देवी अंबाजी की स्तुति – छंद त्रिभंगी – शंकर दानजी जेठी दानजी देथा(लींबडी)

।।दोहा।।
प्रसन प्रसन प्रसनाननी, हम पर रहो सदाय।
प्रणतपाल परमेश्वरी, जय अंबा जगराय।।1

।।छंद – त्रिभंगी।।
जय जगरायाजी, महामायाजी, शुचिकायाजी, छायाजी।
होवे शिशु पाजी, तउ क्षमाजी, कर तुं हाजी, हा हाजी।
प्रीति नित ताजी, नह इतराजी, वाह माताजी, वाह वाहजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।1

धवळांबर धरणी, उजळ वरणी, शंकर घरणी, शं करणी।
निज जन निरझरणी, रक्षा करणी, अशरण शरणी, अघ हरणी।
वासी गिरिवरनी, शिव सहचरणी, हिम भूधरनी दुहिताजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।2।।

चितवां चरिताळी, बुढ्ढी बाळी, जोबन वाळी, जोराळी।
विध विध वपुवाळी, अकळ कळाळी, मृडा दयाळी, मायाळी।
आपति अघ टाळी, कर रखवाळी, तुं एकहि मम त्राता जी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।3

प्राकम पामेवा, विजय करेवा, जग जश लेवा, लाभेवा।
अजरामर ऐवा, अभय अभेवा, देवन देवा महादेवा।
चाहत तुव सेवा, हरि हर जेहवा, देवा वांछित दाताजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।4।।

निगमागम जांणी, विविध वखांणी, पुनित पुरांणी, परमांणी।
सुर सैव्य सयाणी, मां महाराणी, रुप ब्रह्माणी, रुद्राणी।
विधाप्रद वाणी, वीणा पांणि, वरदांणी, विख्याताजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।5।।

महिखादिक मारणि, असुर अहारणि, खळदळ हारिणि, खग धरणि।
सुरकाज सुधारणी, अधम उधारणी, कष्ट निवारणी, शुभ करणी।
आश्रीत उगारणी, दुरमति हारणी, चारणी चंडी, ख्याताजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।6

शंकर कैलाशी, संग विलासी, सदा हुलासी, सुखराशि।
गब्बर गिरिवासी, विन्धय विलासी, टाळण फांसी, चौरासी।
ऋषि सहस्त्र अठासी, सिध संन्यासी, गुण चारण सुर गांतांजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।7।।

सेवग कवि शंकर, कहत जोड कर, कृपा नजर कर करुणाळी।
त्रय ताप मुगत कर, खळ रिपु खय कर, तन मन दुःख हर त्रिशूळाळी।
गिरिजा मां मम घर, रिध सिध वृधि कर, दे सुबुधि सुख, शाताजी।
रह राजी राजी, हमपर माजी, अजा ऊमाजी, अंबाजी।।8।।

।।कळस छप्पय।।
नमो अंबिका उमा, अद्रिजा अजा अपर्णा।
नमो गौरि गिरिसुता, आशपुर्णा अन्नपूर्णा।
नमो भीड भंजनी, भवा भगवती भवानी।
नमो दया सागरि, देवी दुर्गा महादानी।
दुःख दमनि देवी सिध्धेश्वरी, कृपा शीघ्र हम पर करो।
शिव प्रिया हों शंकरदास के, दुरित रोग दारिद हरो।।1।।

।।दोहा।।
सुमति, आयु, आरोग्यदा, वांछितप्रद विख्यात।
धन, यश, स्त्री सुख, धामदा, नमो अंबिका मात।।1।।
जिम दिनकर रा दरस सूं, शीघ्र तिमिर विनसाय।
इम अंबाष्टक उचरतां, पाप त्रिताप नसाय।।2।।

~~लींबडी रा राजकवि शंकर दानजी जेठी दानजी देथा लिखियोडी।

3 comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *