हमारे गौरवशाली साहित्य से युवा पीढ़ी परिचित हो

यदाकदा खर दिमागी लोगों को चारण साहित्य या यों कहिए कि चारण जाति की आलोचना करते हुए सुनतें या पढ़तें हैं तो मन उद्वेलित या व्यथित नहीं होता क्योंकि यह उनका ज्ञान नहीं अपितु उनकी कुंठाग्रस्त मानसिकता का प्रकटीकरण है। अगर कोई आदमी अवसादग्रस्त है या कुंठाग्रस्त है तो स्वाभाविक है कि उसकी अभिव्यक्ति गरिमामय नहीं होगी। यानि खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे या यों कहिए कि कुम्हार, कुम्हारी को नहीं पहुंच सके तो गधे के कान ऐंठता है।

जिन जिन लोगों ने चारण साहित्य की प्रवृतिगत आलोचना की है वस्तुतः उन्होंने इस साहित्य का ककहरा ही नहीं पढ़ा है। इनकी तो यही स्थिति है जो कबीर ने कही थी कि कूकर ज्यों भुसते रहे, सुनी सुनाई बात।

पहले तो मैं उन मनीषियों के प्रति कृतज्ञ हूं जिन्होंने इस साहित्य की अभिव्यक्ति की शक्ति व मर्म को पहचाना और कहा कि इस साहित्य के सृजकों की बलिहारी लेनी चाहिए या इनकी सेवा में ही लगे रहना चाहिए ताकि उत्तम साहित्य से अनवरत रूप से लाभान्वित हो सके। महारावल़ हरराजजी, महाराजा मानसिंहजी, देवीसिंह जी, सांई दीन दरवेश सहित अनेकों महनीय मनीषियों के साथ एल पी टेस्सीटोरी, गुरूदेव रवीन्द्र, महामना मालवीय जी, सुनीत कुमार चटर्जी, कन्हैयालाल म.मुंशी, झंवेरचंद मेघाणी प्रभृति लोगों ने तो इस साहित्य को वि.वि.पाठ्यक्रमों में शामिल करने व अध्ययन-अध्यापन पर जोर दिया था।

राजस्थान के इतिहास में जो सात सकार सुशोभित हैं उनको अक्षुण्ण रखने में इसी साहित्य सृजकों का अवदान है।

इन्हीं की कलम के सहारे यहां शौर्य, स्वाभिमान, स्वदेश प्रेम, साहस, सुरभि स्वातंत्र्य प्रेम और सत्य के रक्षण के स्वर प्रस्फुटित हुए थे जिनकी अनुगुंज आज भी संवेदनशील लोगों के सरस हृदय में गौरवानुभूति पैदा करती है।

चारण साहित्य को बिना पढ़े उस पर कोई आदमी लिखता है तो मुझे बड़ा तरस आता है। इसलिए नहीं कि मैं एक चारण हूं!! बल्कि इसलिए कि मैं इस साहित्य का अकिंचन पाठक और सुधि श्रोता हूं।

मैं जब जब भी पढता हूं तो एक गौरव मिश्रित आनंद की प्राप्ति महसूस करता हूं। क्योंकि इन मनीषियों के काव्य को जितनी बार पढ़ता हूं उतनी बार ऐसा लगता है कि वे कितने संवेदनशील व गंभीर प्रवृति के धनी थे कि उनकी गिरा गरिमा आज भी कराल काल के भाल को चीर कर अक्षुण्ण बनी हुई है।

आज जो लोग प्रगतिशीलता के ढोंग रचकर जनवाद, मानवाधिकार, मानवीय मूल्य, सांस्कृतिक सरोकार, पददलित आदि के पक्ष में अखबारी बयानबाजी करतें हैं उन्हें रंगरेला वीठू, दुरसाजी आढा, ईसरदासजी बारठ, आसाणंदजी, दलपतजी बारठ, बांकीदासजी, बुधजी आसिया, ऊमरदानजी लाल़स, आदि का काव्य व जीवन चरित्र पढ़ना चाहिए ताकि उन्हें पता चले कि निरंकुश सत्ता की संवेदना जागृत करने में इनका क्या योगदान था?

रंगरेला की ‘जैसलमेर रो जस’, दुरसाजी की ‘किरतार बावनी, विरद छिहतरी’, ईसरदासजी का ‘हरिरस, गुण निंदा स्तुति’, बांकीदासजी के गीत, आसाणंदजी के फुटकर दोहे, दलपतजी की ‘पिता मार पच्चीसी’, करनीदानजी कविया का ‘जती रासो व फुटकर गीत दोहे’, ऊमरदानजी का ‘ऊमर काव्य’ एकबार यह आलोचक पढ़कर अपने हृदय पर हाथ देकर कल्पना करें कि आज के छल प्रपंच से जीते वार्ड पंच, सरपंच, एम.एल.ए. व सांसद को उनके छल़ प्रपंच के बारे में बेबाकी से बताने की हिम्मत रखतें हैं या उनका कलेजा ऐसी कल्पना मात्रा से सिहर उठता है!!

ईसरदासजी को लोग केवल भक्त कवि के रूप में ही जानतें हैं जबकि वे मानवाधिकार के मसीहा, आमजन के हिमायती, तथा समन्वयवादी दृष्टिकोण के प्रचारक थे। कितने लोग जानतें हैं कि अहीरों के लिए इसलिए जेल गए थे कि उन्होंने गरीब अहीरों की बादशाह को जमानत दी थी और समय पर अहीर कर्ज भर नहीं सके तो जनवादी ईसरदासजी उनके लिए स्वयं जेल चले गए थे। आज के जनवादी केवल किताबी नारे लगाते या जन के नाम पर धन बटोरते हैं। दुरसाजी आढा की ‘किरतार बावनी’ दीन हीन, बेबस मानव की करुण कहानी का जीवंत दस्तावेज है तो विरद छिहतरी स्वातंत्र्यता का अमर उद्घोष है।

रंगरेला ने जो कहा वो आज हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का रोने वाले कहने की सोच ही नहीं सकते!! वे जेल गए, यातनाएं सही लेकिन तत्कालीन राज व्यवस्था का सटीक चित्रण करने से पैर पीछे नहीं खींचे। जिन बखतसिंह ने निष्ठुरता के साथ अपने पिता अजीतसिंहजी की निर्ममता से हत्या कर दी थी, उन्हें उनकी हकीकत बताने की जो जीवटता दलपतजी बारठ ने प्रदर्शित की, उसकी आज हम कल्पना ही नहीं कर सकते।

अगर उन्हें मेरी बात अतिरंजित लगती हो तो वे किसी ऐसे जनप्रतिनिधि, जिन पर पांच-सात मुकदमे दर्ज हैं (नाम लिखना उचित नहीं रहेगा)की काव्य में आलोचना करके देखलें !! उन्हें क्या पारितोषिक मिलता है और वे उसे कितना पचा पाते हैं।
क्रमशः

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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