डिंगल काव्यधारा में प्रगतिशील चेतना

शौर्य, औदार्य, भक्ति, नीति, लोकव्यवहार एवं अनुरक्ति आदि विविध विषयों में रचित राजस्थानी साहित्य की डिंगल काव्यधारा का अपना अनुपम एवं गौरवमयी इतिहास है। धारातीर्थ धाम के रूप में स्वनामधन्य इस राजस्थान की धोरा धरती की शौर्यप्रधान संस्कृति के निर्माण और परित्राण में डिंगल काव्यधारा का विशेष योगदान रहा है। इस धारा के कवियों में हलांकि अनेक जाति वर्ग के लोगों का नाम आता है लेकिन इनमें अधिकांश कवि चारण रहे हेैं और आज भी हैं। अतः यह चारणी काव्य नाम से भी जाना जाता है। “आधुनिक हिंदी जगत में डिंगल काव्यधारा यानी चारण काव्य के लिए प्रायः भ्रामक धारणाएं व्याप्त है, जो लेशमात्र भी आप्त नहीं है। वस्तुतः चारण सामाजिक चेतना का संचारण एवं क्रांति का कारण है। वह स्वातंत्र्य का समर्थक, पौरुष का प्रशंसक और प्रगति का पोषक होने के साथ ही युगचेता, निर्भीक नेता और प्रख्यात प्रणेता रहा है। उत्कृष्ट का अभिनंदन एवं निकृष्ट का निंदन इसकी सहज वृत्ति रही है। सिद्धांत एवं स्वाभिमान हेतु संघर्ष करने वाले बागी वीरों का वह सदैव अनुरागी रहा है। “ (डाॅ. शक्तिदान कविया-राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन, पृ. 83) इस काव्यधारा ने अनवरत रूप से युगीन यथार्थ को उकरने के साथ जीवनमूल्यों के संरक्षण का अहम कार्य किया है।

जहां तक प्रगतिशल चेतना का प्रश्न है जिस तरह अंधेरे की कोख में उजाला जन्म लेता है उसी तरह परंपरा की कोख से ही प्रगतिशीलता का जन्म होता है। प्रतिरोध एवं प्रतिकार के स्वर से प्रगतिशीलता का गहरा नाता है। समय की जड़ता को तोड़कर उसमें चेतना का शंखनाद करने वाले स्वर को प्रगतिशील स्वर कहा जाता है। पंरपरा जब जड़ एवं रूढ रीति-रिवाजों की जकड़न में फंसती नजर आती है तो प्रगतिशील चेतना उसे ललकारने को विवश हो जाती है। इस दृष्टि से देखें तो डिंगल काव्यधारा में वह चेतना सदैव विद्यमान रही है जो समय की अनीति पर बिना किसी भेदभाव एवं पक्षपात के करारी चोट करने की रचनात्मक जवाबदेही का अहसास करती है। इस काव्यधारा ने यथार्थ के उबड़खावड़ रास्तों पर साहसी कदम बढ़ाते हुए विषम परिस्थितियों से सीना तानकर टक्कर लेने की क्रांतिकारी पहल की है। इस धारा ने अपने समय के रूढीवादी समाज की विसंगतियों एवं हठधर्मी राज की अनीतियों पर अंगुली उठाने में कभी संकोच नहीं किया। समय की रूढ घेराबंदियों को तोड़ते हुए अपने ही निर्णयों को पुनर्मूल्यांकित कर उनमें उचित बदलाव करने का आह्वान करने वाली यह काव्यधारा सामाजिक और सांस्कृतिक संक्रमण के समय जनता को शोषणमुक्त करने की युगान्तरकारी पहल करने वाली रही है। समाज की जीवंत समस्याओं में शायद ही कोई शेष रही हो जिस पर इन डिंगल कवियों की लोकहितकारी दृष्टि नहीं गई हो और इन्होंने अपना तार्किक दृष्टिकोण प्रस्तुत न किया हो। परिवर्तित परिवेश के अनुरूप इसने अपना रंग-ढंग, कथ्य-शिल्प, भंगिमा और मुहावरा बदलते हुए नयेपन को अपनाया है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब राष्ट्र या समाज पर संकट के बादल मंडराए हैं तब तब इन डिंगल कवियों ने अपनी लेखनी की धार को तीक्ष्ण करके संबंधित के जमीर को जगाने में कोई कोर कसर नहीं रखी। भले ही अंगे्रजी सत्ता के इरादों एवं भावी परिणामों की उद्घोषणा करती बांकीदास आसिया की ‘आयो अंगरेज मुलक रै ऊपर, आहंस लीधी खेंच उरां ’ हो या कि शंकरदान सामौर की ‘मिळ मुसळमान, रजपूत ओ मरेठा, जाट सिख पंथ छड जबर जुड़सी ’ की आह्वानकारक आवाज हो। भले ही सितोरहिंद के लिए उतावले उदयपुर महाराणा फतेहसिंह को उनके हिंदुआ-सूरज के वंशविरुद की याद दिलाती क्रांतिकारी केसरीसिंह बारठ की चेतावनी हो, या कि “मानां मन अंजसो मती, अकबर बळ आयाह “ की ओजस्वी हुंकार, जिसने आमेरपति मानसिंह के दंभ को चूर-चूर कर दिया, सब एक से बढ़कर एक उदाहरण है। पितृहंता मारवाड़ नरेश बखतसिंह के गुरूर को तार-तार करती दलपत बारठ की ‘पिता मार पचीसी ‘ हो या कि अपने भविष्य की चिंता नहीं करते हुए कविया करणीदान की वह वरदायी वाणी हो जो ‘कूरम मार्यो डीकरो, (अर) कमधज मार्यो बाप ‘ कहकर मारवाड़ और ढूंढाड़ की राजसत्ता को सबसे कड़वी बात कहते हुए अपना फर्ज निभाने में संकोच नहीं करती। (डाॅ. गजादान चारण: बीकानेर राज्य एवं कविराजा विभूतिदान का घराना)

हिंदी आलोचना जगत में सदैव एक बात उठती रही है कि राजस्थान में किसी प्रकार का सांस्कृतिक पुनरुत्थान जैसा कार्य नहीं हुआ। यह बात इसलिए उठी क्योंकि उन्होंने राजस्थान को एक हिंदीभाषी प्रदेश मानकर उसी दृष्टि से इसका मूल्यांकन करने की कोशिश की है। यदि उन्हें राजस्थान के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के वाकई दर्शन करने हैं तो फिर उन्हें डिंगल काव्य धारा से आधुनिक राजस्थानी की कलकल निनादित काव्यसरिता में अवगाहन करना होगा। राजस्थान की अपनी सांस्कृतिक विरासत है, जो कि बड़े रूप में भारतीय संस्कृति का ही हिस्सा है, जिसे समझने के लिए यहां की भाषा, साहित्य एवं लोकमानस को जानना जरूरी है। यहां की मौखिक एवं वाचिक परंपरा में विद्यमान काव्य का अनुशीलन किया जाए तो पता लगता है कि परिमाण एवं प्रभाव दोनों दृष्टियों से यहां का साहित्य अनुपम है।

चूंकि डिंगलकाव्यधारा की राष्ट्रीय चेतना एवं भारतीय स्वाधीनता संग्राम में इस काव्यधारा के योगदान पर हिंदी एवं राजस्थानी पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में बहुत कुछ प्रकाशित है अतः पुनरावृत्ति से बचते हुए इस आलेख में आज तक अज्ञात या अल्पज्ञात कतिपय नवीन तथ्यों एवं उदाहरणों के माध्यम से डिंगल काव्यधारा की प्रगतिशील चेतना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। डिंगल काव्यधारा में चित्रित पीड़ित एवं शोषित व्यक्ति के दर्द की दास्तान, अकाल की विभीषिका, नारी की पीड़ा, रिश्तों की पवित्रता, मानवीय जीवनमूल्यों का समर्थन, ऊँच-नीच की भावना का प्रतिकार, आमजन की ताकत का बखान, महलों पर भारी पड़ते झौंपड़ी के स्वाभिमान की प्रशंसा, नरेशों की विलासिता एवं नौकरशाहों की निरंकुशता की भर्त्सना, सामंतो एवं श्रीमंतों के अन्याय, अधर्म एवं आचारहीनता की खुली निंदा, वर्तमान नेताओं की दलबदलू प्रवृत्ति पर व्यंग्य बाण, पोंगापंथी धार्मिक आडंबर का विरोध इत्यादि कितने ही विषय हैं, जिनमें इस काव्यधारा की प्रगतिशील चेतना सतत रूप से प्रवाहित रही है।

डिंगल के धुरंधर कवि उमरदान लालस का तो पूरा साहित्य ही क्रांतिचेता का साहित्य है। आम से लेकर खास और राज से लेकर राम हर किसी पर इस जनकवि की कलम चली और अपने ही तेवर में चली। धर्म-कर्म के नाम पर पापाचार में आकंठ डूबे मठों में रहने वाले सठसंतों की संगति उमरदान ने खुद करके देखी और इन मठों के कोने कोने में झांकने के साथ सठसंतों के मन की मैली भावनाओं को बारीकी से समझा। कवि का अंधश्रद्धा से मोहभंग हुआ तो वह हुआ कि मठों एवं मठाधीशों की काली करतूतों का खरा खरी खुलासा करती जनकवि की कलम रुकी नहीं। जनसंहारक ‘छपनिया-अकाल ’ में भूख से बिलबिलाते जनमानस को देखकर कविहृदय करुणा से भर उठा। जनता की गरीबी, लाचारी एवं बेबसी; राजसत्ता की अनदेखी, स्वार्थी तत्वों के षड़यंत्र, क्षत्रियोचित आचरणों के अधःपतन, तरह तरह के नशों की गिरफ्त में फंसती राजसत्ता एवं प्रजा को उमरदान ने हर तरह से जगाने का कार्य किया। वस्तुतः कवि उमरदान लालस आधुनिक राजस्थानी प्रगतिशील कविता के अग्रणी कवियों में से हैं, जिसे प्रगतिशीलता का सशक्त संवाहक कहा जा सकता है। मठवाद के खिलाफ आवाज उठाकर अज्ञानांधकार की कारा को तोड़ने वाले कवि उमरदान ने ‘करसा एक कमावणा ’ की घोषणा कर किसान के श्रम को नमन किया –

मारवाड़ रो माल मुफत में खावै मोडा।
सेवग जोसी सैंग, गरीबां दे नित गोडा।
दाता दे वित दान, मौज माणै मुस्टंडा।
लाखां ले धन लूट, पूतळी पूजक पंडा।
जटा कनफटा जोगटा, खाखी परधन खावणा।
मुरधर में क्रोड़ां मिनख (ज्यांमें) करसा एक कमावणा।।

उमरदान लालस ने उस ईश्वर की ईश्वरता पर भी प्रश्न उठाया, जिसके संसार में पतिव्रता परेशान रहे और गणिकाएं सुखभोग करे। प्रगतिशीलता का स्वर आलापती कवि की पंक्तियां देखिए-

वेश्या रै सुखभोग, पतिव्रता व्याधि
इणसू लागै ईश्वर री ईसरता आधी।

‘मिट्टी के पुतले मानव को इंसान बनाने आया हूं ’ जैसी प्रेरणास्फूर्त रचना लिखने वाले कवि मनुज देपावत ने मूर्तिपूजा एवं पाखंड के बदले मानवता की पूजा का पक्ष लेते हुए लिखा कि इस देश का भाग्य उस दिन जगेगा जिस दिन पत्थरों की बजाय इंसानों की पूजा होगी। कवि की यह इंकलाब के अंगारों वाली वाणी कितनी सटीक है-

अै इंकलाब रा अंगारा, सिलगावै दिल री दुखी हाय।
अब छांट्यां छिड़क्यां नहीं बुझैला जो डूंगर लागी आज लाय।
इक दिन ऐड़ो आवैला, धोरां री धरती धूजैला।
अै सदा पत्थरां रा सेवग पण आज मिनख नैं पूजैला।

अंग्रेजों के साथ तत्कालीन राजाओं की मिलीभगत से होने वाले अत्याचारों का जनभाषा में मार्मिक चित्रण करते हुए डिंगल कवि शंकरदान सामौर ने दीनजनों की दारुण दशा दीनबंधु राम को संबोधित कर कही। कवि ने स्पष्ट घोषणा की कि मखमल की सेजों पर सोने वाले लोग कांटों के दर्द को कैसे जान पाएंगे। कवि ने सुविधाभोगी एवं संपन्न लोगों की आशा छोड़कर झौंपड़ियों में रहने वाले सामान्य जन से ही देश के उद्धार का आह्वान किया-

धिन झौंपड़ियां रा धणी, भुज थां भारत भार।
हो थे इज इण मुलक रा, साचकला सिरदार।।

जहां तक प्रशस्तिपरकता प्रश्न है इन डिंगल कवियों ने राजाओं एवं सूरवीरों के अच्छे कार्यों की प्रशंसा की है, वहां सामान्य लोगों के कलात्मक एवं रचनात्मक कौशल को भी सराहने में पीछे नहीं रहे हैं। डिंगल कवि गोविंददान आसावत, नाथूसर ने अपने पड़ौस के गांव कालू के नाई कालूराम की ऊंट कतरने की कला से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा में छप्पय लिखा जो सैंकड़ों वर्षों बाद भी उस क्षेत्र के लोगों को कंठस्थ है-

