गीत नाहरसिंह जी माथै – कवि डूंगर दान आशिया

परम श्रद्धेय ठाकुर नाहरसिंह जी माथै डिंगल़ रा सिरै कवि आदरणीय डूंगरदानजी आशिया री एक रचना- ठाकर नाहर सिंह जी जैङौ भलौ,अपणायत हितैषी अर विनम्र राजपूत इण समय में कीकर जलमीयो,ऐङा राजपूत तौ पांच सौ सातसौ वरसां पैली हुआ करता। इण भाव रौ एक गीत नजर।

।।गीत।।
पांच सातसौ वरसां पैली,
जणवा नाई खाती जाट।
जात जात री माटी जिणसूं,
घङवा लग्यो विधाता घाट।।1।।

खांदोङी न्यारी इक खिणनें,
विध लायो माटी उण वार।
वार वजावणहार वडाला,
सिरजण हित क्षत्री सिरदार।।2।।

ठाया केई ठावका ठाकर,
वचनवीर केई युधवीर।
दांनवीर कइ धर्म वीर दृढ,
गुण गहीर अर धीर गंभीर।।3।।

साच उवाच काछ रा शूरा,
मिष्ट वचन मन रा मजबूत।
सिष्ट व्यहार इष्ट रा सेवी,
रज उणरा घिङया रजपूत।।4।।

कवियांं हितू केवियांं काटण,
उच्च विचार घणौ अपणाव।
सोच सोच घाल्या गुण सारा,
भरिया माटी मेंं सदभाव।।5।।

विष्णु श्री आया् उण वेल़ा,
हल़ फल़ उठग्यो सिरजण हार।
लोयो एक रहग्यो लारै,
विधना भूल गयो उणवार।।6।।

संवत उगणीसौ बौरांणू,
वो लोयौ आयौ विध याद।
सतवादी माता पितु सोधे,
उण सूं सुत करियो इजहाद।।7।।

रावल जौल अमर अरु रांणी,
रसना हूंत रटै नित रांम।
ज्यांरै घरे सपूत जलमियौ,
नाहर सिंघ दिरायौ नांम।।8।।

प्रीत रीत रौ परम पुजारी,
नांमी नेक निरमली नीत।
जीत रखे इणरी जगदंबा,
गढवी डूंगर दाखै गीत।।9।।

~~डूंगर दान आशिया

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