दे नादावत भीमड़ा

जोधपुर महाराजा गजसिंह जैड़ा दातार अर वीर हा वैडा ई दातार अर वीर इणां रा केई सामंत ई हा। इणां रै ऐड़ै ई एक दातार सामंत रो नाम हो पड़िहार भीम नादावत। भीम रै विषय में किणी कवि लिखियो है कै ‘सतजुग में बल़ि, द्वापुर में करन अर कल़जुग में विक्रमादित्य रै साथै भोज इण परंपरा नै सहेत टोरी पण हालती बखत में दातारगी री गाडी रा पहियां धसण लागा उण बखत भीम आपरो सबल़ खांधो देय जुतियो–

तिणवार भीम नादा तणो,
धुर जीतो ताडा धमल़।।

जाझीवाल़ रा जागीरदार भीम नादावत, नादै पड़िहार रा बेटा हा। भीम रो मन मोटो हो। कोई किणी वेल़ा आयग्यो तो ई नाकारो नीं कियो।

कैयो जावै कै एकबार महाराजा गजसिंह जद कुंवरपदै हा तद उणां रो डेरो पुस्कर माथै होयो। इणां रा खास मर्जीदान भाटी गोयंददास ई साथै हा। उणांनै भीम री दातारगी सुहावती नीं सो वे हमेश इणी ताक में रैता कै कणै मोको मिलै अर कणै भीम नै नीचो दिखायो जावै।

उण दिन उणांनै मोको मिल ई ग्यो। सगल़ा सिरदार प्रभात रो न्हावण करै हा कै गोयंददास एक द्विजदेव नै त्यार किया कै आप झूलतै भीम री पारखा लो कै वो दातार है, कै ईं दातारगी रो सांग करै!!

पैला तो द्विजदेव, गोयंददास रै इण कुड़ में आवण सूं नटग्या पण गोयंददास आपरै प्रभाव अर संबंधां रै पाण वां नै मना लिया कै वे पाणी में न्हावतै भीम री दातारगी परखैला!!

मा’राज जाय भीम नै आशीर्वचन दियो अर उणांरी दातारगी नै बाखाणी। भीम पूरो आवकारो दियो अर कैयो कै “डेरे हाल आपनै राजी करांला अर आपरो जथाजोग सम्मान ई करांला।”

जद वां कैयो कै “डेरे हाल म्हारै कोई मत्ता नीं खाटणी !! बामण तो संतोषी जीव होवै सो, आप तो अबार है जको हाथ रो ऊतर दो अर हाथ रो ऊतर नीं दे सको तो आगैसर दातारगी रा थान मत फाड़जो!!”

भीम रै आगै कुओ अर लारै खाई री गत होयगी। ऊतर देवै तो जीवतो ई मरियै जैड़ो अर दातारगी करै तो कनै अखत रो बीज ई नीं।

कैयो जावै कै भीम ऊतर दैणो तो सीखियो ई नीं हो, सो उणां आपघात करण री तेवड़ गुरां नै कैयो “आप थोड़ा सुसतावो, हूं एक छिबी भल़ै खायलूं।” आ कैय उणां मरण रै मिस छिबी खाई अर जोग ऐड़ो बणियो कै कोई ठोस वस्तु उणांरै हाथ सूं टकरी, उणां अटकल़ी कै कोई कड़ै भांत चीज है। उणां हाथ में पकड़ पाणी सूं ऊपर आया तो उणांरै इचरज रो पार नीं रैयो कै उणांरै हाथ में अणूंती रूपाल़ी घड़त रा दो सोनै रा कड़ा हा। उणां रै जीव में जीव आयो अर द्विजदेव कानी हाथ पसारतां कैयो “द्विजदेव हणै तो फूल सारू पांखड़ी रै रूप में ऐ कड़ोलिया हाजर है, इणांनै अंगेजो अर बाकी आपरो माण राखण कीं डेरे हाजर करूंला।”

