गीत सांगा मैणा रो-कल्याण दास गाडण कहै

17वीं शताब्दी के श्रेष्ठ कवि महकरण मेहडू उर्फ जाडा मेहडू जो अपने समय के निर्भीक व बेबाक कवि के रूप में साहित्यिक जगत में विश्रुत है। इन्हीं के पुत्र कल्याणदास मेहडू भी श्रेण्य कवि माने जाते हैं। कल्याणदास मेहडू मारवाड़, मेवाड़ व बीकानेर आदि रजवाड़ों में समादृत थे। इन्होंने किन्हीं सांगा मैणा/मीणा की वीरता को रेखांकित करते हुए एक गीत कहा। सांगा ने परिहारों व पमारों के बीच हुए किसी युद्ध में भाग लेकर अपना अदम्य साहस दिखाया था। जिसे कवि ने अपनी वाणी से अमर कर दिया।

इससे यह सिद्ध है कि चारण कवि वीरता के पूजारी थे। उनके लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि वीरता दिखाने वाले की जाति क्या है? वो तो केवल गुणग्राही थे। निसंदेह उन कवियों ने जातिवाद से ऊपर उठकर रचनाएं की लेकिन अपरिहार्य कारणों से रचनाएं संकलित सही रूप में नहीं हो पाई। आज हम जब निष्पक्ष रूप से अगर डिंगल गीतों का अध्ययन करें तो हम पाएंगे कि वीर राजपूतों के साथ जो-जो लोग वीरता से लड़ें उनके गीत फुटकर मात्रा में उपलब्ध हैं। इससे यह तो सिद्ध होता ही है कि जो आरोप चारण कवियों पर गढ़े व मढ़े जाते हैं वे निराधार व निर्मूल है। जरूरत है बिना किसी पूर्वाग्रहों के ऐसे गीतों व गीत नायकों के अनुसंधान की।

उक्त गीत मोहनपुरी जी, जो कि हिंदी-राजस्थानी के उम्दा रचनाकार हैं से साभार प्राप्त हुआ-

।।गीत मैणा सांगा रो।।
—कल्याण दास जाडावत कहै—

कड़िबांधी तणो भरोसो करतां,
तीन च्यारि लागी तरवार।
‘सांगला’ तणी कटारी साची,
मारणहार राखियो मार।।
सांगा, जो कि अपनी कड़बंध अर्थात तलवार पर हमेशा भरोसा रखता था यानी जिसे अपनी प्रहार क्षमता पर पूरा विश्वास था। भलेही उसे तीन चार प्रबल प्रहारों का सामना करना पड़ा लेकिन ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसने अपनी कटार के वार से उस दुश्मन को मार गिराया जो उसे मारने को उद्धत था।

बहिये खाग पछै उर वाहि,
जोर उकसी मोर जुई।
मैणा तणी जमाल़ी समहरि,
हुबतै चूक अचूक हुई।।
दुश्मन के प्रहार करने के बाद क्रोधित होकर युद्धस्थल पर सांगा ने जोश में भरकर उसके अंतस्तल प्रहार करने हेतु कटारी निकाली जिसे उस अरि ने देखा लेकिन वो अपना बचाव नहीं कर सका क्योंकि सांगा का प्रहार अचूक था, उससे बचना किसी का भी असंभव था। अतः उसकी कटारी ने शत्रु के हृदय को भी विदीर्ण कर दिया।

पडती बाथ साथ पल़टंते,
हाथ बखाणि बखाणि हियो।
मारण मारण मारके मैणे,
कूढ उपने साच कियो।।
अपने साथियों को बदलते देख यानी सहायतार्थ उत्साहित न देखकर उसने रिपु को अपने बाहुपाश में जकड़ लिया। उस समय उसके दुश्मनों व साथियों ने उसके आत्मबल व बाहुबल दोनों को प्रशंसनीय माना। उस कीर्ति को उसने यथार्थ कर बताया यानी जो उसे मारना चाहते थे उसको इस ‘कूढ’ में जन्मे साहसी मीणे ने मार दिया।

इल़ परिहार पमार अखाडै,
खिंव भुज बहै कटारी खाग।
मुख कर राग थाटियो मैणी,
रावताणी गायो सुजि राग।।
इस अवनी पर परिहार व पमार युद्धार्थ भिड़े। उस समय उसकी कटारी ने बिजली के सदृश चमकते हुए जो प्रखरता दिखाई उसके कारण उसकी माँ अर्थात उस जननी मैणी(स्त्रीलिंग) की शोभा सर्वत्र फैली तो साथ ही उस रावताणी अर्थात राजपूतनी ने भी उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जिसके पुत्रों अथवा पुत्र के कारण वो लड़ा।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

One comment

  • विजय सिंह मीना

    आपको अनेकानेक साधुवाद गिरधरदान रतनू भाई सा कि आपने इस गीत का काबिले तारीफ अनुवाद किया।मोहनपुरी जी को मैने ही ये गीत भेजा था अनुवाद के लिए ।आप और मोहन भाई का अनेकानेक साधुवाद।

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