गाँव बदळग्यो देख कोटड़ी

kotadiगाँव बदळग्यो देख कोटड़ी
छिण में छळग्यो देख कोटड़ी
जिणरै तप सूं जगत कांपतो
(वो) सूरज ढळग्यो देख कोटड़ी।
अम्बर अड़तो रोब अनूठो
पग उठग्यो सो पड़्यो न पूठो
मरजादा राखण मर मिटती
खुद्दारी रो तूं ही खूंटो।
थारी चौकी न्याय निवड़ता
न्याय बचावण माथा झड़ता
धरम करम री धजर धजावां
फहरावण सूरा रण लड़ता।
गायां खातर ब्हार चढ़ी तू
दुष्ट दळां रै लार चढी तू
माथा कटग्या, हार न मानी
रणचंडी खग धार बढी तू
पळट्यो टेम कुजरबो पासो
रुकै नहीं बिगड़ंतो रासो
खड़्यै न्हार री खाल काढ ली
गादडि़यां नैं देण दिलासो।
सगळो गांव साखीणो थारो
जग मे नामी जीणो थारो
अपणायत भेळप घण ऊंडी
रुतबो हो लाखीणो थारो।
बदळ्यो टेम नेम सब बदळ्या
बदळी कूख बेम सब बदळ्या
थारो न्याय बण्यो अपरोगो
लेवण हेम, ‘गेम’ सब बदळ्या।
हूती तूं अनुभव रो आकर
सीखण आतो खुद करुणाकर
कळजुग रो पहरो अणखाणो,
चाकरिया बण बैठ्या ठाकर।
बंद राख मत आंख कोटड़ी
झीणै मांकर झांक कोटड़ी
अबलावां री टेक राखबा
नाक नकटिया चांक कोटड़ी।

~~डॉ गजादान चारण “शक्तिसुत”

One comment

  • ओमपाल सिंह आसिया

    अति सुन्दर समय परक यथार्थ से आगाह कराता पद्य लेखन ।

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