(ख) कवि एवं कृतियाँ

१. बद्रीदान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१८९० ई०) और पाली (मारवाड़) जिलान्तर्गत ग्राम बासनी के निवासी हैं। इन्होंने अपनी प्रारिम्भक शिक्षा मातृभाषा राजस्थानी में अपने पिता अजीतदान जी से प्राप्त की (१८९७ ई०)। साथ ही पं० शंकरलाल (बनेड़ा) से भी ज्ञान ग्रहण किया। इस प्रकार इन्होंने दस वर्ष की आयु में कविता लिखना आरम्भ कर दिया। यह देख कर रायपुर-ठाकुर हरीसिंह ने इन्हें अपने पास रख लिया। रायपुर राजघराने की सेवा करते हुए ये अपना ज्ञान बढ़ाते गये। ठाकुर साहब के निधन के बाद ये जोधपुर आ गये जहाँ इन्होंने वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण की। आजकल आप वकालत के साथ-साथ साहित्य-साधना भी कर रहे हैं। आप वयोवृद्ध होने पर भी उत्साही हैं। जो कोई इनके पास जाता है उन्हें ये अपनी रचनायें बड़े प्रेम से सुनाते हैं।

बद्रीदानजी राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के ज्ञाता हैं। ये ‘चारण-पत्रिका’ के सम्पादक भी रह चुके हैं। इन्होंने प्राचीन-अर्वाचीन दोनों प्रकार की रचनायें लिखी हैं। ‘बोम्बर बावनी’ तथा ‘रणबंका राठौड़’ गुजरे जमाने की याद दिलाती हैं। महाराजा सरदारसिंह, सुमेरसिंह, उम्मेदसिंह एवं हनुवंतसिंह (जोधपुर) पर लिखे शोक-गीत इसी श्रेणी में आते हैं। अर्वाचीन ढंग की रचनाओं में ‘जयहिंद शतक’, ‘केर सतसई’, ‘कांदा पच्चीसी’ आदि उल्लेखनीय हैं। सम्प्रति गीता का राजस्थानी में अनुवाद कर रहे हैं। इन्होंने फुटकर कवितायें भी बहुत लिखी हैं। संक्षिप्त होते हुए भी इनकी रचनायें अपने-अपने कालों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

एक बार प्रसिद्ध काँग्रेस-नेता लोकनायक श्री जयनारायण व्यास ने समस्या दी- ‘जय हिन्द !’ श्री कविया आशु कवि के रूप में धड़ाधड़ दोहे सुनाने लगे जिसका नमूना इस प्रकार है-

गांधी तो त्यागी घणो जिन्नो मुफतीयो जिन्द।
पाकथान ले ने पड्यो, हार वी’ क जय हिन्द।।
नागी द्रुपदी निरखतां, कुरुवंश निष्कंध।
नार हजारों नग्न की, हार वी’ क जय हिन्द।।
सीता रावण ने हरी, (जिणा) काट लिया दसकंध।
हा लाखों तीय हर लई, हार वी’ क जय हिन्द।।

‘केर-सतसई’ में प्रकृति की अद्भुत देन ‘केर’ की महिमा देखिये-

हिय हरियो हरियो रहै, हरदम हरियो हैर।
तू मरुधर रा कल्पतरु, (थने) किण विध भूलों कैर।।
आलू गोभी थों आगे, ठीक न जावे ठैर।
सब सागों रा सेहरा, किण विध भूलों कैर।।

और अंत में, गीता-अनुवाद का यह दोहा कितना प्रेरणादायक है ?

नर वैने नामरदगी, शोभै नँह समराट।
हिवड़ा री तज हीणता, भड़ उठ भिड़ भारात।।

२. ईश्वरीदानसिंह:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१८६५ ई०) और सवाईमाधोपुर जिलान्तर्गत ग्राम बंवली बिशनपुरा के निवासी हैं। जीवित कवियों में इन्हें डिंगल, पिंगल, हिन्दी, उर्दू तथा फारसी भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त है। ये राव साहब धूळा तथा जयपुर दरबार के राज्य-कवि रह चुके हैं। इसलिये लोग इन्हें ‘ठाकुर’ कहकर पुकारते हैं। इनकी रचनाओं में ‘कूर्म विजय’, ‘कमधज कबंध’, ‘पचरंग प्रकाश’, ‘महिपति रघुकुल नेम ग्रंथ’, ‘शेखावत प्रकाश’, ‘मोहन भक्ति प्रकाश’ आदि उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त फुटकर रचनाये भी बहुत लिखी हैं।

ईश्वरीदानसिंहजी परम्परागत कवि हैं। ‘पचरंग प्रकाश’ में जयपुर के पचरंगी झंडे की तवारीख है किन्तु साथ ही काव्य-सौन्दर्य देखते ही बनता है। इसमें महाराजा मानसिंह (प्रथम) तथा बादशाह अब्दुलाखां उज़वक़ (पठान) के युद्ध का चित्रोपम वर्णन है। काबुल के इस युद्ध में महाराजा को विजयश्री प्राप्त हुई थी। शह-शाह-तुरान की सेना आती देखकर मानसिंह की सेना सजने लगी। इसका वर्णन कवि ने छंद ‘पद्धरी’ में किया है-

ये सुनत ख़बर युवराज मान, काबुल रक्षक जो वंश-भान।
आज्ञा सुभटन को दी तुरन्त, सब सजे वीर कूरम दुरंत।।
भुजदंड फडक ब्रहमंड ओर, धक घकिये जोश मूंछन मरोर।
हो गए कंध केहरि समान, खिंच गई भौंह मानो कमान।।
चढ़ गये तौर जिन सार पार, चस गये नैन जैसे अंगार।
सजधज बलिष्ठ होकर तयार, गर्जत अनेक भट दळ संभार।
संसार मोह को त्याग दीन्ह, वह समय अंत सब लियो चीन्ह।।

छंद ‘भुजंगप्रयात’ में तोपों का यह वर्णन भी दृष्टव्य है-

चिती चाव पै चंचळा तोप चाळी, किलक्की मनो क्रोध में होम काळी।
दगी जौर पै तेज बारूद जागी, लखी यों मनो लंक में लाय लागी।।
अड्यो जाय आकाश में यो उजाला, मनो वीजळी सी उठी ज्वाल माला।
भयो घोर अंधार ना भान भास्यो, फळै काळ सो रूप आक प्रकास्यो।।
धरै धीर नाहीं धरा को धुजावै, डकै डाकनी डूंगरो को डिगावै।
इहि रीत दोनों दिशा में तड़क्की, किधो कंस पै माहमाया कड़क्की।।

३. तखतदान:- ये बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं और पाली जिलान्तर्गत ग्राम आंगदोष के निवासी हैं। इनकी गणना राजस्थानी के उत्तम कवियों में की जाती है। आपने फुटकर कवितायें लिखी हैं। एक उदाहरण देखिये-

ऊंट जवाहर अरब रो, निज कर घाल नकेल।
झटको दे झेकावतो, पड़ गयो पार पटेल।।

४. माधौसिंह:- ये सिंढायच शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०१ ई०) और जोधपुर जिलान्तर्गत ग्राम मोगड़ा के निवासी हैं। इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की (१९२४ ई०) फिर राज्य-सेवा में लग गये। आपने स्वास्थ्य निरीक्षक, नगर-परिषद्, जोधपुर तथा पुलिस-विभाग में इन्सपेक्टर के पद पर कार्य किया है। आजकल अपने गाँव में ही रहते हैं। मिलने पर प्राय: कहा करते हैं- गाँव में सब-कुछ है- शुद्ध वायु, स्वच्छ जल और अनुकूल भोजन लेकिन विद्या और विद्वान के बिना सब सूना है। ग्राम्य-जीवन से स्नेह होने के साथ कवि विद्वानों से मिलने को उत्सुक रहता है। चश्मा लगाना तो दूर, इस अवस्था में भी आँखों का तेज ईश्वरीय कृपा से ज्यों का त्यों बना हुआ है।

