गीत जोरावरपुरा माताजी रो

डीडवाना के पास एक गाँव है जोरावरपुरा। अमरावत बारठों का गाँव है। वहां के चमत्कारी करनी मंदिर के दर्शन करके मां के चरणों में एक गीत निवेदन –
karnimajorawarpur

।।दूहा।।
आया सेवग आस कर, हे दाया दरियाय।
महमाया करनी मया, सुरराया कर स्याय।।
और न दीसै अवनि पे, जीसै करूं जुंहार।
सुर तेतीसै में सिरै, देवी तूं दातार।।
जंगळ में मंगळ रचै, दंगळ दुष्ट दबाय।
अमंगळ झट अळगा करै, मेहाई महमाय।।
जोरावरपुर है जबर, धिनियाणी तव धाम।
सोहै मढ़ हद सोहणो, ओरण बिच अभिराम।।
अड़ीखंब आगल खड़ा, भुरजाळा बेहुं भ्रात।
करुणा सुण किरपा करै, नित्त भैरवानाथ।।
जागण व्है जगदम्ब रो, उमड़ै भीड़ अपार।
बँटै प्रसादी प्रेम री, देवी रै दरबार।।
गीत छंद चिरजा घणी, गाय करै गुणगान।
राय सुणंतां रीझवै, द्यै विद्या वरदान।।

।।गीत साणौर।।
करै खास अरदास सब दास सुण करनला
आस कर आपरै द्वार आया।
मन्न में जास विश्वास अत मावड़ी
देविका रखाजे परम दाया।।
बळू तू कळू में रहीजे बीसहथ
चळूनद सोखणी मात चंडी।
भक्त भयभंजणी कृपालू भवानी
खीज कर दढाळी देत खंडी।।
रीझ कर रीझ कर राय हिंगोळ री
छोरुआं रखाणी छत्रछाया।
बगस रुजगार व्यापार सुख बगसणी
जोरावरपुराळी जोगमाया।।
मूरती तोय महमाय मनभावणी
दरस में हरस री लहर दौड़े।
परस कर चरण जो पुकारै प्रेम सूं
चारणी सहायक रहै चोड़े।।
भ्रात दुहुं द्वार पर खड़ा भड़ बांकड़ा
सांकड़ा सेवगां रखण सौरा।
मात रा भ्रात नित अगाड़ी मदद में
निमख नीं काढणा पड़ै न्होरा।।
बणी री आईना रखी तैं बणाई
इयां ही रखाजे अंब आगै।
रूप रळियामणा सुहाणा रूंखड़ा
जिका नित गाम रै हेत जागै।।
सीख तव आईना समप्पे सुहाणी
घाव पण रूंख रै न को घालै।
छांग कर लूंग ले करै नीं छानेड़ो
हुकम तो मावड़ी सकड़ हालै।।
चोर जे उठावै गाम सूं चीज को
बणी में भटकतां टेम बीतै।
अंब तूं उघाड़ै बोध री आंखिया
रिदै पछताय, कर जाय रीतै।।.
दूसरै नौरतै जागरण दीरीजै
अंब आसोज रो मास आयां।
हेत सूं प्रसादी अरोगै हजारूं
जिकां खुद जिमाड़ै जोगमायां।।
पढै छँद गीतड़ा पात मिल प्रेम सूं
जात दे जिकां रा कष्ट जावै।
गाय चिरजाय जो रिझावै मात नैं
अखां सुख संपदा धाम आवै।।
उरां ले भाव जो करै है आयोजन
पुरां वां मावड़ी प्रगट राजै।
मन्न तन निरोगा रखै मातेसरी
बरकतां तणां नित ढोल बाजै।
आस अर पास रै गामां सूं आविया
भगतजन लाविया भाव भीना।
गाविया रातभर तोर जसगीतड़ा
दया कर दढाळी दरस दीना।।
अरज आँ किसानां तणी सुण अंबिका
खूब कर सवाई साख खेती।
टीडियां कातरो रूंखड़ी टाळजे
आफतां जाळजे मात अेती।।
समै पर मेह बरसायजे सुराणी
साख सरसायजे भोम सारी।
मतीरा काकड़ी टींडसी मोकळा
मही उपजायजे मात म्हारी।।
मवेसी कुसळ सब रखाजे मेहाई
घास अन हरै रा न हो घाटा।
दूध घृत दही तू दिराजे दपटवां
लखां लख अन्न रा देय लाटा।।
भणै वां टाबरां हियै दे भरोसो
मगज में समझ दे महमाया।
रुळै ना जवानी कोय अधराह में
कृपाळू रखाजे कुसळ काया।।
माण रख मायतां काण कुळ गाम री
आन अर बान नहं आंच आवै।
प्राण जे रखै तो प्रण पण निभाजे
गरज कर भगतजन गीत गावै।।
बधाजे वंश री बेल नित बडाळी
मढाळी परस्पर मेळ कीजेे।
दढाळी सदा ही दया कर दासड़ां
सुराणी चरण री सरण दीजे।
नगर नाथाण रो पात गजराज नित
चित्त सूं तिहारा दरस चावै।
कृपा-कर सीस पे रखीजे करनला
जिकण सूं दोख सब दूर जावै।

।।छप्पय।।
दोष हटै सब दूर, कटै सब कष्ट कलेसा।
राखै सौरा राय, देय वरदान विसेसा।
अन धन देय अपार, सदा सम्पत सरसावै।
उर में व्है जो आस, प्रगट महामाय पुरावै।
सेवगां सुजस शिखरां चढ़ै, क्रोड़ भांत विकसै कला।
गजराज सरब गरजां सरै, करै कृपा जद करनला।

~~डा. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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