दीपै वारां देस, ज्यारां साहित जगमगै (एक) – डॉ. रेवंत दान बारहट

काव्य चेतना के उच्चतम सोपान का साहसी नासेटू-तेजस मुंगेरिया

एक रचनाकार अपने समय का गौरव होता है। यह बात उन लेखकों और कवियों पर अक्षरशः लागू होती है जो अपने इतिहास और संस्कृति के उज्जवल पक्ष को शब्दों में सारजीत करते हैं। जिस समाज, संस्कृति और देशकाल में ऐसे रचनाकार होते हैं, सही मायनों में उनका समय उस देश के लिए सौभाग्यशाली होता है। वो देश कितने अभागे होते हैं जहां रचनाकार जन्मते नहीं।

राजस्थानी में कवि उदयराज उज्ज्वल साहित्य सृजन को देश को आलोकित करने वाला बताते हैं।

सत ऊजळ संदेश, उदयराज ऊजळ अखै।
दीपै वारां देस, ज्यारां साहित जगमगै।।

भारतीय भाषाओं में राजस्थानी के डिंगल काव्य परम्परा की एक विशिष्ट और समृद्ध परम्परा रही है। जिसे चारणों सहित कई साहित्यिक समुदायों ने पल्लवित पोषित किया।

यही डिंगल काव्य शैली है जिसके नाद से प्रभावित होकर विश्वकवि रबिन्द्र नाथ टैगोर ने इसे आत्मा को झंकृत करने वाली और सचेत करने वाली क्रांति का वाहक बताया और अफसोस जताया कि उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में ऐसी कविता सुनी…..।

डिंगल काव्य का संसार में कोई सानी नहीं है, यही वजह है कि भारतीय भाषाओं में यह कहीं सिरमौर न बन जाए इसका भय हिंदी के हिंदीपट्टी के उन पुरापंथी परम्परा के आलोचकों और साहित्य इतिहासकारों को रहा जिन्होंने एक सुनियोजित षड्यंत्र के साथ इस भाषा और इसकी इस अनुपम काव्य शैली को गंवार कहकर अंधेरे में रखा। यह डिंगल काव्य की शक्ति ही थी कि उसे लोक में रोकने के लिए सदियों से षड्यंत्र किए गए हैं। कभी राजस्थानी भाषा पर सामूहिकता और प्रतिनिधि भाषा का अभाव कहकर खारिज किया तो कभी हिंदी साहित्य के आधार रासो काव्य परम्परा को जो कि डिंगल शैली में लिखे गए, उनको अप्रमाणिक घोषित किया गया।

लेकिन मारवाड़ में एक कहावत है- “घी अंधारे मांय छान्नो नी रेवे. . . अर्थात किसी की गुणवत्ता और प्रतिभा को ज्यादा दिनों तक अंधेरे में छुपाकर नहीं रख सकते हैं।

मैं इस शीर्षक की श्रृंखला ‘दीपै वारां देस, ज्यारां साहित जगमगै ‘ के तहत आपको आने वाले दिनों में राजस्थानी और डिंगल काव्य की समृद्ध और विख्यात परम्परा के आधुनिक पीढ़ी के नए हस्ताक्षरों से परिचित करवाने की कोशिश करूंगा। इस परम्परा में कवि चंद से लेकर ईसरदास बारहठ, पृथ्वीराज राठौड़, दुरसा आढा, सूर्यमल्ल मीसण, बांकीदास आशिया, कृपाराम खिडिया, ऊमरदान लालस और आधुनिक काल में हरीश भादानी, रेवत दान मथानिया, शक्ति दान कविया, कन्हैया लाल सेठिया, चन्द्र सिंह बिरकाली, डॉ आईदान सिंह भाटी और गिरधर दान रतनू दासोड़ी, राम स्वरूप किसान, नंद भारद्वाज, मनोज देपावत (इस सूची में दर्जनों सुपरिचित नाम हैं जिनके काव्य में यह परम्परा अविरल रूप से प्रवाहित है।)

आधुनिक काल में राजस्थानी में कविता लिखने वाले कुछ सुखद युवा नाम डॉ गजादान चारण शक्तिसुत, नरपत वैतालिक, दुलाराम सहारण, राजूराम बिजारणियां, ओम नागर, महेंद्र सिंह छायण (इस सूची में भी एक दर्जन से ज्यादा युवा कविता स्वर सक्रिय है) इत्यादि प्रमुख रूप से है।

राजस्थानी भाषा के इन युवा कवियों के बीच एक नौजवान और प्रगतिशील कविता की उभरती हुई बुलंद आवाज है-तेजस मुंगेरिया की।

यथा नाम तथा गुण। गिरधर दान जी के शब्दों में कहूं तो ‘बीज की बाजरी ‘ अर्थात बहुत ही अनमोल।

तेजस मुंगेरिया राजस्थानी कविता और खासकर डिंगल की उस प्राचीन विशिष्ट काव्य शैली का भरोसेमंद नाम है।

कविता के तीन काव्य गुणों में प्रतिभा निश्चित रूप से सर्वप्रमुख है। आदरणीय आईदान सिंह जी भाटी के शब्दों में कहूं तो कुदरत बहुत कम किसी कवि के काव्य को सर्व स्वीकार्य बनाती है। जन जन की पीड़ा को जिनके शब्द काव्य में अभिव्यक्त कर दे, सच्चे मायनों में कवि कहलाने का हकदार भी वही है।

तेजस मुंगेरिया ने अभी उम्र से पच्चीस बसंत ही पार किए हैं। लेकिन उनकी कविता का गांभीर्य उन्हें वरिष्ठ कवियों के समकक्ष खड़ा करता है।

तेजस की कविता में राजस्थानी काव्य परम्परा में नवीन अन्वेषण के साथ, नए रूपक, बिम्ब और नया मुहावरा मिलता है। कविता के संदर्भ विविध विषयों से अंतर्संबंधित होने का कारण कवि का व्यापक अध्ययन और चिंतन है।

तेजस की कविता में आधुनिकताबोध है, यथार्थ की अभिव्यक्ति है, लेकिन खास बात यह है कि कविता की शब्दावली ठेस आंचलिक है। ऐसे शब्द जो कहन और लेखन से दूर होते जा रहे हैं, ऐसी विलुप्त होती हुई शब्दावली को तेजस अपनी कविता में संजोने का बड़ी संजीदगी से जतन करते हैं। किसी भी भाषा के लिए ऐसा कार्य बहुत ऐतिहासिक होता है जिसमें उसकी विलुप्तप्राय शब्दों को सारजीत करने का जतन हो।

उदाहरण के लिए यहां उनकी एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूं जिसमें वे रेगिस्तानी मनुष्य की कठिनाईयों और जिजीविषा को कविता में लिखते हैं-

मरुधर वाळां माणसियां पग-पग पै पीड़ां पाई है।

आसाढ़ां रो दिन ऊगौ,
ओ आभै कानी देखै है।
सूखोड़ै सावणियै ने वा,
लूखै मन सूं लेखै है।।
भादरियौ बिन बरस्यां भाज्यौ,
हरियौ किम हरसावै जी।
ताती मरुधर री छाती पै,
बादळ कुण बरसावै जी।।
अबखा लागै दिन अकाळी, डाकण लागै डाई है।।
मरुधर वाळां माणसियां, पग-पग पै पीड़ां पाई है।।

पाताळां सूं पाणी काढां,
पाडां अर सांढां रै पीठां।
पांच कोस पै घड़ा, पखालां,
दुखियारा हाथां में दीठा।।
दाणां रो देठाळौ ना है,
टाबरिया कुरळावै है।
टूटयोड़ी घरबारी ने वा,
सांधा दे दे ठावै है।।
सुपनां में भी सीरौ कोनी, राब सुबड़के खाई है।।
मरुधर वाळां माणसियां, पग-पग पै पीड़ां पाई है।।

चंवरा रो चौफेरो उड़ ग्यौ,
ढिबगी रेतां ढांणी है।
ढोळै आ ग्या ढोर बापड़ा,
सौ दुख री सैनाणी है।।
जाणी कुण हालत नाजोगां,
साहस खुद सहलावै है।
बूढो बा यूँ बाका घालै,
ज़्यूं त्यूं ई जीमावै है।
लीराळी चूनड़की ओढै, माथौ ढाकै माई है।।
मरुधर वाळां माणसियां, पग-पग पै पीड़ां पाई है।।

एवड़ पै ऊनड़की आ भी,
पड़चूनां में पूरी है।
करजो है सेठां रो कावळ,
जद ही जी हुजूरी है।।
धीणै रा धरमेला टूट्या,
सूखी मिरचां खावै जी।
दुखड़ां सूं पीढ़ी रो नातो,
किणनै जाय सुणावै जी।।
गैला तू क्यूं सोच करे है, दुख आपां रो भाई है।।
मरुधर वाळां माणसियां, पग-पग पै पीड़ां पाई है।।

इस कविता को पढ़कर रेगिस्तान के जीवन की तकलीफों का मार्मिक चितराम उभरता है। राजस्थानी में कहा जाता है कि ‘हींये री पीड़ फेफड़ा जाणे’ अर्थात कोई करीबी, या पीड़ा का सहभोगी ही कष्ट की पराकाष्ठा को जान सकता है। रेगिस्तान की पीड़ा उजागर करती इस कविता को पढ़कर लगता है कि इस नई पीढ़ी के कवि की सूक्ष्म अन्वेषण दृष्टि से कुछ भी छान्ना नहीं रहा है।

तेजस को यात्राओं और देशाटन का बहुत शौक है, जहां भी जाना हुआ उस जगह का कविता में अद्भुत वर्णन किया है, उदाहरण के लिए तेजस ऐतिहासिक उज्जैन नगरी जाते हैं और उसका कविता में जो वर्णन करते हैं उस पढ़कर कोई नहीं कह सकता कि यह इतनी कम वय के बालक कवि की रचना है। इस कविता को पढ़कर आप तेजस की काव्य प्रतिभा के साथ उनके अध्ययन मनन का अंदाजा लगा सकते हो

—उज्जैन को देखते-देखते—
‘मालवधरा! क्या-क्या कहूँ’
हे मालवमनमोहिनी! क्या उपमा दूँ तुझे?
सनातन के मान बिंदु सांभे खड़ी
ओ महाकाल की महानगरी,
ओ कलरवरंगी क्षिप्रतटी निर्मला,
ओ हरसिद्धेश्वरी की दीपमालिका,
ओ विक्रम की आद्य अवंतिका!
हे वररुचि के व्याकरण सूत्र
क्या उपमा पढूँ तेरे लिए?
ओ वराहमिहिर की नक्षत्र पारखी आँख,
ओ धन्वन्तरी के ओखली की बूटी,
ओ कालिदास के महाकाव्य की
चितद्ग्ध शकुंतला,
ओ बेतालभट्ट की रहस्यात्मक कहानी!
हे सिंहस्थ की ओघड़ साधिका
क्या उपमा पढूँ तेरे लिए?
ओ भृतहरि के वैराग्य की रेखा,
ओ बाणभट्ट के महाश्लोक,
ओ हर्षवर्द्धन की सौम्यधरा।
हे परमार विजय पताका!
क्या मलंग रंग है तेरा,
गली-गली में शंकर बैठा
गली-गली में वेद उवाच्
गली-गली में शंख चेतना
गली-गली में तंत्रनाद!
हे क्षिप्रतरंगी सुचंगी !
यह धूँ-धूँ करता रामघाट,
गूँजता शव दाह निनाद,
भष्म लेटते ओघड़ गाते-
मृत्यु मिले पर जलूँ क्षिप्रतट,
यह शोक-हर्ष की मँगल आभा।
तू कर्म से शिव हृदयी,
विविध वाद की समपोषिका,
पढ़े कंठ रावण का गाया
जटाजूट की अमर कीर्ति,
पढ़े अज़ानें छोर उसी पर
पढ़े अमन की नव अभिलाषा।
हे दुर्गदास की मृत्युशैया,
श्याम धर्म की शरणदायीनी,
मरुधरा का उपेक्षित अश्रु
क्षिप्रतटी का शोभा बिंदु,
राष्ट्रगौरव का देवदूत,
संत-सूर का मिलन कंठ,
धवल धीर की धवल कीर्ति।
धवल प्रेरणा हृदय धारकर,
सनातनी पताका कहूँ
या ध्वजदंड कहूँ,
आधार कहूँ कि
मेरुदंड कहूँ,
हे मोक्षदायिनी !
मैं तुझे क्या-क्या कहूँ?

इसी तरह कवि तेजस हिमालय की यात्रा पर जाते हैं तो उसका जस इस तरह बखानते है

–जस हेमाल़े राज रो–
कीरत हेमाळै कथूं, दरसावूं गिर देस।
बरणन अणहद बीहड़ां, नम नम आज नगेस।।

।।छंद – त्रोटक।।
सह देव जठै विचरै सखरा,
खळळाट वहै नद-नाळ खरा।
घण गूंजत नाद महा गहरा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

धवल़ास भयी हिम सूं धरणी,
वड लाख झरै उथ वैतरणी।
गढ शैव अरु बुद्ध गौतम रा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

गिर पै गिर राजत है गगना,
मनु देखत ही चित में मगना।
हद चीड़’रु पींपल़ देव हरा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

दुख पाप हरै गंग को दरिया,
नद सिंधु ढल़ै नित नीर लियां।
भल भाग कहो नित भारत रा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

दरवेस बसै उन डूंगर में,
हठ साध भजै तपसी हर नै।
पशुनाथ करै उणरा पहरा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

गढ कांगड़ कीरत है गहरी,
पँच पांडव एथ रह्या पहरी।
भल मान सरोवर नीर भरा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

दुनियाण हल्लै दृग देखण नूं,
प्रत डूंगर सूं सध पेखण नूं।
चड़ यूं इठल़ावत चोट सरां,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

सह बात सुणो इतनी श्रवणा,
भम डूंगर भांज उरां भ्रमना।
निज चेतन चाकर होय नरा,
दुनि लाख नमो तुझ देवधरा।।

तेजस को जानने वाले जानते हैं कि वो अल्प आयु के अघोरी जैसे हैं, राग अनुराग से ऊपर उठे हुए इस कवि में मैंने कभी कभी कवि बाणभट्ट की यायावरी छवि को भी देखा है।

तेजस की कविता इसका दूसरा प्रमाण है। कवि संसार के सारे समन्दर, नदी, पर्वत और जंगल मैदानों को देखने का उत्सुक है

–यात्रा महत्त्व–
अमर इल़ा पै आयकै, खोज्या नह खोगाळ।
जतन करै कर जातरा, भांत जगत री भाळ।।

।।गीत – चित इलोल़।।
जिकण मन में आस जागी,
खोजतो मन खैर।
भम्मरा बणै भौम भमता,
फगत डेरा फैर।
तो घण सैर जी घण सैर, सोधी मांडता घण सैर।।

हाथ घोड़ा हाकलै वा,
कोस लांघै क्रौड़।
जाण करणी जगत भर री,
मुगत बाँध्यौ मोड़।
तो वा दौड़ जी वा दौड़, देख्यौ जगत ने वा दौड़।।

डूंगरां री डीग नापी,
नापया नद नाळ।
छोळ मापी समदरां री,
पगां आसी पाळ।
तो जंजाळ जी जंजाळ झट सूं जाळिया जंजाळ।।

कोलंबस रा कारनामा,
वास्को ने वाह,
ज्याज ताण्या जोर रा,
अर चानणै री चाह।
तो परवाह जी परवाह, पूरी मैट दी परवाह।।

इबन आया अलबरूनी,
कोट दिल्ली काज।
हेनसांगो बौद्ध हाल्यौ,
खोज मैटी खाज।
तो सरताज जी सरताज सबसूं जातरी सरताज।।

मन मलीरा मोदता वा,
देखता दरबार।
‘मेग’ री ‘इंडिका’ मानौ,
मगध री मलहार।
तो दीदार जी दीदार है वा देस रो दीदार।।

हद हिमाळै हालणौ,
अर गंग धारा गाम।
दसां’ज भांती देस दक्खण,
विदग जोवां वाम।
तो सुधकाम जी सुधकाम छै घण जातरा सुधकाम।।

भाव भर तू भातियौ,
कर कंठ सूं किलकार।
पग बणा तू पाथरां रा,
धीरपौ मन धार।
तो संसार जी संसार सगळौ छाण ले संसार।।

कवि तेजस ने अनुपम ईश स्तुति रचनाएं लिखकर डिंगल के शक्ति काव्य परम्परा में अपनी आध्यात्मिक आहूति दी है। एक उदाहरण

शिव कुटम्ब बरणन. . .।

।।छंद – मालती/ मतगयंद।।
गौर निहारत नाथ गिरीस कु,
पोढत मूसक नांदिय पासा।
तातन गोद गजानन ताड़त,
क्षीर पिवै सडआनन खासा।
माठ सुणै सह तारकमंडल़,
वाम लहै गिर ऊपर वासा।
दंपत को अनुरागय देखत,
देव प्रणाम करै बहु दासा।।

तेजस की आस्था सर्वोच्च ईश्वरीय सत्ता में है लेकिन उन्होंने धर्म के नाम पर हो रहे पाखंड का विखंडन भी बड़ी निर्ममता के साथ किया है। जब वे पाखंड का विखंडन अपनी कविता में करते हैं तो सहसा कवि ऊमर दान लालस की याद दिलाते हैं

–बुगलाई संत–
।।छंद – मतगयंद सवैया/मालती।।
कूड़ कथै मठ भीतर कूकर,
खोट करै झट फोगट खाता।
ढाकण कूड़ मत्थां भगवों धर,
ओ बुगला बण चूंथण आता।।
चाकर राखत बेलिय चेलिय,
रास दिनोदिन नाथ रचाता।
नाथ सुणो तुम हो नगटै नग,
तेल तळों तुमको बहु ताता।।

ऐसे धार्मिक पाखंड और संसार की विडंबनाओं को देखकर कवि ईश्वर को संबोधित करते हुए कहता है

।।मालती सवैया।।
संचन जो करता बहु साधन,
दौ पल में धन जाय दहातो।
छूत-अछूतन का सुर छेड़त,
बां तन बेहद कोढ बढ़ातो।।
नेकहु पाथ चलै सुगरो नर,
बां घर आणद खूब बहातो।
कूच भयी मनसाहत केशव!
काश कृपानिधि यूं कर जातो।
जो हरता तिरिया हठ जोकर,
तां कर तातहु तेल तळातो।
दीन पतीतन को दुख देवत,
बां कर बेहद आगि बळातो।।
सींचण जो करता सत को पथ,
बां घर कंचण जो बरसातो।
कूच भयी मनसाहत केशव!
काश कृपानिधि यूं कर जातो।।

तेजस ने राजस्थानी के हर काव्यरूप में लिखा है। उदाहरण के लिए उनके कुछ सोरठे प्रस्तुत है

–भीखिया रा सोरठा–
पोथी मांड पहाड़, सोध सजीवण साथिया।
चेतन धारां चाड़, बेगो भण तू भीखिया।।
खट बांचो थे ख्यात, बात-कथावां हां वळै।
नेह ग्यान री न्यात, भलभल जीमै भीखिया।।
वा पांतरिया वेद, करम जोग गीता कठै।
खट उपजै मन खेद, भण आखर तू भीखिया।।
अहो युरोपी आज, भण-भण नै आगळ भया।
टूटो जगगुरु ताज, भाळै कांई भीखिया।।
धीरप देवै धाप, चाकरिया चितड़ै तणा।
आखरिया अणमाप, भाखरियां ज्यूं भीखिया।।
आखर नह अलमार, मरघट वा घर मानणो।
पोथी रो नह पार, बो घर सुर रो भीखिया।।
साहित हंदी छोळ, कीरत जुग-जुग री कहै।
आखर रतन अमोल, भेळा कर तू भीखिया।।

कवि तेजस के संगीत ज्ञान की एक झलक भी प्राप्त कर लीजिए।

।।कवित्त – संगीतशास्त्र।।
मेघ, मिंया की मल्हार, मंडी है सभा महान,
मोहक मुरली मध्य मादक मृदंग है।
ताल तीन तालहु पै तात-धिन तबला की,
तुम्बी ओ तंबूरा पै तो तान की तरंग है।।
सखी ओ सनेही सुन, संतूर सरोद सोहै,
सारंगी सितार सुरमंडल को संग है।
पूंगी में फूंकत प्राण, पाधरो पखावज पै,
भीमपलश्री भोपाली भैरवी भपंग है।।

तेजस का अध्ययन बहुत व्यापक है। इसलिए कहा जाता है कि बहुत ज्यादा पढ़ो और बहुत कम लिखो। तेजस की पीढ़ी के कवियों को तेजस से सीखना चाहिए कि किस तरह गहन अध्ययन और मौलिक चिंतन के उपरांत सृजन करना चाहिए।
जीवन में ज्ञान के स्रोत के रूप में पोथी ज्ञान जरूरी है लेकिन एक स्तर के बाद व्यक्ति को उसका आत्मज्ञान मार्गदर्शन करता है।

–खोल रै किताबखानो–
।।मनहरन।।
आंखिन अंधारो ऐसो, दरस कछु ना रहै,
पत्थर पारस भले अरस-परस को।
हाथ हेर-हेर सीस पंचसेर माहिं रहे,
हाथ लहै हलाहल, भ्रम सोम रस को।
गठरी गुमान वारी, भरि भारी सीस धारी,
भांग है कसूंमो है, कि असर चरस को।
चेतन टटोल भाई खोल रै किताबखानो,
मेटसी अंधारो मन, कोटिन बरस को।

कवि तेजस से अभी न सिर्फ राजस्थानी बल्कि हिंदी और आने वाले समय में और भाषाओं को भी उम्मीद रहेगी क्योंकि मनुष्य अपनी सुसुप्त प्रज्ञा को जागृत करने के पश्चात असीमित संभावनाओं के द्वारा खोलता है।

तेजस ने हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर किया है साथ ही इस विषय से नेट जे आर एफ भी उत्तीर्ण की है। आने वाले समय में भाषा और साहित्य के किसी पक्ष पर किसी विश्वविद्यालय में शोध करेंगे।

तेजस जहां भी रहे अपने आलोक से सबको तेजमय करते रहें और मातृभाषा में अपनी बेजोड़ रचनाएं करते रहें।

यह बात मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव और साहित्य पठन पाठन के आधार पर कह रहा हूं कि तेजस मुंगेरिया का काव्य राजस्थानी का भविष्य है। यह सब अकादमियों और पीठों के सम्मानों से ऊपर भाषा का गौरव है।

कवि तेजस राजस्थानी कविता की राहों का नवीन अन्वेषक है। वह काव्य चेतना के उच्चतम सोपान का साहसी और अनथक नासेटू (यात्री) है। कुदरत उन्हें उनकी प्रतिभा और क्षमता के अनुसार मनचाही ऊंचाइयां प्रदान करे।

शुभकामनाएं।

-रेवंता

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