गोविंद भज रै गीधिया

KrishnBansuri

गोविंद भजरै गीधिया, जाय रह्य दिन जाण।
विसर मती तूं बैवणो, आगै वाट अजाण।।१
गोविंद भज रै गीधिया, दिन जोबन रा दोय।
आगै जासी एकलो, करै न साथो कोय।।२
गोविंद भज रै गीधिया, हिलै जितै पग हाथ।
वदन आवसी बूढपण, बोल सकै नी बात।।३
गोविंद भज रै गीधिया, अजै समझ नै आज।
काल काल में कालिया, कछु ना सरसी काज।।४
गोविंद भज रै गीधिया, तन में जद तक ताण
करै ढील मत कालिया, जुड़ण जितै जमराण।।५
गोविंद भज रे गीधिया, चलणो अगै चितार।
परहर दे कूड़ा प्रगट, सत री लीजै सार।।६
गोविंद भज रे गीधिया, चूक मती उर चेत।
जग जाल़ा जकड़ीजियो, हर सूं छूटो हेत।।७
गोविंद भज रे गीधिया, बगत रही है बीत।
म्हारी थारी मूरखा, गाणा छडदे गीत।।८
गोविंद भज रे गीधिया, टेर कहै मन तूझ।
कालाई में काल़िया, ऊंधो मती अल़ूझ।।९
गोविंद भजरै गीधिया, ग्रंथां लेयर ग्यान।
मटक मती मोहजाल़ मे, धर उण रो कछु ध्यान।।१०
गोविंद भज रे गीधिया, वीर !जाणै कछु बात।
हाथ तिहारे हेरले, गाढ जितै तक गात।।११
गोविंद भजरै गीधिया, कर उर परै कपट्ट।
धिन इण री धणियाप सूं, जम ना दिये झपट्ट।।१२
गोविंद भजरै गीधिया, छल़ बल़ दीजै छंड।
सतगत मिल़सी सांपरत, दटसी जम रा दंड।।१३
गोविंद भजरै गीधिया, निजरां करै नजीर।
पद परमेसर पामियो, प्रगट केईक पीर।।१४
गोविंद भजरै गीधिया, करदे पासै कूड़।
संगत कर सैणां तणी, धीठां लारै धूड़।।१५
गोविंद भजरै गीधिया, आतम री सुण ऐन।
जस तो मिल़सी जगत में, चित नै मिलसी चैन।।१६
गोविंद भजरै गीधिया, नकटां सूं तज नेह।
नित्त तिलोकीनाथ रो, दत चित चरणां देह।।१७
गोविंद भजरै गीधिया, नामी नाम निहार।।
अटक्यो बेड़ो आण नै, परतख करसी पार।।१८
गोविंद भजरै गीधिया, अडग झाल नै ओट।
ओ ई एक उतारसी, पापां वाल़ी पोट।।१९
गोविंद भजरै गीधिया, जब तक हिलै जबून।
करसी माफी केसवो, खट कितराई खून।।२०
गोविंद भजरै गीधिया, कर कर मन में कोड।
मिनख जमारै मूढ मन, हुवै न इणरी होड।।२१
गोविंद भजरै गीधिया, बीजी बात विसार।
वेद शास्त्र भेद बोह, निकल़्यो एक नितार।।२२
गोविंद भजरै गीधिया, कर पासै सब काम।
सुखदायक संसार में, आगै दैण अराम।।२३
गोविंद भजरै गीधिया, सुण रतनू सुभियाण।
सरण चहै घणश्याम री, करण चहै कलियाण।।२४
गोविंद भजरै गीधिया, देख मती कर देर।
मिल़ै चौरासी चूकियां, फल़ भुगतण नै फेर।।२५
गोविन्द भजरै गीधिया, ग्रंथ कहै सुण गूढ।
लगन धार मन लेयले, माधव सरणो मूढ।।२६
गोविंद रा गुण गीधिया, गाय सकै तो गाय।
धुर निजरां में अमर धन, पाय सकै तो पाय।।27

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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