माँ हिंगलाज का छंद – कवि अज्ञात

hinglaj-mata

॥दोहा॥
आद भवानी ईसरी, मोर भवानी माय।
कळा रचै अब कांमणी, रमै गिरंदां राय॥ 1 ॥

॥छंद: नाराच॥
भमंक अंज काळ भंज सिंघ संज सज्जियै।
झमंक झंझ ताळ खंज वीर डंज बज्जियै।
चौसठ्ठ मझ्झ रास रंझ स्याम मंझ सम्मियै।
गिरंद गाज बीण बाज हिंगळाज रम्मिये।
मां हिंगळाज रम्मिये जि हिंगळाज रम्मिये॥ 1॥

चुडी भुजाळ वीण वाळ नाग डाळ रम्मिये।
त्रशूळ ताळ खग्ग झाळ खप्पराळ खम्मिये।
सिंदूर ढाळ विक्कराळ डम्मवाळ डम्मियै।
गिरंद गाज बीण बाज हिंगळाज रम्मिये।
मां हिंगळाज रम्मिये जि हिंगळाज रम्मिये॥ 2॥

खेलां खिलाय रंग माय घुंघराय घम्मिये।
अखाड माय रम्म राय झांझराय झम्मिये।
सहाय माय सुर्रराय आय साय अम्मियै।
गिरंद गाज बीण बाज हिंगळाज रम्मिये।
मां हिंगळाज रम्मिये जि हिंगळाज रम्मिये॥ 3॥

हिलंत हार मोति सार नग्ग झार मांणिये।
जडाउ तार ग्रीळ धार जोत सार जाणिये।
अपार पार ग्रीव धार तेज पुंज तम्मिये।
गिरंद गाज बीण बाज हिंगळाज रम्मिये।
मां हिंगळाज रम्मिये जि हिंगळाज रम्मिये॥ 4॥

~~कवि अज्ञात
कवि गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” द्वारा सम्पादित पुस्तक “करनी कीरत” से

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