🌹देवीअथर्वशीर्षम् का भावानुवाद🌹

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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आखर अथर्व शीर्ष रा, देवी दाखूं आज।
उकती दीजो अंबिका, मेहाई महराज।।४५६
सकल देव सुरलोक रा, कहियो करणी मां ज।
कहो आप किनियांण कुण, मेहाई महराज?।।४५७
पुरूख प्रकृति पुहमि पर, जगत चराचर म्हां ज।
शुन अशुन्न सब हीज हूं, मेहाई महराज।।४५८
मात वदी निज मुख मधुर, आखर शुभ रिधु राज।
ब्रह्मरूप हूं भगवती, मेहाई महराज।।४५९
दिव्याखंडानंदिका, अन-आनंदा म्हां ज।
हरख सोग री हूं धणी, मेहाई महराज।।४६०
पंचभूत मैं प्राण हूं, अपँच -भूत हुं मां ज।
देवी द्रश्य अद्रश्य हूं, मेहाई महराज।।४६१
अविज्ञान विज्ञानमय, सब केवल रिधु राज।
ब्रह्माब्रह्म हूं बीसहथ, मेहाई महराज।।४६२
वेदावेद विलासिनी, विध्याविध्या म्हां ज।
अजानजा हूं अंबिका, मेहाई महराज।।४६३
अवस बसूं आकास लग, सिर परसै सरगां ज।
जोगण हूं जबरी वडी, मेहाई महराज।।४६४
ऊपर नीचै हूं अवस, अगल बगल पण म्हां ज।
व्यापी सब वसुधा सदा, मेहाई महराज।।४६५
पग सूं अडूं पताळ नें, वड विराट वपु म्हां ज।
म्हारी कुण समवड करै, (म्है)मेहाई महराज।।४६६
रूद्र और वसु रूप में, संचरणी पण म्हां ज।
वपु वपु बसणी विश्व री, मेहाई महराज।।४६७
आदित द्वादस अवनि रा, विश्वदेव वसु म्हां ज।
व्यापक हूं वड मावडी, मेहाई महराज।।४६८
मित्र, वरुण अर सुर-महिप, अगनि, अश्विनी राज।
पोखक हूं परमेश्वरी, मेहाई महराज।।४६९
त्वष्ट, सोम, पूखा तथा, भग धारणी भवा ज।
जंगळ धर री जोगणी, मेहाई महराज।।४७०
त्रिकम त्रिभुवनाक्रान्तक, प्रजापति ब्रह्म म्हां ज।
धारण करणी धा वडी, मेहाई महराज।।४७१
सदा सोमरस समपता, हवि मँह जो जन म्हां ज।
देती फळ, धन, द्रव्य वित, (म्है)मेहाई महराज।।४७२
अखिल जगत अवलंब हूं, भरणी धन भगतां ज।
ब्रह्म रूप ब्रह्मवादिनी, मेहाई महराज।।४७३
यजन करण वड जगत मैं, अधिराजन अधिराज।
वड म्हां सूं हूं इज स्वयं, मेहाई महराज।।४७४
थानक आतम रूप थिर, बसणी बुध्धि मांझ।
जोगण वड जाणो म्हनैं, मेहाई महराज।।४७५
जिण जन जांणी जोगणी, धर जांगळ वड धा ज।
उण ने जस धन दूं सदा, मेहाई महराज।।४७६
सकळ देव सुरलोक रा, महिमा कथवा मां ज।
आखर आखर आखिया, “मेहाई महराज”।।४७७
“नमो देव ! वड देव नित, सगति रूप शिवा ज।
आदि मात अखिलेसरी, मेहाई महराज”।।४७८
करणी जन जन कारणी, प्रवृत करतव्यां ज।
कल्याणी क्षेमंकरी, मेहाई महराज।।४७९
गुणरूपी गरिमामयी, मंगलमय माता ज।
नियम सहित थांनें निमण, मेहाई महराज।।४८०
अगन जोत सम ऊजळी, जग मग जग ग्यानां ज।
वड आवड वैरोचनी, मेहाई महराज।।४८१
सकल सुमंगल सुख प्रदा, चरण शरण रख आज।
करम जथा करणी कृपा, मेहाई महराज।।४८२
धरा-अमंगल ध्वंसिणी, असुर मारणी आ’ज।
करणी किनियाणी तथा, मेहाई महराज।।४८३
वाणी-प्राणी, वैखरी, जनमदैनी देवां ज।
शारदमय थांनें नमन, मेहाई महराज।।४८४
कामधेनु !आणंद कर, अन बल रूपी आ’ज।
रिधू तवन सुण रीझजो, मेहाई महराज।।४८५
कालनाशिनी कवित तव, वद वद वेद किया ज।
विष्णु सकति जय वैश्णवी, मेहाई महराज।।४८६
