धिन्न विशणु प्रगट्यो धरा

jambheshwar

धिन्न विशणु प्रगट्यो धरा, देव मिनख री देह।
जंभ नाम जग जाणियो, गुणधर लोहट गेह।।१
गौ भगती कीधी गहर, अहर निसा कर आप।
महर करी नैं मोचिया, पींपासर में पाप।।२
समराथल़ तपियो समथ, धोरै ऊजल़ धिन्न।
अन्न जल़ दियो अहर निस, भूखां नैं भगवन्न।।३
ग्यान नदी खल़की गहन, नित उपदेस नवल्ल।
पसरी चहुंदिस पहुम पर, गुरु जंभै री गल्ल।।४
सोखी कीना संतजन, वसु पोखी वनराय।
दोखी जन सह दाटिया, बात इमी वरसाय।।५
मऊ माल़वै जावती, करण मजूरी काज।
समराथल़ ढाबी समथ, निज कर बांट्यो नाज।।६
ऊंच नीच सह एक सम, भगवन एको भाव।
अपणाया उपदेस दे, चेला करनै चाव।।७
नेम भल़ाया बीस नव, उरां खरो उपदेस
ऐ विशनोई आज दिन, दीपै सारै देस।।८
पर्यावरण पशु प्रेम रा, पेख धरा परतीक
जग चेला जंभेस रा, लेस न छोडै लीक।।९
आंनै हिरणां सूं अहो, पूतां सम ही प्रेम।
निज पय पाल़ै नारिया, नेह निजर रै नेम।।१०
एकै हांचल़ आपरो, दूजै हिरणो देख।
पेखो समवड़ पोखणी, नार सिनानण नेम।।११
जायो आपही जैहड़ो, जायो हिरणी जोय
भेद करै नीं भूल सूं, दूध पावै थण दोय।।१२
निछल़ नेह देवै निपट, धपट थणां री धार।
काढ मूंडै रो कोर दे, न्हाल़ सिनानण नार।। १३
आहेड़ी आंरी इल़ा, नितप्रत रहै निरास।
अभय मिरग उछरै अहो, विश्नोइया रै वास।।१४
धन धीणा घर धोपटा, धरा निपै घण धान।
जंभेसर दीनो जगत, विश्नोइयां वरदान१५

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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