गीत राठोड़ पाबूजी धांधळोव रो – आसिया बांकीदास रो कह्यो

प्रथम नेह भीनौ महा क्रोध भीनौ पछै,
लाभ चमरी समर झोक लागै।
रायकवरी वरी जेण वागै रसिक,
वरी घड कवारी तेण वागै।।

जो पहिले विवाह-मंडप में भांवर फिरने के लोभ में स्नेह से भीगा था, वही बाद में युद्ध की वाहवाही के लोभ से महाक्रोध से युक्त हुआ। उस रसिक ने जिस वागे को पहन कर राजकुमारी का पाणिग्रहण किया, उसी वागे से उसने कवारी (बिना किसी से लडी हुई) सेना का वरण किया (युद्ध किया)।

हुवे मगळ धमळ दमगळ वीरहक,
रग तूठो कमध जग रूठो।
सघण वूठो कुसुम वोह जिण मौड सिर,
विखम उण मौड सिर लोह वूठो।।

जहां विवाहोत्सव के मंगल गीत गाये जा रहे थे, वहीं युद्ध का वीर-गर्जन हुआ। जो राठोड़ विवाह की खुशी में दानादि देने को प्रसन्न हुआ था, यहीं युद्ध के लिए क्रोधित हो गया। जिसके शिरोभूषण पर पुष्प-वर्षा की सघन बौछारें हुई थीं, उसी पर भयंकर शस्त्र-वर्षा हुई।

करण अखियात चढियौ भला काळमी,
निवाहण वैण भुज बाधियो नेत।
पवारा सदन वरमाळ सू पूजियौ,
खळां किरमाळ सू पूजियौ खेत।।

वह अपनी कथा अक्षय करने को भले ही ‘काळमी’ नामक घोडी पर सवार हुआ। वचन-पालन के अपने विरुद को उसने भुजाओं पर धारण किया। पवारों के घर पर तो वरमाला से पूजित हुआ था, वही रणक्षेत्र में शत्रुओं की तलवारों से पूजित हुआ।

सूर वाहर चढे चारणा सुरहरी,
इतै जस जीतै गिरनार आबू।
विहड़ खळ खीचिया तणा दळ विभाडे,
पौढियो सेज रणभोम पाबू।।

चारणों की गायों की रक्षार्थ चढ़ कर, खीचियों के दलों को खण्ड खण्ड करके, शत्रुओं को नष्ट करने वाला वह बीर पाबू रणभूमि रुपी सेज पर सो गया। उसका यश तब तक रहेगा जव तक गिरनार और आबू पर्वत इस पृथ्वी पर स्थित हैं।

 

~~महाकवि बाँकीदास आसिया

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