चित में अति कर चाव, सुघड़ हद ऊंट संवारै।
न्हाखै नवळा नाळ, बेल दरखत विस्तारै।
फबै बेल बिच फूल, कोयलां दरख्खत किल्लकै।
सरवर घाट सुघाट, मांय पणिहार मिल्लकै।
कवि बिड़द सुतन गोविंद कह, भली ख्यांत कर भाळियो।
चात्रगां गांव काळू चतर, (ज्यांमें) किसबी मोटो काळियो।।

डिंगल कविता पर महलों की प्रशस्ति का आरोप लगाने वाले यदि इस काव्यधारा को ढंग से समझें तो उन्हें मिलेगा कि इन कवियों ने उत्कृष्ट कार्य करने वाले सभी वीरों का बिना किसी भेदभाव के आवआदर किया है। यहां तो ‘दुश्मन के भी घाव सराहने ’ की सराहनीय परंपरा निर्वाहित हुई है। आलनियावास पर अंग्रेजों के आक्रमण के समय जमीयत का मुसलमान जमींदार मीरूखां बड़े साहस से लड़कर वीरगति को प्राप्त हुआ। कवि शंकरदान सामौर ने पंथ और पद की बजाय शहादत को सलाम करते हुए मीरूखां को अमर कर दिया-

जमींदार जमीयत्त रो, मीरूखां मरदाण।
मर्यो मरद री मौत वो, गौरां रो कर घाण।।

इसी तरह झुंझुनू के बहल ठिकाने पर अंग्रेजों की घेराबंदी में जूझते हुए गुड़ा (शेखावाटी) का ठाकुर धीरसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ। अंग्रेजी मेजर फोरेस्टर ने इस वीर की मृत देह से सिर अलग करके झुंझुनूं के छावनी दरवाजे पर लटका दिया। उस लटकते हुए सर को लाने की हिम्मत कौन करे ? घीसिंह की ठकुरानी का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था। ऐसे में वहां के एक सुभट वीर मीणा ने पंद्रह कोस की पैदल यात्रा कर लटकते हुए सर को उतारने एवं ठकुरानी तक पहुंचाने का कार्य किया। कवि शंकरदान सामौर ने उसको रंग दिया-

फोरेस्टर फीको पड़्यो, सिर न देख्यो सुंवार।
सिर ल्यायो सांवत रो, मीणी जायो न्हार।।

संतत्व की आड़ में पलते दुराचार एवं अनाचार के अनेकों खुलासों के बाद भी अंधविश्वासों की जकड़न से ग्रसित आमजन संतों की जूठन को भगवान का आर्शीवाद मानकर खाता हैं और उसमें अपने भाग्य की सराहना करता है। कवि उमरदान लालस ने भेष की आड़ में स्वार्थ सिद्ध करने वाले कलियुगी साधुओं की करतूतों का खुलासा करते हुए प्रसाद के नाम पर जूठन खाने वाले लोगों की आंख खोली-

काम करै नहीं काज करै, सीरो चरै सदाई।
सीत प्रसाद नाम धर सोधां, खूबहि ऐंठ खुवाई।।

अंधविश्वास एवं भूतप्रेत की धारणा को निर्मूल सिद्ध करते हुए बावजी चतरसिंह ने लोगों को तार्किक रूप से समझाते हुए कहा कि यदि डाकण जैसी कोई शक्ति होती तो सरकार सैनिकों का खर्चा क्यों करती –

डाकण व्है तो शस्त्र सिपाही, क्यों राखै सरकार।
घर बैठां ही मुलक जीत ल्ये, मूठ मंत्र सूं मार।।

राजशाही का वह समय जब प्रेम केवल सामंतो एवं श्रीमंतों की बपौती समझा जाता था। नारी को भोग की वस्तु मानते हुए उसकी भावनाओं को आहत एवं नजरअंदाज किया जाता था। ऐसे दौर में डिंगल काव्यधारा के युगचेता कवि आसाणंद बारठ ने नारी के निश्छल प्रेम की कोमल भावना का सम्मान करते हुए बाघा और भारमली की जोड़ी का समर्थन करके राजसत्ता की नाराजगी मोल ली। इतिहास साक्षी है कि राव मालदेव को जब अपनी रूपलावण्यवती दासी भारमली पर मुग्ध हुआ देखा तो उसकी रानी भटियानी ऊमादे रूठ कर पीहर चली गई। महारानी को मनाने के लिए मालदेव ने कई प्रयास किए। उसने भारमली को रानी भटियानी एवं उसके बीच अवरोध मानते हुए किसी और के यहां भेजने की सोची मगर मालदेव जैसे शक्तिशाली राजा की दासी को रखने की हिम्मत किसी ने नहीं की। ऐसे में मालदेव ने आसाणंद बारठ से कहकर भारमली को बाघा कोटड़िया को सौंप दिया। बाघा एक सामान्य सामंत था और आसाणंद बारठ का अजीज मित्र था। आसाणंद के कहने से बाघा ने भारमली को स्वीकार कर लिया। लेकिन ऊमादे भटियानी मालदेव के यहां आने को राजी नहीं हुई। मालदेव के लिए ‘दुविधा में दोऊं गए, माया मिली न राम’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई। रानी मनी नहीं और भारमली को खुद भेज दिया। मालदेव ने कवि आसाणंद से कहा कि ‘‘रानी तो नहीं आई सौ नहीं आई, मेरी भारमली तो वापस लाओ।’’ राव की आज्ञा मानकर आसाणंद बारठ बाघा कोटड़िया के पास गया लेकिन वहां जाकर जब बाघा एवं भारमली के परस्पर प्रेम को देखा तो कवि के संवेदनशील मन ने उन्हें अलग करने की बजाय सदा-सदा के लिए साथ रहने का आशीर्वाद देते हुए कहा-

जंह तरवर तंह मोरिया, जंह सरवर तंह हंस।
जंह बाघो तंह भारमली, जंह दारू तंह मंस।।

यह बात कहना आज तो सहज लग सकता है परंतु ‘नारी उपेक्षा’ के उस युग में नारी और वह भी एक दासी की सामान्य सामंत के प्रति चाहत का पक्ष करके राजसत्ता की नाराजगी मोल लेना तत्कालीन समय में प्रगतिशीलता की अमिट पहचान कहा जा सकता है। भारमली द्वारा मालदेव की बजाय बाघा कोटड़िया जैसे सामान्य सामंत के साथ को प्राथमिकता देने वाली इस घटना से एक दूसरा तथ्य भी उभर कर सामने आता है कि नारी उसी के साथ रहना पसंद करती है, जो उसके प्यार का सम्मान करता है, वासना के कीड़े कितने ही बड़े क्यों ना हो, वह उनको पसंद नहीं करती।

मर्यादा एवं आदर्श स्थापना की दृष्टि से सबसे महान ग्रंथ रामचरित मानस के रचयिता द्वारा लक्ष्मण भार्या उर्मिला के त्याग की उपेक्षा पर अनेक कवियों ने प्रश्न उठाए, इस कड़ी में भी डिंगल काव्यधारा अग्रिम पंक्ति में रही। कवि शंकरदान सामौर ने नारी के प्रति सच्चे सम्मान की भावना प्रकट करते हुए ‘साकेत सतक ’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें राज और राम दोनों सहित रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को भी उर्मिला के त्याग की उपेक्षा के कारण आड़े हाथों लिया है। उर्मिला की वेदना को रामचरितमानस जैसे ग्रंथ में नजरअंदाज करने वाले गोस्वामी तुलसी को कवि ने उलाहना देते हुए कहा-

तुलसी धिन धिन तोय, रची सकळ मानस मयण।
महा अचंभो मोय, उरमिल त्याग न ओळ्ख्यो।।

राजाओं के अमर्यादित आचरण एवं वादाखिलाफी को इंगित करते हुए ‘साकेत-शतक’ कार ने लिखा कि आज की जनता सीता के समान सभी परीक्षाओं में खरी उतरने के बावजूद भी धरती में गड़ने को अभिशप्त है। गोस्वामी तुलसी के मानस की सीता ने अपने राम को कभी उलाहना तक नहीं दिया लेकिन डिंगल काव्यधारा के कवि शंकरदान सामौर के ‘साकेत-शतक’ की जनतारूपी सीता ने रामरूपी राजाओं को स्पष्ट कहा कि जो व्यक्ति अपनी एक अदद पत्नी की प्रीति को भी नहीं निभा पाया वह असंख्य जनता की मर्यादाओं को क्या रख पाएगा ? इसकी साख भरते दो दोहे दृष्टव्य है-

अेक प्रीत री आद, नंह निभा सकिया निपट।
जण राखण मरजाद, आप अवतर्या अधपती।।

अवहेलना एवं उपेक्षा जहां होती है, वहां कोई नहीं रहना चाहता। राजसत्ता की कद्र नहीं कर पाने एवं उसे ढंग से नहीं संभाल पाने वाले अकर्मण्य क्षत्रियों को कवि उमरदान लालस ने खराखरी कहा कि ये धरती रूपी वधू आपके यहां बहुत दिनों तक रही लेकिन आपने इसे जब उचित आदर-सम्मान नहीं दिया तो यह आपसे आखिरी सलाम करने को मजबूर है-

रही घणा दिन राज रै, बेआदर बरतीह।
जाती करै जुंवारड़ा, धणियां सूं धरतीह।।

डिंगल कवियों ने इस बात का सदा ध्यान रखा है कि राजा हो या गांव का सामंत, जिसे समाज के अग्रणी या श्रेष्ठ होने के नाते जनता से अतिरिक्त सम्मान मिलता है, तो फिर उस श्रेष्ठ व्यक्ति का आचरण भी श्रेष्ठ ही होना चाहिए। जहां भी मर्यादा के खिलाफ आचरण हुआ, वहीं इन कवियों ने उसे खरी और खारी सुनाने में कोई कसर नहीं रखी। ऐसे हजारों उदाहरण होंगे। बीकानेर राज्य के गांव बेजासर के सामंत ईसरसिंह ने अपनी मां तथा भाभी का अपमान किया। उसने अपने बड़े भाई मालसिंह की पत्नी, जो कि किसी घटना में अंधी हो गई, उसे निर्जन जंगल में ले जाकर बेसहारा छोड़ दिया। इस घटना को सुनकर कवि गोविंददान आसावत, नाथूसर को बड़ी वेदना हुई और कवि ने ईसरसिंह की भर्त्सना करते हुए लिखा-

भ्रात माल री अंध भारज्या, काढी घर सूं कोढी।
ईसरियै बी अभ्यागत नैं, निंदरोही में छोडी ।।
घर की घरणी, मालै परणी, पूनूसर की प्यारी।
रोट्यां काज तजी रोही में, बड़ा अधरमी भारी।।
जाम पूत माता पिछताई, बूड गई सा बाजी।
महत कवी घर टेरा चाटै, ईसरिया री माजी।।

इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण है जब राजाओं एवं सामंतो के अन्याय और अनीति के खिलाफ चारण कवियों ने प्रबल प्रतिरोध के स्वर आलापते हुए धरने दिए, आमरण अनशन पर रहे और अपने हाथों कटारियां खाकर अपनी ईहलीला को खत्म किया और जिंदा रहते अन्याय नहीं सहने के अपने प्रण को अमर किया। न केवल पुरुषों वरन चारण नारियों ने भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए जंवर किये यानी अपनी जीवनलीला समाप्त की। लोक में प्रसिद्ध उक्ति है कि ‘जमहर मेहळियां जळी, समहर में सूराह ’। ये चारण नारियां अपने पति या परिवार पर हुए अत्याचार के खिलाफ अहिंसात्मक आवाज उठाते हुए कई कई दिनों तक आमरण अनशन पर रहीं और अंत में संसार से विदा ले गईं। इन्हें समाज में लोकदेवियों का सम्मान मिला। आज भी ये लोकदेवियां श्रद्धा से पूजी जाती हैं। चंदूबाई माड़वा-जैसलमेर, सरूबाई बारठाणी, डाबर-बाड़मेर, हरियाबाई, हरणी तथा सीलाबाई, झिणकली के जंवर लोकप्रसिद्ध हैं। डिंगल के अनेक छंद एवं गीत इन लोकदेवियों के बलिदान की गाथा गाते हुए लोक को अन्याय के प्रबल प्रतिकार की सीख देते हैं।

सामंतो के अन्याय के खिलाफ अपना प्रतिरोध दिखाने के लिए चारणों ने अपने ‘सासण’ तक वापस किए हैं, ऐसे ऐतिहासिक प्रमाण हैं। इन धरनों, जंवरों, तेलियों एवं त्यागों से संबंधित डिंगल काव्य प्रचुर मात्रा में है, जिनमें तत्कालीन राजसत्ता एवं समय-परिवेश आदि का उल्लेख है। गुड़ा के राजा भाखरसिंह ने झिणकली के चारणों का अपमान किया, इसके प्रतिकार में चारणों द्वारा कटारी खाने की घटना का साक्षी ये दोहा आज भी प्रचलित है-

मारण ग्यो थो माड़, चारण वळतां चूंथिया।
अे वातां औनाड़, भली न कीधी भाखरा।।

इसी तरह नगर के सामंतो की अनीति का विरोध करते हुए धनदान लालस ने कटारी खाई। धनदान के पिता रामचंद्रदान लालस ने अपने दो सासण भेडाणा और आवळिया राजा को वापस कर अपने ईमान को जिदा रखा। इनकी साख भरते अनेक दोहे एवं गीत प्रसिद्ध हैं-

धनियां धाराळीह, पैर गळै विच पोढियो।
कर कांबळ काळीह, राळी सिर रावत तणै।।
लौटाया सासण दोय लाळस, नगर तणै अन्याय।
भेडाणा, आवळिया भेळी, जको कलंक न जाय।।

जब समाज के अग्रणी एवं रक्षक कहे जाने वाले क्षत्रियों ने अपना कर्म बदल कर परमार्थ एवं परोपकारी मार्ग त्याग दिया तथा जनता को लूटना शुरू कर दिया तो इन कवियों ने प्रशंसा वाले स्वर को एकदम पलट कर प्रबल स्वर में उन्हें धिक्कारा है। कवि हिंगलाजदान कविया, सेवापुरा की ये पंक्तियां स्वतः स्पष्ट है-

वणता जो वाहरू, करण धाड़ा कोपीजै।
खाय बाड़ नैं खेत, राड़ कुण हूं रोपीजै।
पैल उदक पत्रियां, बिड़द छत्रियां डोबोया।
कानां सुण कांपता, जकै आंख्यां अब जोया।
धिरकार इसा छत्रधारियां, बुरीगार ऊजड़ बुआ।

डिंगल काव्यधारा का सबसे बड़ा स्वर्णिम पहलू तो यही है कि इस धारा के कवियों ने साधारण लोगों के असाधारण एवं साहसिक कार्यों की सराहने की तथा अपने आपमें बड़े बने लोगों ने जब अपना फर्ज भुलाया तो चेतावनी के चाबुक से उनकी खाल खिंचाई करने का कार्य किया। रावण पर राम की विजय को अन्याय पर न्याय की, सत्ता पर जनता की तथा महलों पर झोंपड़ी की विजय का प्रतीक मानते हुए कोट किलों में अपने आपको सुरक्षित समझने वाले मदांध शासकों को चुनौती देती डिंगल कवि बुधजी आसिया (जो बाळकनाथ नाम से लिखते थे) की निर्भीक वाणी दृष्टव्य है-

लंका रींछ बांदरां लूटी, निजरां रांवण नरखी।
का‘ला मिनख किला पर केई, चढै कैफ री चरखी।
बाळक नाथ कहै छै बाबा, किलां गरब मत कीजो।
जीती लंका हूंत झौंपड़ी, दिस्ट जिकण पर दीजो।।

सामंतों के अन्याय, अधर्म ओर आचारहीनता की खुलकर निंदा करने वाले इस कवि ने तत्कालीन कुलीन वर्ग में व्याप्त व्यभिचार पर तीक्ष्ण प्रहार करते हुए यहां तक कहा कि पूर्वजन्म में हिमालय पर शरीर त्याग करने वाले सभी हिंजड़े इस समय मरुधरा के उच्च कुलों में अवतीर्ण हो गए, तत्कालीन समय में उच्चवर्ग के खिलाफ इतनी तीखी टिप्पणी करने की हिम्मत इस डिंगल कविता ने ही की है, अन्यत्र दुर्लभ है-

नीची तांण बुरै मुख नीलज, संगतां नीची नीच सभाव।
नीचां नांम घालवा नीलज, अवतरिया ऊंचै कुळ आय।।
गथराड़ा हेमाळै गळिया, छोड़े अन पाणी कर चाय।
मुरधर मांय ठिकाणै मोटै, अवतरिया ए वे सब आय।।

महाराणा प्रताप, राव चंद्रसेन एवं राव सुरताण को आजादी की आन पर अडिग रहने हेतु उत्प्रेरित करने वाले कवि दुरसा आढा ने अपने युग के दलित वर्ग की दशा और दुर्भिक्ष जैसे विषयों का सविस्तार वर्णन किया है। दुरसा ने धर्म की ओट में होने वाले कर्मकांड एवं पाखंडों का भी खुलासा करने में कमी नहीं रखी। अपनी कृति ‘किरतार बावनी ’ में उस समय के किसान, कहार, लोहार, पहरेदार, पत्रवाचक, महावत, मछेरा, सुरंग खोदने वाले, श्रमिक, चाकर, भिखारी, जागरी इत्यादि विविध व्यवसायों में दीन-हीन लोगों की दारुण दशा का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। भार लेकर चलने वाले श्रमिक की परिश्रमशीलता एवं कार्य की दुष्करता का चित्रण करती ये काव्य पंक्तियां देखें-

भारी नर ले भार, धरा चलतां पिंड धूजै।
सीस तणो परसेव, पगां नख सूधो पूगै।।

कड़कड़ाती सर्दी में जब सब लोग अपने शरीर का यत्न करते हैं। भवन के अंदर होते हुए भी गर्म कोने में जाकर बैठते हैं। गर्म पकवान खाते हैं। उस कंपकंपाती सर्दी में ये श्रमजीवी लोग खुले आसमान तले खेतों में पानी देने का काम करने को मजबूर हैं, कवि दुरसा आढा की मार्मिक पंक्तियां दृष्टव्य है-

सीत रो जोर जळ सेवतां, घड़ धूजै कंपवा धरै।
किरतार पेट दुभरि किया, काम एह मानव करै।।

अंग्रेजों की अनीतियों की बदोलत जब बेगार और जरब की मार से गरीब जनता की कमर टूट चूकी थी, सब्र का बांध फूट चुका था। प्रजा की आंखों में प्रलयंकारी शंकर दृष्टि तथा सांसों में ज्यालामुखी का धुआं दृश्यमान होने लगा था। उस समय जनजागृति एवं उसके परिणाम का यथातथ्य चित्रण कर आमजन की ताकत का खुलासा करती क्रांतिकारी केसरीसिंह बारठ की ये पंक्तियां प्रगतिशीलता की वाहक बनी हैं –

साद प्रजा रौ सींवियौ, फिट कानूनां फांस।
ज्वाळामुख ज्यूं जाणजे, सो धुंधवायौ सांस।।
परजा ही पलटावियो, अणचींत्या बिन फौज।
काल जिके धर गंजता, आज मिळै नह खोज।।

नेताओं की वादा खिलाफी तथा दलबदलू प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य करती देवकरण बारठ इंदोकली की ये पंक्तियां कितनी सटीक है-

तिकै पद पाय जनता तणौ, छाती में झौंकै छुरो।
बांदीह हुती (नैं) लड़ग्यो बिछु, ब्याव हमैं कै कुण बुरो।।
खिलाफी हूंत मिळ जाय खळ, धूड़ उडावै कर धड़ा।
वाह जी वाह थांरा विधन, (थांनै) नेता कहूं क नागड़ा।।

आजाद भारत में न केवल नेता वरन सभी लोग स्वार्थ की सड़क पर चल पड़े हैं, ऐसे में देश की दुदर्शा पर विचार करने के लिए युवाकवि गिरधरदान रतनू दासोड़ी की ये पंक्तियां उल्लेखनीय है-

भ्रष्टाचार आचार गाँधी तणी भोम पे, कोम सै कीच में कळी काठी।
हुवै कुण निकाळण बहै जो हरावळ, पढ्या सै अेकठा अेक पाटी।।
बैख बोपारियां तणी बदनीत आ, खोट कर माल में तोल खोटा।
लूट किरसाण नैं पनपिया लालची, अनीति तणां इम लेय ओटा।।

पद-प्रतिष्ठा एवं गौरव की दृष्टि से अपेक्षित कार्यवहार नहीं कर स्वार्थी, संकीर्ण एवं विरुद के विपरीत काम करने वाले सामाजिकों पर इन डिंगल कवियों ने अन्योक्तियों के माध्यम से करारा प्रहार किया है। डाॅ. शक्तिदान कविया की पंक्तियां दृष्टव्य है-

आश्रय दे अन्याय नैं, कदै न न्याय कराय।
किण विद सुध वादो करै (जो) धरमादो खाय।।
राजनीति सगळै रमी, जनतंतर रै जोर।
लोकसभा वाळा लखण, लखै गांव मे लोग।।

डिंगल काव्यधारा के कवियों ने मानवीय दृष्टि को अपनाते हुए समाज में व्याप्त छुआछूत एवं ऊंच-नीच की भावना का तार्किक प्रतिकार किया। धर्म की आड़ में अधर्म एवं नीति की आड़ में अनीति करने वाले तथाकथित बड़े समझे जाने वाले इन नीति नियंताओं पर इन कवियों ने करारे प्रहार किए। “ऊंचनीच का भेदभाव मनुष्यकृत है, जो कि ईश्वर को बिल्कुल पसंद नहीं है।” ऐसा खुलासा करती कवि बुधजी आसिया के ‘भगतमाळ ’ की ये पंक्तियां, जिनमें कवि ने तथाकथित रूप से छोटी समझी जाने वाली जातियों यथा बागरी, मीणा, मेघवाल, ढोली, भील, कसाई इत्यादि जातियों में पैदा हुए भक्तों के बिना किसी भेदभाव के भव तरने की बात कही है-

वळै फेर वागरी, तुरत लाधियो तारै।
मैणो घट मतार, मेघ रेवो ऊधारै।
नामौ ढोली तार, भील कर गोहो भाई।
सजन सरीसो सोध, कियो भव पार कसाई।
भजन रै जोर तरिया भगत, ऊंच नीच नंह आंतरो।
रांम रो भजन करलै रिदै, पलक बुधा मत पांतरो।।

अपनी ‘दारू दूषण ‘ कृति में डाॅ. शक्तिदान कविया ने तो छोटे और मोटे के इस अव्यवहारिक विभेद पर व्यंग्य करते हुए लिखा है कि इस धरती में हमने जिन्हें छोटा माना उन्होंने तो बाबा रामदेव की आध्यात्मिक बाणियों से लोगों को जीवन का मर्म समझाया वहीं बड़े माने जाने वाले लोगों ने तो मद्यपान किया है और बेचारे निर्दोष बकरों की कुर्बानियां दी है-

छित पर छोटोड़ांह, बाबै री की बाणियां।
मद पी मोटोड़ांह, की बकरा कुरबानियां।।

आज चारों तरफ फैशन का दौर है। सब लोग देखादेखी बड़ों की हौड़ करके अपनी हालत बिगाड़ने में लगे हैं। यह स्थिति कमोबेश हर काल में रही है। सब जानते हैं कि व्यक्ति को अपनी हैसियत के अनुसार काम करने चाहिए। अपने बराबर वालों से ही मैत्री, वैवाहित संबंध एवं लेन-देन करना सुखकर रहता है लेकिन ऐसा करते नहीं हैं। डिंगल कवि छता आसिया ने बड़े लोगों की दोस्ती से छोटे लोगों के लिए होने वाले परेशानियों का युक्तियुक्त ब्योरा देते हुए उन्हें बड़ों से दूर रहने की सलाह दी-

के व्याहां तंग हुवै के करजौ, केतां औसर तंग करै।
फैसन तंग हुवै केई फोकट, हाथां घर री आथ हरै।।
गिरवै मेल खेतड़ा गहणा, लहणा करै न लाजै।
वहणां मग ऊंधै वौरां सूं, बोफा ऊभा बाजै।।

यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि किसी भी रूढी का सहजता से प्रतिकार सक्षम लोग ही कर सकते हैं, गरीब या कमजोर लोगों को तो आर-पार की लड़ाई ही लड़नी पड़ती है। कवि छता आसिया ने इस तथ्य को समझते हुए समाज के संपन्न लोगों से अरदास की कि वे कम खर्च करने की पहल करें ताकि उनकी देखादेखी कर्ज में डूब रहे गरीब लोग बच सके –

इण सूं वड़ा लोग सुण अरजी, कमती खरच करीजे।
देखा देख गरीब न डूबै, कैणो म्हारो कीजे।।

डिंगल कवि चंडीदान सांदू हीलोड़ी की मान्यता है कि आत्म सम्मान चाहते हो तो संबंध और मैत्री अपने बराबर वालों से ही रखें। वे तथाकथित बड़े आदमी किसी काम के नहीं, जो खुश होकर तो बेगार में रगड़ें और नाराज होने पर नुकसान कर दें। कवि की यह तार्किक अभिव्यक्ति आज भी कितनी प्रासंगिक है-

आयां घर करै एक पग ऊभा, खातर खलल पड़्या व्है खीज।
संकौ करां नटां न सरम सूं, चित्त चढ़ै वा ले लै चीज।।
कठै हि मिळै (तौ) पिछांणै कोनीं, सदन गयां नह बूझै सार।
करां सलांम दखै करडापण, कांम पड़्यां कछु करै न कार।।
राजी हुवां कांम में रगड़ै, नाराजियां करै नुकसाण।
छोटकियां मोटोड़ां छोड़ौ, मिळौ सारीखां चाहौ मांण।
आं सूं मेळ कियां दुख उपजै, रंच न लाभै सुख रौ रेस।
मुणै ‘चंड’ मोटा मिनखां सूं, अळगां सूं करणा आदेस।।

बावजी चतरसिंह ने ज्ञानार्थ प्रवेश एवं सेवार्थ प्रस्थान वाली शिक्षा व्यवस्था में धंसती स्वार्थभावना एवं दूर होती परोपकार वृत्ति की ओर संकेत करते हुए जनता को चेताया-

डिग्री साथै धस्या जेब में, दावा केक दवाई।
परमारथ रो पाठ भूलने, कीधी याद ठगाई।।

आजाद भारत में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में सुधार एवं परिमार्जन हेतु शिक्षाकर्मी, लोकजुम्बिश, डीपीईपी एवं सर्वशिक्षा अभियान जैसे कई प्रयोग किए गए। लेकिन इन प्रायोजनाओं से शिक्षा में कोई सुधार नहीं हुआ, अलबत्ता कुछ लोगों के यहां धनलक्ष्मी का प्रवेश जुरूर हुआ, इस तथ्य को उजागर करती डाॅ. शक्तिदान कविया कि ये पंक्तियां कितनी खरी है-

दीठा आखर देवरा, लोकजुम्बिशां लख्ख।
सुरसत तो नंह संचरी, पण लिछमी परतख्ख।।

समाज में फैली कुरीतियों एवं विकृतियों के लिए अशिक्षा को जिम्मेदार मानते हुए सबको पढ़ने-पढ़ने का आह्वान करती कवि भंवरदान बीठू माड़वा की ये पंक्तियां कितनी प्रेरक हैं, जिनमें कवि ने अशिक्षा के दुष्परिणामों को गिनवाया है-

पढाई अभाव कोई औसर मौसर करे, पढाई अभाव कर्जदार कहलावै है।
पढाई अभाव भूत प्रेतन को भय मानै, पढाई अभाव मूढ पाखंड मचावै है।
पढाई अभाव कम उमर में ब्याव करै, पढाई अभाव भूल पाछे पछतावै है।
पढाई अभाव मानै आपस में छुआछूत, पढाई अभाव ओछी अकल उपावै है।।

इन कवियों ने न केवल राजसत्ता वरन समाज के हर कोने की घटना पर अपनी दृष्टि डालते हुए अपना फर्ज निभाया। व्यापारियों द्वारा माप-तोल में किए जाने वाले खोट-कपट एवं येन केन प्रकारेण मुनाफे की नीयत से किए जाने वाले कार्य-व्यवहार का भंडाफोड़ भी इन कवियों ने किया। कवि बांकीदास आसिया ने ‘वैस-वार्ता ‘ में वणिक समुदाय द्वारा ग्रामीण जनता को ठगने के विविध हथकंडों का भंडाफोड़ किया –

दरसावै जग नूं दया, पाप लियां सिर पोट।
हित में चित में हाथ में, (आंरै) खत में मत में खोट।।
धूत बजारी धरम री, हियै न मानै हील।
मन चलाय खांफण महीं, काढै नफो कुचील।।
मैण लगावै पालड़ां, तोलां मांहि कसूर।
डर तज राखै डांडियां, पारद हूंता पूर।।

समय के साथ बहुत से बदलाव स्वाभाविक रूप से होते हैं ओर उनकी क्रियान्विति भी सहज ही हो जाती है लेकिन कुछ धारणाएं रूढ़ बन जाती है, कुछ संबोधन-अभिवादन रूढीवश चलते रहते हैं। इसी तरह का एक अभिवादन ‘खमाघणी ’ है, जो कभी ओचित्यपूर्ण रहा होगा लेकिन आज इसका कोई औचित्य नहीं। कवि देवकरण बारठ इंदोकली ने ‘खमाघणी ’ अभिवादन का सामयिक अनौचित्य सिद्ध करते हुए इसे त्यागने का आह्वान किया-

साजौ बैठा सौख, दाजौ नंह देखे दसा।
घणी खमां री घोख, अब थोथी घर-घर उडै।।
गीत जलो गातांह, कांणी मृगनैणी कहै।
उण रूढी आतांह, (थांनै) खमा-खमा आखै खलक।।

नेता, पुलिस तथा प्रशासन आदि से जनता का सीधा संबंध रहता है, उसी तरह से अन्याय से लड़ने के लिए पीड़ित पक्ष को न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है। वहां पैरवी करने वाले वकीलों को जब ‘पैसों के बदले पासा पलटते’ देखा गया तो कवि की कलम को सच बयान करना पड़ा। मुकदमों के मर्ज एवं किसानों के कर्ज का प्रमुख कारण ‘आजकल के वकीलों की धनलोलुपता’ को मानते हुए कवि देवकरण बारठ इंदोकली ने जनता को इनके शिकंजे से बचे रहने का दिशानिर्देश दिया-

लेखक ठीक लोभ रा लाला, वाला महा बिगाड़ण वीर।
दुख जातां झाला देवणियां, आला दरजा तणा उमीर।।
कोसण रकम सजीला कमरा, भड़कीला चमकीला भेस।
नैड़ा कर यांरै मत निकळौ, ‘देवा’ रा मानौ उपदेस।।

महात्मा गाँधी की अहिंसा वाली आंधी में झौंपड़ियों ने जब अपना मस्तक ऊंचा किया तो कई गढ़-किले कांपने लगे। जाति, धर्म की दीवारें उलांध कर सभी लोग गांधी के काफिले में आ मिले ओर राजवियों ने सिंहासन छोड़कर जाट और हरिजनों के साथ गांधी की जाजम पर बैठना स्वीकार किया। इन भावों को ‘गुणसबदी ‘ में व्यक्त करती कवि भंवरदान बारठ, झिणकली की पंक्तियां देखें-

मोहन मंत्र फूंकियो मोहन, वाजिया संख विसेक।
पंडित मुल्ला पादरी पूरा, हंमचै हूवा हेक।।
गाँधीड़ो कामणगारो रे….
झौंपड़ियां मदसार झमंती, कांपिया किल्ला कोट।
तूटण लागी भुरजां तीखी, वाजिया गोळा बोट।।
गाँधीड़ो कामणगारो रे….
साह निबाब भूपाळ राजेसर, छाक सिंहासण छोड़।
बाबाजी रै पाखती बैठा, जाट हरीजन जोड़।
गाँधीड़ो कामणगारो रे, मोभीड़ो हिंद माता रो रे।।

