गीत चंदू माऊ नै अरज

प्रहास साणोर
सच साद तूं ऊदाई सांभल़ै सँतरी,जाणगर मरम री सरव जाणै।
शरम नै रखावण आवजै सहायक,ताकड़ो होफरी जोर ताणै।।१

डूबर्यो कवि दुख दधि में डोकरी,छोकरै तणै ओ साद छेलो।
विनासण विघन नै बावड़ै बीसहथ,हांमल़ी मावड़ी सांभ हेलो।।२

आयगी बात आ लारलै आसणां,जतावूं प्रगट कर किसूं ज्यादी।
वेर ही वेर में रटूं इक बातड़ी,देर मत लगाड़ै अबै दादी।।३

वदन असलाक धर बूढापै बैठसी,ऊचरतां साद नह साय आसी।
काज इक टकै रो सरै नीं कवि रो,जोवतां तिहारै लाज जासी।।४

पुकारां सुणै नीं पात री प्रीत सूं,किणी दिस जाय हूबाड़ काढै।
मावितर सांभलै शरम रै मारियो,मनां री मनां में रखूं माडै।।५

म्हारै मनां री बात सारी मुदै,छतापण तोर सूं नको छानी।
भुजंग तो मरि जा डांग भागै नहीं,खरै मन देखजै मूझ खानी।।६

भरोसो गीध नै तिहारै भुजां रो,अडग विश्वास में अरज आखै।
काज नै चंदू मा सुधारै दया कर,राज तूं सदा ज्यूं लाज राखै।।७

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