चारणां रो रगत पचैला नीं!

कच्छ धरा में एक गांम है मोरझर। मोरझर जूनो सांसण। अठै सुरताणिया चारण रैवै। ऐ सुरताणिया पैला पाधरड़ी गांम में रैवता। किणी बात माथै उठै रै ठाकुर राजाजी वाघेला सूं अणबण हुयगी अर ऐ आपरो माल-मवेशी लेय गांम सूं निकल़ग्या।

बैता-बैता मोरझर पासै आया तो इणां नै आ धरा आपरै बसणजोग लागी। घणो झूंसरो, प्रघल़ो पाणी। लीला लेर अर घेर घुमेर रूंखां री जाडी छाया देख इणां आपरो नेस अठै थापियो।

इण सुरताणिया परिवार रा मुख्या जगोजी हा। वै बोलता पुरस, डील रा डारण अर दीखत रा डकरेल हा-

भोपाल़ां बातां हद भावै,
सबद सुहावै घणा सकाज।
देह धराज दीसता डारण,
राजावां बिच सोहै कविराज।।
~~मानसिंहजी जोधपुर

उण दिनां मोरझर री धरा लाखाड़ी री सीमा में पड़ती सो जगाजी रो ऐड़ो व्यक्तित्व देख’र उठै रा ठाकुर देवाजी इणां नै सदैव रै सारू इनायत करदी। जगाजी रै साथै ई इणां रा मोटा भाई भाखरसी ई रैता। इणी भाखरसी रै एक बेटे रो नाम हो महकरणजी।
महकरणजी रो ब्याव वावड़ी गांम रा झीबा खोड़ीदान री बेटी वानूं रै साथै हुयो।

वानू दया रा मूरत अर करुणा री सागर ही। थोड़ै ई दिनां में आपरै गुणां रै पाण समूल़ै गांम में माण पायो।

सुरताणियां रै साथै ई रैयत आई जिणमें केई गरीब-गुरबा ई भेल़ा हा जिकां मांय सूं केई बखत री मार सूं भल़ै पतल़ा(गरीब) पड़ग्या।

ऐड़ै मिनखां रो स्वाभिमान ई कायम रैवै अर पेट भराई ई हुय जावै, आ सोच’र वानूं एक नियम बणायो कै झांझरकै(प्रभात सूं थोड़ो पैला)उठणो। बिलावणो करणो। लापसी रांधणी अर चरूड़ै रै साथै ई छाछ रो चाडो आपरै फल़सै रै बारलै वल़ा मेलणो ताकि लोगबाग अंधारे में बिनां संकियां ले जावै अर झारो(सिरावण, नास्तो) करै। वै मांयलै पासी ओटै(चौकी)माथै अफूठा बैठ माला फेरण लागता। ओ उणां रो नितनेम हो।

महकरणजी री मोतबरी अर वानूं रै दया भाव री बातां री जसवेल रातां रै पसाव चौताल़ै पसरी। पण ओ सुखद दापंत्य संयोग वि.स.1760 में दुरजोग में बदल़ग्यो। महकरणजी इण संसार नै छोड सुरग वासो कियो। वानूं पति विछोह रो दुख छाती माथै भाटो राख सहन कियो पण आपरै नितनेम में कसर नीं पड़ण दी।

वानूं री दूधाल़ी अर रूपाल़ी गायां री कीरत पाखती रै गांमां पूगी। एक दिन इणां री गायां मछरती रोही में लीलो चरै ही। ग्वाल़ा पाखती बैठा चैन री बंशी बजावै हा कै अचाणक गायां में भगदड़ मची। ग्वाल़ां देखियो कै दस-बारह पाल़ा अर दो घुड़सवार गायां नै माडै टोरै हा। ऐ उठिया। भुटको हुयो पण पार नीं पड़ी। थाबाचूक हुय ग्वाल़ां गांम आय बात बताई। ठाह लागो कै पाखती रै ई गांम लोरिया रा दो जाडेचा (राजपूत) मेघो अर ऊनड़ गायां लेयग्या।

