रंग! रे दोहा रंग! – हंस की अन्योक्ति


आज कल सोशियल मीडिया साहित्यिक ज्ञान के आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है। सोशियल मीडिया पर ट्वीटर पर हाल ही में प्रताप सोमवंशी साहब जो कि दैनिक हिंदुस्तान में वरिष्ठ संपादक है और देश के बहुत ही उम्दा शायरों में शुमार एक शायर हैं, नें कुछ दिन पूर्व जब एक लोक दोहा जो हंस पर था वह शेयर किया जो उन्होंनें 1959 में कुतुर्उरल एन हैदर द्वारा लिखी किताब “आग का दरिया” में पढा था। दोहा कुछ यूं था।

ताल सूख पत्थर भयो, हंस कहीँ न जाय।
पीत पुरानी कारणे, चुन-चुन कांकर खाय।।

तो इस दोहे की वजह से उनसे साहित्यिक संवाद का स्वर्णिम अवसर मिला और मुझे लगा कि क्यों न हंस पर लिखे अन्य अन्योक्ति परक प्राचीन दोहे जो मेरे संज्ञान में है सुधि पाठकों के बीच साझा किये जाएँ ?

अन्योक्ति भारतीय वांग्मय में एक अलंकार है जिसमें किसी एक पात्र को संबोधित कर कर के दोहा या मुक्तक कहा जाता है। संस्कृत सुभाषित और दोहे में अपार अन्योक्ति परक सुक्तियां भरी पडी है। हंस एक शालीन व्यक्तित्व के धनी गुणी सज्जन का प्रतीक है।

हंसा आ पारख्खडी, छीलर जल़ न पियंत।
मान सरोवर कै पिये, कै तरसिया मरंत।।
हंसों की यही पहचान होती है कि वह छोटे छोटे पोखर या तालाब का जल कभी नहीं पीते। या तो वो मानसरोवर का जल पियेंगें या फिर प्यासे ही मर जाना पसंद करते है।

सर सुक्यौ बेल़ू हिली, पाणी गयो पताल़।
औगण गारा हंसला, तउ न छोडी पाल़।।
सरोवर सूख गया है, रेत दिख रही है और जलस्तर पाताल में चला गया है। फिर भी अपने पर किए गये उपकार की वजह से हंस किनारे पर ही बैठा है।

पाल़ पुराणी जल़ नयो, हंसो बैठो आय।
प्रीत पुराणी कारणै, चुग चुग कंकर खाय।।
तट वही पुराना है सिर्फ उस में जल नया भर गया है। हंस उसी तालाब के किनारे वापस आकर बैठा है। पुरानी प्रीति का निर्वहन करते हुए वह कंकड़ चुगकर ही अपना जीवन निर्वाहन कर रहा है।

डीघी पाल़ तल़ाव री, हंसा बैठा आय।
प्रीत पुराणी कारणै, चुग चुग कंकर खाय।।
तालाब का किनारे पर हंस आकर बैठा है, पानी सूख गया है। परंतु पुरानी प्रीत का निर्वहन करते हुए हंस तालाब को न छोड़ कर चुन चुन कर कंकड़ चुनकर खा रहा है।

मन नहीं डिगै मराल़, केता ही लांघण करो,
मुकता चुगै जमाल, चुगै न कांकर नाथिया।।
कवि नाथिया नाम के किसी व्यक्ति को संबोधित करके सोरठे में कहता है कि हे नाथिया! मराल का मन विचलित कभी भी नहीं होता, भले वह कितने ही दिन भूखा क्यो न रहे। वह मुक्ता(मोती) ही चुगेगा वह कभी भी कंकड पत्थर नहीं चुगेगा।

हंसा बिरद बिचार ले, चुगै त मोती चुग्ग।
नातर रहजै लांघणौ, जीणा किताक जुग्ग।।
कवि हंस की अन्योक्ति से किसी सज्जन और गुणी को संबोधन करके कहता है। हे हंस तु अपने बिरद और रूतबे का सदैव खयाल रख, चुगना चाहे तो मानसरोवर के मोती ही चुग। अगर मोती न मिले तो भुखे रहना ही श्रेयस्कर है। हमे अब और ज्यादा थोडे ही जीना है।