मा’राज नै एकर तो पतियारो ई नीं होयो कै पाणी में कड़ा भीम कनै कठै सूं आया! पण हाथ कंगन नै आरसी कांई!! भीम सूं कड़ा लेय वे गोयंददास रै डेरे गया अर कैयो कै-
“नीं, भीम साचाणी मोटो दातार है,”
अर उणां पूरी विगतवार बताई तो उठै बैठां एक बारठजी नै आ बात सफा अजोगती लागी। उणां दोनां रो माजनो पाड़तां कैयो कै-“थांरो धध हणै एक आदमी रा नाहक प्राण ले लेतो।”

उणां उणी बखत उण मा’राज अर गोयंददास रो माजनो पाड़तां एक कवित्त कैयो जको इण पूरी घटना रो साखीधर है–

कंवर पदै गजबंध, धांम मुकांम पुहक्कर।
सो झूलै सिरदार, वेल़ रिवराज डिगंबर।
भाटी गोयंददास, विपर मेलियो कुवेल़ा।
जल़ रोकै पड़ियार, वडम दाखै आ वेल़ा।
कर हूंत काढ सोव्रन कड़ा, दिल सुध हेतज दक्खियो।
तिणवार जोध नादा तणै, भीम नहीं अन भक्खियो।।

उण बखत भीम री इण ऊजल़ दातारगी री साख भरतां किणी कवि कैयो है–

मरगो नंद वीसल़देव मरेवो,
परहंस दीठै भोज पंवार।
भरियां हुवै सायर जल़ भेल़ो,
भीम कहै जस तणै भंडार।।

बात चालै कै एकर किणी चौधरी री ढाणी मांय सूं किणी दोखी उणरी जोड़ायत नै उठायली। चौधरी रा हाथ नीं पूगा। वो रोवै हो अर मारग मारग जावै हो कै उणनै कोई बारठजी मिलग्या। बारठजी उणनै रोवण रो कारण पूछियो तो उण कैयो कै-” म्हारो एक वैरी म्हारी लुगाई नै माडै ऊंठ माथै चढार लेयग्यो।

तो बारठजी कैयो कै-“तूं ई थारै ऊंठ माथै चढर उणरै लारै जावतो !यूं पाल़ो अर रोयां उणनै कद पूगैला अर कद थारी धण हाथ आवैला?”

आ सुणर चौधरी कैयो- “म्हारै घरै ऊंठ होवतो तो म्हनै खल्ला घींसण रो कोड थोड़ो ई हो? ऊंठ म्हारै तो पाडौस में नीं है!!”

“तो गेला भाई पाखती जाझियाल़ो है!! भीम सूं मांग लीजै !! ऊंठ रो कांई वो तो तूं मांगै ज्यूं दे देला!!” आ बात बारठजी कैयी तो चौधरी कैयो – “हुकम दीयै जैड़ै भाग होवता तो रातींदो क्यूं होवतो? ओ काम तो आप ई करावो।”

आ सुणर बारठजी नै दया आयगी अर वे उणरै साथै जाय भीम नै कैयो कै – “हे भीम! म्हनै एक ऐड़ो ऊंठ दे जिणरो माथो टामक जैड़ो, पगां मे प्रचंड शक्ति होवै बैयां धरती नै करौत री गत काटणियो अर घर मंडणियो होवै। जिणरा कान रूपाल़ा होवै अर देख्यां लागै कै कोई जंगल़ में रैवणियो जती है”-

माथो टांमक जेहड़ो, बाहुडंड परचंड।
दे नादावत भीमड़ा, धर करवत घर मंड।।
माथो टांमक जेहड़ो, कानज रती रतीह।
दे नादावत भीमड़ा, (इक) जंगल़ तणो जतीह!!

बारठजी रै कैतां जेज ही, भीम ऊंठ हाजर कियो। बारठजी ऊंठ चौधरी नै दियो। जिण माथै बैठ चौधरी आपरै चोरां लारै खड़ियो।

आज नीं बारठजी है अर नीं वो चौधरी पण लोक रसना माथै भीम रो ऊंठ आज ई अमर है।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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