चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १६२ | सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – जीवनी खंड-सूर्यमल्ल मिश्रण

महान विभूतियों, विशेषत: कवियों की दैनिक चर्या बड़ी ही विचित्र होती हे और सूर्यमल्ल भी इसका अपवाद नहीं। इनके चरित में कन्चन, कादम्ब एवं कामिनी का सुयोग देखते ही बनता है। कंचन इनके लिए साधन मात्र था, साध्य नहीं। यदि इन्हें बूंदी राज्य-कोष की कुंजी कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। कहते हैं, इन्हें प्रतिदिन दरबार को बिना पूछे पाँच हजार तक व्यय करने की आज्ञा थी। उपहार तो न जाने कितने मिला करते थे? कादम्ब इनके जीवन का सर्वस्व था। आठों पहर इसका सेवन करते। नशा इनके लिए काव्य था या काव्य नशा – इसका निर्णय करना कठिन है। संदेह नहीं कि इसका सेवन सांसारिकता को भुलाने एवं काव्य-शक्ति को जगाने के लिए किया जाता था। यह देखकर राव एवं उमराव अपने यहाँ तैयार किया हुआ बढ़िया से बढ़िया आसव इनके पास भेजा करते थे। शराब के नशे में कभी-कभी ये संतुलन खो देते थे। प्रवाद है कि जब एक दिन ये नशे में चूर होकर बैठे थे तब हरलिया नाम के चाकर ने ६ मास की गुड़िया सी कन्या को लाकर इनकी गोद में रखा और इन्होंने उसे प्यार से इतना हिलाया-डुलाया कि उसकी साँस ही निकल गई। इसी प्रकार थूणपुर (कोटा) वाली ठकुराणी महियारिणी की दाह-किया के समय श्मशान घाट पर शराब पीकर परिक्रमा लगाना तथा बहादुर कलावंत से तम्बूरा छीनकर “लाडीजी घूंघटड़ो खोलो म्हाने देखण रो चाव छै” नामक शोक-गीत गाना, रतलाम-नरेश के स्वर्गवास पर तालाब के किनारे कविता की जलांजलि देना प्रसिद्ध हैं। जहां तक नारी का सम्बंध है, वह इनके जीवन में स्फूर्तिदायक प्रेरणा बनकर आई थी। इनके ६ स्त्रियां थीं- दोला, सुरजा, विजयका, जसारु, पुष्पा एवं गोविन्दा। संभव है, संतान न होने से इतने विवाह करने की आवश्यकता हुई हो! ये गणिका-गायन के विशेष प्रेमी थे। जब झज्झर ग्राम की गणिका पर मुग्ध होकर काव्य-रचना शिथिल पड़ गई तब बूंदी-नरेश ने उसे इनाम देकर चुपके से भगा दिया। जब इन्हें इस बात का पता चला तब कपड़े जला दिये, भस्म रमा ली और सन्यास लेने पर उतारू हो गये। निदान अपनी वंश-कीर्त्ति में व्यवधान आते देख चतुर नरेश ने इनके पास नित्य ही मनोरंजनार्थ एक नहीं अनेक गणिकाओं को भेजने की आज्ञा दे दी। इसी प्रकार एक गायन पर न्यौछावर होकर इन्होंने गणिका को पाँच सौ रूपये इनाम देने के लिए खजानची के नाम पत्र भेजा किन्तु उसने अधिक समझकर इनकी बात टाल दी। जब गणिका ने लौटकर इस बात की शिकायत की तब इन्होंने उसमें पाँच सौ और जोड़ दिये। उधर खजानची दरबार के पास पहुँचा होगा कि इधर गणिका ने दौड़कर पाँच सौ और बढ़वा दिये। अंत में रामसिंह जी ने निर्णय किया कि पहले लिखी हुई रकम पाँच सौ की पूर्ति खजाना करे और बाकी एक हजार खजानची भरे।

सूर्यमल्ल का जीवन-वृत्त अनेक मनोरंजक घटनाओं का अद्‌भुत जाल है। ये बूंदी के पाँच रत्नों में से एक थे। राजमहल में इनका एक विशेष स्थान नियुक्त था किन्तु अपना अधिकांश समय महाराजा जगन्नाथसिंहजी की हवेली में व्यतीत करते थे। इन्हें गुलेल चलाने का शौक था। इससे पड़ोसी बंदरों के आतंक से निश्चिंत रहते थे। इनके कनिष्ट भ्राता जयलाल जी अपने समय के प्रसिद्ध वैयाकरण थे, आवश्यकतानुसार इनकी शंकाओं का समाधान करते रहते थे। जब ऊब जाते तब सितार लेकर हवेली में इमली के पेड़ पर बनाये हुए मचान पर जा बैठते और गाने लगते- “मीसण थारो मनड़ो कहूं न दीसै”. . . . अपने स्वजनों पर विपत्ति आई देख जो कह देते, वह करके दिखाते थे। कहते हैं कि पाटन के एक बनिये की दुकान पर जब दरबार की आज्ञा से ताला लग गया तब इन्होंने खुलवा दिया था। इसी प्रकार अपने विश्वासपात्र अंबालाल दाहिमा के यहाँ कन्या-जन्म के समय तंगी देखकर इन्होंने राजकीय प्रबंध करा दिया था। यही दाहिमा जब ‘गंगालहरी’ का पाठ करते समय महाराव की मिथ्या प्रशंसा का कोप-भाजन बना तब इन्होंने बूंदी-नरेश को लिखा- “आज ज्ञात हुआ कि प्रशंसा करने से आप हमारे लेखकों के दरोगा चौबे अंबालालजी से नाराज हो गये। यह नई बात मालुम हुई और खयाल आया कि मैंने तो आपकी बहुत प्रशंसा की है और आगे भी करने की इच्छा है – सो इस तरह आप कभी मुझ पर भी नाराज हो सकते हैं। आपको वास्तविकता से इतना प्रेम हो तो ऐसी खरी-खरी सुनाई जाय कि फिर न मुँह दिखाओगे और न हमारा मुँह देखना पसन्द करोगे।” यह पत्र आगे आने वाली घटना का पूर्वाभ्यास था।

