चारण साहित्य का इतिहास – डॉ. मोहन लाल जिज्ञासु

| कड़ी – १४६ | छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान)
| धारावाहिक श्रंखला – प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ – पद्य साहित्य – राष्ट्रीय काव्य

६. राष्ट्रीय काव्य:- अँग्रेज अपनी सैन्य-शक्ति एवं राजनीति के बल पर राजस्थानी नरेशों को एक-एक करके अपने वश में कर रहे थे। यह देखकर कतिपय स्वतंत्रता प्रेमी नरेशों का हृदय क्षुब्ध हो उठा। अत: उन्होंने उनका विरोध किया। अंग्रेजों के साथ संधि हो जाने पर भी भरतपुर नरेश रणजीतसिंह ने जसवंतराव होल्कर को अपने यहां शरण दी और लाख प्रयत्न करने पर भी उसे नहीं सौंपा। विषम परिस्थितियों में उलझे रहने पर भी जोधपर नरेश मानसिंह ने जीवन भर अंग्रेजों को तबाह किया, होल्कर के साथ संधि की और अप्पाजी भोंसले को अपने यहां शरण दी। राज्य-गद्दी की कठिनता, सरदारों की चालबाजी एवं नाथों के उपद्रव ने उन्हें चेन की नींद न लेने दी फिर भी उन्होंने अंग्रेजों को खूब छकाया और उनकी आज्ञाओं को टालते रहे। महाराजकुमार चैनसिंह (नृसिंहगढ़), महारावल जसवंतसिंह (डूंगरपुर), हाडा बलवंतसिंह गोठड़ा (बूंदी) एवं रावत केसरीसिंह (सलूंबर) से तो युद्ध भी हुए किन्तु इन वीरों ने दासता स्वीकार नहीं की। इससे सरदारों में भी जोश आ गया और उन्होंने अंग्रेजों को तंग करना आरम्भ किया। शेखावाटी प्रदेश के बठोठ गांववासी डूंगरसिंह एवं जवाहरसिंह अंग्रेजों की डाक तथा खजाने लूटने लगे और चांपावत अभैसिंह एवं चिमनसिंह (बलूओत) नामक दो भाइयों ने भी ऐसा कर उनका साथ दिया। यदि अन्य नरेश पारस्परिक वैर-वैमनस्य एवं प्रलोभन को तिलांजलि देकर इन राष्ट्र-वीरों के साथ विश्वासघात न करते तो शायद स्थिति कुछ और ही होती। कहना न होगा कि चारण कवि इन घटनाओं से प्रभावित हुए हैं और उन्होंने इन क्रांतिकारियों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की है।

इस दृष्टि से वांकीदास, नाथूराम, नवलदान, बुधजी, जवानजी, चिमनजी, गोपालदान, चैनजी, गोपालदान (भदोरा), गिरवरदान, जादूराम, चंडीदान, मोहबतसिंह, दुर्गादत्त, बुधसिंह, दलजी, लक्ष्मीदान, चंडीदान महियारिया, गंगादान, जीवराज एवं भारतदान की रचनायें उल्लेखनीय हैं। इनमें राष्ट्रीय क्रियाशीलता के प्रमुख केन्द्र – भरतपुर, जोधपुर, जयपुर, बूंदी एवं डूंगरपुर की विविध हलचलों का यथार्थ चित्रण हुआ है। अस्तु,

राजा-महाराजाओं के पारस्परिक वैर-वैमनस्य एवं उनकी ऐश्वर्य प्रियता के कारण धरती माता शनैः-शनैः पराई होती जा रही थी। यह देखकर स्वदेश प्रेम विह्वल कविराजा वांकीदास का हृदय जलने लगा। बिना युद्ध के अंग्रेजों के आगे नतमस्तक होना उन्हें बहुत बुरा लगा। अत: उन्होंने ओज भरी वाणी में इन बाहुबलियों की भर्त्सना की और उन्हें स्वाभिमान एवं कर्त्तव्य के लिए ललकारा। यह लक्ष्य करने की बात है कि भारतेंदु बाबू हरिश्चन्द्र से भी पूर्व कविराजा ने स्वाधीनता के लिए शंखनाद किया था और इस ओर सबका ध्यान आकर्षित किया कि अंग्रेज नाम का शैतान हमारे देश पर चढ़ आया है जिसने देश के जिस्म की सारी चेतना को अपने खूनी अधरों से सोख लिया है। ‘गीत चेतावणी रो’ में कवि की राष्टीय भावना कितने सुन्दर रूप से मुखरित हुई है?