माधौसिंहजी प्रारम्भ से ही राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के उपासक रहे हैं। इन्होंने अपने पूर्वज कवियों एवं लेखकों की कई कृतियों का अध्ययन किया है। कई बातें इनके कंठ में निवास करती हैं। ये डिंगल एवं पिंगल दोनों भाषाओं में स्फुट काव्य-रचना करते हैं। साथ ही प्राचीन एवं अर्वाचीन दोनों ढंग की रचना करने में समर्थ हैं। स्वतंत्रता-काल के वीर योद्धाओं का वर्णन करते हुए कवि ने ये उद्गार प्रकट किये हैं-

भारत रा अणियों भंवर, जिण पुळ सजै जवांन।
दरकै छाती दोयणां, थरकै पाकिसथांन।
मुंड दिये हरमाळ में, रुंड रचै धमसांण।
तिकां कोतुहळ भालवा, रथ ठंभै रातांण।।
हर नाचै नारद हसै, अछरां वरण अधीर।
भारत रा जिण पुळ सुभट, हिचै जुघां हमगीर।।

प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की प्रशंसा में उसका कथन है-

कह्या बंगहित काज, वचन जिके निरवाहिया।
इणसूं भारत आज, अजसै तोसुं इन्दिरा।।
विध विध किया विहाल, यायाखां पापी असुर।
विलसै सुख बंगाल, अब अवलंब तो इन्दरा।।

५. गोविन्ददान:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०२ ई०) और जोधपुर राज्यान्तर्गत ग्राम बिराई के निवासी हैं। इनके पिता जसवंतदानजी जब ये केवल नौ महीने के थे, स्वर्गवासी हो गये। कवि-कुल में जन्म लेने के कारण आप काव्य-पाठ में दक्ष हैं। वृद्धावस्था में भी आपको अनेक छंद कंठस्थ हैं। आप समाज-सुधार में विशेष रुचि लेते हैं और अपने क्षेत्र में इतने लोकप्रिय हैं कि सभी जातियों के लोग पारस्परिक झगड़े निपटाने के लिए इनकी सहायता लेते हैं। इन्होंने निर्विरोध रूप से अपनी पंचायत में पंच, उप-सरपंच तथा पंचायत समिति, बालेसर के सहवृत्त सदस्य के रूप में कार्य किया है। आजकल आप अपने गाँव में ही कृषि-कार्य की देखभाल करते हैं।

गोविन्ददानजी ने फुटकर रूप से राजस्थानी साहित्य की सेवा की है। शोक-काव्य एवं वर्तमान भ्रष्टाचार को लक्ष्य करके जो दोहे कहे गये हैं, वे उल्लेखनीय हैं। एक उदाहरण देखिये-

कांम सड़क ऊपर करै, खास हृदै विच खोट।
मजदूरी (तो) वांनै (इ) मिळै, (पण) नेता हड़पै नोट।।

६. सीताराम:- ये लालस शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९०८ ई०) और जोधपुर जिलान्तर्गत ग्राम नैरवा के निवासी हैं। इनके पिता का नाम हाथीरामजी है। जब इनकी अवस्था ढाई वर्ष की थी तब उनका स्वर्गवास हो गया अत: पालन-पोषण ननिहाल में हुआ। इनके नाना शादूलजी एक प्रसिद्ध विद्वान एवं कवि थे। उन्होंने इन्हें अपने गांव सरवडी (सिवाना) में प्रारम्भिक शिक्षा दी। इसके पश्चात् ये आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए जोधपुर आकर क्रमशः राजमहल मिडिल स्कूल तथा दरबार हाई स्कूल में भर्ती हुए किन्तु विशेष सफलता नहीं मिली। इन्होंने संस्कृत का ज्ञान पं० भगवतीलालजी से प्राप्त किया जिनका ये बहुत आभार मानते हैं। इस समय कबीर पंथी साधु जुढिया गाँव के पनारामजी मोतीसर जो राजस्थानी के उच्च ज्ञाता थे, उनकी देख-रेख में वर्षों तक इन्होंने अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। इस प्रकार संस्कृत, हिंदी एवं राजस्थानी इन तीनों भाषाओं का आपने अध्ययन किया है।

