दुव सेन उदग्गन – वंश भास्कर

प्रायो ब्रजदेशीय प्राकृत मिश्रित भाषा
।।दोहा।।
सक हय बसु सत्रह समय, माधव दरस मिलाप।
घटिय रुद्र रबि के चढत, उलटि समुद्रन आप।।१।।
विक्रम संवत् के वर्ष सत्रह सौ सतासी के वैशाख माह की अमावस्या के दिन जब सूर्य ग्यारह घड़ी चढ़ चुका था उस समय दोनों सेनाओं (बुधसिंह और सालमसिंह) रूपी समुद्रों का पानी उलट पड़ा अर्थात् उमड़ा।

।।छंद दुर्मिला।।
दुव सेन उदग्गन खग्ग समग्गन अग्ग तुरग्गन बग्ग लई।
मचि रंग उतंगन दंग मतंगन सज्जि रनंगन जंग जई।।१।।
लगि कंप लजाकन भीरु भजाकन बाक कजाकन हाक बढी।
जिम मेह ससंबर यों लगि अंबर चंड अडंबर खेहू चढी।।२।।
फहरक्कि निसान दिसान बड़े बहरक्कि निसान उडैं बिथरैं।
रसना अहिनायक की निकसैं कि परा झल होरिय की प्रसरैं।
गज घंट ठनंकिय भेरि भनंकिय रंग रनंकिय कोच करी।
पखरान झनंकिय बान सनंकिय चाप तनंकिय ताप परी।।३।।
दोनों उदग्र सेनाओं की अग्रिम पंक्ति के वीरों ने अपने-अपने घोड़ों की लगामें खींच कर उन्हें बढ़ाते हुए अपनी-अपनी नंगी तलवारें हाथों में उठाई। इस युद्ध भूमि में युद्ध जीतने वाले सज्जित ऊँचे-ऊँचे हाथियों का युद्ध मचा अर्थात् आरंभ हुआ। जब पराक्रमी वीरों की युद्ध हाक ऊंचें स्वरों में उच्चारित हुई तो उसे सुन कर रणभूमि में लज्जित होने वाले और भाग खड़े होने वाले कायर कांप उठे। रणभूमि में अचानक हाथी घोड़ों के संचरण से उड़ी धूल से आकाश आच्छादित हो उठा जैसे कि आकाश में पानीदार मेघ उमड़ आए हों। दोनों सेनाओं के अपने ध्वज और पताकाएं सभी दिशाओं में फहराने लगीं और वे इस तरह फहराई जैसे कि शेषनाग की जिव्हाएं मुंह से बाहर आई हों अथवा हवा लगने पर जलती हुई पसरने वाली होली की ज्वालाएं हों। रणभूमि हाथियों के गले में बंधे गजघंटों के नाद नोबत के बजने की ताल और वीर योद्धाओं की कवचों की कड़ियों के बजने से उठने वाली ध्वनि से भर गई। घोड़ों के पाखरों (कवचों) की झनकार चलते बाणों की सनसनाहट और धनुष की प्रत्यंचाओं के उद्घोष से रणभूमि भयभीत करने वाली कोलाहलमय हो उठी।

