दशावतार रूप स्वामी सहजानंद स्तुति

दोहा

मच्छ कच्छ वाराहमण, नरसिंह वामन नाम|
कर फरसी, रघुपति किसन, बुध नकळंक प्रणाम||१
वेद शंखासुर ले वटै, वाण घटै सो ब्रह्म|
तोय उदधि चाळण तठै, प्रगटै मच्छ प्रथम्म||२

छंद रोमकंद

प्रथमं धर रूप अनूप प्रथी पर, कायम मच्छ स्वयं छकला|
जळ लोध करै महा जोध पति जग, कारण सोहि लई कमला|
शिर छेद संखासुर वेद लिये सब मेटण खेद विरंचि मही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||१
कछ धार वपु अवतार रमा कज, सार लहि मथिया सगरं|
करतार चक्रं धर राह कपेसर, अम्र अमी विष दे असुरं|
वडवान घटं बंधिवान कियौ बळ, त्रिसधीरूप अनूप तही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||२
हरि होय वराह हण्यौ हरणायक, नायक लायक नूर नलं|
धरवाळ लही प्रतिपाळ द्रढंतर, ख्यात विशाळह काळ खलं|
जगनाथ समो समराथ जगोजग, आज जनं गुणगाथ अही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||३
प्रगटै नरसिंह अबीह प्रथीपर, त्रास निवारण दास तणै|
प्रहळाद हितं असुरांण प्रहारण, वेश कराळ भयाळ बणै|
हरणाकंस मार उध्धार जनं हरि, के जस वार उचार कही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||४
सुरराज कजं अवतार सुधारण, वामन अंग सुचंग बणं|
द्विज दीन चलं बल आगळ दाखत, तीन क्रमं धर दे त्रिपणं|
वर ले वध व्योम सुभोम भरे बल, दाब रसातळ राज दही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||५
धन धाम द्विजं फ्रशराम तनं धर, हेत पिता निज मात हणी|
करपाण फ्रसी नखत्राण करे धर त्रोड भुजा सहस्त्राण तणी|
करतार अपार प्रकार बहूकर, वार केही अवतार लही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||६
हुय नाथ नरं रघुनाथ सुरां हित, ईश जगं दशशीश अरं|
सुध सीत लई जुध जीत निशाचरक्रीत जगं सब प्रीत करं|
धनुषं धर भार उतार सबे धर, नार रिखी उदधार लही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||७
किसनं अवतार ओधार जनं हरि, कंस सँहार विहार कियं|
वछबाल वयाल नथे विसवेसर, रीझत बाल गोपाल रियं|
वसुकोप अनोप कियौ ब्रजपें तब, गोप रख्यो गिरीराज ग्रही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||८
प्रगटै बुध सो शुध बोध प्रकाशण, जोध मनं अवरोध जगं|
सब मातसरं उपरंत व्रतंशत, भूर उमंत असंत भगं|
निसप्रेह निकाम नस्वाद निलोभिय, मांन बिना व्रतमान मही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||९
जब होसिय रोळ करोळ महाजग, होय कळू ध्रम लोप हसी|
असुरांण जुराण भयाण वधै इळ, द्वैष सुभेष दिखै घरसी|
धजराज चढै निकळंक चक्रंधर, भै हरसी जयकार भही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||१०
अवतार अनेक लिया अविनाशिय, लाख अलेख अबै लयसी|
सहजानंद रूप अनूप सबै हिय, व्यापक रूप रह्यो विलसी|
नितनीमित रूप अनूप निरंजन “लाडुय”ताहिकी ओट लही|
अति आणंद कंद मुनिंद अराधत, सो सहजानंद रूप सही||११

कलस छप्पय

एहि मच्छ एहि कच्छ, एहि सुकर तनु धार्यो|
एहि बनें नरसिंह, दुष्ट हिरणाकँस मार्यो|
एहि वामन वपु कीन, लिन्ह पद तीन भुवन त्रय|
एहि परशुधर राम, एहि रघुपति की जग जय|
कृष्ण बुध्ध नकळंक एहि, तेहि मेटत भव भ्रम टळे|
कितनेक रूप” लाडू “कहै, सो यह सहजानंद मिळै||

~~लाडुदान जी आसिया (ब्रह्मानंद स्वामी कृत)

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