चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – २५० | आठवाँ अध्याय – चारण-काव्य का नवचरण (उपसंहार)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – कवि एवं कृतियाँ

१४. प्रभुदानसिंह:- ये पाल्हावत बारहठ शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९१९ ई०) और जयपुर जिलान्तर्गत ग्राम किशनपुरा के निवासी हैं। आपके पिता का नाम शेषदानसिंहजी है। आपने जोबनेर से मैट्रिक उत्तीर्ण कर (१९३९ ई०) सतत् राज्य-सेवा की और गत वर्ष इससे निवृत्त हुए हैं (१९७४ ई०)। ये विद्यार्थी-काल से ही कवितायें लिखते आये हैं। इनकी रचनायें भक्ति काव्य के अन्तर्गत आती हैं जिनमें ‘श्री दुर्गा शप्तशती’ तथा ‘श्रीमद्भागवत गीता’ का अनुवाद, ‘श्री करणीजी का जीवन-चरित्र महाप्रयाण तक’, ‘श्री जगदम्बा की प्रार्थनायें’, ‘भगवत भजन व स्तुति’ आदि उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त फुटकर छंद भी अनेक हैं। ‘करणी-चरित्र’ का यह उदाहरण देखिये-

सर्व रूप त्रय लोकमय, वंदौ पुरुष विराट् छवि।
करणी कीरति कथत ‘प्रभु’ क्षमहु भूल सब संत कवि।।
करणी करुणाधाम ग्राम देशाण विराजै।
लाल ध्वजा यश विमल मूर्ती छवि अनुपम छाजै।।
शेखा हित बन सेन आप मुल्तान सिधाई।
लाई बंधु छुड़ाय कीर्ति जण अबलौं छाई।।
भक्त काज सारे सकळ, विरद विचारो करनला।
‘प्रभु’ चारण चितवत् सभी देशनोक दुर्गे कला।।

१५. उजीणसिंह:- ये सामौर शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९२० ई०) और चुरू जिलान्तर्गत ग्राम बोबासर के निवासी हैं। इनके पिता का नाम चतुरदानजी है जो राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि रह चुके हैं। शिक्षा-दीक्षा सामान्य होने पर भी कवि-कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें साहित्यिक परम्परा विरासत में प्राप्त हुई है। अपने क्षेत्र के विकास कार्यो में विशेष अभिरुचि लेते हैं। आप ग्राम विकास समिति के संस्थापक सदस्य हैं। इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि है किन्तु इसके साथ-साथ साहित्य-सेवा भी करते रहते हैं। बांगला देश मुक्ति संग्राम से सम्बंधित इनकी रचना ‘विजय-सतक’ बहुत लोकप्रिय हुई। इसके अतिरिक्त स्फुट रचनायें प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। इन रचनाओं के प्रस्तुतीकरण की इनकी अपनी मौलिक विशेषता है। उदाहरण के लिए ‘विजय-सतक’ का यह अंश देखिये-

लेवण नै कसमीर तूं, घणा बजातो गाल।
को याह्या किसड़ी हुई, खो बैठ्यो बंगाल।
निरहत्था लाखां मिनख, खूंनी तूं खायाह।
काकी जायां सूं भिड़्या, होवै आ भायाह।।
निकसन तो कस बायरो, जग सारै जाणीह।
मिनख पणो अळगो धर्‌यो, ताना साह तांणीह।।
राज विभीषण नै दियो, जिंयां राम जग तेस।
जण बळ नै भारत दियो, बिंयां बांगला देस।।
माणक उस्मानी मरद, जबरोड़ा जग जीत।
भुजबळ थांरै भारती, गाया जस रा गीत।।

अकाल के संदर्भ में कवि का निन्दात्मक स्वर भी देखिये-

दुरभख री इण देश में, अब न रही ओगाळ।
आज मनिस्टर सांपरत, पगां चालता काळ।।

इसी प्रकार चाँद पर चढ़ने वालों की भर्त्सना करते हुए भी कवि का मानवतावादी स्वर ही मुखरित हुआ है-

करक बण्यो सिड़र्‌यो मिनख, इण धरती रो आज।
धिरक चांद पर चढणियां, तोय न थांनै लाज।।

१६. नारायणसिंह:- ये कविया शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९२० ई०) और पाली जिलान्तर्गत ग्राम नोख के निवासी हैं। इनके पिता का नाम सुमेरदानजी है। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा जोधपुर में हुई जहाँ से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करके आप अध्यापक हो गये। आगे अध्यापन कार्य के साथ-साथ अध्ययन भी करते गये और इस प्रकार एम० ए० हिन्दी तथा बी० एड० की परीक्षायें उत्तीर्ण की। ये धुन के पक्के हैं और जो काम हाथ में लेते हैं उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं। आपका जीवन ग्रामीण क्षेत्रों में ही व्यतीत हुआ है। सम्प्रति राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, निम्बेड़ा कला में मुख्य अध्यापक के रूप में कार्य कर रहे हैं।

