देगराय रा छंद

।।दूहा।।
महि धिन पावन माड री, थपिया उथियै थांन।
आई आवड़ आपनै, जाणै सकल़ जहांन।।

।।छंद-रैंणकी।।
मामड़ घर मात अवतरी महियल़,
सात रूप इक साथ सही।
चारण कुल़ विमल़ कियो इल चहुंवल़,
रूप दुहीता धार रही।
ओपै इणभांत सदन तव आयल,
तेज दोयदश भांण तपै।
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।1

बहती पथ गैण ऊतरी बसुधा,
मात सात ही साथ मल़ै।
देतो भयणाक दैत उथ डकरां,
भाल़वियो उण वेर भल़ै।
भूखी कँध भांज करैगी भक्खण,
दाझ धरा की राज दफै।
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।2

भोल़प कर भ्रात रहस्य कत्थ आखी,
करुणा तज जद कोप कियो।
भट विसधर-चोर डसै तुझ बंधव,
बीसहथी मुख शाप बयो।
समझी घर हांण आण दे सूरज,
रवि पहर दस-दोय रुपै।
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।3

निसचर कर चूर धरण की निरभै,
रत्त सूं लोवड़ फेर रँगी।
रचियै हद रास रमी भर रजनी,
हास कियो तैं हरसंगी।
दीठो बल़ जोर भुजां तव देवी,
केवी कण कण चकर कपै।
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।4

तालर मंझ नाच कियो दे ताल़ी,
जोराल़ी नवलाख जमी
सरवर जल़ न्हांण भांण कर सप्तम,
थांन पवितर मांन थमी।
कीरत कर कान चढै झट केहर,
थिर चाकर धणियाप थपै
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।5

ओरण गहडंबर ऊजल़ी अवनी,
मगरै पाधर उठै मही।
राजी होय माय भूपतां रीझी,
सिग कीना सह काज सही।
दीनो जदुरांण राज थिर देवी,
जो जस दुनियण साख जपै।
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।6

बैठी गिर टूंक तेमड़ै वरधर,
भादरियै तण्णोट भूई।
भाखर फिर श्याम पाट तूं भलभल,
जामण तूं घँटियाल़ जुई।
गिरधर नम नाक पढै जस गढवी,
कष्ट रोर हर शोग कपै।
साची सुरराय स्हाय नित सेवग, देगराय महमाय दिपै।।7

।।छप्पय।।
माडधरा महमाय, मुदित मन राजै माता।
सात रूप सुरराय, दैण मदती नित दाता।
रवि रथ आभै रोक, जगत पसर्यो जस जाहर।
लुडी लंपची डाल़, बणी बहु सेवग वाहर।
पी गई उदध हकड़ो प्रगट, बसुधर बातां विम्मल़ा।
गीधियो दास जांणै गुणी, कुण पूगै तोरी कल़ा।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”
29/10/20

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