चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – २१८ | सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – आलोचना खण्ड: प्रकृति प्रेम

शिवबख्श कृत ‘षड् ऋतु वर्णन’ प्रकृति पूजा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें १३० झमाल हैं जिनमें ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ अलवर की शोभा का सुन्दर वर्णन किया गया है। प्रकृति के ऐसे रंग-बिरंगे चित्र अन्यत्र दुर्लभ हैं। महाराजा बख्तावरसिंहजी के समय में बना हुआ जलाशय कैसा शोभायमान हो रहा है और कितना सुन्दर लगता है उस पर बना हुआ राजमहल!-

सोभा अति सागर तणी, जो नहि बरणीं जाय।
देखि भर्‌यो मंजार दधि, पथ भोलै पी जाय।।
पय भोलै पी जाय, भलो इण भाँत सूं।
हंसा संभ्रम होय, क्षीर सिंधु खाँत सूं।।
बणियो ताल विहद्द वखत नृप बार रो।
उण पर अधिक अराम धाम, छत्र धार रो।।

वहाँ जल भरती हुई पनिहारिनों को देखकर कवि ने जो कल्पना की है, वह सर्वथा दृष्टव्य है-

महलां तळ छळियो महण, सागर जल सरसार।
आवै मिंल लंझा उठै, पंणघट पर पणिहार।।
पंणघट पर पणिहार, नीर कज्ज नीसरी।
श्रीफल तणै प्रमाणक, शोभा शीसरी।।
कच बैणीं गुंथि कुसम, लपेटा लागणीं।
साँपड़ि क्षीर समुद्रक, निकसी नागणीं।।

सावणी तीज के दिन इस जलाशय को देखकर लोगों का हृदय-सागर उमड़ आया है। सुरंगे ओढ़ने ओढ़कर पद्‌मिनी नायिकायें अट्टालिकाओं पर चढ़कर लहरों का आनन्द मन भरकर लूट रही हैं-

आय सांमणीं तीज अब, सरसांमणी सनेह।
ऊठि घटा उतराध सूं, छूटि पटा अणछेह।।
छूटि पटा अणछेह, मेह झड़ मंडवै।
चमंकि छटा चहुँ ओड़, घटा घूमंडवै।।
सुरंग दुपट्टा शीस घटा सुघटा घणीं।
लहर अटा चढ़ि लेत, पटा भर पदमणीं।।

मेघों का गरजना और बिजली का चमकना, कभी प्रकट होना और कभी छिप जाना यह दृश्य ऐसा दिखाई देता है मानो बिजली बादल से आँखमिचौनी खेल रही हो-

झुकि बादल लागी झड़ी, उघड़ै घड़ी न इंद।
बायु त्रहूं बागी बहण, शीतल-मंद-सुगंद।।
शीतल-मंद-सुगंद, वायु त्रहूं बाजावै।
मधुरो-मधुरो मेह क, गहरो गाजवै।।
छटा चमंकि छिप जात, घटा मधि यौं घणीं।
मिलि खेळत घण माँहि, मनौं तुक मीचणी।।

कवि ने परम्परागत साहित्यिक रूढ़ियों को भी सहृदयता के साथ अपनाया है। वर्षा-ऋतु के फलस्वरूप वसुधा का यह नव श्रृंगार बड़ा ही आकर्षक है-

हरिया तरु गिरवर हुवा, पांघरिया बन पात।
सर तालर भरिया सुजल, बसुधा सबज बनात।।
बसुधा सबज बनात, बिछायत ज्यौं बणीं।
जिलह ओस कंण जोति, कि नां हीरा कणीं।।
इंद बधू अण पार, क बसुधा बित्तरी।
मनु तूटी मणिमाल, मदन महिपत्तरी।।

ऊमरदान की प्रकृति ऋषि दयानंद के शुभागमन से लहलहा उठी है-

अन्त असाड दयानन्द आयो, छोणी ज्ञान घुमड घण छायो।
सावण हरिकर सुख सरसायो, भादो अम्मृत झड़ बरसायो।।
बहे व्याख्यान बळोबळ बाळा, नीर निवाण ताल नद नाळा।
पड़े प्रेम घर-घर परनाळा, जुगति जळ मेटी त्रिस ज्वाळा।।

और शोक में यही प्रकृति अर्जुनसिंह द्वारा चित्रित खुशालकुमारी को सती होने के लिए प्रेरित करती है-

परवाई वज पवन, वाहळ अनड़ां रा वाजै।
दिस-दिस रींछी दौड़, छटा झळमळ रुत छाजै।।
हर वल बुग पँथ हलै, स्याम घण बदळ सुरंगा।
बन गेहरा रँग वणै, तणै इँद धनख दुरंगा।।
कंक धार अखँड मोरां कुहक, गहरै अंबर गाजतां।
खुसहाल उमँग हरख र चली, वर सँग ढौल व़जावतां।।

~~क्रमशः


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भाग १ – अनुक्रमणिका (शीर्षक पर क्लिक करें)

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

भाग २ – अनुक्रमणिका (शीर्षक पर क्लिक करें)

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

[…]* संशोधित

9 comments

  • रतन सिंह चंपावत

    सादर जय मां करणी जी की।

    रतन सिंह चाँपावत विट्ठलदासोत “रणसीगांव रा आपनै घणै मान जवारड़ा।

    इतिहास अर साहित नै सहेजण री आ घणी ओपती अर अंंजस जोग खेंंचल है ।
    आपने घणै मान बधाई

  • Charan Lala

    Vah very good
    Jai Charan Sakti

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

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