चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १०५ | पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य (श्रृंगारिक काव्य)

करणीदान कविया ने अपने महाकाव्य के अन्तर्गत ‘अंतपुर रौ वरणण’ एवं ‘स्त्री वरणण’ में संयोग का चित्रण किया हे। अंतःपुर में रहने वाली स्त्रियों का रूप वर्णन करते हुए कवि कहता है-

दुति भाँण पदमणि देखि, पति जेम पदमणि पेखि।
सज्जंत सोळ सिंगार, आभरण दूण अढार।।
नव जरी वेलि अनूंप, चिग नौख गौख सचूंप।
सहचरी चतुर सबोह, मिळ रचत उच्छब मोह।।
वर करत चौक वणाव, करि कुंमकुंमा छिड़काव।
मझि छभा राज मंझारि, नव उछब इम नर नारि।।

कहीं-कहीं परम्परागत उपमान भी देखने को मिलते हैं-

छुटी अलक्क नाग छौन, सोभ एम साज ही।
रथंस जांणि चंद्र रासि, रूप में विराजही।।
राजै मुखं सबाधि रूप, जोति चंद्र हूं जहीं।
रहै सदा अखंड रूप, निक्ख सांमता मही।।
सिंदूर बिंदु भाल सोभ, ओपियौ आणंद रै।
जिको उरम्म माळ जाणि, चाढ़ि दीध चंद रै।।

करणीदान में श्रृंगार की यह प्रवृत्ति युग का प्रभाव ही कही जायगी, अन्यथा रामजन्म के समय वह इस प्रकार का वर्णन न करता-

सिंगार सोळ सज्जयं, लखे सची सु लज्जियं।
इसी न रम्भ यदरी, सझन्त ज्ञान सुन्दरी।।
संगीत नृत्य सोहती, मुनेस हंस मोहती।
अनंग रंग आतुरी, प्रिया नचन्त पातुरी।।
कुलीण नारि केकयं, आणंद में अनेकयं।
सुहाग भाग सुम्भरी, अनेक राग उच्चरी।।
इसीज वाणि उच्चरे, किलोळ कोकिला करे।
प्रफूलयं प्रकासयं, हसन्त के हुलासयं।।
करन्त के किलोहलं, महा उछाह मंगलं।
सझे इसी सहच्चरी, उरःवसी न अच्छरी।।
वणाव सोळ वामरा, कटा छिबांण कामरा।
उच्छाह में उमंगयं, करंत राग रंगयं।।
रमै इसै नरिंजरां, मझार राज मिन्दरां।
करै उच्छाह सुकिया, पचास सात से प्रिया।।

राज-कवि सौंदर्य के भूखे नहीं, अत: कविया ने रानियों का सौंदर्य-वर्णन न कर उनकी वाह्य वेश-भूषा का चित्रण किया है। नश-शिख वर्णन में रूढ़ि भी है, कहीं-कहीं मौलिकता भी।

६. रीति काव्य:- साहित्य में किसी विषय का वर्णन करते समय वर्णों की वह योजना जिससे ओज, प्रसाद या माधुर्य गुण का सन्निवेश हो, ‘रीति’ का सामान्य रूढ़ अर्थ माना जायगा। ‘रीतिरात्मा काव्यस्य’ कहकर वामन इसे काव्य की आत्मा मानते हैं। जिस प्रकार नर-नारी की शारीरिक रचना को देखकर उसके गुणों का ज्ञान हो जाता है, उसी प्रकार अनुकुल पदों का संघटन कर काव्य में गुणों की व्यंजना द्वारा रस-उत्कर्ष होता है। हर्ष का विषय है कि चारण-साहित्य में भी ऐसे ही रीतिकार हुए हैं जिन्होंने अमूल्य ग्रंथों की सृष्टि कर राजस्थानी कवियों एवं लेखकों का पथ-प्रदर्शन किया है। इनमें सर्वश्री जोगीदास, हमीरदान, वीरभाण एवं उदयराम के नाम सगर्व लिए जा सकते हैं। जोगीदास प्रथम चारण था, जिसने इस क्षेत्र में प्रथम कदम उठाया।
यह लक्ष्य करने की बात है कि राजस्थानी साहित्य में हरराज रावळ ने ‘पिंगल सिरोमणे उडिंगल नांममाळा’ एवं नागराज जैन ने ‘नागराज पिंगल कृत डिंगल कोष’ नामक ग्रंथों की रचना कर जिस प्रवृत्ति का बीजारोपण किया था, उसे विकसित करने का श्रेय जोगीदास को है। ‘हरि-पिंगल प्रबन्ध’ (१६६४ ई.) इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। यह एक छन्द-शास्त्र का अनुपम ग्रंथ है जिसमें ९९ प्रकार के गीतों और अनेक छन्दों का प्रमुख रूप से लक्षण उदाहरण के साथ दिया गया है। यह उल्लेखनीय है कि इतने गीतों का उल्लेख और किसी ने नहीं किया। गीतों के मूल उद्‌गम का पता नहीं चलता किन्तु इसे देखकर लगता है कि इससे पूर्व भी इस प्रकार के ग्रंथ अवश्य लिखे गये होंगे। प्रस्तुत ग्रंथ में तीन परिच्छेद हैं जिनमें क्रमश: संस्कृत, हिन्दी एवं डिंगल में प्रयुक्त होने वाले मुख्य-मुख्य छन्दों के लक्षण सोदाहरण दिये गये हैं। रीति-काव्य की दृष्टि से ये परिच्छेद अत्यन्त उपयोगी हैं। अन्त में चारणाचार्य ने हरिसिंह के वंश-गौरव का वर्णन किया है, जो ऐतिहासिक दृष्टि से पृथक महत्त्व रखता है। ऐसा करना एक राज्याश्रित कवि के लिए स्वाभाविक ही है। भाषा-शैली पर रीतिकालीन प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। एक उदाहरण दिया जाता है-

वाणी सेस उचारवा, मैं मन कीधौ पेख।
कांकीड़ा लोड़ै न की, गज घूमंतां देख।।
हणमत सहजै डाकियौ, गौ लोपै महराण।
त की न कूदै दादरौ, हत्थ-बेहत्थ प्रमाण।।
राणी गज-मोताहळै, बौह मंडै सणगार।
की भीली झालै नहीं, गळ गुंजाहळ हार।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

भाग १ – अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

६. रीति काव्य. . . . क्रमशः

भाग २ – अनुक्रमणिका

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

6 comments

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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