आ सुण’र गांम रा मोटयार मरण मतै हुय संभिया। जद आ बात वानूं नै ठाह लागी तो उणां मोटयारां नै पालिया अर खुद लोरियां गी।

जाडेचा भेल़ा हुया। वानूं उणां नै कह्यो-
“रै डेल़ीचूकां(क्रियाहीण) चारणां सूं ई नीं चूका! चारण तो थांरै आझै(भरोसै, विश्वास) माथै तो निरभै रैवै। कांई थे रजवट रुखाल़ै पाबू री बात सुणी नीं!जिको चारणां री गायां सटै सुरग वरी अर आज ई चारणां रो पौरायत बाजै-

चवड़ै सूवो चारणां, बारै बांधो वित्त।
धिन ज्यांरै धांधल धणी, पाबू पौरायत्त।।

चारण वित्त वाहर चढ्यो, मसतक बंधै मोड़।
अमलां वेल़ा आपनै, रंग पाबू राठौड़।।

एकै कानी थे गादड़ा हुकी-हुकी करता म्हांरी ई गायां टोर लाया। लख लाणत है थांरी जामणी नै जिको थां जैड़ै कपूतां नै हांछल़ चूंघा मोटा किया। उणनै थांरी फिटकड़ी जैड़ी आंख्यां देख नाड़ो काटण री जागा थांरी नस(गर्दन) काटणी चाहीजती। म्हें चारण हां, म्हांरी गायां रो दूध थांनै जरै नीं। ओ दूध नीं, थांरै सारू जहर है। सो म्हारी गायां अजेज पाछी दिरावो। अजै कोई मोड़ो नीं हुयो है। आखड़िया जैड़ा पड़िया नीं।”

आ सुण’र उण जाडेचां कह्यो-
“कांई माजी ऐड़ी भोल़ी बातां करो? कदै ई मसाणां में आई लकड़ी पाछी घरै हालै? म्हैं कांई हल़ जोतांला? म्हांरै आ खेती अर ओ ई विभो। ओ तो दूध है! म्हांनै तो रगत ई जरै।”

आ सुण’र डोकरी नै ई रीस आयगी भंवारा तणग्या। आपरी कटारी काढी अर बोली-
“म्हनै लागै कै थे चणां रै भरोसै कांकरा चाब रह्या हो। ओ रगत चारणां रो है! थांनै कांई थांरी सात पीढी तक अजीर्ण हुय जासी। जिण-जिण ओ रगत जारण री भूल करी उणां रो जगत में लारै नाम लेवणियो नीं बचियो। थे सुणी नीं रै कालां कै कामेई रै क्रोध सूं रावल़ जाम जल़ग्यो हो। पछै थे किण खेत री मूल़ी हो? जिणां री वाहर खुदोखुद जगजामण चढै उणांरो धन कुण खाय सकै?अजै ई एक मोको देवूं कै गायां लाया ज्यां ई छोडदो। हूं जाणूंली कै म्हारै गोरवैं ई ऊभी ही।”

आ सुण उवै दोनूं कुक्षत्रिय काल़ रै वश हुयोड़ा जोर सूं हंसता बोल्या-
“डोकरी उवै चारण्यां अर बखत बीजो हो। हमै बखत बीजो है। मन नै धीजो दो कै गायां सूं संस्कार चूको। आ मानलो कै गायां आपांरी नीं आं जाडेजां री ईज ही।”

आ सुणतां डोकरी आपरी कटार सूं आपरो हांचल़(थण) चीर’र अंजल़ी भरी अर उण कायर जाडेचां कानी बगायो अर बोली-
“लो राकसां ओ पीवो एक चारणी रो रगत। जरै तो जार लीजो नींतर नवलाख रो भख बणजो।”

ओ चकासो देखतां ई उठै ऊभा बीजा आदमी सैतराबैतरा रैयग्या।

पण डोकरी इतरी बात सूं हवा नीं करी उणां अजेज कटारी नै कंठां पैरी।

गाय चोरां वानूं रो ओ विकराल़ रूप देखियो तो बांठां पग दिया। बाकी जाडेचा पगै पड़िया अर अरदास करी कै
“हे बैन ! म्हे निर्दोष हां, म्हांनै बगस।”

आ सुण’र डोकरी बोली कै-
“म्हें थांनै कांई ! उण चोरां नै ई माफी दी। थे सुणी हुसी जद मूढ कानियै(काना राठौड़, जांगल़ू) काल़वश मा करनीजी री परखण सारू मोत मांगी तो उण दयादधि कह्यो हो-

चारण नै रजपूत री, रख रिछ्या दिन-रात।
आ कांई ऊंधी ऊकली, (म्हारा)भोल़ा कानव भ्रात?

सो म्हारै मूंढै म्हैं राजपूत नै मरण पावण री गाल़ नीं काढूं। पण कोई आपरी करणी रो फल़ पासी तो इणमें म्हारो दोष मत मानजो।”

आ कैय वानूं मोरझर आई। कुटंब नै भेल़ो कियो अर रात पूरी जोगसाधना में बैठी रैयी। पावन प्रभात री वेल़ा में मोरझर गांम रै आथूणै पासै आई एक टेकरी माथै उगतै सूरज री साख में वि.सं.1772 री बैसाख सुदी 13 गुरुवार रै दिन जमर री जोत सूं परमजोत में भिल़़गी। आज ई उठै एक पाल़ियो(थान)अर उण में थापित खांभी(पाखाण मूरत) इण बात री साखीधर है कै आई वानूं स्वाभिमान अर चारणाचार नै अखी राखण सारू जमर कियो। इतै वरसां पछै ई मोरझर रा चारण तो कांई कोईपण बीजी जात रो मोरझर वासी लोरिया रो पाणी नीं पीवै। इण ‘अपियै’ रै नेम नै आज ई द्रढ भाव सूं पाल़ै। आप आ जाण’र अचूंभो करोला कै लोरिया़ं में थोड़ै दिनां पछै उण दोनूं खूटल जाडेचां रो पूरो परिवार मर मिटियो।

उण भांयखै(इलाकै)में मा वानूं आज ई एक लोकदेवी रै रूप में संपूज्य है।

परवर्ती घणै डिंगल़ कवियां आई नै अरदास कर’र आपरी आस पूरण रो विश्वास जतायो है।

इण पेटै एक बात चावी है कै कवि जीवण रवाणी(रवदान सुरताणिया का पुत्र) रोहा ठाकुरां रो खास मर्जीदान। रोहा री एक कुंवरी लाठी परणायोड़ी ही। कुजोग सूं परणावतां ई विधवा हुयगी। रोहा ठाकुर, जीवण सुरताणिया नै बुलाया अर कह्यो कै-
“आप लाठी जावो अर बाई नै ले आवो।”

जीवणजी गया। ठाकुरां आवभगत करी। पछै बाई सूं मिलिया। बातांचींता हुई तो बाई कह्यो कै-
“भाभोसा(बड़े पिता) आप म्हनै वचन देवो तो एक बात कैवूं।”

जीवणजी कह्यो कै “डीकरा ! वचन सूं कांई करेला ? तूं कैवै तो जीव काढ’र थारै हाथ में दे दूं ! बता कांई कैवणो चावै?”

बाई कह्यो-
“फखत वचन।”

जीवणजी कह्यो-
“ले बेटा वचन है। जीवण रै जितै नकतूण्यां सास रैसी उतै इण वचन नै पाल़सी।”

कुंवरी कह्यो कै-
“म्हारै माथै राम रूठो। जणै ऐ दिन देखणा पड़िया। आज तो म्हारो बाप बैठो है पण सवारै उणांनै सौ वरस पूगै अर जोग सूं भाई आंख बदल़ ले तो हूं कांई करूंली? सो आप म्हारो गहणो आपरै कनै राखो। किणी नै ई नीं तो बताजो अर नीं कैजो। म्हारै सिंणगार तो रह्यो नीं पण आधार रूप चाहीजेला जणै दीजो।”

आ कैय कुंवरी आपरी मंजूषड़ी जीवणजी नै झला दी। जीवणजी कुंवरी नै लेय रोहा आयग्या। गढ में बाई नै उतार’र खुद बिनां ठाकरां सूं मिलियां आपरै गांम आय, मंजूषड़ी जाबतै कर’र विंसाई ली।

