घी ढूळ्यो तो ई मूंगां मांहीं

आपणै राजस्थानी लोकजीवण मांय अेक कैबत चालै कै “घी ढूळ्यो तो ई मूंगां मांहीं”। इणरो प्रयोग साधारण रूप सूं उण ठौड़ करीजै जठै आपणै कोई नुकसाण हुवै पण उण नुकसाण सूं आपांनैं घणो धोखो कोनी हुवै क्यूंकै आपणै नुकसाण सूं कोई आपणै ई खास आदमी नैं फायदो हुवै जणां उण नुकसाण री मनोमन भरपाई करल्यां। जियां कोई लावणो बांटण आवै अर बडै भाई री ठौड़ छोटकियै भाई रै घरै लावणो देज्यावै। पछै जद ठा पड़ै तो कईजै कै कोई बात नीं घी ढूळ्यो तो मूंगां मांहीं। टेक टाबर पूछलियो कै गुरुजी घी ढूळण में मूंगां री ठौड़ गुंवार का बाजरी रो नाम क्यूं कोनी लीरीजै। मैं उणनैं समझावतां बतायो कै घी मूंगां में ढूळ्यां तो घी में गळगच मूंगां नैं पीस’र हलवो बणा लेवां पण जे बाजरी का गुंवार में पड़ज्या तो पछै घी कीं काम ई कोनी आवै। इण कारण आपणै बडेरां सोच-समझ’र कैबतां घड़ी है। इण कैबत रै लारै ई अेक घटना है, उणनैं सावळसर जाण्यां कैबत रो अरथ खुलै। ध्यान सूं पढो-

अेकर री बात है गाम में दो भाई घणै प्रेम सूं सागै रैवता। अेक दूजै सूं अणूतो हेत। समैजोग सूं बां भायां री लूगांयां रै कीं खटपट हुई अर देराण्यां-जेठाण्यां रै मूंछां अड़ण लागगी। थोड़ा दिन छोटीमोटी बात हुई पण पछै घणी खिंचगी बर छेकड़ दोनां भायां रै आणजाण बंद हुग्यो। आपसै में बोलण बतळावण रो ई काम नीं। थोड़ै दिनां पछै बडोड़ै भाई रै घरै सवामणी रो आयोजन। सगळो कडूंबो सिगर्यो नूंतीज्यो उण भेळै नेवगी सूं छोटकियै भाई रै घरै ई नूंतो दिराइजग्यो। मारवाड़ में आ परंपरा है कै बाकी लोग तो नेवगी रै नूंतै सूं ई आज्यावै पण कडूंबै में नेवगी रो नूंतो तो दीरीजै ई है। घरवाळां कानीं सूं बुलावो फेर दिराइजै। नेवगण बां घरां में बुलावो देवण जावै। नेवगण रै बुलावै रै पछै कड़ूंबै रा लोग जीमण आवै।

छोटकियै रै घरै उणरी भाभी नेवगण सूं बुलावो कोनी दिरायो अर नां खुद कैयो कै पधारो। आ जाण’र छोटकियो दुखी हुयो। पण बो आपरै भाई री मजबूरी जाणै हो। उणरै मन में आज ई आपरै भाई रै प्रति आदर अर नेह हो। इण कारण जद सगळा लोगबाग आया तो छोटकियो भाई बिना बुलावै ई बडोड़ै भाई रै घरै आयग्यो। आपरै छोटै भाई नैं आयोड़ो देख’र बडो भाई मन ई मन घणो राजी हुयो पण लुगाई री कळै सूं डरतै बण छोटै भाई सूं बात कोनी करी। सगळां भेळो छोटकियो ई जीमण बैठग्यो। आपरै लाडलै भाई नैं जीमतां देख’र बडै भाई नैं बाळपणै रा बै दिन याद आया जद छोटो भाई बडोड़ै रै हाथ सूं परोसेड़ी जीमतो।

पैली रै टेम में जीमणवार में घी उपर सूं घालण री परंपरा ही। मोटो लोटो, कुलडि़यो का इयांकलो ई कोई पात्र लेय’र घरधणी सगळां री मनवार करतो। बडोड़ो भाई आपरै हाथ में घी रो बरतण लेय’र सगळां नैं परोसतो आपरै भाई रै कनैं सी आयो, जितै उणनैं आपरी लुगाई याद आयगी। बण मन में बिचार कर्यो कै जे मैं छोटै भाई नैं म्हारै हाथां घी परोस्यो तो अबार ई गोधम माचसी। वो आपरी लुगाई री आदत जाणतो। इण खातर बडोड़ै भाई दिमाग सूं काम लियो। जद छोटै भाई सूं कीं दूर हो जणांसी बो जाणबूझ’र आखड़ग्यो अर पड़ण रो नाटक कर्यो। पण पड़तै पड़तै आपरै हाथ में लियोड़ै घी वाळै कूलडि़यै नैं भाई री थाळी में खिणा दियो। बठै बैठ्या लोग इणरी चाल अर मजबूरी दोन्यां नैं समझग्या अर बोल्या –

भाई कै भाई मन भायो, बिना बुलावै जीमण आयो।
आखडि़यो सौ पडि़यो नांहीं, घी ढुळ्यो तो मूंगां मांहीं।।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

 

One comment

  • lalit kumar

    शानदार रचना ईण स्यु पेली ई बात रो ठा कोनी हो क घी मूंगा म कदू ढूळ बा लाग्यो हो

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