गज़ल – सुनो

–मूल रचना–

चींटियों के चमचमाते पर निकल आए सुनो।
महफ़िलों में मेंढ़कों ने गीत फिर गाए सुनो।

अहो रूपम् अहो ध्वनि का, दौर परतख देखिए,
पंचस्वर को साधने कटु-काग सज आए सुनो।

आवरण ओढ़े हुए है आज का हर आदमी,
क्या पता कलि-कृष्ण में, कब कंश दिख जाए सुनो।

वानरों के हाथ में अब आ गए हैं उस्तरे,
कौन जाने कब तलक, यह गात बच पाए सुनो।

खौफ के साए से चाहे जन-दिलों को जीतना,
है हकीकत ये सियासतदान सठियाए सुनो।

आज जो आसीन है इन मसनदों पे अकड़कर,
हैं सभी भावी सफ़र का टिकिट कटवाए सुनो।

मौर से क्या बोलने की मौज छीनोगे भला,
चुप नहीं रह पाएगा वो मर भले जाए सुनो।

हुक्काम के दर हाज़री का हुनर सीखो साथियो!
जी-हुजूरी अफ़सरी को, रास बहु आए सुनो।

मान ले ‘गजराज’ करले दुर्जनों से दोसती,
काश इससे सज्जनों की आंख खुल पाए सुनो।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

–राजस्थानी भावानुवाद–

आज कीङ्यां रै पळकती, पांख आई है सुणौ!
मै’फिलां में मेंढकां री, राग छाई है सुणौ!!

अहो-रूप अर अहो-नाद रौ, दौर परतख देख लो!
क्रिस्ण-करकश-कागलां री, टौळ आई है सुणौ!!

आवरण ओढ्यां खङौ है, आज रौ हर आदमी!
जुग-पटळ पर कंस री, तस्वीर छाई है सुणौ!!

बांदरां रै हाथ में अब, आ चुक्या है उस्तरा!
गात कद तांई बचैलो ?मौत आई है सुणौ!!

खौफ-री-खोह री छियां स्यूं, चाह जन ने जीतणै री!
हाय! सठियाई है सत्ता, सुध गमाई है सुणौ!!

आज अकङ्यां मसनदां पर, गळ उठा आसीण है!
जातरा-जबरी री टिकटां, ऐ कटाई है सुणौ!!

मौज कींकर खोस लेस्यौ? मोर स्यूं मन-मोद री!
मूंन मरियां नीं रवैलो, जिद समाई है सुणौ!!

हाजरी रै हद-हुनर ने, सीख लो हुक्काम स्यूं!
जी-हजूरी अफसरां री, रास आई है सुणौ!!

कर ले थूं- गजराज कैवै, दुरजंणां स्यूं दोसती!
काश! आं ओळ्यां स्यूं जन री, आंख खुल ज्यावै सुणौ!!

~~सोनी सिंथेलियन

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