धमचक्क रचक्कन लग्गि लचक्कन कोल मचक्कन तोल कढ्यो।
पखरालन भार खुभी खुरतालन व्याल कपालन साल बढ्यो।
डगमग्गि सिलोच्चय शृंग डुले झगमग्गि कुपानन अग्गि झरी।
बजि खल्ल तबल्लन हल्ल उझल्लन भुम्मि हमल्लन घुम्मि भरी।।४।।
मचि घोरन दोर दु ओर समीरन जोर उमीरन घोर जम्यों।
अभमल्ल उछाहन हड्ड हठी कछवाहन गाहन चाह क्रम्यों।
सुव जैत इतैं भट देव सही करि स्वामि मही हित संग सज्यो।
दुहुओर कुलाहक तोप दगी लगि भद्द बलाहक नद्द लज्यो।।५।।
दोनों सेनाओं की आपसी भिड़ंत की धमाचौकड़ी से भूमि लचकने लगी और पृथ्वी को धारण करने वाले वराह के झुक पड़ने की स्थिति आ बनी। पाखर पहने हुए घोड़ों के समूहों की भूमि में खुभी हुई खुरतालों से शेषनाग के कपाल में चुभन बढ़ी। पर्वतों के हिलने से उनके शिखर डोलने लगे और तलवार की धारों से अग्नि की चिनगारियां झरने लगीं। खालों से बनी ढालें दुधारी तलवारों के प्रहारों से बज उठीं और ललकार कर किये गए दोनों ओर के धावों से जैसे पृथ्वी घूम गई हो अर्थात् इस पक्ष के वीर उस पक्ष के क्षेत्र में और उधर के इधर आ पहुँचे। दोनों ओर के घोड़ों की दौड़ से दोनों ओर का पवन बहा और दोनों ओर के सामन्तों का घमासान और अधिक तीव्रतर होता गया। ऐसे समय में हठी हाड़ा अभयसिंह अपने शत्रु कछवाहों को तहश-नहश करने को बढ़ा। वहीं जैतसिंह का पराक्रमी पुत्र देवसिंह अपने स्वामी की भूमि नहीं जाने देने की सोच कर अपने सज्जित दल के साथ रणभूमि में लड़ने चला। इसी समय भयंकर कोलाहल करने वाली तोपें गरज उठीं। पृथ्वी को अपने वश में करने वाली अर्थात जीतने वाली दोनों पक्षों की ये तोपें ऐसी गरजीं कि उनकी गर्जना के सम्मुख भाद्रपद माह के मेघों की गर्जना फीकी लगीं।

उततैं कछवाहन उग्र उछाहन बेग सु बाहन बग्ग लई।
बनि बुंदिय बालम जंग सु जालम संगहि सालम दौर दई।
परि रिठ्ठि कृपानन चंड चुहानन गिद्धि उडानन गूद गहैं।
गन धीर गुमानन पीर प्रमानन बीर कमानन तीर बहैं।।६।।
बढि बुत्थिन बुत्थि छई बसुधा लगि लुत्थिन लुत्थि परैं प्रजरैं।
घट सेल घमाकन रंग रमाकन हड्ड सु हाकन होस हरैं।
लखि खग्ग उदग्गन मग्ग लगी जुरि अच्छरि जग्ग प्रजापति ज्यों।
गलबांहं करैं करि बीर बरैं गमनैं गन गैवर की गति ज्यों।।७।।
उधर से बड़े उत्साह के साथ कछवाहों ने भी अपने घोड़ों की लगामें खींची और बड़े वेग से शत्रु दल की ओर बढ़े। इनके साथ ही जालिम सालमसिंह बूंदी का जबरन स्वामी बन कर युद्ध करने दौड़ा। चहुवानों के भयंकर खड़ग चल पड़े और उनके निरंतर प्रहारों को देख कर गिद्ध पक्षियों के झुंड मज्जा खाने को उड़ते हुए रणभूमि पर मंडराने लगे। धीर-वीर लोगों के समूह के गुमान वाले धनुषों की प्रत्यंचाओं से शत्रु को पीड़ा देने वाले तीर चलने लगे। रणभूमि वीरों के कटे हुए मांस के लोथड़ों से ढंक गई। दोनों ओर वीरों के कटे शवों पर कटे शव गिरने लगे। अर्थात दाह क्रिया के लिए शवों के ढेर लग गए। युद्ध में रणक्रीड़ा का प्रदर्शन करने वाले वीरों के शरीर पर भालों के प्रहारों से घाव बनने लगे। हाड़ा वीरों की वीर हाक अपने शत्रुओं के विजय प्राप्त करने की होंस को मिटाने पर आमादा हो आई। उदग्र (उठी हुई) तलवारों को देख कर अप्सराएँ रणभूमि की ओर आने वाले मार्ग पर यों रवाना हुई जिस उत्साह से भरी वे पूर्व में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में गई थीं। हाथियों की मस्त गति से गमन करने वाली इन अप्सराओं के समूहों ने रणभूमि में आ कर अपनी-अपनी पसंद के वीरों का वरण करना आरंभ किया।

