हालाँ झालाँ रा कुँडळिया – ईसरदास जी बारहट

हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” ईसरदास जी की सर्वोत्कृष्ट कृति है। यह डिंगल भाषा के सर्वश्रेष्ट ग्रंथों में से है। अपने कवि धर्म का पालन करने के लिए भक्तवर व भक्ति काव्य के प्रधान कवि इसरदास जी को इस वीर रस के काव्य का सर्जन क्यों करना पडा इसके पीछे निम्नलिखित किंवदंती प्रसिद्ध है।

एक बार हलवद नरेश झाला रायसिंह ध्रोळ राज्य के ठाकुर हाला जसाजी से मिलने के लिए ध्रोळ गये। ये उनके भानजे होते थे। एक दिन दोनों बैठकर चौपड़ खेलने लगे। इतने में कहीं से नगाड़े की आवाज इनके कानों में पड़ी। सुनकर जसाजी क्रोध से झल्ला उठे और बोले – “यह ऐसा कौन जोरावर है जो मेरे गांव की सीमा में नगाड़ा बजा रहा है” फौरन नौकर को भेजकर पता लगवाया गया। नौकर ने आकर कहा – “हूजूर मकन भारती (मुकुन्द भारती) नामक दिल्ली के किसी मठाधीश की जमात माँ हिगळाज की यात्रा को जा रही है और उसी का नगाड़ा बज रहा है।“ यह सुनकर जसाजी बोले – “तब कोई हर्ज नहीं है। नगाड़ा बजने दो।“

झाला रायसिंह अभी तक चुपचाप बैठे थे। जसाजी के अन्तिम वाक्य को सुनकर कहने लगे – “यह तो गाँव का रास्ता है। सैकड़ों आदमी आते जाते रहते हैं। नगाड़े भी बजते ही हैं। इसमें नाराज होने की कौनसी बात है? यदि यह किसी जमात का नगाड़ा न होकर किसी राजा का नगाड़ा होता तो आप क्या कर लेते?” जसाजी ने उत्तर दिया – “मैं उन नगाड़ों को तुड़वा कर फिंकवा देता। मेरे राज्य में किसी दूसरे राजा का नगाड़ा नहीं बज सकता।“

यह गर्वोक्ति रायसिंह को चुभ गई। बोले – “अच्छी बात है। युद्ध के लिए तैयार रहिए। इसी गाँव में झाला रायसिंह का नगाड़ा बजेगा।“ चौपढ़ खेलना बंद हो गया। रायसिंह उठकर हलवद चले गये।

अपनी प्रतिज्ञानुसार कुछ दिनों बाद रायसिंह अपने दलबल सहित ध्रोळ जा पहुँचे और नगाड़ा बजाया। अपने भानजे पर हथियार उठाना अनुचित समझ कर जसाजी ने उन्हें बहुत समझाया-बुझाया और वापस लौट जाने को कहा। परन्तु उन्होंने एक न सुनी। निदान जसाजी को रणभूमि में उतरना पड़ा। भारी युद्ध और भयंकर कटाकटी हुई। अंत में जसाजी वीरता से लड़ते हुए काम आए और रायसिंह के भी बहुत से घाव लगे। यह घटना वि.सं. १६२० की है।

कहते हैं कि वीरवर जसाजी हाला ने रणभूमि में अपने अंतिम क्षणों में महाकवि ईसरदास जी को उनके पोते धूना के साथ सन्देश भेजा था कि “है धूना ! तुम तुम्हारे दादा महाकवि ईसरदासजी को कहना कि मैंने यह युद्ध जो हलवद नरेश रायसिंह झाला के साथ लड़ा है इसका वर्णन अपनी काव्य-वाणी में करें तभी मेरी मुक्ति होगी।” धूनाजी (जो स्वयं युद्ध में शामिल थे तथा बहादुरी के साथ लड़े थे) ने इस युद्ध तथा जसाजी के इस युद्ध में शौर्य प्रदर्शन का आँखों देखा हाल बताते हुए जसाजी के सन्देश को संचाणा जाकर सुनाया। वीर जसाजी की अंतिम इच्छा का पालन करने के लिए कवि-धर्म एवं मानवीय धर्म का निर्वाह करते हुए महाकवि ईसरदासजी ने “हालाँ झालाँ रा कुँडळिया” के रूप में इस वीर-रस प्रधान महान काव्य-कृति की रचना की जिसने जसाजी, रायसिंह और ईसरदास तीनों के नाम को अमर कर दिया।