सूर्यमल्ल एवं रामसिंह की अनन्यता को देखते हुए क्या कोई इनके भिन्नत्व की कल्पना कर सकता है? इस वस्तु जगत में अभिन्न मित्रता कहाँ पड़ी है? प्राय: बड़े से बड़ा संसर्ग लोभ एवं स्वार्थ के छोटे प्रसंग से टूट जाता है और फिर उसका ताल-मेल बैठाना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में निन्दक भी कान भर दिया करते हैं जिससे चित्त विक्षिप्त होकर विपथ-गामी बन जाता है। यही बात हम राजा और कविराजा के सम्बंध में पाते हैं। लगभग १० वर्ष की कठोर तपश्चर्या के पश्चात् इन दोनों में विरोध आरम्भ हुआ जो किसी छोटे से प्रसंग के विस्फोटित होने की प्रतीक्षा करने लगा (१८५२ ई० के आस-पास) कोई आश्चर्य नहीं, अर्थाभाव से अथवा अधिक व्यय से मनमुटाव हुआ हो। कहते हैं, इस बीच जब कोई दरबार के यहाँ से इनके पास कार्य की प्रगति के विषय में पूछने आता तब ये उसके पीछे पत्थर लेकर मारने दौड़ते और वह बेचारा बड़ी कठिनता से अपने प्राण बचाता था। एक दिन यही दशा मुकुन्द गूजर गौड़ की हुई। चारण विद्वानों का कथन है कि जब बूंदी-नरेशों का क्रमिक गुणावगुण लिखते-लिखते रामसिंह का नाम आया और इन्होंने खरा-खरा लिखना आरम्भ किया तब महाराव से इनकी अनबन हो गई (१८५५ ई०) जान पड़ता है, रामसिंह ने कवि को कुछ ऐसी बात लिखने के लिए अवश्य कह दिया था जिसके लिए इनका हृदय साक्षी नहीं देता था। मुंशी देवीप्रसाद के मतानुसार एक बार इन दोनों में झड़प भी हुई थी। महाराव ने खीझकर कहा-“आपने मेरे बाप-दादा वगैरह के जो दोष लिखे हैं, उनको पढ़कर तो मैंने जैसे-तैसे सबर किया परन्तु अपने दोषों के लिए नहीं कर सकता। ” इन्होने अक्खड़ता से उत्तर दिया-“जब सबके दोष लिखे गये हैं तो आपके भी लिखे जायेंगे। ” यह हौसला देखकर रामसिंह बोल उठे-“ऐसे लिखने से तो नहीं लिखना अच्छा है। ” अपने वर्षों के श्रम, साधना, सेवा एवं काव्य पर सहसा पानी फिरते देख कवि को जो मर्मान्तक पीड़ा हुई होगी, उसकी कल्पना सहज ही में की जा सकती है।

सूर्यमल्ल का समस्त जीवन एक असाधारणत्व लिए हुए था। निःसंतान होने के कारण इन्होंने मुरारिदान को गोद ले लिया जिन्होंने रामसिंह की आज्ञा से ‘वंशभास्कर’ के अपूर्ण अंश को पूर्ण किया। राज्य-सेवा से विमुख होकर कवि १३ वर्ष तक और जीवित रहा और ५३ वर्ष की अवस्था में शरीर त्याग दिया (१८६८ ई०)

सूर्यमल्ल ने कुल ८ रचनायें लिखी जिनमें ‘वंशभास्कर’ (४ भाग, प्रकाशित) विशेष प्रसिद्ध है। इसे राजस्थानी का महाभारत कहा जाता है जिसकी सटीक पृष्ठ सँख्या ४३६८ है। मूल ग्रंथ २५०० पृष्ठों का है। यह ग्रंथ १५ वर्ष की साधना का सुफल है (१८४०-५५ ई०) इसके पश्चात् ऐसा विशाल ग्रंथ कोई नहीं लिखा गया। वीर काव्य की दृष्टि से ‘वीर सतसई’ (प्रकाशित) का घना मूल्य है (१८५७ ई०) इसके प्रामाणिक दोहों की संख्या २८८ है। पिता की लिखी हुई ‘पल विग्रह’ नामक रचना इनके द्वारा पूरी हुई थी। १० वर्ष की अवस्था में ‘रामरंजाट’ नामक ग्रंथ बनाया जिसमें अपने आश्रयदाता के आखेट का वर्णन है। ‘सती रासो’ की रचना भिणाय (अजमेर) की रानी के सती होने पर की गई थी। ‘छंदोमयूख’ छंद-शास्त्र विषयक ग्रंथ है। ‘बळवद्विलास एवं बलवंतविलास’ में भिणाय एवं रतलाम के राजाओं का चरित वर्णित है। ‘धातु रूपावली’ का पता नहीं लगता। इनके अतिरिक्त फुटकर कवित्त-सवैये आदि भी बहुत उपलब्ध होते हैं।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

भाग १ – अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

भाग २ – अनुक्रमणिका

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

(क) जीवनी खण्ड. . . . क्रमशः

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

7 comments

  • Charan Lala

    Vah very good
    Jai Charan Sakti

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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