छननंकि उडानन बान छये उननंकि गयंदन घंट्ट घुरे।
फननंकि दुबाहन टोप फटे रननंकि सिपाहन कोच रुरे।
डुलि भैरुव डैरुव तैं डहकी डरि डाकिनि साकिनि चोंकि चली।
नचि नारद नच्चबिसारद व्हां बिबि बारद भांति मिले खुरली।।८।।
कटि खग्ग कलाप रु दंत कढैं कटि कुंभ मउत्तिन मेह फुरैं।
तरिता तनु तेग तहां तरकैं घन गज्ज मतंगज गज्ज घुरैं।
बक पंतिय दंतिय दंत बढे चहुं ओर अचानक अब्भ चढे।
कटिकैं उडि चातक घंट कढे प्रति पक्खर भेक अनेक पढे।।९।।
‘सन सन’ की ध्वनि करते उड़ते हुए बाणों ने रणभूमि के आकाश को छा दिया। ठन ठन का शब्द करने वाले हाथी अपने गज घंटों सहित भूमि पर कट कर गिरने लगे। ‘फनन फनन’ की आवाज के साथ दुबाह करने वाले वीरों के शिरस्त्राण चिरने लगे। रनंक रनंक की ध्वनि के साथ वीरों के कवचों की कड़ियां बज उठीं। भैरव के वाद्य यंत्र डेरू के बजने की आवाज से चोंकी हुई डाकिनियां और शाकिनियां (देवी की दासियां) डरती हुई इधर उधर डोलने लगीं। नृत्य विशारद नारद नाच उठा और आकाश में टकराते दो बादलों की मानिन्द शस्त्र विद्या में पारंगत दोनों पक्षों के वीर टकराने (भिड़ने) लगे। रणभूमि में किसी जगह हाथियों के कटे हुए कलावे (गर्दनें) उखड़े हुए दांत पड़े थे तो कहीं फूटे हुए कुंभस्थलों से मोतियों की वर्षा होने लगी। विद्युत की त्वरा वाले खड़ग चलने लगे और उनके प्रहारों से मेघ के समान गर्जना करने वाले हाथी चिंघाड़ने लगे। हाथियों के कटे हुए दांतों की पंक्तियां आकाश में यो उछलने लगीं जैसे बुगलों की पंक्तियां उड़ी जा रही हों। हाथियों के गले में बंधे गज घंट प्रहार की चोट पड़ते ही इस तरह बजने लगे जैसे चातक (पपीहे) बोलने लगे हों और घोड़ों के पाखर प्रहारों से ऐसे बज उठे मानों एक ही राग में मेंढक बिना रुके बोलने लगे हों।

यह आनि सुमाकर मैं बरखा बढि माधवमास अमा बिथुर्‌यो।
लखि नायक सूरन हूरन हूरन अंगन अंग अनंग फुर्‌यो।
इत सूरन चंदन अस्त्र चढे रस कैं इत हूरन राग रचे।
उमहै इत सिंधुन की ध्वनि तैं समुहै उत सिंजित सद्द मचे।।१०।।
इत डाकिनि दूति कजाकिनि ओ इत साकिनि नाकिनि यास सखी।
सब हूर सुहागिनि इक्क अभागिनि बुद्ध बिभागिनि सो बिलखी।
द्रुत हार सिंगार बिगारि दये धुपि अंजन रोदन बारि बह्यो।
कर कंकन फोरि मरोरि कलापहिं छोरि अलापहिं ताप सह्यो।।११।।
इस तरह पुष्पों की खान कहलाती बसंत ऋतु में अचानक वैशाख माह की अमावस्या के दिन वर्षा बढ़ी अर्थात् अचानक पावस का आगमन हुआ। अपने वीर नायक को देख कर प्रत्येक अप्सरा के अंग-अंग में कामदेव का स्फुरण बढ़ा। वहीं वीर रस में उफनते वीरों की रगों में आरक्त चंदन रूपी रक्त वेग के साथ संचरण करने लगा और अप्सराओं ने अपने नायक वीरों को रिझाने को रागिनियां छेड़ीं। रणभूमि में एक ओर जहाँ सिंधु राग की ध्वनि उभरती वहीं बीच-बीच में अप्सराओं के आभूषणों की झनकार फूट पड़ने लगी। इधर भिड़ाने का दूत कर्म करने वाली डाकिनियां ओर उधर से उनकी सखियां शाकिनियां, अप्सराओं के साथ मिल कर रणभूमि में विचरण करने लगीं। शेष सभी अप्सराएं सौभाग्यशालिनी निकली कि उन्हें अपने वरण के योग्य वीर मिले पर एक अप्सरा अभागिन ही बनी रही जिसने राजा बुधसिंह का वरण करने की सोची थी अर्थात् वह सुहागिन नहीं हो पाने पर रोई। (क्योंकि बुधसिंह डर कर युद्ध भूमि में नहीं आ पाया)। उसने अपने किये हुए शृंगार को मिटा दिया और पुष्पहार को तोड़ फेंका उसकी आंखों का काजल आंसुओं के साथ बह निकला। उसने हाथ में पहने कंगन तोड़ डाले और कटि मेखला को (कमर पर बंधने वाला आभूषण) मरोड़ कर फेंकते हुए गीत छोड़ कर दुःख का ताप स्वीकारा।

