डीडवाना की गै’र

हाकम की होली, दिल-देहरी रंगोली,
खेले रसियां की टोली, लिए हाथों ही में चंग है।
बाजत मृदंग, थेई-थेई-ता-ता-थ्रग,
मिल करे हुड़दंग, वाको नाचे अंग-अंग है।
डोलची को पानी, लागे पीठ या पेशानी,
जातें याद आवै नानी, दुनी देख-देख दंग है।
कहे “गजादान”, आओ देखने को डीडवाना,
डोलची की गै’र, मेरे शहर की उमंग है।।

भूल बैर-भाव, सद्भाव को बढ़ावै सदा,
रखे आव-जाव, जासों सरस समाज है।
हिंदू हो कि इस्लाम, नफरत को न नाम,
समता के सराजाम, स्नेह सरताज है।
संत और काजी, जहां रहे राजी-राजी,
यातें प्रगट न पाए पाजी, यह गूढ राज है।
कहे “गजराज”, सारे मिल के सुधारें काज,
पूजा हो कि हो नमाज, एक ही आवाज है।।

मालियों के बास, जहां उमंग उल्लास देखो,
सज-सज सांग खास, गै’र हैं निकालते।
बालक जवान प्रौढ़, नाचत हैं अंग मोड़,
एक-दूसरे से होड़, चंग-संग चालते।
गीत ओ धमाल गाते, करते कमाल जाते,
मेला ये विशाल, आते रंग को उछालते।
कहे “गजादान” यामें सीख है महान,
जो भी करता है कान, सो ई चले प्रीत पालते।।

~~डाॅ.गजादान चारण “शक्तिसुत”

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