जसाजी और रायसिंह लड़े थे, यह लड़ाई सं० १६२० में हुई थी और जसाजी इस झड़प में मारे गये थे, ये बातें सही हैं और इतिहास-ग्रंथों में इनका उल्लेख मिलता है। परन्तु इस लड़ाई का जो कारण उल्लिखित किंवदंती मे बताया गया है वह कुछ शंकास्पद है और इसके सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद भी है।

यह ग्रन्थ मूल रूप में कितने पद्यों का था इसका ठीक ठीक पता नहीं लगता। इसकी प्राचीनतम प्रति जो देखने में आई है वह स. १६९८ की लिखी हुई है जिसमे कुल ५० पद्य है। इसके बाद की प्रतियों में कुछ में ५० कुछ में ५० से कम पद्य मिलते हैं। यह ग्रन्थ वीर रस का है।

‘हालाँ झालाँ रा कुंडलिया’ कोई क्रमबद्ध, कथायुक्त ग्रन्थ नहीं है। इसके प्रायः सभी छंदों में प्रथम दो चरण दोहे के हैं जिसमे कोई मौलिक भाव अथवा सिद्धांत वाक्य कहा गया है तथा अंतिम चार चरणों में उसी सिद्धांत को प्रयोग में लाते हुए जसाजी अथवा उनके वीर साथियों की वीरता के बारे में लिखा गया है।

।।हालाँ झालाँ रा कुँडळिया।।

हालाँ झालाँ होवसी सीहाँ लत्थौवत्थ।
घर पैलाँ अपणावसी कै अपणी पर हत्थ।।
करै धर पारकी आपणी जिकै नर।
केवियाँ सीस खग-पाण करणा कचर।।
सत्रहराँ नारि नहँ नीद भरि सोवसी।
हलचलाँ सही हालाँ घरै होवसी।।१।।

धीरा धीरा ठाकुराँ गुम्मर कियाँ म जाह।
महुँगा देसी झूँपड़ा जै घरि होसी नाह।।
नाह महुँगा दियण झूँपड़ा न्रिभै नर।
जावसौ कड़तळाँ केमि जरसौ जहर।।
रूक-हथ पेखिसौ हाथ जसराज रा।
ठिवंताँ पाव धीरा दियौ ठाकुराँ।।२।।

घोड़ाँ हींस न भल्लिया पिय नींदड़ी निवारि।
बैरी आया पावणाँ दळ-थँब तूझ दुवारि।।
दळ-थँब तुझ दुवारि झुँझारि धवळ तणा।
घणाँ विरदाँ लहण आविया अरि घणा।।
घणाँ नींदाळवाँ नींद वारौ घणी।
तूंग नहँ छै भली हास घोड़ां तणी।।३।।

ऊठि अचूंका वोलणा नारि पयंपै नाह।
घोड़ाँ पाखर घमघमी सींधू राग हुवाह।।
हुवौ अति सींधवौ राग बागी हकाँ।
थाट आया पिसण घाट लागै थकाँ।।
अखाड़ाँ जीति खग अरि घड़ा खोलणा।
ऊठि हरधवळ सुत अचूंका वोलणा।।४।।

ऊठि अढंगा बोलणा कामणि आखै कंत।
अै हल्ला तो उपराँ हूँकळ कळळ हुवंत।।
हूँकळै सीधवौ वीर कळहळ हुवै।
वरण कजि अपछराँ सूरिमाँ बह बुवै।।
त्रिजड़-हथ मयंद जुध गयंद-घड़ तोलणा।
ऊठि हरधवळ सुत अढंगा बोलणा।।५।।