आजादी की अलख जगाती आमजन की आंधी के सामने सारे कोट किलों के ढहने की उत्साही आवाज देती जनकवि रेंवतदान चारण मथानिया की ये पंक्तियां उल्लेखनीय है-

अंधार घोर आंधी प्रचंड, (आ) धुंआधोर धंव धंव करती।
आवै है उस में आग लियां, गढ, कोटां, बंगलां नैं ढहती।।

इसी कड़ी में देश को तंद्रा छोड़कर सजग होने एवं नवीन सपने संजोते हुए आगे बढ़ने का आह्वान करती मनुज देपावत की ये पंक्तियां कितनी उत्साहवर्धक हैं-

उठ खोल उणींदी आंखड़ल्यां, नैणां री मीठी नींद छोड़।
रे रात नहीं अब दिन उगियो, सपनां रो झूठो मोह छोड़।
थारी आंख्यां में राच रैया, जंजाळ सुहाणी रातां रा।
थूं कोट बणावै उण जुग रा, जूनोड़ी बोदी बातां रा।
पण बीत गयो सो गयो बीत, अब उणरी झूठी आस त्याग रे।
छाती पर पैणां पड़्या नाग रे, धोरां वाळा देस जाग रे।

निष्कर्षतः राजस्थान की डिंगल काव्यधारा प्रगतिशीलता की सशक्त एवं प्रबल संवाहिता है। यह सही है कि इस काव्यधारा का मूल स्वर वीररसात्मक रहा है बावजूद इसके इस काव्यधारा ने परिवेश के अनुकूल स्वरभंगिमा बदलते हुए कभी अकाल की विभीषिका से आहत होकर दर्द की अतल गहराइयों को छूने वाले स्वर आलापे हैंै तो कभी आम आदमी के संघर्ष एवं जूझ को देखकर उसकी जीवटता एवं स्वाभिमान की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए आगे बढ़ी है। मातृभूमि की रक्षार्थ मरने मारने को तैयार वीरों की प्रशस्ति की है तो कत्र्तव्य से विमुख होकर भागने वाले कायरों की भत्र्सना करने में भी इस काव्यधारा का कोई सानी नहीं है। प्रसंगवश रूप-सौंदर्य के भव्य चित्र उकेरने के साथ दायित्वबोध के आस्थावान स्वरों को साधने में भी यह कभी पीछे नहीं रही है। इसके साहित्य को संकलित कर सिलसिलेवार अनुशीलन की दरकार है। वस्तुतः डिंगल काव्यधारा के प्रति भ्रांत धारणाओं का निवारण इसके विषद अध्ययन से ही संभव है। विषद अध्ययन के अभाव में इस विशिष्ट काव्यधारा को कुछ संकीर्ण खांचों में कैद करना अपने आपको धोखा देने जैसा है। इसे राजदरबारी, प्रशस्तिपरक, इतिवृत्तात्मक, एकरस, जनसामान्य से विलग इत्यादि कहने वाले आलोचक यदि इसके विविध विषयी एवं विविध आयामी काव्य का सिलसिलेवार अध्ययन करेंगे तो उन्हें स्वयं अपना मत बदलना होगा। यह सत्य है कि यह काव्य समझने में थोड़ा कठिन अवश्य है लेकिन राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान को समझने के लिए इसे समझना बहुत जरूरी है। ……….

~~डाॅ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

संदर्भ ग्रंथ सूची:
01. राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव: डाॅ. शक्तिदान कविया
प्रकाशक: महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश, जोधपुर, संस्करण- 2004
02. डाॅ. गुमानसिंह बीठू: व्यक्तित्व एवं कृतित्व, संपादक: डाॅ. कुलदीपसिंह बीठू
प्रकाशक: गिरिजा प्रकाशन, बीकानेर,संस्करण 2014
03. राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन: डाॅ. शक्तिदान कविया
प्रकाशक: थळवट प्रकाशन, बिराई-जोधपुर, संस्करण: 1984
04. रयत रा रुखाल़ा: कवि भंवरदान माड़वा (मधुकर)
प्रकाशक: श्री आई करणी साहित्य संस्थान, जैसलमेर, संस्करण: 2012
05. भारतीय साहित्य रा निरमाता-शंकरदान सामौर: भंवरसिंह सामौर
प्रकाशक: साहित्य अकादमी, नईदिल्ली, संस्करण: 1995.
06. स्वातंत्र्य राजसूय यज्ञ में बारहठ परिवार की महान आहूति: ओंकार सिंह लखावत
प्रकाशक: तीर्थ पैलेस प्रकाशन, सोडाल-जयपुर, संस्करण: 2012
07. भारतीय साहित्य रा निरमाता-बावजी चतुरसिंहजी: कन्हैयालाल राजपुरोहित
प्रकाशक: साहित्य अकादमी, नईदिल्ली, संस्करण: 1996.
08. सपूतां री धरती: डाॅ. शक्तिदान कविया
प्रकाशक: राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर – संस्करण: 2003
09. चेत मांनखा: रेवतदान, संपादक: कोमल कोठारी
प्रकाशक: राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर-संस्करण:1996.
10. छंदां री छोळ: गिरधरदान रतनू ‘दासोड़ी’
प्रकाशक: राजस्थानी साहित्य एवं संस्कृति जनहित प्रन्यास, बीकानेर, संस्करण: 2006
11. दारू-दूषण: डाॅ. शक्तिदान कविया
प्रकाशक: आचार्य तुलसी राजस्थानी शोध संस्थान, गंगाशहर-बीकानेर, संस्करण: 2006.
12. चारण साहित्य का इतिहास (भाग प्रथम एवं द्वितीय): डाॅ. मोहनलाल जिज्ञासु
प्रकाशक: जैन ब्रदर्स, जोधपुर, संस्करण: 1977
13. चारणौं री बातां: ठा. नाहरसिंह जसोल
प्रकाशक: राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, संस्करण: 2012

One comment

  • ‌राजेन्द्र सिंह नरावत

    चारण जाति और चारण साहित्य का वास्तविक स्वरूप आप के प्रकाश में लाया गया है।समाज आपका ऋणी रहेगा व साहित्य साधना करने वाले देव पुरूषों का आशीर्वाद प्राप्त होगा। भगवती की कृपा आप पर बनी रहे।

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