स्कंद -मात शिव सहचरी, वीण पाणि ब्रह्मा ज।
पुहमि पाप प्रजाळणी, मेहाई महराज।।४८७
अदिति अंब थूं देवता, अजमुख कन्या आ’ज।
कल्यांणी किनियाण मां, मेहाई महराज।।४८८
सरव सगति रूपा शिवा, महालक्षमी राज।
ध्यान धरूं थारो सगत, मेहाई महराज।।४८९
ग्यान ध्यान माता बढा, भैरवी रूप भवा ज।
मन-आलोकण मावडी, मेहाई महराज।।४९०
मृत्युरहित, मंगलकरण, सरजणहार सुरां ज।
दक्षसुता अदिती शिवा, मेहाई महराज।।४९१
‘कं’ रूपा मां कामदा, ‘ए’ योनी रूपा ज।
‘ई’ कमला मां ईश्वरी, मेहाई महराज।।४९२
रूप ‘ल’ सूं सुरपति ललित, ‘ह्रीं’ सूं मां गुह्या ज।
‘ह’-‘स’ वर्णमय तूं स्वयं, मेहाई महराज।।४९३
वायू है ‘क’ ‘ह’-बादळी, ‘ल’ मय सुरपति राज।
ह्रीम् गुहा मय आप हो, मेहाई महराज।।४९४
सकल वरणमय तूं सकति, माया मय ह्रीं मां ज।
सदा मात सरवात्मिका, मेहाई महराज।।४९५
वपु आवड वड हिंगुला, माता मूलविधा ज।
ब्रह्मरूपिणी विविध वपु, मेहाई महराज।।४९६
सगति परम री तूं स्वयं, विश्वविमोहिन राज।
धनुपाशांकुश बाणधर, मेहाई महराज।।४९७
श्रीविधा मां हिज स्वयं, जण जण जाणी राज।
सोक रहित सब नें करै, मेहाई महराज।।४९८
नमन नमन नारायणी, पाहि पाहि पातां ज।
किनियांणी करूणाकरा, मेहाई महराज।।४९९
रिखी मुनी मुख सूं वदे, व्यापी वपु वपु वा ज।
देशणोक री डोकरी, मेहाई महराज।।५००
वा ज अाठ वसु है स्वयं, रूद्र एक दस राज।
द्वादस सूरज डोकरी, मेहाई महराज।।५०१
सोमपान करणी स्वयं, नँह करणी पण राज।
विश्व देव वड-वपु-मयी, मेहाई महराज।।५०२
तूं सुर, आसुर, राखसां, जातुधान जख राज।
नाग, सिध्ध, किन्नर, नरां, मेहाई महराज।।५०३
सत्व रजस तम मां स्वयं, बसणी घट घट वा ज।
त्रिगुण रूप त्रिगुणात्मिका, मेहाई महराज।।५०४
रूद्र-ब्रह्म- हरि रूपिणी, अखिल जगत अधिराज।
देव-त्रयी देशाणपत, मेहाई महराज।।५०५
प्रजापतिम् परमेस्वरी, मनु इन्द्रादि आ ज।
वडी खडी औ मावडी, मेहाई महराज।।५०६
ग्रह नखतर जोतिस गहन, उडुगण अवनी रा ज।
सूर चंद्रमा पण स्वयं, मेहाई महराज।।५०७
कला काठ रूपी रिधू, काल रूप पण राज।
डाढाळी औ डोकरी, मेहाई महराज।।५०८
पातक जाळक पार्वती, भुगत मुगत दाता ज।
अनत चरित तव अंबिका, मेहाई महराज।।५०९
वसुधा विजय प्रदायिनी, सरल शुध्ध मन ज्या ज।
संभाळे सरणागतां, मेहाई महराज।।५१०
शिव दाता पण शंकरी, मंगल करणी मां ज।
नमन मात नित प्रत नमन, मेहाई महराज।।५११
वियदिकार संयुक्त वपु, वीतिहोत्र पण वा ज।
अरध चंद्र जुत बीज मय, मेहाई महराज।।५१२
“ह” “ई” है आकास मयी, “र” है अगनि रुपा ज।
अर्ध चंद्र है बीजमय, मेहाई महराज।।५१३
शुध्ध चित्तमय हुय सदा, धरै ध्यान रति ज्यांज।
ह्रीं एकाक्षर ब्रह्म है, मेहाई महराज।।५१४
जोर ध्यान धरता जती, ग्यान अंबु दधि राज।
प्रणव मंत्र रव नाम शुभ, मेहाई महराज।।५१५
वाणी माया ब्रह्म जुत, ऐं ह्रीं क्लीं थूं मां ज।
विच्चै चामुंडा वदूं, मेहाई महराज।।५१६
वक्त्र जुक्त सूरज तथा, “चा” “म” रूप थूं मां ज।
विच्चै चामुंडा वदूं, मेहाई महराज।।५१७
करण दखण किनियाण “ऊ”, रूप बिन्दु “मुं” राज।
विच्चै चामुंडा वदूं, मेहाई महराज।।५१८
“डा” नारायण रो ध्वनिम, “यं” वायू रूपा ज।