काळौ मंजीठी कियाँ नइणै नींदालुद्ध।
अंबर लागौ ऊठियौ विढवा वंस विसुद्ध।।
वंस विसुद्ध वरीयाम साम्हौ विढण।
घणा दिसि दोइणाँ म्हाँलियौ विरद घण।।
थूरहथ धवळरौ थाट मैं बट थियौ।
काळ-चाळौ चखाँ चोळबोळाँ कियौ।।६।।

माल्हंतौ घरि आंगणै सखी सहेलौ ग्रामि।
जो जाणूँ पिय माल्हणौ जै मल्है संग्रामि।।
ग्रामि संग्रामि झूँझार माल्है गहड़।
अरि घड़ा खेसवै आप न खिसै अनड़।।
घाइ भांजै घड़ा खाग त्राछै घणौ।
मेर मांझी जसौ हेक रिण माल्हंणौ।।७।।

एकौ लाखां आंगमैं सीह कहीजै सोय।
सूराँ जेथी सेड़ियै कळहळ तेथी होय।।
कळळ हूँकळ अवसि खेति सूरा करै।
धीरपै सुहड़ रिण चलण धीरा धरै।।
आगि वज्रागि जसवंत अकळावणौ।
खाग बळि एकलो लाख दळ खावणौ।।८।।

सादूळौ आपा समौ वियौ न कोय गिणंत।
हाक बिडाणी किम सहै घण गाजियै मरंत।।
मरै घण गाजियै जिकौ सादूळ महि।
सत्राँ चा ढोल सिर सकै किम जसौ सहि।।
वयण घण साँभळे रहै किम वीसमौ।
सुपह सादूळ कुणि गिणैं आपा समौ।।९।।

सीहणि हेकौ सीह जणि छापरि मंडै आळि।
दूध विटाळण कापुरस बौहळा जणै सियाळि।।
घणा सियाळि जे जणै जंबूक घणां।
तोहि नहँ पूजवै पाण केहरि तणा।।
धूणि खग ऊठियौ अभंग साम्हौ धणी।
सीह जसवंत जिसौ हेक जणि सीहणी।।१०।।

केहरि मरूँ कळाइयाँ रुहिरज रत्तड़ियाँह।
हेकणि हाथळ गै हणै दंत दुहत्था ज्याँह।।
दंत दुहत्था ज्याँह हाथियाँ सबळ दऴ।
आवधाँ अरहरां चूर करणै अकळ।।
रोळसी खळदळाँ चखाँ रातंबरी।
कळायाँ मरूँ त्याँ जसौ गज केहरी।।११।।

केहरि केस भमंग-मणि सरणाई सुहड़ाँह।
सती पयोहर क्रपण धन पड़सी हाथ मुवाँह।।
मूवाँ हिज पड़ैसी हाथ भमंग-मणि।
गहड़ सरणांइयाँ ताहरै गैडसणि।।
काळ ऊभौ जसौ, सकै नेड़ा करी।
कुणि सती पयोहर मूछ लै केहरी।।१२।।

सखी अमीणा कंथ रौ अंग ढीलौ आचंत।
कड़ी ढहक्कै वगतराँ नड़ी नड़ी नाचंत।।
नड़ी नाचै भिढ़ै छोह लोहा भिळै।
ऊससै सुवप मुख-मूँछ भोहाँ मिळै।।
खगाँ उनगाँ पिसण पाड़ि ऊभौ खड़ौ।
कहूँ इण भाँति ढीलौ सखी कंथड़ौ।।१३।।

ग्रीझणि काँई उतावळी हय पलाणतां धीर।
काय बेसाणूं सत्र-सिर काय आपणै सरीर।।
आपणै गात काय अरि कमळ ऊपराँ।
चापड़े रातड़ामुखाँ आमिखचराँ।।
धीर हय पलाणत कहै साम्हौ धणी।
गयण मग आकुळी फिरै किम ग्रीझणी।।१४।।

