गज़ल-हाल मनवा!

Pathik

हाल मनवा! दूर अनहद देस; चालां,
ले कमंडल, प्हैर भगवौ भेस; चालां।।१
चिट्ठीयां नी डाकियौ नी है कबूतर,
तोई कुण भेजे रियौ संदेश; चालां।।२
बाट में रूकणौ बटाऊ ठीक है पण,
पंथ री दूरी लखै हम्मेश; चालां।।३
छाछ, बाटी, राबडी रो स्वाद लेवा,
गांव, ढांणी, झूंपडी के नेस; चालां।।४
हां जठै गणणाट गूंजै अनलहक री,
भाल़वा उण ठौड रो दरवेश; चालां।।५
वा! गज़ल री मोकल़ी महफिल जमीं है,
ओल़ियां इक दोय करनें पेश; चालां।।६
कुण झरूखै दीप ले पल पल उडीकै,
लाज री लंगर सुरंगै भेस; चालां।।७
मील रो भाटौ न भाले़ भायला थूं,
दूर मंजिल, देर बिन लवलेश; चालां।।८
रेत, भाखर, झाड, झांखर, खीप फोगां,
आँख में ले डिंगल़ी परिवेश; चालां।।९
रे लखी बिणजार भरदै पोठ बाल़द,
लाख सुपनां आँख ले, अनिमेष; चालां।।१०
लीक लय री छोडजे मत रे “नपा” थू,
गीत, गज़लां दोहरा रे देश; चालां।।११
~~©वैतालिक

One comment

  • chunaram vishnoi

    नपसा!निर्गुणी गजल सचमुच मे- “चालो रे म्हारी हेली उण देश म” जठे जगे आत्मजोत!इण भजन/वाणी रीओळूं दिलारही है।।आपरो अन्तो सांचाळी स्वतः आलोकित है।।
    एड़ी निरगुणी राग फकीरी फैरूं भेजता रेवाजो।।

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