गडरा

बाड़मेर जिले का सीमांत गांव गडरा, जो कि न केवल हमारे देश की सीमा पर स्थित सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं बल्कि इसका इतिहास भी मातृत्व, वीरता युक्त शान्ति और सह-अस्तित्व की भावना के कारण आज भी सुप्रसिद्ध हैं।

वर्तमान में गडरा रोड़ भारत में हैं, जबकि गडरा सीटी पाकिस्तान में स्थित हैं जो कि आजादी से पहले एक ही हुआ करता था। इसका उल्लेख कुछ इस तरह मिलता हैं कि किसी समय में यहाँ घना जंगल था जिसमें भयंकर जंगली और विषेले जानवर रहते थे। जंगल के आस पास ढाणियों में रहने वाले लोग भेड़-बकरियाँ रखते थे। बताते हैं एक दिन एक भेड़ इस जंगल में बाकी जानवरों से बिछड़कर कर जंगल में ही छूट गयीं और उसी रात जंगल में ही एक बच्चे को जन्म दिया। घने जंगल में हिसंक जानवरों से उस भेड़(गडरी) ने स्वयं के साथ बच्चे सहित रक्षा की।

उसी दिन सुबह वहाँ का जागीरदार शिकार खेलने आया जब उसे इसको देखकर, इस मातृत्व और सुरक्षित वात्सल्य पूर्ण वीरभूमी पर गांव बसाने का विचार किया। भेड़ को गाडर भी कहते हैं इसलिए इसका नाम गडरा रखा गया।

वर्तमान में तहसील मुख्यालय गडरा रोड़ एक भव्य और सभी सुविधाओं से युक्त एक छोटा शहर हैं जिसमें सभी धर्म और जातियों के लोगों में आपसी प्रेम और सदभावना की मिशाल कायम हैं। आज भी उस स्थान का ही चमत्कार हैं कि दोनों देशों की सबसे सीमांत गांव और बी ओ पी पर किसी अपवाद को छोड़कर, हमेशा शान्ति कायम रही हैं।

इस गांव की संस्कृति, रहन-सहन और खान-पान की मिठास और अपनत्व भी सबसे अलग हैं। यहाँ के बाजरें का खीच, गुड़ के साथ केसर जैसा घी और दही का स्वाद की कोई व्यंजन बराबरी नहीं कर सकता और अगर आपको कभी यहाँ पर बाजरें के सोगरे पर मक्खन और ग्वारफली की सब्जी खाने को मिलें तो इसके सामने तो छप्पन भोग भी फीके ही लगेंगे शायद। इस व्यंजन के साथ यहाँ के लोगों की मनुहार मिठास और अपनत्व का तो कोई सानी ही नहीं जो कि बिना कोई विशेष अवसर के लोगों को सीमांत तीन सौ किमी खीचकर ले जा सकता हैं।

आज गडरा में चारण परिवारों में लगभग पन्द्रह घर देथा, पांच घर देवल और दो घर रतनु परिवार के हैं जो चारण संस्कारों और संस्कृति की मीठी महक चारों ओर फैला रहे हैं। इसी मिट्टी की महक हमने स्नेह मिलन कार्यक्रम में श्री करणीदान देथा, आई आर एस, एडीशनल आयुक्त, आयकर विभाग, जोधपुर और श्री मगदान जी रतनु की मान-मनुआर में झलकती महसूस की।

~~जगदीशदान कविया, राजाबंध, बिराई

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