थोड़ा बोलौ घण सहौ नहचै जो नेठाह।
जो परवाड़ा आगलौ मित्र करीजै नाह।।
नाह इसड़ा नराँ वात बिगड़ै नहीं।
सोना री कसवटी खरी पूजै सही।।
घणा मझ घातियाँ भार झालै घणौ।
वहुत अबगुण कियाँ थोहड़ो बोलणौ।।१५।।

ल्यावै लोड़ि पराइयाँ नहँ दै आपणियाँह।
सखी अमीणा कंथ री उरसाँ झूँपड़ियाँह।।
लोड़ि धर वीर वर पराई ल्यावणा।
आपणी न दै भड़ जिकै अघ्रियामणा।।
बरण कजि अपछरा वाट जोवै खड़ी।
ज्याँ भड़ाँ तणी झिल्लै उरस झूँपड़ी।।१६।।

सखी अमीणा कंत रौ औ इक बड़ौ सुभाव।
गळियाराँ ढीलो फिरे हाकाँ वागाँ राव।।
वाजियाँ वीर-हक विहस लागै विढण।
विलम न धारै करताँ अपछर वरण।।
आवरत जसै अरि घड़ा अघ्रियामणौ।
ताइ हे सखी साभाव कंता तणौ।।१७।।

जसवँत गुरड़ न उड्डही ताळी त्रजड़ तणेह।
हाकलियाँ ढूला हुवै पंछी अवर पुणेह।।
हुवै पँखराव जिम बीर हाकालियाँ।
थरहरै कायराँ उवर ढीला थियाँ।।
छोह करताळियाँ चिड़कला छड्डही।
अभंग जसवँत जुध गुरड़ नहँ उड्डही।।१८।।

सैल घमोड़ा किम सह्या, किम सहिया गजदंत।
कठण पयोहर लागताँ, कसमसतो तूँ कंत।।
कंत सूँ ओळंबो दियै इम कामणी।
अैण घट आजरा कैम सहिया अणी।।
ईखता आप नारंग-फळ आकरा।
सह्या किम कंत, अै घाव घट सैलरा।।।।१९।।

मतवाळा घूमै नहीं नहँ घायल बरड़ाय।
बाळि सखी ऊ द्रंगड़ौ भड़ बापड़ा कहाय।।
बाळि ऊ द्रंगड़ौ बसै भड़ बापड़ा।
घाव अंग सहै नहँ विभाड़ै अरि-घड़ा।।
घणा जसवंत रा जोध विहसै घणा।
मांडिसी सही मतवाळा बेढीमणा।।२०।।

सांई एहा भीचड़ा मोलि महूँगे वासि।
ज्याँ आछन्ना दूरि भौ दूरि थकाँ भौ पासि।।
रहै किमि पासि भौ राखियाँ रावताँ।
स्यामि रै कामि हणवँत जिसा सावताँ।।
खत्री गुर वासिया मोलि महूँगा खरा।
अरि-घड़ा भाँजिसी भीच जसवंत रा।।२१।।

सिणगारी सन्नाह सूँ विसकामणि वरियाम।
वरि आई हालाँ वरण करण महाजुध काम।।
काम संग्राम ची हाम जुध कामणी।
घणा नर जोवती भोमि आई घणी।।
महाबळ धवळरा साहि वरमाळ तूँ।
सबळ धड़ कड़तळाँ घणा सन्नाह सूँ।।२२।।

फेरा लेतै फिर अफिर फेरी घड़ अणफेर।
सीह तणी हरधवळ सुत गहमाती गहढ़ेर।।
गहड़ घड़-कामणी करै पाणी ग्रहण।
करगि खग वाहतौ जुबा जूसण कसण।।
कोपियै छाकियै चहर भड़ अहर करि।
फुरळतै पिसण घड़ फेरवी अफिर फिरि।।२३।।

