फागुन छाया है सखी

आज बिरज में धूम है, जन जन करे धमाल।
फागुन छाया है सखी!, बरसे लाल गुलाल।।१

गोरी गोरे गाल की, जिसके नैन विशाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नंद लाल।।२

सिर पर छोटी बेंदुली, चमके जिसका भाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँदलाल।।३

बातें मिसरी की डली, लगती मोहनथाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नंद लाल।।४

आँखें है जादूगरी, नेह नीर के ताल।
उससे होरी खेलता, नागरिया नंद लाल।।५

बरसाने की नागरी, चुनरी जिसकी लाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँद लाल।।६

अल्हड सी नवयौवना, जिसके हाथ रूमाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँदलाल।।७

सँग सखियाँ पनियाँ भरन, चलती मत-गज-चाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँद लाल।।८

सिर वेणी सुन्दर धरी, केश सघन ज्यों व्याल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँद लाल।।९

पग धर सुंदर पैजनी, छम छम चलती चाल।
उससे होली खेलता, नागरिया नँद लाल।।१०

कृष तन्वंगी कोमला, पहने पाटल माल।
उससे होली खेलता, नागरिया नंद लाल।।११

मैं मन को कोसूं सखी, बैठी तरू तमाल।
काहै मुझपर साँवरा, छिडके नहीं गुलाल।।१२

रे !रससागर साँवरे, मुझको करो निहाल।
रंग अबीर गुलाल का, हम पर भी दे डाल।।१३

साँवरिया रंग दे मुझे, तू अपने ही रंग।
या फिर मेरे रंग से, मल दे तेरा अंग।।१४

मन बरसाने में सखीे, बरसे फिर घनश्याम।
रंगी उन्ही के रंग में, रोम रोम ब्रजधाम।।१५

~~@नरपत आवडदान आसिया “वैतालिक”

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