गज़ल की गज़ल

सन्नाटे को चीर गज़ल।
बन जाती शमशीर गज़ल॥1
शायर ने क्या खुब सजाया,
लगती जैसे हीर गज़ल॥2
जन जन के मन की जाने है,
संवेदन की पीर गज़ल॥3
नटखट कवि कान्हा को मिलने,
राधा बनी अधीर गज़ल॥4
चित में बस छाई फगुनाई,
छिडकै सदा अबीर गज़ल।5
मन मरजी से रोज लुटाती,
लमहों की जागीर गज़ल॥6
कैद नहीं कर सकता कोई
तोडे हर जंजीर गज़ल।7
अल्फाजों से सब कह डाले,
कीतनी है माहिर गज़ल॥8
शहद चासनी मीसरी फिकी,
पर है मीठी खीर गज़ल॥9
वली, जौक, मोमिन नें पाली,
ढाली-गालिब मीर गज़ल॥10
यदी साज ले आप बजादें,
तो पलटे तकदीर गज़ल॥11
“नरपत” का भंडार भरे नित ,
करती मुझै अमीर गज़ल॥12

~~नरपत आशिया “वैतालिक”

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