत में राजतंत्र।
लूट डकैती हत्यायें, बढ़ चली ढहाने प्रजातंत्र।।
उस समय इन्द्र या इन्द्रा ने, क्या खूब व्यवस्था बनवाई।
पकड़े सब देश कलंकी औ प्रतिक्रियावाद के अगवाई।।
जनतंत्र बचाने धनिकों से, पूंजीगत बड़े झमेला में।
राष्ट्रभावना लानी है, जनतंत्री बली की बेला में।।
आज गरीबी ताकत से पूंजी का कोट ढहाना है।
इन्द्रा के हाथों अगवाई, सब देश एक हो जाना है।
हमें परीक्षा घडियों में, संकट में लगी दुहाई को।
इन्द्रा के पीछे चलना है, हर पार कुवा कर खाई को।

कहने का अभिप्राय यह कि भाव-पक्ष की दृष्टि से चारण-काव्य में एक परिवर्तन आने लगा है। यह परिवर्तन भाषा में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अब डिंगल एवं पिंगल के साथ हिन्दी में कविता करने वालों का भी अभाव नहीं। अक्षयसिंह रतनू देश-हित में अपना बलिदान करने हेतु कहते हैं-

एक दिन निश्चय निकलना प्रान मेरा।
देश हित में धन्य हो जीवन अगर कुर्बान मेरा।।
चंद दिन की जिन्दगी में हूँ स्वयं महमान मेरा।
और बनता मरे चमड़े का न कुछ सामान मेरा।।
स्वार्थ तो पशु भी निभाते हैं वृथा अभिमान मेरा।
देश हित में हो अगर अपमान भी है मान मेरा।।

राजस्थानी के यशस्वी कवि अजयदान बारहठ रचित यह ‘जन्माष्टमी’ शीर्षक कविता कितनी संस्कृतनिष्ट हो गई है ?-

नाशक कंस नृशंस, बन्स-अरि-अमर विनाशक।
त्रासक कालिय क्रूर, पूर पथ पार्थ प्रकाशक।
श्रुति सुधारक सेतु, हेतु-जग निज जन तारक।
अधम उद्धारक अमित, सकल सुर काज संवारक।।
उन पुरुष पुरातन कृष्ण की, यह जन्म तिथि जग पावनी।
है ‘अजय’ पर्व सर्वोपरी, अरु हरि-भक्ति दृढ़ावनी।।

इस प्रकार चारण साहित्य अपने कुल-गौरव की रक्षा करने के साथ-साथ इस युग की नई रोशनी से जगमगा रहा है। यहाँ गत अध्यायों के सदृश पृथक प्रवृत्तिमूलक अध्ययन प्रस्तुत न कर स्वतंत्रता काल के शेष जीवित चारण कवियों तथा लेखकों के व्यक्तित्व तथा कृतित्व के साथ-साथ उनकी उल्लेखनीय रचनाओं के कतिपय उदाहरण दिये जाते हैं जिनके आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचने में देर नहीं लगती कि यह साहित्य नई दिशा की ओर कदम बढ़ा रहा है। गत अध्याय में भी यथास्थान जीवित कवियों का विवरण, विश्लेषण तथा विवेचन दिया गया है किन्तु इन चुने हुए कवियों में नवीन धारा के स्पष्ट दर्शन होते हैं। दुख है कि इनमें से एक-दो कवि अभी हाल ही में चल बसे हैं।

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