चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १३६ | छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – पद्य साहित्य – वीर काव्य (बाँकीदास)

युद्ध का वातावरण उपस्थित करने में कवि सफल है। यथा-

अमलां खोबा बाजियां, मचै भड़ां मनुवार।
जांगड़िया दूहा दिये, सिंधू राग मझार।।
उठै सोर झाळां अनळ, आभ धुआँ अँधियार।
ओळां जिम गोळा पडै, मेछां कटक मंझार।।
भुरजमाळ फण मंडळी, सोर झाळ विष झाळ।
जाण सेस बैठो जमी मिस चीतोड़ कराळ।।
के गोळां के गोळियां, के तरवारां धार।
मरै गड़ै कबरां महीं, बीबा मंसबदार।।
ढूके नह गढ़ ढूकड़ा, अकबर रा उमराव।
करै वीर गढ़ रा कवच, दोय टूक इक घाव।।
सूनी थाहर सिंघ री, जाय सके नहिं कोय।
सिंह खड़ां थह सिंह री, क्यों न भयंकर होय।।

प्रतिपक्षी की भावनाओं का चित्रण भी है-

बारा सुखनां खीजियो, अकबर साह जलाल।
उच्चरियो हूं जीवतां, सिंहां पाडूं खाल।।
पग मांडो जैमल पता, गढ़ मोसूं नहि दूर।
लीधा इसा हजारगढ़, मो दादे तहमूर।।

संवादों की सुसम्बद्ध योजना ने इस रचना में नाटकीय चमत्कार उत्पन्न कर दिया है। यथा-

आसिफखाँ अकबर कहै, भीतां भुरजां जोय।
बांको गढ़ भड़ बांकडा, हलो कियां की होय।।
भीतरला फूटां भड़ां, कै खूटां सामान।
इण गढ़ में होसी अमल, खम तूं आसिफखान।।

‘सूर-छतीसी’ एवं ‘सीह-छतीसी’ में स्वतंत्र रूप से एक आदर्श युद्धवीर का चित्रण किया गया है। कवि ने इन दोहों में शूरवीर के लक्षण बताये हैं–

सूर न पूछै टीपणौ, सुकन न देखै सूर।
मरणाँ नूँ मंगळ गिणै, समर चढ़ै मुख नूर।।
जाया रजपूतांणियाँ, बीरत दीधी वेह।
प्रांण दियै पांणी पुणग, जावा न दिये जेह।।
भड़ां जिकां हूँ भामणै, केहा करूँ बखांण।
पड़ियै सिर धड़ नह पड़ै, कर वाहै केवांण।।
सूर भरोसै आपरै, आप भरोसै सीह।
भिड़ दहुँ ऐ भाजै नहीं, नहीं मरण रौ बीह।।
छूटा जामण मरण सूँ, भवसागर तिरियाह।
मुँवा जूँझ जे रण मही, वे नर ऊबरियाह।।

कहीं-कहीं प्रतीक-पद्धति के द्वारा कवि ने उत्कृष्ट कल्पना की है। यथा–

सूतौ थाहर नींद सुख, सादूळौ बळवंत।
बन कांठै मारग वहै, पग-पग हौळ पडंत।।
केहर कुंभ विदारियौ, गज मोती खिरियाह।
जाँणे काळा जळद सूं, ओळा ओसरियाह।।

वीरांगना के मुख से प्रस्फुटित होने वाली गर्वोक्तियां तो और भी चित्ताकर्षक हैं। वह अपनी सहेली के सन्मुख सतर्कता से साहिबों का गुण खोलकर रख देती है–

सखी अमीणौ साहिबो, वाँकम सूँ भरियौह।
रण विकसै रितुराज मै, ज्यूँ तरवर हरियौह।।
सखी अमीणौ साहिबो निरभै काळो नाग।
सिर राखै मिण सामध्रम, रीझै सिंधू राग।।
सखी अमीणौ साहिबो, सूर धीर समरत्थ।
जुध में वामण डंड जिम, हेली बाधै हत्थ।।
सखी अमीणा कंथरी, पूरी एह प्रतीत।
कै जासी सुर ध्रंगड़ै, कै आसी रण जीत।।

मौलिक होते हुए भी कहीं-कहीं कवि की उक्तियों पर ईसरदास का प्रभाव है। वांकीदास को ईसरदास की कुंडळिया कंठस्थ थीं अत: ऐसा होना स्वाभाविक ही था। यथा-

अंबर री अग्राज सुं, केहर खीज करंत।
हाक धरा ऊपर हुई, केम सहै बळवंत।।
केहर कुंभ विदारियौ, तोड़ दुहत्था दंत।
रुहिर कळाई रत्तड़ी, मदतर तै महकंत।।
घर आंगण मांहै घणा, त्रासै पडियां ताव।
जुध आंगण सोहै जिकै, बालम ! बास बसाव।।

महात्मा स्वरूपदास कृत ‘पाण्डव यशेन्दु-चन्द्रिका’ एक प्रबन्ध काव्य है जिसके षोड़ष मयूखों में महाभारत का सार है। यद्यपि मार्मिक स्थलों को पहचानने में बाबाजी की नजर कुछ मोटी है तथापि इसमें भाव-सौन्दर्य स्थान-स्थान पर देखने को मिलता है। ओज एवं प्रसाद गुण तो कूट-कूट कर भरे हुए हैं। कवि की दृष्टि में क्लिष्टता काव्य का गुण है अत: यह काव्य सर्व साधारण की समझ से बाहर है। सुन्दर भाव, मनोहर कल्पना एवं गति की त्वरा पाठकों को मुग्ध कर देती है। अर्जुन का युद्ध वर्णन एवं शत्रु संहारक रूप एक प्रचण्ड युद्धवीर के अत्यन्त अनुरूप बन पड़ा है। भीम की गदा भी कम आकर्षक नहीं। इसी प्रकार द्रोणाचार्य की युद्धवीरता अपना पृथक महत्व रखती है। निम्न छंद में कवि ने जो रूपक बांधा है, उससे उसकी उत्कट कवित्व-शक्ति का परिचय मिलता है। इसमें युद्ध-क्षेत्र को एक यज्ञ-क्षेत्र बनाया गया है और द्रौपदी को अरिणी। युधिष्ठिर यजमान हैं और अर्जुन होम करने वाला है जिनकी प्रत्यंचा की टंकार ही स्वाहा-स्वाहा का शब्द है। भीम के क्रोध घर्षण से अग्नि उत्पन्न हुई है तथा वीर रस उस यज्ञ का घृत है। ऐसे महायज्ञ की पूर्णाहुति भीमसेन अपने गदाघात द्वारा दुर्योधन को मारकर करते हैं जो बलि पशु है। इस यज्ञ में कौरव वृन्द समिधि है-

अरुनि द्रुपद जाई, कोप भीम को सुआगि, जजत युधिष्ठिर समाज स्वांग लीने है।
होता है किरीटी श्रवा धनुष ज्या शब्द श्वाहा, साकुल्य है वीर आज वीर रस भीने है।
सुयोधन जग्य पशु करुखेत अग्नि कुण्ड, पूर्णाहुति भीम गदा ने अंग छीने है।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

भाग १ – अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

भाग २ – अनुक्रमणिका

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

३. वीर काव्य. . . . क्रमशः

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

7 comments

  • Charan Lala

    Vah very good
    Jai Charan Sakti

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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