दातार बांकजी रतनू सांढां

चेलार (वर्तमान पाकिस्तान) रो एक बांमण ओ प्रण लेर निकल़ियो कै जिको दातार वचन देवैला उणी सूं वो दान ग्रहण करेला। इणी द्रिढ संकल्प रै साथै निकल़ियो वो घणै दातारां कनै गयो पण उणनै वचन देवणियो दातार नी मिलियो। वो मेवाड़, मारवाड़, आमेर, जांगल़ आद स्थानां मे घूमतो घूमतो माड रै केई दातारां कनै फिरियो पण कोई उणनै वचन देवण री हिमत नी कर सकियो। छेवट निरास होय पाछो आपरै गांव जावतो साढां (जैसलमेर) रै रतनू बांकजी रै घरै रुकियो। दिनुगै रवाना होवती वेल़ा बांकजी उणनै दक्षिणा देवणी चाई तो उण आपरे प्रण रे बाबत पूरी बात बतावतै दक्षिणा लेवण सूं नटग्यो। उण कैयो आप वचन देवो तो हूं दान लेवण री हां भरूं नीतर आप रेवण देवो।

बांकजी कैयो कै म्हारो वचन है पण द्विजवर म्हारी एक बेटी है जिकी तो म्है एक चारण नै दे चूको वा तो अबै म्हारै कनै दूजां री अमानत है वा तो म्है आपनै नी दे सकूं। इण एक टाल़ म्हारो वचन है कै आप मागोला वो देवूंला।मांगो!

बामण ई सतवादी हो। बांकजी री दानशीलता अर द्रिढता देखर राजी होयो अर कैयो फगत पांच रुपिया दे दो। म्है आप सूं घणो राजी। कालांतर मे इण घटना नै डिंगल कवि धूड़जी मोतीसर (जुढिया) आपरे एक गीत सूं अमर कर दीनी

गीत सोहणो – बांकजी रतनू सांढां रो
(धूड़जी मोतीसर कृत)
ब्रामण एक वेद रो वकता, सुध मन धार विचार सही
निकल़्यो सत असत निहारण, मंजल़ करण चहुंदेश मही १
मेदपाट मुरधर धर मालव, धर गुजर आंबेर धरा
रीत समै नासत यूं रेखी, पेखी वसुधा समंद परा २
जोया सेठ सिरायत राजंद, भटक भटक दिलगीर भयो
जैसलमेर तणी धर जोशी, रेणव सांढां तखत रयो ३
सुत धनराज वंश रो सूरज, सूम घणां उर सांकै
सुजस लियो डारण दिल साचै, वचन दियो कव बांकै ४
सुत अस द्रब गघ घरणी, जाच फेर मन चाह जुवो
रुपिया पांच लेय हुय राजी, विप्र दे आशीष बुवो ५
रतनू राव वरण सिग राखी, थिर प्रिथमी जसवास थयो
मोतीसर धूड़ै सुण महमा, कवि सोहणो गीत कयो ६

वचन निभायो विपर रो, सांढां धणी सुचंग
अमलां वेल़ा आपनै, रतनू बांका रंग

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