गमियो मूषक राज

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

गणेशजी रो वाहण मूषक राज गुम गियो है। अर गणेश जी उणरी छाणबीन कर रिया हा जद कोई उणने यूं कहियो के देशणोक में मूषक रूप काबा घणा है तो वे आपारे मूषक नें खोजण देशाण मढ आया। अर मां भगवती मेहाई महाराज अर गणेशजी रे बिच संवाद मेहाई सतसई रे इण आठ दूहा रे माध्यम सूं। हलकै हास रस सूं भरियोडा ऐ दूहा आप सब नें सादर।

गणाध्यक्ष गण राज रो, गमियो मूषक राज।
तद तव मंदिर आविया, मेहाई महराज।।९७
कोई उणनें जद कह्यो, मूषक उठै घणाज।
देशाणै रे देवळे, मेहाई महराज।।९८
उछळ कूदता ऊंदरा, गजब देख गणराज।
मन मूंझ्या वां पण कह्यौ, मेहाई महराज।।९९
म्हारो कुण वाहण कथौ, हे नवलख सिरताज?।
म्हनै दिरावौ म्हां तणो, मेहाई महराज।।१००
आई तद मुख आखिया गणाध्यक्ष गणराज।
ऐ है म्हारा दीकरा, (म्है) मेहाई महराज।। १०१
मढ देशाणा मोंयला, रमता मूषक राज।
देवी रा सब दीकरा, मेहाई महराज।। १०२
देवी जबरा जोरसूं, ऊंची करी अवाज।
मूषक दूरां सूं कह्यौ, (जी)मेहाई महराज।।१०३
तद गणपत मन हरखिया, मिळिया मूषक राज।
आभारी म्है आप रो, मेहाई महराज।।१०४
~~वैतालिक

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