सीतारामजी कई वर्षों तक माध्यमिक पाठशाला में शिक्षक के रूप में सेवा कर चुके हैं। राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के आप मर्मज्ञ हैं। इसके साथ रजिस्टर्ड वैद्य भी हैं और आयुर्वेद शास्त्र में पर्याप्त रुचि रखते हैं। ये कवि के रूप में नहीं लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। इन्होंने कई ग्रन्थों का सफलतापूर्वक सम्पादन किया है जिनमें ‘विड़द सिंणगार’, ‘प्रेमसिंह रूपक’, ‘रघुवर जस प्रकाश’ एवं ‘सूरज प्रकाश’ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। मौलिक रचना में ‘राजस्थानी-व्याकरण’ का नाम लिया जा सकता है। इनके जीवन का ध्येय यही है कि किसी तरह ‘राजस्थांनी सबद-कोस’ का कार्य सम्पूर्ण हो और इस हेतु पावटा (जोधपुर) स्थित कार्यालय में साधना कर रहे हैं। यह कार्य प्रांतीय एवं केन्द्रीय सहायता से चल रहा है। जोधपुर विश्वविद्यालय ने इन्हें ‘डाक्टर’ की मानद डिग्री प्रदान की है (१९ जनवरी, १९७६ ई०)।

‘राजस्थांनी सबद-कोस’ छः हजार पृष्ठों का एक मूल्यवान ग्रंथ है। इसका प्रथम खंड एक जिल्द में भूमिका सहित ११७५ पृष्ठों का है जो अ से घ तक चलता है। द्वितीय खंड दो जिल्दों में है- पहली में च, ट तथा त वर्ग है और दूसरी में थ, द, ध तथा न वर्ग हैं। तृतीय खंड तीन जिल्दों में है-पहली में प और फ, दूसरी में केवल ब तथा तीसरी में भ और प वर्ग हैं। पहली दो जिल्दों पर कर्त्ता के रूप में स्व० उदयराज उज्वल का भी नाम है। चतुर्थ खंड भी तीन जिल्दों में है- पहली में व, दूसरी में स तथा तीसरी में स का अवशिष्ट और ह है। इस कोष में एक शब्द के अनेक अर्थ दिये गये हैं जैसे ‘गजगाह’ के ९ और ‘अंब’ शब्द के १५ अर्थ हैं। एक उदाहरण देखिये-

अंब-सं० पु० [सं०] १ शिव, महादेव (ना० डिं० को) [सं० अंबक] २. नेत्र, नयन। [सं० अंबुधि] ३. समुद्र (अ० मा०) [सं० अंबु] ४. जल। उ०-नैण नीरज में अंब बहै रे, गंगा बहि जाती-मीरां ५. चन्द्रमा। [सं० अंबुद] ६. बादल। [सं० आम्र] ७. आम का वृक्ष या उसका फल। उ०-मारगि-मारगि अंब मौरिया, अंबि-अंबि कोकिल अलाप। -वेलि [सं० अंबर] ८ आकाश। ९. वस्त्र। सं० स्त्री [सं० अंबा] १० उमा, पार्वती। उ०-अंब हुकम गई अंब अराधण, सुख-सागर दरसायौ हे माय। -गी० रां० ११. दुर्गा। १२. धरती। १३. शक्ति। १४ माता, जननी। उ०-आज कहौ तो आप जाइ आवूं, अंब जात्र अंबिका तणी। -वेलि० [सं० अंबु] १५ कांति।।

इतना होते हुए भी कुछ शब्द छूट गये हैं तथा कहीं-कहीं भ्रामक शब्द और शब्दार्थादि दिये गये हैं। राजस्थानी के एक अन्य कोष-कर्त्ता आचार्य श्री बदरी प्रसाद साकरिया ने ‘वैचारिकी’ में क्रमशः पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए लिखा है – ‘प्रस्तुत राजस्थांनी सबद कोस में शब्द, व्युत्पत्ति, अर्थ, व्याख्या, उदाहरण और शब्द के रूप-भेदों आदि को लेकर के जो सहस्रों भूले हैं, उनके सुधार की नितांत आवश्यकता है। परन्तु राम जाने, कब, कैसे और कौन उनका संशोधन करेगा, कहना कठिन है। अनेक स्थल ऐसे हैं जो समीक्षायुक्त संशोधन की अपेक्षा रखते हैं।’

~~क्रमशः


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