गीत देसाणराय करनीजी रो

गीत – चित इलोल़

मुरधरा सोयाप मोटो, सांसणां सिरताज।
मेह रै घर जनम माता, हरस नै हिंगल़ाज।
तो हिंगल़ाज जी हिंगल़ाज हितवां रीझणी हिंगल़ाज।।1

कोम किनियां भोम कीरत, मंडणी महमाय।
उदर देवल धिनो आढी, प्रगट जामण पाय।
तो सुररायजी सुरराय, सोरम सुजस री सुरराय।।2

भाल़ निज री तात भगनी, साच उलटी सीख।
ताण पापण कियो तारां, ठोलियो सिर ठीक।
तो नजदीकजी नजदीक निष्ठुर भाव रै नजदीक।।3

दियो परचो पैल देवी, दुनी नूं दरसाव।
हाथ टूंटो कियो हिवपुल़, भुवा रो तज भाव।
तो तज भाव जी तज भाव, भल भल त्यागियो मन भाव।।4

कूक सुणनै करी करुणा, जामणी जद जोर।
हाथ री पुनि विपद हरनै, ठीक ठायो ठोर।
तो तैं ठोर जी तैं ठोर, ठायो हाथ बांको ठोर।।5

तात नै जद डस्यो तासक, घाय मिरतू घेर।
हाण हरणी करी किरपा, जहर कीनो जेर।
तो नहीं देर जी नहीं देर, तैं तो डगां की बिन देर।।6

धूंसबा अरियांण धरती, शेख चढियो सूर।
मेहजा जद मिल़ी मारग, निमल़ भलहल़ नूर।।
तो मुख नूर जी मुख नूर, नैणां भाल़ भाटी नूर।।7

जदुराण आसत जाण जोरां, पमंग तज पड़ पाव।
बाई दे वरदान वैणां, देवूं दोयण दाव।
तो घट घाव जी घट घाव, घालूं दोयणां घट घाव।।8

जोय भगती तूठ जोगण, बैठ खेजड़ वीर।
मही रोटा जीम मनरुच, धार दिल में धीर।
तो नित सीर जी नित सीर, सगती पाल़सी नित सीर।।9

सरस पाणी सात स्वागण, आई लिखिया अंक।
हुवै ना साठीक हितवां, कुटल़्ल़ बिच्छू कंट।
तो बिन शंकजी बिन शंक, सुधमन जोयलो बिन शंक।।10
साह जगड़ू तणी समँदर, ज्हाज अटकी जोय।
वांणिये मन करी विणती, मात मदती मोय।
तो बिन कोय जी बिन कोय, करनल आप बिन ना कोय।।11

त्यागियो साठीक तिणदिन, टुरी सुरभी टोल़।
जोड में जा जमी जोगण, घाल गाडां गोल़।
तैं तो गोल़ जी तैं गोल, घणथट जमायो निज गोल़।।12

तोड़ जांटी तणी टाल़ी, रूप नेहड़ रोप।
हुवो हरियल़ खेजड़ो हिव, जोर महियल़ जोप।
तो तैं जोप जी तैं जोप, जिण दिन रोपियो थिर जोप।।13

कान महिपत वाद कीनो, धीठ जीवण धाप।
होफरी बण दूठ हणियो, थंभ नरसिंह थाप।
तो तैं थाप जी तैं थाप, थापी कान कनफड़ थाप।।14

जोधतण जद जोधपुर, हिंयै हिम्मत हार।
कुंवरगुर कमधेस बीको, ओट पड़ियो आर।
तो सरकार जी सरकार, समंपी बीसहथ सरकार।।15

काल़िये बदनीत कीनो, पाप पेथड़ पूर।
सिटल़, सगती तणी सुरभी, चोर मद में चूर।
तो तैं चूर जी तैं चूर, चांचां चाबियो कर चूर।।16

ऊंच नै नह नीच आ़णै, भेद मन में भाव।
राज निज नित शरण राखै, चरण में कर चाव।
तो अपणाव जी अपणाव, आई आपरां अपणाव।।17

कूकियो मझ पड़त कोयर, अणद कहियो आव।
बीसहथ जद बणी बोगी, लंबी सांधण लाव।
तो भल भावजी भल भाव, भाल़्यो भगत रो मन भाव।।18

कटक लेनै चढ्यो कमरू, मुगल दल़ अणमाप।
जैत रै पख जुटी जागण, धार निज धणियाप।
तो धणियाप जी धणियाप, धरणी जंगल़ री धणियाप।।19

तूटियो पड़ ऊंठ तटकै, चोथ रो उण चोट।
बांध चाखड़ कियो बैठो, पाण लादी पोट।
तो तैं पोट जी तैं पोट, पांगल़ ऊपरै लद पोट।।20

लेस नाही ढील लावै, भाल़ करणी भीर
सगत सुणतां सिंह सांप्रत, चढै उडतै चीर।
तो हमगीरजी हमगी, हिवविध करनला हमगीर।।21

दास गिरधर आस देवी, पास रह नित पूर।
हरफ गैलां सुणै हेलो, दोस करणी दूर।
तो तूं दूर जी तूं दूर, दुख सब काटणी कर दूर।।22

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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