चढ़ि पोरिस वर सोह चढ़ि चढ़ि रिण तोरणि चालि।
कुंवारी घड़ कड़तळाँ झूँझ भार भुज झालि।।
झालियै भार झूँझारि भुजि झालियै।
पाट ऊधौर हालाँ वखत पालियै।।
पौह घणा भागलाँ गई मुहराइ पड़ि।
चाव गुर जसौ जिण वार सोह चड़ि।।२४।।

म्है परणंती परखियौ सूरति पाक सनाह।
धड़ि लड़िसि गुड़िसि गयँद नीठि पड़ेसी नाह।।
नाह नीठि पड़िसी खेत मांझी निवड़।
गयंद पड़िसि गहर करड़ घड़ भड़ गहड़।।
विढंतौ जसौ बिसकन्या बाखाणियौ।
परणती कंथ चौ मुरड़ पहचाणियौ।।२५।।

आपै ही जाणावसी भलौ ज होसी वग्गि।
कै माँगिण दरसावियाँ कै ऊछजियाँ खग्गि।।
खागि ऊछाजियै खंडै रिण अरि दळाँ।
सूर प्रगटाहियै सौ सराँ साबळाँ।।
अभंग जसवंत जुध काम कजि आवियौ।
जुडंताँ धवळ रौ भलौ जाणावियौ।।२६।।

पिलंगि महारिण पौढियौ काळौ भलां कहाय।
जस जोबण साजै जसौ मणिमथ फौज मल्हाय।।
मल्हाँवण फौज बिसकामणी मानियौ।
इसौ दीठौ न को बींद अहवानियौ।।
अभंग जसवंत जुधि काजि करि अंगो अंगि।
पौढियौ घड़ा पौढाय चौरंग-पिलंगि।।२७।।

ग्रीझणि दीयै दुड़बड़ी समळी चंपै सीस।
पंख झपेटां पिउ सुवै हूं बळिहारि थईस।।
थई बळिहारी झूंझार रोळण थटाँ।
सेन रायसिंघ रा सामठा सुभटां।।
घणा भड़ पाड़ि अरि-नारि रांडी घणी।
गहड़ भड़ पोढियौ दुड़बड़ी ग्रीझणी।।२८।।

रिण सोहा रिण सूरमा वीकौ सोम वखाणि।
नायक पायक भड़ निवड़ अरि भंजण आराणि।।
रांण आराणि अरि भांजिताँ रूक-हथ।
सूर साराहिया सोम वीकौ समथ।।
खंड पड़तीस सो विहूं ऊडै खरा।
राय गुर बखाणै बंधव रायसिंघ रा।।२९।।

हेक पराया जव चरौ हालौ ऊगाँ सूर।
दाढाळा भूँडण भणै भागाँ-भाखर दूर।।
दूरि दळ देख जसवंत थइयौ दई।
कोड़ लग पाखर्या कटक आयौ कई।।
हाक कुणि करै जसवंत सूँ हलचलौ।
उड्डियाँ लोह अंबर अड़ै हेकलौ।।३०।।

हे पणिहारी वापड़ी जहरी सूँ वर जाय।
केड़ै कटकाँ लूँबियाँ लायक मरसी आय।।
आवसी जिकौ नहँ जावसी अपूठौ।
महा मैमंत काळौ चखाँ मजीठौ।।
अणी चढ़ि खेति जसवंत सूँ आहुड़ी।
पिय नखै पौढ़सी नहीं पणिहारड़ी।।३१।।

सींगाळौ अवखल्लणौ जिण कुळ हेक न थाय।
जास पुराणी बाड़ जिम जिण जिण मत्थै पाय।।
जिण मत्थै इसा भड़ न हूवै प्रचंड।
बाघउत रिम घड़ा करै खागाँ विखंड।।
झूंझ झूंझार भड़ राजसी झल्लणौ।
एक अवनाड़ सींगाळ अवखल्लणौ।।३२।।

