डिंगल काव्य केवल वीर रस प्रधान ही नहीं इसमें हास्य रस भी है-मोहन सिंह रतनू

महान भक्त कवि ओपा जी आढा को देवगढ के कुंवर राघव देव चूंडावत ने ऐक घोड़ा भेंट किया। घोड़ा बूढा एवं दुर्बल था।
इस पर कवि ने कुंवर को उलाहना स्वरूप एक गीत लिखा…देखिये सुंदर बिंनगी

धर पैंड न चालै माथो धूणै,
हाकूं केण दिसा हैराव।
दीधो सो दीठो राघव दे,
पाछो ले तूं लाख पसाव।।1

पाप्यां घाल्यो ओपा पूठे,
कवियण कासूं खून कियो!
ओ थारो धजराज अंवेरो,
दत जांणूं गजराज दियो।।2

डाकण भखै न बाघ अडोले,
दीधां बिके न देवे दांम!
चंचल परो लिजीये चूंडा,
गज दीधो काई दीधो गांम।।3

चौडी पूठ सांकडी. छाती,
कुरड. उघाड़ी लांबा कांन।
लाखां इ बातां पाछो लीजे,
कुंवर न दीजे दांन कुदांन।।4

~~कवि ओपा जी आढा
संकलन: मोहन सिंह रतनू

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