यह आइय डाकिनि की सिखई धवहीन भई अब छोह छई।
अति आरति अच्छरि की लखि कैं हसि डाकिनि डिंडिम डक्क दई।
सहनाइय सुंडिन की करि कैं गन बावन गावनमैं गहकैं।
कटि मुंड रु रुंड किरैं इतकों चउसठ्ठि न झुंड नचैं चहकैं।।१२।।
पखराल तुरंगन पूर किते नखगल्ल कुरंगन फाल मचैं।
भट बार कटारन पार करैं असि झार अंगारन मार मचैं।
फटकारि मतंगज सुंडि फिरैं कटकारि चुहानन झुंड क्रमैं।
हलकारि चुरेलिनि होस हरैं ललकारि भयंकर भूत भ्रमैं।।१३।।
वह अभागिन अप्सरा डाकिनियों के सिखावे में आ कर रणभूमि में बुधसिंह का वरण करने आई थी पर उसका पति भी उससे छूट गया। वह इस बात पर क्रोधित हुई। उधर इस अप्सरा को पीड़ा से आर्त्तनाद करते हुए बिलबिलाते देखा तो डाकिनि ने हँस कर अपने वाद्ययंत्र डिंडिम बजाने के लिए उस पर डाके (बजाने की डंडी) का प्रहार किया। यह देख कर बावन भैरव रणभूमि से कटे हुए हाथियों की सूंडों को उठा कर शहनाई की तरह बजाने लगे और चहक कर गाने लगे। रणभूमि में इधर वीरों के मस्तक कट कर धड़ (रुंड) गिरते हैं और इन्हें देख कर चोंसठ योगिनियों का समूह नाच नाच उठने लगता है। उधर रणभूमि में कई पाखर वाले घोड़े हिरणों की तरह नखराली छलांगे भरने लगे। वीर अपने प्रहारों से शत्रु शरीर के आर पार अपनी कटारें निकालने लगे और तलवारों के प्रहारों से निकलती चिंगारियों की भरमार हो गई। हाथी अपनी सूंडें फटकारने लगे और शत्रु सेना पर चहुवान वीर झपटने लगे। इन हाड़ा वीरों की ललकारें चुड़ैलों की होंस मिटाने वाली है और वीर हाक भूतों को भी भयभीत करने वाली है।

