चिरजा इंन्द्रबाईसा की – कवि हिंगऴाजदान जी जागावत

हिंगऴाजदान जी जागावत साहब ने आई आवड़ा, माँ श्रीकरनीजी व इंद्रबाईसा की अनेकानेक व विविध विषयों पर चिरजायें सृजित की है। उन्हे मिर्गी के दौरे आते थे और ऐक बार श्रीमढ खुड़द से वापस अपने गांव आते समय गोविन्दगढ जिला जयपुर मे रेलवे लाईन पार करते समय वे मिर्गी का दौरा पड़ने से बेहोश हो कर गिर पड़े, और अचानक दूसरी लाईन पर आई रेल वहीं पर आकर उसका इंजन बंद हो गया और लगभग ऐक-सवा घंन्टा बाद जब जागावत साहब की चेतना हुई तब ही इंजन वापस चालू हो पाया। उस घटना को कविवर नें चिरजा के रूप में पिरोकर सृजित किया है। आज नवरात्रि के पावन अवसर पर प्रस्तुत है वो चिरजा।

।।चिरजा।।
।।राग-विहाग।।

इंन्द्रबाई आये कृपा करि आप,
बड़ापण राज तणूं भारी।।टेर।।

पाप कोऊ प्रकट्यो मों पिछलो,
मैं मति भयो जु मंन्द।
मां मन बिलकुल कुटिल हमारो,
भूल गयो धज बन्द।
फेर फिर किरपा अणपारी।।1।।

अम्बा रेल उलांघता हे,
पड़्यो रपट मैं पांव।
उण बिरियां मों ईश्वरी,
बिलकुल हो न बचाव।
करी थे खासा रखवारी।।2।।

याद कियां बिण मो अजू,
जी अम्बा करी ऊबेल।
जन की मूर्छा जगी न जब तक,
रही ठौर डट रेल।
बहुत विधि जब हौं बलिहारी।।3।।

गज तारण कारण हित गोविन्द,
आये गरूड़ उडाय।
आतुरता भारी लखि इन्दू,
रहे हरि बतलाय।
अधिकता बड़ा-बड़ी वारी।।4।।

नांसति मात जमानां मांही,
आसति आप अपार।
कीन्हा आप प्रवाड़ा केता,
सकति बड़्यां अनु सार।
छिति यश छाय रह्यो भारी।।5।।

देखि ध्वजा मंदिर अति सुन्दर,
असुर भगै अकुलाय।
विकट शक्ति भक्त लख जनकी,
संकट विकट नशांय।
कीरति कवि गाय रहे थारी।।6।।

अनुचर तव नानाणां वाऴो,
गावै गुण “हिंगऴाज”।
माता बात करी घण मोटी,
इण बिरियां में आज।
भयो यो परवाड़ो भारी।।7।।

इंन्द्रबाई आये कृपा करि आप,
बड़ा पण राज तणूं भारी।।

इस के अलावा भी जागावत जी ने अनेक सुन्दर चिरजावों की रचना करके चारण समाज को धरोहर के रूप में प्रदान की है और सभी गांवों में माँ भगवती भवानी के मंदिरो में गाई व सुनी जाती है।
~~कवि हिंगऴाजदान जी जागावत
प्रेषित: राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर

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