धीवड़ी

धीवड़ी !
फूल री जागा
भाठै री मूरत
बणा मेली है साम
राम निकल़्योड़ै मिनखां रै रेल़ै में!
जका पूजण रा रैया है भीरु
जुग- जुग सूं
काढणिया मीन मेख
कारीगर री खामचाई में
मानै है इणनै अणमावती
बा चीज
जिणनै आभै पटकी
धरती झाली नीं
बगा दीनी पूठी
त्रिशंकु ज्यूं।
बा
अणथाग उफणतै जोबन री
थल़गट माथै ऊभी देखै है
जोबन में गरबीजती ढेल नैं
मोर रै लारै
भरती डगला
चाल मतवाल़ी में।
बा ई चावै है
चाल मतवाल़ी बैणो
पण!
पैणा बण
ऊभ जावै आडा
अड़ी खंब
दादी रा आखर
कै धीवड़ी है!
किणी घर री लाज
ढकणी है आबरु री
उण सोच्यो !
जिणनैं ढाकै ढकदी है
इण जग री बोदी रीतां रै पाण
क्यूं कै
पतिमार सती होवण वाल़ी
सतवंती देवै है
उणनैं सीख
सत रुखाल़ण री!
प्रीत रा पाऊंडा
नीं भर सकै वा
कैय नीं सकै
अंतस इलोल़ रा आखर
उणनैं
मिलणवाल़ो नेह तो
जावतो दीखै है
खेह रै खोपणियां में
जद ई तो मिलै
उणनैं झिणकण
ऊकल़ता आखर
हिंयै री हूंस रा हारु
अर
मन मसोसियां
बा तो
मिनखपण सूं हीण
इण रिंधरोही में
डरुं फरुं होयोड़ी
नीप्योड़ै आंगण
वड़ी फैर्योड़ै चंवरां में
लागै है अल़ीसवाड़ै
रै उनमान अणखावणी
जद ई तो उणनैं
किणी वेल़ा पुल़ मांय
खांट गाय ज्यूं
सूंप दी जालैला
किणी कसाई नैं
कंठ मोसण सारु।

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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