छंद खेतरपाळजी रौ – मेहाजी वीठू


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।।सोरठो।।
गोरो गुणै गहीर, सांवळ धर सुर सस मथूं।
विध सो बावन वीर, खिले भयान तूं खेतला।।

।।छंद नाराच।।
भयांण तेह जांण गेह, रूप नेह रच्चये।
सुरा सलेह मन्न मेह, पनंगेह परच्चये।
तईम तेह सेह जेह, गेह गेह गल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।।1।।

इळा अकास मंडतास, अभ्भियास आंणिये।
उसास सास अंगियास, जग्गियास जांणिये।
जुरा न तास जम्म पास, ग्रभवास न लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।।2।।

कासी भंवाळ कोटवाळ. रच्छपाळ सींव ऐ।
विद्या विसाल बाच फाळ, उज्जवाळ भींव ऐ।
चिरत्त चाळ बुढ्ढपाळ, बब्बराळ बल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्यऐ।।3।।

रथां उरेळ चढ्ढ चेळ, मन्न मेळ मोहियूं।
झमंक झेळ गुघ्घरेळ, संग खेळ सोहियूं।
सगत्तियां समेळ खेळ, हेळ-भेळ हल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।4।।

चमीर हीर पट्ट चीर, चंगियां सुचेल ऐ।
कपूर नीर ते अबीर, सो सरीर झेल ऐ।
जुवाद जीर अंस नीर, तत्त धीर तल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।।5।।

सदा उसांण सम्मसांण, नीर ठांण नीझरू।
पवन्न पांण आप पांण, चत्रखांण चाचरू।
खडू खडांण ढांण ढांण, बांण बांण बल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।6।।

निरत्त नम्म नाचियम्म, घम्म घम्म घट्टऐ।
उरम्म क्रम्म अक्खियम्म, छम्म छम्म छट्टऐ।
हुकम्म इम्म ताळ तम्म, लीळ लम्म लल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।।7।।

चोवां चंदन्न बबीयन, वास व्रन्न सोवनूं!।
चिरत्त चन्न सुद्ध मन्न, भक्खियन्न भोजनूं।
पंगी पहन्न नाग रन्न, मुख पे न खल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।8।।

झरेत रेत झंगरेस, रव्व रेत सुभ्भरै।
वसंत हेत विम्ममेर, दीसंध रेह किंदरै।
गिरव्वरै अगम्मरै, पुरै पुरै अदल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।9।।

बहोतरी कळा बळास कम्मळास ऊजळा।
लळव्वळा लळा लळा, बहळ्ळै वळा वळा।
वैणी ढळा पे चूवळाव, उछळ्ळा उथल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्यऐ।।10।।

पणै पवट्ट पंख झट्ट, वेग वट्ट वच्चये।
होए अघट्ट आवियट्ट, नट्ट नट्ट नच्चऐ।
दयत्त दट्ट घाव घट्ट, सूळ सट्ट सल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।।11।।

पुयंग रा भुयंग पत्र, वद्दरा सुभंगणै।
विहंग रा अनंग नाय, श्रंगरा सुचंगणै।
नरां न कोय अंगरां, तुरां अवेव ढल्लऐ।
गुणै गहीर सूर धीर, खेत वीर खिल्लऐ।।12।।

।।कवत्त।।
खेतल वीर सधीर, हीर तो वदै हरीहर।
व्रह्म रखै सुर वेद, भेद पूछै विद्यावर।
ग्रहक गुणै गहीर, सेख सीखज रिव मिले सुर।
मुर मुवणां मांझली, ग्यांन पुस्तक चिरचै गुर।
संभु संभ्रम आपो सुबद्ध, सेव भेव गुणराज सिद्ध।
गोरा क्रिसण गरवा गरू, वाचे मेह वखांण विद्ध।।

~~मेहाजी वीठू
साभार सन्दर्भ: श्री गिरधरदान रतनू संपादित “मेहा वीठू काव्य-संचै
(साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित)

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