चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १९२ | सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड: वीर काव्य – सूर्यमल्ल मिश्रण

सती स्त्री की यह स्वभावगत ईर्ष्या कितनी वांछनीय है जो स्वर्ग की अप्सराओं तक को फटकार देती है-

काली अच्छर छक म कर, सूना धव अपणाय।
सूर किसौ परखै सती, बोली सुरग बसाय।।

इस प्रकार ‘वीर सतसई’ भाव एवं कला का एक अभिनव आयोजन है। साथ ही इसमें परम्परा से आती हुई अनेक रूढ़ियों का भी सन्निवेश हुआ है। इस दृष्टि से कवि ईसरदास का ऋणी है। कुछ उदाहरण लीजिए-

धण आखै जागो धणी, हूंकळ कळळ हजार।
बण नूँतारा पाहुणा, मिळण बुलावै वार।।
कंकाणी चंपै चरण, गीधाणी सिर गाह।
मो बिण सूतौ सेजरी, रीत न छंडै नाह।।
आळस जाणै ऐस में, बपु ढीलै बिकसंत।
सींधू सुणियाँ सौ गुणौ, कवच न मावै कंत।।
सुण हेली ढीलै सहज, लेणौ पड़वै लोच।
कंत सजंतां सौ गुणौ, कड़ी बजंतां कोच।।
करड़ौ कुचनूँ भाखता, पड़वा हंदी चोळ।
अब फूलाँ जिम आँग में, सेलाँ री घमरोळ।।

गोपालदान कृत ‘लावा रासा’ वीर रस की एक सफल रचना है। इसमें कवि ने कछवाहों की नरूका शाखा के वीरों द्वारा लड़ी हुई लड़ाइयों का रोचक ढंग से ओजपूर्ण शब्दों में वर्णन किया है। इस ग्रंथ में पाँच युद्धों का पाँच प्रसंगों में वर्णन है- १. महाराजा जगतसिंह (जयपुर) एवं मानसिंह (जोधपुर) का युद्ध २. लावा युद्ध ३. लदाना युद्ध ४. उणियारा युद्ध ५. द्वितीय लावा युद्ध। प्रथम युद्ध को छोड़कर शेष चारों नरूका और मुसलमान लुटेरों के मध्य हुए हैं। लदाना युद्ध के इस दृश्य में सेना के भार से पृथ्वी पर एक अद्भुत हलचल उत्पन्न हो गई है-

चढ़ि चल्लिय मेछान, भान गरदावलि भिल्लिय।
हलचल्लिय हिन्दवान, खखड जुग्गनि खिल खिल्लिय।।
धर हुल्लिय परिभार, पहुमि बसवान उचल्लिय।
हल मिल्लिय परि जोर, शेष अहि फन पर सल्लिय।।
लखि जोर सोर दिल्लिय सदन, तदन तोर दरसावियो।
कर अली-अली माधव नगर, येम सजी कर आवियो।।

और भी-

धरा धूम बित्थुरे, तोय ऊछरे सरोवर।
गिरे श्रृंग नग तुट्टि, ताम प्रज्जरे तरोवर।।
नदी कूप नद सूकि, कूक कातर उर फट्‌टिय।
आवट्‌टिय जल जोर, सोर दुहुं ओर उपट्‌टिय।।
सर धून-धून दिगपाल डरि, कसकि कमठ्‌ठनि पिठ्‌ठि भर।
धर धुज्जि तलातल तल बितल, शेष सलस्सल छड्‌डिधर।।

युद्ध के तेजी पकड़ने पर कवि ने क्या ही सुन्दर चित्र खींचा है ?-

कितेक लत्थ बत्थ ह्वै अचेत भूमि पै गिरै, किते कुठार खग्ग धार सेल खंजरू लरै।
कितेक हाथ पावके बिहीन भूमि पै लुटैं, कितेक सीसके कटे कबंध ऊठिके जुटैं
कितेक गिद्धनीन को धपाय गूद अप्पने, कितेक सुद्धि के विहीन मार-मार जप्पने।
कितेक ईस पोय लीन सीस मुंजकी गुनि, कितेक खप्र खोपरी बनाय जुग्गनी चुनी।।
कितेक बीर जुद्ध में अधीर होय बक्कही, कितेक भूत खेचरी अघाय श्रोन छक्कही।
कितेक हूर अच्छरी बिमान बैठि ऊतरी, कितेक जात व्योम को मनो अरठ्ठ की घरी।।

कमजी ने रावत रणजीतसिंह चुण्डावत (देवगढ़) एवं रावत जोधसिंह चहुआन (कोठारिया) की युद्धवीरता पर स्फुट गीत लिखे हैं। प्रस्तुत गीत में कवि ने अँग्रेजों के अनावश्यक हस्तक्षेप करने पर रणजीतसिंह द्वारा प्रदर्शित शौर्य का बड़ा ही ओजस्वी वर्णन किया है-

लीधां आसतीक रेणसिंग ऊचारे घड़ा रो लाडो, ऊबारो भड़ाळां नाम चाढ़ौ कुळां अंब।
गोरां रे अजंटी बौल सांभळे वीराण गाढो, खंगै ऊभौ मैदपाट आडो जेत खंभ।।
चगे नथो पावां वीरताई ऊफणी रे चखां, बातां हुई गणीरे अभीडा बोलै बौल।
आवतां फरंगी समै जासती वणीरे एळा, रहे तेण वेळा चूंडो धणी रे हरोल।।
माथे शत्रां खांपां घावै गवांवै जिहान माथै, दसुं दसा सोभाग छवायो वीरदाण।
जींहान जाणी जोम छते नाहरेस जायो, अजंठी ऊठायो आयो आपे ही आथाण।।
गाजे धूंसा राणरा फरंगी लगा दीये गेले, ओसाणा साधियो टला हमला खेवाड़।
अई चूडा गराणे हींदवां छात आराधियों, आपरे गळे ही भलां बाधियों मेवाड़।।

~~क्रमशः


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भाग १ – अनुक्रमणिका (शीर्षक पर क्लिक करें)

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

भाग २ – अनुक्रमणिका (शीर्षक पर क्लिक करें)

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

३. वीर काव्य. . . . क्रमशः

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

9 comments

  • रतन सिंह चंपावत

    सादर जय मां करणी जी की।

    रतन सिंह चाँपावत विट्ठलदासोत “रणसीगांव रा आपनै घणै मान जवारड़ा।

    इतिहास अर साहित नै सहेजण री आ घणी ओपती अर अंंजस जोग खेंंचल है ।
    आपने घणै मान बधाई

  • Charan Lala

    Vah very good
    Jai Charan Sakti

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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