आयो इंगरेज मुलक रै ऊपर, आहँस लीधा खैंचि उरा।
धणीयाँ मरै न दीधी धरती, धणीयाँ ऊभाँ गई धरा।।1।।
फोजाँ देख न कीधी फोजाँ, दोयण किया न खळा डळा ।
खवाँ-खाँच चूडै खावंद रै, उणहिज चूडै गई ईळा।।2।।
छत्रपतियाँ लागी नह छाँणत ! गढ़पतियाँ धर परी गुमी।
बळ नह कियो बापडाँ बोताँ, जोताँ-जोताँ गई जमी।।3।।
दुय चत्रमास बाजियो दिखणी, भोम गई सो लिखत भवेस।
पूगो नहीं चाकरी पकड़ी, दीधो नही मरेठाँ देस।।4।।
बजियो भलो भरतपुर वाळो, गाजै गजर धजर नभ गोम।
पहिलाँ सिर साहब रो पड़ियो, भड़ ऊभाँ नह दीधी भोम।।5।।
महि जाताँ चींताताँ महलाँ, ऐ दुय मरण तणाँ अवसाँण।
राखो रै किहिंक रजपूती, मरद हिन्दू की मुसलमाण।।6।।
पुर जोधाण, उदैपुर, जैपुर, पह थाँरा खूटा परमाँण।
आंकै गई आवसी आंकै, “बांकै” आसल किया बखाँण।।7।।

स्वतंत्रता को लक्ष्य करके वांकीदास ने और भी कई गीत लिखे हैं जिनमें ‘गीत भरतपुर रो’, ‘गीत नींबावतां रै महंत रो’ एवं ‘गीत मानसिंहजी रो’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। राष्ट्रीय दृष्टि से ये गीत बडे महत्वपूर्ण हैं। ‘गीत भरतपुर रो’ में कवि ने अंग्रेजों के विरूद्ध राजा रणजीतसिंह की अतुल युद्धवीरता का ओजस्वी वर्णन किया है। यथा-

अण खरब कळह तर कहै दुज अेकठा, गरब वां किताबां तणा गळियां।
थया बलहीण लसकर फिरंगथांन रा, चीण इनांन रा इलम चलिया।।
मेर मरजाद रणजीत आखाड़ मल, खेर दीधा डसण जबर खेटै।
पुखत गुरगम मिळी सेन पण पांकियो, भरतपुर फेर नह उसर भेटै।।

‘गीत नींबावतां रै महंत रो’ में लम्बे टीके वाले पाखंडी एवं विश्वासघाती साधुओं के कारण जाटों की पराजय का उल्लेख है। यथा-

हुवो कपाटां रो खोल बोहतै फिरंगी थाटां राहलो, मंत्र खोटा घाटां रो उपायो पाप भाग।
भायां झड़ां फाटां रो हरीफां हाथे दीनो भेद, ऊभा टीका वाळां कीनो जाटां रो अभाग।।
माल खायो ज्यांरो त्यांरो रत्ती हीथे, नायो मोह, कुबदी सूं छायो भायो नहीं रमाकंत।
वेसासघात सूं कांम कमायो बुराई दाळो, माजनो गमायो नींबावतां रै महंत।।

‘गीत मानसिंहजी रो’ में अँग्रेजों के सामने न टिकने वाले राजाओं की शिव रूप महाराज मानसिंह की शरण में आने का चित्रण है। यथा-

देख गरुड़ अंगरेज दळ, बणिया नृप अन व्याळ।
जठै मांन जोधाहरो, भूप हुवो चंद्र भाळ।।

~~क्रमशः


नोट: पूर्व में प्रेषित कड़ियों को पढने के लिए निम्न अनुक्रमणिका में सम्बंधित विषय के शीर्षक पर क्लिक कीजिये। जो कड़ियाँ प्रेषित हो चुकी हैं उन्ही के लिंक एक्टिव रहेंगे।

भाग १ – अनुक्रमणिका

पहला अध्याय – विषय प्रवेश

दूसरा अध्याय – चारण साहित्य की पृष्ठभूमि (सन ६५०-११५० ई.)

तीसरा अध्याय – प्राचीन काल (सन ११५०-१५०० ई.)

चौथा अध्याय – मध्यकाल, प्रथम उत्थान (१५००- १६५० ई.)

पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल, द्वितीय उत्थान (सन १६५०-१८०० ई.)

भाग २ – अनुक्रमणिका

छठा अध्याय – आधुनिक काल, प्रथम उत्थान (सन् १८००-१८५० ई०)

सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान (सन् १८५०- १९५० ई०)

आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव-चरण (सन् १९५० – १९७५ ई०)

7 comments

  • Charan Lala

    Vah very good
    Jai Charan Sakti

  • Shambhusingh chahdot Barahath

    जय माता जी की बहुत बढ़िया जानकारी दी है होकम।

  • Balwant Deval

    जिज्ञासु जी की मेहनत को कोटि कोटि वंदन।
    इस पुस्तक को अगर हम खरीदना चाहे तो कंहा ओर कैसे सम्पर्क करना होगा।
    कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

    • राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर में मिल सकती है हुकम। उनका नंबर है 9414100334

  • Mahendra singh

    साधुवाद

  • पुष्पेंद्र जुगतावत

    यह ग्रन्थ अत्यधिक श्रमसाधना का परिणाम है। इसका सुलभ होना स्वागत योग्य है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *