दोय उदैपुर ऊजल़ा!!

जणणी जणै तो दोय जण, चंगो जौबन खोय।
कै जण वैर विहंडणो, कै कुल़ मंडण होय।।

राजस्थानी कवि कितरी सतोली बात कैयी है कै, हे! जणणी तूं जणै तो दो ई भांत रा पूत जणजै!! एक तो वंश रो वैर लेवणियो अर दूजो कुल़ नै गौरान्वित करणियो। ऐड़ै कुल़ मंडणिया री ओल़ में कवि रसिक बिहारी च्यार जणां नै मानिया है-

रसिक बिहारी चार जात लो जहान जाने,
विद्या हरि गान ते, कृपान ते, सुदान ते।।

तो कवि शंकर बारठ इण च्यारां में दान देवणियै नै सिरै मानियो है-

तन वीजूजल़ पल़ समल़, सिव कमल़ हंस हूर।
एता दीन्हां बायरो, मोख न पावै सूर।।

ऐड़ै ई एक दातार टोडरमल शेखावत रो किस्सो आज ई चावो है।

उण दिनां उदयपुर माथै महाराणा जगतसिंह राज करै। उदार अर मोटै मन रा राजा। जिणां रै विषय में ओ दूहो घणो चावो है-

पारेवा मोती चुगै,
जगपत रै दरबार!!

एक दिन उणां रो दरबार उमरावां अर कवियां सूं थटाथट भरियो। बात चाली कै ‘आज री बखत महाराणा जगतसिंह री बराबरी रो कोई दातार नीं!! जितै किणी कैयो कै एक है!! उदयपुर छोटा(शेखावाटी) रा धणी टोडरमल!!’

किणी कैयो कै ‘कठै बापड़ो उदयपुरियो अर कठै उदयपुर!! तुलै सोनो अर मींडीजै ईंटां!!’

महाराणा रै आ बात खुबगी। उणां उठै बैठा सिंढायच हरिदास बाणावत (मोगड़ा) नै कैयो कै-“हरिदासजी ! आप जोगता मिनख अर मोटा कवि हो सो आप जावो अर पारखा करो कै कांई इतरी कम जागीर अर कम कमाई रो धणी म्हारै जोड़ै है कै लोग पड़ी नै पलारै!!”

आदेश पाय हरिदासजी उदयपुर छोटै टुरिया।

आगली बात लिखूं, उणसूं पैला थोड़ी ओल़खाण हरिदास सिंढायच री दैणी ठीक रैसी।

पंवार वंशीय राजा सम रो बेटो कविदास किणी कारणां सूं चारण बणग्यो। इण कविदास री पांचवी पीढी में भाचलियोजी होया अर भाचलियैजी रै एक बेटो रो नाम संडायच/संढायच हो। सिंढायच री वंश परंपरा में नरसिंह भांचलिया साहसी, वीर अर वाकपटु चारण हा। उण दिनां मंडोवर माथै नाहड़राव पड़िहार राज करै। बात चालै कै कपिल मुनी रै श्राप सूं एकर पुस्कर तल़ाब सफा सूखग्यो। पाछो भरीजै ई नीं जणै किणी कैयो कै कोई ऐड़ो आदमी जको सिंह मारण रो पुन्न आपनै इण तल़ाब माथै संकल़पै तो ओ तल़ाब भरीज सकै। राजा पतो करायो तो ठाह लागो कै गिरनार रै पासै रो चारण नरसिंह भांचल़ियो ऐड़ो प्रतापी पुरूष है। कैल़ाशदानजी ऊजल़ लिखै-

साप कपिल मुनी सूखियो, पुस्कर राज प्रसिद्ध।
पाणी पाछो प्रागल़ै, समप्यां पुनि सिंघ वध्ध।।

नाहड़राव आदमी मेल नरसिंह नै तेड़ायो। नरसिंह आयो अर जनहित में गौमार सिंह मारण रो पुन्न राजा रै नाम संकल़पियो। विख्यात विद्वान कैल़ाशदानजी ऊजल रै आखरां में-

ताकव तुरत तेड़ावियो, सह नाहड़ सन्मान।
सिंहढायच आयो सुभट, दियण तीर्थ हित दान।।

नरसिंह री ओजस्वी वाणी अर तेजस्वी उणियारै सूं नाहड़राव राजी होयो अर इणनै आपरो पोल़पात बणाय 12 गांमां सूं मोगड़ो दियो-

भांचल़ियो नरसिंघ भण, पुस्कर कियो पड़ाव।
विरद सिंढायच भाखियो, राजा नाहड़राव।।

नरसिंह री संतति आपरै दादै सिंढायच लारै कालांतर में सिंढायच बाजी।

इणी ऊजल़ै वंश में आगै जायर बाणजी होया अर बाणजी रा बेटा हरिदास सिंढायच होया।

हरिदास सिंढायच रै एक दूहै माथै महाराज पदमसिंह बीकानेर नौ लाख री हुंडी भरी-

रघुपत काय न रखियौ, ऐक पदम आराण।
पाण अठारै पदम रै, कर तौ वल़ केवाण।।

बात चालै कै जद हरिदास इतरो धन लेय घरै गया तो उणां री जोड़ायत इचरज में पडती पूछियो कै “कांई कोई चिंतामणी हाथ आयगी कै कोई पारस मिलग्यो कै राम मिलग्यो कै जदुपत किसन भेटियो कै लंका लूटली आद आद रै साथै उणां कैयो कै ऐ सगल़ी नै होई तो सेवट म्हनै लागै कै महाराज पदमसिंह रीझग्या!! इण भावां नै किणी कवि आपरै शब्दां में पिरोवतां लिखियो-

चितामण कर चढे, किना पारस्स परस्सै।
मिल़िया रघुपत राय, किना जदुपत दरस्सै,
लूटी लंक कनंक, किना लखमीवर तूठा।
भोल़ैनाथ भंडार, दिया लूटाय अलुटा।
तूठा कुमेर वूठा वरुण, अणखूटा धन आविया।
(कन) राजा पदम रीझाविया।।

सिंढायच हरिदास आपरी बखत रा मोटमना अर दातार मिनख हा। उणां दातारगी री घणी छौल़ां दी। किणी मोतीसर कवि लिखियो कै-जस दातारगी री दवा रै अभाव में ऐड़ो बीमार पड़ियो कै ऊभो ई नीं होय सकियो सेवट उणनै हरिदास धनंतर रो रूप धार दातारगी री ओखद सूं निरोग कियो-

मांदो जस महलोय, पड़ियो दत ओखद पखै।
हरि धनंतर होय, बैठो कीधो बाणउत।।

जैड़ो कै आपां जाणां कै हरिदास सिंढायच मोटा दातार हा अर दातारां रो नाम दुनी सदैव याद राखै। आज ई जद-जद ई जाजमां जमै अर रैयाण होवै उण बखत सिंढायच हरिदास रो सुजस अवस पढीजै। मोतीसर मोर आपरै एक दो अर्थां वाल़ै दूहै में कैवै कै म्हैं मोर (मोरियो) बारै (दूर/बाहर) महिणा फालतु ई सोर (कविता) कियो अर कल़ाव कर कर र रीझाया जदकै मेह री छौल़ां देवणियो ओ हरियंद तो अबै मिल़ियो है जको दाल़द नै दफै करणियो है-

मोर कहै हरियंद मिल्यो, रोर विहंडण राव।
म्है बारै घण जच्चिया, कर कर सोर कल़ाव।।

हरिदास नै महाराजा गजसिंह जोधपुर ई लाख पसाव देय सम्मानित किया। सूरजप्रकाश में कविराजा करनीदानजी लिखै-

दसम लाख कल्याण, रांण मेहडु जाडावत।
सँडायच हरिदास, एक लख करी बाणावत।।

सो हरिदास नै जगतसिंह, टोडरमल रै ठिकाणै मोही जको उदयपुर बाजतो, (आज उदयपुरवाटी है) मेलिया।

कवि पालकी में बैठ मोही री दिशा हालिया। दर कूंचां दर मंजलां मोही री कांकड़ सूं च्यार-पांच कोस आगी कवि री पालकी रैयी जद कवियां अर गुणां रा ग्राहक टोडरमल भोई (कहार) रै रूप आय पालकी रै कांधो देय मोही कानी कहारां रै भेल़ा बुवा।
ज्यूं-ज्यूं मोही नैड़ी आवण लागी ज्यूं-ज्यूं कवि नै रीस आवण लागी। क्यूंकै मोटै मिनखां री मिलणी अर काण-कायदा ई मोटा! पछै हरिदास ई मोटा कवेसर अर टोडरमल ई मोटा दातार। टोडरमल री बेरुखी कवि सूं सहन नीं होई क्यूंकै मोही रो गौरवो आयग्यो अर टोडरमल अगवाणी में नीं आया जणै कैड़ा कद्रदान!! अर कैड़ा दातार?

ऐड़ै घमंडी आदमी रो नाम इयां पोलपट्टी में कीकर चावो होयो ? आ बात कवि विचारणै लागा अर सोचतां सोचतां ई आपरै साथ नै कैयो कै-
“सुणो रे! टोडरमल कोई कवि अर कविता री कद्र करणिया नीं है, आ किणी रै गोडै माथै घड़ियोड़ी लागै कै टोडरमल गुणग्राही है!!”

आ सुणर पालकी में भोई रै रूप बैतां टोडरमल कैयो कै-
“माफी हुकम! माफी !! म्है ठैरियो गांमड़ै रो धणी सो राजवियां री रीतां नीं जाणां अर नीं आ जाणां कै कवि रो सम्मान कीकर करियो जावै ? म्हनै तो फखत आ ई सबर आई कै म्है म्हारो कांधो, म्हारी कांकड़ सूं च्यार-पांच कोस आगूंच आपरी पालकी रै देय आपनै म्हारै झूंपड़ै तक ले जाऊं!! आप मोटमना हो सो आप म्हारो गुन्हो बगसो!!”

आ सुणतां ई कवि कैयो-वाह रे टोडरमल वाह!! बडा सिरदार जुलम किया, म्हारो हियो फूटो सो हूं थांनै ओल़ख नीं सकियो पण थांरो सुजस जैड़ो सुणियो उणसूं सवायो देखियो!! आ कैय कवि एक दूहो कैयो-

दोय उदैपुर ऊजल़ा, दोय दातार अटल्ल।
इक तो राणो जगतसी, दूजो टोडरमल्ल।।

टोडरमल री इण कवि सम्मान रै ऊजल़ै प्रेम री साख भरतां किणी बीजै कवि लिखियो है-

जोवो चारण जात नै, मोही टोडरमल्ल।
पातां वाल़ी पालकी, भोई बणियो भल्ल।।

जद तक संवेदनशील लोग जीवता रैवैला तदतक ऐ दूहा अर दूहा नायक अमर रैसी!!

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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