गीत सैणलाराय रो – पन्नारांमजी मोतीसर जुडिया कृत

।।गीत – संपखरो।।
भुजां साहियां त्रसूल़ झूल़, सगत्यां स तेज भाण,
केवियां कैवांण पांण हटावै कंकाल़।
आराधियां आवै ताल़, तीसरी ईसरी आप,
कीजै माहेश्वरी रिच्छा आरोहा लंकाल़।।

अलकांर बाजणा, कदंमा कटि संध आभा,
जटी मोली वाम अंगा, पौशाकां जरीस।
खंभी हेम अंगोठा खूगटी जडां वज्र खासां,
गाढी रोम लडां सीस, चुट्टी नागरीस।।

म्रगा अंक वाल़ा भाल, विसाला सुढाला मध्य,
चंचरीक भ्रूह लाला पंकती स चूप।
वक्र मांनू नाला नासिका सु कीर कोकवाणी,
रूपै सुरारांणी हंस चाला कुंभी रूप।।

रंभ जंगा तारकेस सीला धू रमंता रास,
कल़ा साठ वैद साथ चौगणी कुंवार।
प्रकतीस दूण पक्ष वीर श्याम स्वेत पास,
साजै तांन गांन ग्राम रागनी सवार।।

पधार्या वेदाई पंथ हेमाल़ै गल़ैवा पिंड,
गौरी पातशाह राज गमायो गहीर।
पंच तुंड पीठ धू, पीरोज बिराजै पांन,
मही दुनी भरै साख चद्रमां महीर।।

सैणला कवेसां पांय, सांसणां बघार सिंगो,
हेला हाथी ऊंट वाप, दीवारो हमेश।
उकती समापो आछी जोड बीस हाथ वाल़ी,
कहै पन्नो काट काल़ी, काया रो कल़ेस।।

~~पन्नारामजी मोतीसर “जुडिया”
प्रेषक: मोहन सिंह रतनू चौपासणी

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