विच्चै चामुंडा वदूं, मेहाई महराज।।५१९
ए सह युक्त नवार्ण यह, महा मंत्र रिधु राज।
विच्चै चामुंडा वदूं, मेहाई महराज।।५२०
नवार्ण ओ नव अक्खरी, अखिल मंत्र अधिराज।
महिमा गावै मात री, मेहाई महराज।।५२१
आणंद देय उपासगां, ब्रह्मसायुज प्रदा ज।
नवार्ण ओ नव अक्खरी, मेहाई महराज।।५२२
चिद रूपां वड सरसती, वडलखमी थूं राज।
कारी आणंद काळिका, मेहाई महराज।।५२३
ब्रह्म विद्या बगसावणी, ध्यान धरूं तव राज।
वड काली, श्री, सुरसती, मेहाई महराज।।५२४
अग्यानां तम डोर री, गांठ खोल ने राज।
करो मुगत म्हां नें मया, मेहाई महराज।।५२५
ह्रदय कमल मँह राजनी, सूरज प्रात प्रभा ज।
पाशांकुश कर धारिणी, मेहाई महराज।।५२६
वदनसौम्य, वरदायिनी, अर कर अभयकरा ज।
तारण तरणी त्रंबका, मेहाई महराज।।५२७
वसन-रगत वपु धारिणी, कवियां कामदुधा ज।
भजो भाव सूं भैरवी, मेहाई महराज।।५२८
मार-महा-भय मावडी, संकट हर म्हारां ज।
करूणामय महती सदा, मेहाई महराज।।५२९
जिण ब्रह्मा जाणी नहीं, इणसूं अग्येया ज।
वदे सकळ वसुधा तनें, मेहाई महराज।।५३०
पार न जिणरो पामियो, रहस तणी नँह था ज।
कही अनंता जगत तद, मेहाई महराज।।५३१
लक्ष किणी न लखिजियो, तेण अलक्षा आ ज।
सगत जगत वड संकरी, मेहाई महराज।।५३२
जनम न जिण रो जाणियो, इण सूं कही अजा ज।
जगजननी जगदीश्वरी, मेहाई महराज।।५३३
रहै एकली रात दिन, इण सूं है एका ज।
एकल पण तूं अखिल में, मेहाई महराज।।५३४
विश्व रुपिणी एक वपु, इण सूं है नेका ज।
अखिल अवनि एकाम्बिका, मेहाई महराज।।५३५
इण सूं कहता आप नें, अजा अलक्षेका ज।
अग्येया नेका अनत, मेहाई महराज।।५३६
मंत्रमयी थूं मातृका, शबद ग्यान रूपा ज।
चिन्मयतीता चंडिका, मेहाई महराज।।५३७
सुन्न मांय सुन साखिणी, जिण उपर कछु नां ज।
दुरगा खुद देशाणपत, मेहाई महराज।।५३८
भव सागर भय सूं ग्रसित, नमूं नमूं नित मां ज।
दुरगा तौ देशाणपत, मेहाई महराज।।३३९
अरणव पार उतार भव, करनल कर करुणा ज।
दुराचार हरजो दुगा, मेहाई महराज।।३४०
जिण जन जपिया जाप शुभ, पांच अथवशीर्शांज।
फल देणी हूं फल प्रदा, मेहाई महराज।।३४१
जिण जन इण नी जांणियो, पर थरपी प्रतिमा ज।
अर्च सिध्धि आपै कियां, मेहाई महराज।।३४२
बार एकसो आठ जप, पुरश्चरण विधि राज।
दस वारां पढ दिल खुशी, मेहाई महराज।।३४३
कृपा करे किनियांणियां, उण रे उपर मां ज।
संकट मेटे दास रा, मेहाई महराज।।५४४
प्रात रात नित जप कियां, पातक दळणी मां ज।
सकल अमंगल ध्वंसिणी, मेहाई महराज।।५४५
तौ तुरीय संध्या जपै, कर घण कोड मनां ज।
वचन सिध्ध उणने करे, मेहाई महराज।।५४६
चित्रित-नव-कठ-पुतळी, जो रख रटता राज।
प्रांण प्रतिष्ठित उण करे, मेहाई महराज।।५४७
महा मृत्यु सूं वा तरै, रटै तुरीय ज सांझ।
भोम अमावस भाव सूं, “मेहाई महराज”।।५४८
अवनि अविध्या नासिनी, सरस ब्रह्म विध्या ज।
देणहार वड देव थूं, मेहाई महराज।।५४९
जिण जन जांणी जोगणी, रहस मयी रिधु राज।
भव बँध उणरा भंजणी, मेहाई महराज।।५५०
सतसई बणसी सहस पद, आखर आखर राज।
आखर आखर है मधुर, मेहाई महराज।।५५१

~~वैतालिक

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