भमता भमता हंसडे, दीठा बहुविध नीर।
(तउ)एक घडी न बीसरै, मानसरोवर तीर।
अपने जीवनकाल में देश विदेश का हंस नें भ्रमण करते हुए अलग अलग देश के नीर को निहारा, फिर भी वह मानसरोवर के तीर की यादें नही भुल पाया।

हंसा तहाँ न जाइये, जहाँ न आदर भाव।
कग-बग, बग-कग, बगग-कग, कग बग कगग कहाव।।
कवि हंस को संबोधित करते हुए कहता है कि हे हंस उस जगह हरगिज मत जाना जहाँ तुम्हारा कोई मान सम्मान या आदर न हो। जहाँ, तुम को बगुला या कौआ समझा जाए या पुकारा जाए।

मान सरोवर सुभर जल़, हंसा केल़ि कराह।
मुगताहल़ मुगता चुगै, अब उड अनत न जाह।।
मानसरोवर का सुंदर जल है, हे हंस यहाँ केलि करो, मुक्ता को चुगते रहो, अब उडके अनंत की तरफ प्रयाण मत करो।

किसी बात पर सरोवर और हंस के बीच मनमुटाव हो गया है। दोनों ही गुणी और सज्जन है। साधुता और शुचिता के प्रतीक है। उनके संवाद में प्राचीन लोक कवियों नें इतनी सारगर्भित और विचारणीय बातें रखी है कि हमारा मन उन भावों को पढकर सुनकर, गदगद हो जाता है। कभी कभी कवि स्वयं उन दोनों के मनमुटाव को दूर करवानें की कोशिश भी करता है और नसीहत या सीख दोनों को देता है।

हंसो ऊमण दूमणो, बैठो वदन छिपाय।
कै तौ जोड़ो बिछड्यौ, कै सर गयौ सुखाय।।
आज हंस मन से अप्रसन्न है खिन्न है। मुँह छुपाकर बैठा हुआ है। या तो उस की जोड़ी बिछुड गयी है या फिर सरोवर सूख गया है (सरोवर के स्नेह में कमी आ गयी है। )

सरवर केम उतावल़ो, लांबी छोल़ न लेह।
आयां छां उड़ जावसां, पंख पसारण देह।।
हंस सरोवर को कहता है “हे सरोवर आज तुम इतने बदले हुए और उतावले क्यूं हो? अपनी बडी बडी लहरों से मेरा तिरस्कार मत कर। मुझे जरा पंख तो पसारने दो। आया हूं तो उड भी जरूर ही जाउँगा। “

हंसा सरवर न तजो, जे झल़ खारो होय।
डाबर डाबर डोलतां, भलो न कहसी कोय।।
कवि हंस को संबोधित करते हुए कहता है। हे हंस !सरवर को त्याग के मत जाओ?भले सरोवर का जल खारा हो गया हो?या सरोवर के स्नेह में कुछ कमी आई हो?अगर तुम छोटे छोटे पोखरों के पास जाऔगे तो तुम्है कोई भला नहीं कहेगा?

हंसा समद मनायले, जे जल ओछो होय।
डाबर डाबर डोलतां, भलो न कहसी कोय।
कवि हंस को संबोधित करते हुए कहता है “हे हंस तु सरोवर को कैसे भी मनाले भले ही उसके पास पानी (संसाधनों) की कमी हो। पोखर पोखर भटकनें पर तुम्है कौन अच्छा कहेगा?”

लगता है हंस को कुछ ज्यादा ही बुरा लग गया है सरोवर की बात से। तभी तो वह कहता है।

जा जल़ पाछौ जाव तूं, तुझ मुझ रहौ न संग।
कडवा बोल्या बापड़ा, फेर न मिल़सी अंग।।
हे ! सरोवर के जल! तुम वापस चले जाऔ। अब तुम और हम साथ नहीं रह सकते। तुम ने मेरे दिल को आहत करने वाली कड़वाहट भरी बात कहदी है। अब मेरा शरीर आप से उसी आत्मीयता से नहीं मिल सकता।

अवर घणा ई आवसी, चिड़ी, कमेड़ी, काग।
हंसा फेर न आवसी, रे सरवर निरभाग।।
कवि बीच बचाव करते हुए सरोवर को हंस की महत्ता से अवगत करवाता है। वह कहता है। “अरे अभागे सरोवर!यहाँ तुम्हारे पास चिड़ीया, कमेडी और काग जैसे पक्षी तो खुब आएगें। पर अगर हंस रूठ कर इस सरोवर को त्याग देगा तो वह तुम्हारी चौखट पर कभी पलटकर वापिस नहीं आएगा। उसे बेहतर है कि मना लिया जाए।”

सरवर हंस मनायले, नेडा थका बहोड़।
जिण सूं लागां फूटरा, तिण सूं नेह न तोड़।।
कवि सरोवर को नसीहत देते हुए फिर एक बार हंस को मनाने की कोशिश करने हेतु आग्रह करता है। “हे सरोवर! गुणी हंस को जितनी जलदी हो सके मना ले। जिस हंस से तुम्हारी सुंदरता को चार चांद लगते है उससे स्नेह को मत तोड़।”

हंसा जहि गय तहि जगय, महि मंडणा हवंत।
छेरी ताह महासरां, जे हंसा मुच्चंत।।
कवि कहता है हंस जहाँ मन मानता है वहाँ ही जाता है और वहाँ जाने पर उस जगह की शोभा बढ जाती है। मन न होने पर वह मानसरोवर को भी वह त्याग देता है।

हंसा अपणी डार नें, छोड कठे न जाय।
दुख में आडा आवसी, और न कोई आय।।
कवि कहता है “हंस अपनी डाल को छोड कर दूसरी जगह कभी भी नहीं जाते। (अपना आश्रय स्थल कभी नहीं छोडते)। दुख में यही है जो हमारे सहभागी बनेंगे, और कोई सहभागी नहीं बनेगा। “

जावौ तो बरजूं नहीं, रैवौ तौ आ ठौड़।
हंसा रे सरवर घणा, सरवर हंस करोड़।।
सरोवर हंस को कहता है। “आप जा रहे हो तो मैं आप को हरगिज रोकने वाला नहीं हूँ। रहना है तो यह जगह आप के लिए ही है। हंस को सरोवर बहुत मिल जाएगें तो सरोवर के लिए भी हंसो की कमी नहीं है।” (किसी गुणी के वहाँ से प्रतिभा के पलायन पर कितना सटीक है यह दोहा)

आवतडा पालूं नहीं, जातां लाउं न मोड़।
हंसा रे सरवर घणा, सरवर हंस करोड़।।
सरोवर कहता है। आप का कभी जी करे वापिस आने को तो मैं कभी आप को आने से मना नहीं करूंगा। और जाने वाले को कभी भी नहीं रोकूंगा। हंस को सरोवर बहुत मिल जाएगें तो सरोवर को भी हंस बहुत ही मिल जाएगें।

हंसा उड सरवर गया, मूंघा मिल़े न मोल।
अब दिन कटणी कीजिए, बुगलां ही सूं बोल।।
कवि कहता है, हंस सरोवर से उड़ कर चला गया। अब ऐसे गुणी मोल भाव करने पर भी मिलने से रहे! अब बुगलों से बतियाकर दिवस व्यतीत कीजिए।।

पाल़ कहे रे सायरा!, लागै आज बुरोह।
मैं हँस ने हंसता कह्यौ, जातो रह्यौ परोह।।
हंस चला गया उस बात का पछतावा सरोवर के पुलिन को भी हो रहा है। वह कहता है, हे!सरोवर !मुझे बहुत ही बुरा लग रहा है। मैंनें हँसते हँसते मजाक में हंस को बोला था वह तो सचमुच मुझसे रूठकर सरोवर छोड़कर ही चला गया।

क्रमश:

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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