बैदाणी ढीलौ घड़े मो कंथ तणौ सनाह।
विकसै पोइण फूल जिम पर दळ दीठां नाह।।
नाह विकसै घणौ कमळ जिम भड़ निवड़।
भड़ घणा पाड़तौ सोभियौ महा भड़।।
विहसतै सहस बळ कड़ी जाय ऊबड़ै।
घाट धड़ कंथ रै जरद ढीलौ घड़ै।।३३।।

केहरि छोटो बहुत गुण मोड़ै गयँदां माण।
लोहड़ बड़ाई की करै नरां नखत परमाण।।
नखत परमाण वाखाण वाघौ नरै।
आवगौ झूँझ रौ भार भुजि आपरै।।
मेटणौ भीड़ भूंजि गयंद री मोटियाँ।
छावड़ वळ हतै कळाइयाँ छोटियाँ।।३४।।

किसन तणौ साम्हौ क्रमै चढ़तौ बांकिम वींद।
नींदवतै नवतै नरां अणभंग रहै अनींद।।
अभंग अणनींद भुजि खाग आवाहतौ।
पिसण घड़ पाड़तौ पूजवै सपत्तौ।।
घणा बाखाणियौ सु तेण पौरिस घणौ।
तेजमलि रहै छळि इसौ किसनै तणौ।।३५।।

सिंघ सरस रायसिंघ रै रहियौ सूझै राम।
आडौ सरवहियौ अछै कळह तणौ धरि काम।।
काम संग्राम चौ हांम मन मां करै।
पड़ै गिरनारि जे पटू मोटा परै।।
अभंग छळि दाखि जस राखि जगि आपरौ।
रहै सथ कड़तळाँ सरस रायसिंह रौ।।३६।।

गढवी गाँगौ गाविजै स्याम न मेल्है साथ।
ओढण अनिकारां नरां हालां रा पण हाथ।।
हाथ आवाहतौ सिंधु रागाँ थियाँ।
सहै झूझा थयाँ बळि जसा रा साथियाँ।।
साथि जसवंत रै सोहियौ समवड़ौ।
गाविजै नेतड़ै रोहड़ै गाँगड़ौ।।३७।।

फिरि फिरि झटका जे सहै हाका बाजंताँह।
त्यां घरि हंदी बंदड़ी घरणीन कापुरसाँह।।
कापुरसाँ घरणी करतार रख्खै करै।
मरै नहँ पिसण खग निबळ आपै मरै।।
अभंग जसवंत जुध काम कजि आहुरी।
फिरि अफिरि फौज करि सुयण झटका फिरी।।३८।।

घुड़ला रुधिर झिकोळिया ढीला हुआ सनाह।
रावतियाँ मुख झाँखणाँ सही क मिळियौ नाह।।
ना मिळियौ सही विरंग रंग नीसरै।
क्रमंताँ प्रथी सिर जेज नहँ को करै।।
रीसियै जसै भड़ रिमां घड़ रौळियाँ।
झूड़ि अस असमराँ रुधिर झबकोळिया।।३९।।

हिरणाँ लाम्बी सींगड़ी भाजण तणौ सभाव।
सूराँ छोटी दांतळी दे घण थट्टाँ घाव।।
घाव घण थटाँ अत पिसण दळ घालणौ।
पाँच से पाखर्यां हेकलो पालणौ।।
राण जसवंत सो राखिया विरणिया।
हाक वागी तठे कूदि गा हिरणिया।।४०।।

गैदंतौ पाडा खुरौ आरण अचळ अघट्‌ट।
भूंडण जै सु भू भलौ थोभै अरियाँ थट्‌ट।।
थाट में वाट विच पिसण दळ थरहरै।
घोड़ला हैजमा कड़तळाँ घरहरै।।
सबळ वाराह हालौ लड़ण आँकड़ौ।
गोसियल राण जसवंत गैदंतड़ौ।।४१।।