खग धारन धार खिरैं खटकें पलचारन झुंड झटैं झपटैं।
खुरतारन भार खुदैं पहुमी असवारन वार दटैं दपटैं।
उपकारन कार किते उमहे सिव धारन काज गहैं सिर कों।
दल मारन मार मिले दुवघां मद बारन बार चले चिर कों।।१४।।
घमसानन बान उडानन लै अरि प्रानन पीवत काल अही।
चहुवानन के कर की उपमा पवमान न मानस व्हां निबही।
करवालन चंड उडी चिनगी भट जालन भीर भिरैं भुरसैं।
बढि ज्वाल करालन लोक बरैं दिकपाल कपालन साल बसैं।।१५।।
तलवारों पर तलवारों के प्रहारों से उनकी धारें भोथरी होने लगी और इनकी खटपट सुन कर मांसाहारी जानवरों के झुंड रणभूमि में झपटने लगे। घोड़ों पर सवार वीर अपने घोड़ों को जब झपटा कर बढ़ाते हैं तो उनकी खुरतालों से भूमि खुदने लगती है। उत्साह में पगे वीर (शिव का) उपकार करने में संलग्न होने लगे और शिव अपनी मुंडमाल के लिए कटे हुए मस्तक चुनने लगे। शत्रु संहार करने वाले दोनों पक्षों के वीर मिले (भिड़े) जिससे मस्त हाथियों का मद बहुत देर तक बहता रहा अर्थात् उनके प्रहार से मदझर हाथी मद झारने लगे। काले सर्पों की तरह उड़ कर शत्रु के प्राण हरने वाले बाण रणभूमि में चलने लगे। चहुवान वीरों के हाथों की त्वरा की उपमा न तो पवन के वेग से की जा सकती है न मन की चंचलता से अर्थात् उनके प्रहारों की चपलता दोनों के वेग से बढ़ कर थी। प्रचंड तलवारों के प्रहारों से उत्पन्न होने वाली चिनगारियाँ भिड़ने वाले वीरों को जलाने लगी अर्थात् उन्हें मिटाने लगी और ऐसी ही अग्नि प्रज्वलित करने वाली तलवारों की आग में लोग झुलसने लगे और दिग्पाल हाथियों के कपालों में पीड़ा होने लगी।

गजराजन ढाल ढहैं ढरकैं रत भाजन घाय भरैं भभकैं।
लगि लाजन सूर लरैं लटकैं, छटकैं भुव काजन लोह छकैं।
कटि कालिक पीह किरै कलि मैं फटि मस्तक खंड उडैं फबिकैं।
जिम सैलनशृंग खिरै बिखरै प्रतिमल्ल पुरंदर के पबिकैं।।१६।।
मथि मंथनि मत्थ गहैं गति सों गन गिद्धनि गोद गिलैं गहकैं।
मनु ग्वालिनि मट्ठ दही मथिकैं नवनीत निकारन बारनकैं।
चहि मार दुधार चलैं चमकैं असवार तुखार कटैं उलटैं।
फटि मक्कुन ऊरु फटैं उछटैं कटि बाहुल बाहुल बाहु कटैं।।१७।।
गजराजों की पीठ पर लगे ध्वज कट कर गिरने लगे और घावों से रक्त के पात्र हैं वे भर कर ढुलकने लगे अर्थात् उनसे रक्त गिरने लगा। रणभूमि से भाग उठने की लज्जा से बचते हुए वीर टूटकर लड़ते हैं और शस्त्रों के प्रहारों से घायल हो कर रणभूमि में भूमि के लिए गिरते हैं। ये वीर अपना कलेजा और तिल्ली चिरने पर रणभूमि में गिरते हैं और कलियुग में (दूसरे अर्थ में युद्ध में) अपने मस्तक की धज्जियां उड़ा कर शोभा पाते हैं। यह ठीक वैसा है जैसे पर्वत का शिखर खंडित हो कर बिखरता है और वह भी इन्द्र के वज्रपात के प्रहार से। अपनी चोंचों से फटे हुए वीरों के मस्तक को मथनी (रवाई) बना कर गिद्ध मंथन कर मक्खन रूपी मज्जा निकाल कर खाने को रणभूमि में उतरने लगे मानो ग्वालिन दही की मटकी को मथ कर मक्खन निकालने में देर न लगाती हो। मारना चाह कर दुधारी तलवारें चलती है जिन्हें देख कर घोड़े और उनके सवार चमकते हैं और उनके प्रहारों से शत्रुओं के जंघाप्रदेश कट कर उछलते हैं शत्रुओं के बाहुस्त्राण कट कर बाँहें उछलती हैं।

~~महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (वंश भास्कर)

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