लारै सूं घावड़ियां ठाकुरां नै भिड़ाया कै-
“कुंवरी तो बिचारी टाबर ही सो इणनै पोटाय’र गहणो बाजीसा गटकायग्या।”

ठाकुरां नै ई रीस आयगी। उणां आदमी मेल अजेज बुलाया। जीवणजी आया अर आवतां ई ठाकुरां रै आदम्यां जीवणजी नै कैद कर दिया अर कह्यो कै बाई रो गहणो दियां ई छूटसो।

आ सुण’र जीवणजी रै सगल़ो माजरो समझ में आयगो। गहणो तो उणांरै सारू अलीण(न छूने योग्य वस्तु) हो। उवै कणै ई फेंक सकता पण सवाल कुंवरी नै दिए वचनां रो हो। सो वै मोरझर साम्ही मूंढो कर’र वानूं रो छंद पढण लागा–

कर वा’र वानूं आव करणी,
जेथ नांम न जांणियै।
परदेश देश विदेश परगट,
विखम भोम वजाणियै।
कोई जात मात न तात जांणै,
पिता नांम न पावियै।
जिण ठांम ओखी पड़ै झीबी,
ओथ वानूं आवियै।।
मा ओथ वानूं आवियै।।

बात चालै कै ज्यूं ई छंद री एक-दो ओल़ी ई कवि उच्चरी हुसी कै ओरड़ी रा ताल़ा अर कवि रा बंधण आपै ई तटाक-तटाक तूटग्या। पाखती ऊभै मिनखां आ बात देखी तो अजेज ठाकुरां नै बुलाया। ठाकुरां ओ खिलको(खेल)देखियो तो समझग्या कै कोई देवीय परचो है।

ठाकुरां देखियो कै कवि हर चौथी कड़ी में वानूं नै चाड(करुण पुकार)कर रह्यो है-…ओथ वानूं आवियै।
ज्यूं ई अरदास पूरी हुई अर ठाकुरां अर कवि री आंख्यां मिल़ी तो ठाकुरां कह्यो-
“कविवर म्हनै माफ करो। म्है भोल़ावै में आयग्यो। भोल़ै बामण भेड खाई, भल़ै खावै तो राम दुहाई।”

जीवणजी कह्यो कै-
“म्है माफ करणियो कुण?माफ तो म्हारी मा वानूं ई करसी। जिण ऐ म्हारा बंधण तोड़, कलंक काटियो है।”

ठाकुर उणी बखत घोड़ै चढ’र मोरझर गया। वानूं री जोत कराय माफी मांगी।

इणी कड़ी में गोपाल़जी खिड़िया रचित रास रै भाव रा छंद तो घणी उटीपी रचना है-

झणणाट पगां बिच झांझर जोरसुं,
सोर ठणां ठणकंत ठवै।
झल़कै भुज चूड़ झणकंत कंकण,
वीस भुजाल़िय ताल़ व्रवै।
हिय हार हिलोल़ लल़ै लट मोतिय,
जोतिय लाल अंगार जमै।
वरदाय विसोतर वाहर वानुंय,
राय मोरांझर रास रमै।।

आधुनिक कवियां ई आई रै लोकहितार्थ दिए बलिदान नै चितारतां आपरी कलम नै धिन-धिन करी है। इण ओल़्यां रै लेखक ई एक भुजंगी छंद (वानूं-विरद) रच’र आई रै चरणां में शब्द सुमन चढाया है-

चवां धांम तोरै सदाव्रत चालै।
घणी लापसी धापसी हाथ घालै।
जको भेद जाती तणो नाय जानूं।
वणै साय वानूं बणै साय वानूं।।

मुदै सांसणां आप म्रजाद मंडी।
चवां थूरियां चूरिया दैत चंडी।
जको बात एको नको झूठ जानूं।
वणै साय वानूं वणै साय वानूं।।

गायां री रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग करण वाल़ी मा वानूं नै सादर वंदन।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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