उलटौ काय न मार ही पंचायण मैमंत।
कड़तळ दळाँ उपाड़ि करि कड़काय चालौ कंत।।
कंथड़ा झालि किरमाळ केड़ौ कराँ।
सार झड़ वरण सो सोक सैलाँ सराँ।।
कमळ अरियाँ तणा घणा झटकाँ कटै।
उजबकाँ दिसी जसवंत सी ऊलटै।।४२।।

रिमाँ माण मूकै नहीं वैरण गौ वढत्तांह।
घण झूझौ रण भोम ही चढियाँ चाखड़ताँह।।
चढै रण चाखड़ी सामहौ चालियौ।
झूंझतै भलौ रायसिंघ तैं झालियौ।।
तास वरणागिये दीठि मन हेतणौ।
मलफियौ सामहौ कळह बेढीमणौ।।४३।।

ग्रीझणियाँ रतनाळियाँ सिर बैठी सुहड़ाँह।
चाँच न वावै डरपती करड़ी निजर भड़ाँह।।
भड़ाँ करड़ी निजर ग्रीझणी भाळियौ।
अरि घड़ा विढंता भलौ अहवाळियौ।।
खळकियाँ श्रोण तांय बौह घट-खाळियाँ।
रिण भड़ाँ सीस यूँ बैठि रतनाळियाँ।।४४।।

मूँछाँ बाय फुरूकिया रसण झबूकै दंत।
सूतौ सैलाँ धौ करै हूँ बळिहारी कंत।।
कंत बळिहार लै मनाविय कामणी।
धरै मन धू-धड़ै साथि सकळा धणी।।
पाड़ि सत्र लोहडाँ धौ करै पोढियौ।
विमळ मूँछाँ मिळै फरूकै बावियौ।।४५।।

हूँ बलिहारी साथियाँ भाजै नहँ गइयाह।
छीणा मोती हार जिमि पासै ही पड़ियाह।।
पड़ै रिण पाखती छीणवै हार परि।
आवरत फेरि संघारि झूँझारि अरि।।
हाथळै झेरवी कड़तळाँ हाथियाँ।
सहै झुझा थया बळि जसा रा साथियाँ।।४६।।

लै ठाकुर वित आपणौ देतौ रजपूतांह।
धड़ धरती पग पागड़ै अंत्रावळि ग्रीझांह।।
ग्रहै अंत्रावळि उड़ि चली ग्रीझणी।
त्रिहूँ भुयण रही बात सोहड़ाँ तणी।।
ताइयाँ खाँति तरवारियाँ भाँत तह।
लड़ण कजि दियंतौ सुपह सुजि बीत लह।।४७।।

अरक जसौ जगि आथमै गौ चकवाँ गुणियाँह।
भुवण अंधारौ भाँजिसी त्रिभुवण पति कुणित्याँह।।
तियाँ कुणि भाँजिसी भुवण अंधियार तण।
भमै नर संजोगी विजोगी इणि भुवण।।
सुकवि चकवा दुखी सुखी कुणि करै सक।
आजि जगि आथमै जसौ दूजौ अरक।।४८।।

कळपतरू ऊखलि पड़ै जसौ महा धू जाम।
माळाँ गाळाँ ठाम महि तिकौ न सूझै ताम।।
ताम सूझै न कौ ठाम धवळह तणा।
घणा अन राइयाँ रूँख राखै घणा।।
ब्रवै काय रँभ रथ जूथ जाणै सुवर।
पड़ै कवि-पंखियाँ जसौ धू कळपतरु।।४९।।

मरदाँ मरणो हक्क है, ऊबरसी गल्लाँह।
सा पुरसाँ रौ जीवणां, थोड़ौ ही भल्लाँह।।
भलां थोड़ा जीवियाँ, नांम राखै भवां।
खेलियौ भार, हेमजळ माथै खवां।।
कळ चड़ै जसौ जोय, चंद नामौ करे।
मरद सांचा जिकै, आय अवसर मरे।।।।५०।।

~~ भक्त कवि ईसरदास बारहट

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