नारायणसिंहजी बाल्यावस्था से ही राजस्थानी काव्य-क्षेत्र में रुचि लेते रहे हैं। इन्होंने अपने गेय गीतों के दो संकलन प्रकाशित कराये हैं- ‘मीठे बाल गीत’ (१९६१ ई०) तथा ‘प्रेरणा के गीत’ (१९५७ ई०)। इनका वर्ण्य विषय राजस्थान की धरती और यहाँ का शौर्य है। इनके अतिरिक्त फुटकर रचनायें लिखने में भी पीछे नहीं रहते। यहाँ ‘धरती काशमीर री’ का एक उदाहरण देखिये-

अम्बर गरजे धर हिले, सुण भारत रा वीर।
शीश भलां ही देवजे मत दीजे कशमीर।।
इण धरती रो म्हांने अभिमान ओ ईपर वारों प्राण ओ-
धरती काशमीर री।।
हँसतोड़ा फुलड़ों री घाटी महके केसर क्यारियां।
ज्योरी शोभा देख लजावे अमरापुर री नारीयां
रसवन्ती धरती में निपजे दाख बिदाम ओ-
धरती काशमीर री।।

इण धरती में हड़पण सारु दुसमण उभा लपके है।
अंगूरी खेतों रे सारूं मूंडे पाणी टपके है।
पण आंगल आंगल धरती सारु जासी जान ओ-
धरती काशमीर री।।

इमरत सर जोधोणे जम्मू दुस्मन गोला नाखिया।
सरगो धो लाहौर लेतो भुट्टो गोडा टेकिया।।
कसमीरी धरती सूं पापी पड़िया ढाण ओ-
धरती काशमीर री।।

चौबेजी छबेजी बाणता दुब्बे वे ने दौड़िया।
टैंक ने बन्दूक गोला डरता लारे छोड़िया।।
पूछड़ी दबाय कायर कियो पयाण ओ-
धरती काशमीर री।।

हाजी पीर हेलो दीन्हो अयूब अठी मत आवजे।
भुट्टो भाई भले भचेड़ो भारत सू मत खावजे।।
काशमीर खोदेला थारो कब्रिस्तान ओ-
धरती काशमीर री।।

१७. जोरावरसिंह:- ये सांदू शाखा में उत्पन्न हुए हैं (१९२१ ई०) और पाली जिलान्तर्गत ग्राम मृगेश्वर के निवासी हैं। इनके पिता का नाम नाथूदान जी है। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा मिडिल स्कूल, सेवाड़ी में हुई फिर आपने मैट्रिक, इन्टर उदयपुर से और बी० ए० जसवंत कॉलेज से उत्तीर्ण की (१९४४ ई. )। विद्याध्ययन के पश्चात् ये जोधपुर राज्य-सेवा में तहसीलदार पद पर नियुक्त हुए। फिर तो शनैः शनैः उन्नति करते गये तथा राजस्थान-प्रशासनिक-सेवा में आकर (१९५० ई०) अनेक महत्त्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया। अभी आप ‘राजस्व अपील अधिकारी’ के पद से सेवा-मुक्त हुए हैं।

जोरावरसिंहजी उदयपुर में शिक्षा ग्रहण करते समय कवितायें लिखने लगे। इन्होंने कविता प्रतियोगिताओं में भाग लिया तथा प्रथम पुरस्कार भी प्राप्त किया (१९३८-‘३९ ई०)। ठा० केसरीसिंहजी बारहठ (सौन्याणा) को आप अपना गुरू मानते हैं और इन्हीं से कविता लिखने की प्रेरणा मिली। समाजसुधार की महत्त्वाकांक्षा से आपने कवितायें लिखी हैं। कवि ने राष्ट्रपिता गाँधी का यशोगान इन शब्दों में किया है-

ध्रुव से अटल अरु सलिल से नम्र संत,
धीर, वीर ! पीर पर असह्य है तेरे काज।
दीदन तें दीन बनि सेवा करि जग को तूं,
सेवाग्राम संत बन्यो उर को सम्राट आज।
अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र साज हटा नग्न होय पूज्य,
मिटाने लंगोटी कसी विश्व की नग्नता आज।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

भाग १ – अनुक्रमणिका (शीर्षक पर क्लिक करें)

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

भाग २ – अनुक्रमणिका (शीर्षक पर क्लिक करें)

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

[…]* संशोधित

9 comments

  • रतन सिंह चंपावत

    सादर जय मां करणी जी की।

    रतन सिंह चाँपावत विट्ठलदासोत “रणसीगांव रा आपनै घणै मान जवारड़ा।

    इतिहास अर साहित नै सहेजण री आ घणी ओपती अर अंंजस जोग खेंंचल है ।
    आपने घणै मान बधाई

  • Charan Lala

    Vah very good
    Jai Charan Sakti

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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