🌺हंसा इती उतावल़ कांई🌺

प्रमुख स्वामी महाराज को शब्दांजली

rajhans
हंसा! इती उतावल़ कांई।
गुरुसा !इती उतावल़ कांई।।
बैठौ सतसंग करां दुय घडी,लेजो पछै विदाई।

उडता उडता थकिया व्होला, राजहंस सुखदाई।
जाजम ढाल़ी नेह नगर में, माणों राज! मिताई।।१

मोती मुकता चुगो भजन रा, मनोसरोवर मांई
पांख पसारे, बैठो पाल़े, तोडो मत अपणाई।२
नीर-खीर रा आप विवेकी, इण जग कह्या सदाई।
सोगन है लूंठा ठाकर री, आज रुको गुरूराई ।।३
धूप दीप नैवेध धरूंला, चंदन तिलक लगाई।
आप रीझावण करूं आरती,नित मन मंदिर मांई।४
अनहद थोंरो थें अनहद रा, इण में भेद न कांई ।
तो पण हंसा !करो उतावल़, ठीक नहीं ओ सांई।५

हंसा थोंरे लारे हालूं , पंख नहीं पण पाई।
“नरपत” सूं तोडो मत प्रीति, रखो चरण शरणाई।।६

~~©वैतालिक

PramukhSwami

 

बोचासण वासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामी नारायण (BAPS) के प्रमुख स्वामी आज दि. १४ अगस्त २०१६ को ब्रह्मलीन हो गए| प्रमुख स्वामी महाराज का जन्म वड़ोदरा जिले के चाणसद गाँव में हुआ था| वे शास्त्री महाराज के शिष्य बने और १० जनवरी १९४० को नारायणस्वरुप दासजी के रूप में उन्होंने अपना आध्यात्मिक सफ़र शुरू किया| वर्ष १९५० में मात्र २८ वर्ष की आयु में ही उन्होंने BAPS के प्रमुख का पद संभाला|

साथियो, कवि सचमुच मनमौजी और हृदय सम्राट होता हैं और जब किसी रचना को वह हृदय से बनाता हैं तो सचमुच उसमें प्राण फूंक देता हैं।

“वैतालिक, नरपत आसिया” की ऐसी ही कालजयी रचना उन्होने अपने गुरू श्रद्धेय संत स्वामी के देवलोक गमन पर बनाई हैं। इस रचना को मैने कल ही पहली बार सुनी और आठ दश बार सुनी। नरपत सा की इस श्रद्धाजंली को स्वर गुजरात के गायक हेमन्त चौहान ने दिया है।

इसको सुनकर जो अहसास मुझे हुआ, वह कवि का भाव थे या नहीं, यह तो नहीं बता सकता, लेकिन स्वयं द्वारा जो अनुभूति हुई उसे आपसे शेयर अवश्य करना चाहूंगा।

कोई भी साधना गुरू कृपा के बिना सफल नहीं हो सकती, डिगल जैसी साधना और नरपत जी जैसा साधक सचमुच युगो बाद मिलते हैं।

शिष्य जब आत्मलीन होता हैं तो गुरू और शिष्य एकाकार हो जाते हैं। यह रचना भी गुरू के प्राण शरीर से अलग होते ही उसके लिए मन-मनुहार कर रोकने का प्रयास किया।

संबोधन गुरू के हंसा (प्राणों) को करते हुए, “हंसा! इती उतावल कांई।” शिष्य जान चुका हैं हंसा निकल कर रवाना हो चुका हैं इसलिए शिष्य की बात सुनने की प्रार्थना ही इसका मुखड़ा हैं।

गुरू से हमेशा सत्संग में लीन और प्यासे देखा हैं तो उनके मन की ही मनुहार कि-
बैठो सत्संग करां दुय घड़ी, लेजो पछै विदाई

इससे भी जब हंसा नहीं रूका तो गुरूजी की वृद्ध शरीर और सुकोमल दैह को याद करके कवि उनके अधिक उड़ने से थके हो जाने की याद दिलाते हुए हंसा से-
उडता उडता थकिया व्होला, राजहंस सुखदाई,

हंसा फिर भी अपने मार्ग आगे बढता देख व्यथित कवि मन के नेह नगर में जाजम पर कुछ पल इतने दिनों की मिताई को याद दिलाते हुए मानने के लिए फिर विनती करता हैं-
जाजम ढाली नेह नगर में, माणो राज ! मिताई।।”

हे हंसा तुम्हें भी मोती तो पसंद हैं ना ?, फिर आज तुम मन सरोवर में भजन रूपी मुक्ता को छोड़कर, निर्मोही की तरह क्यों उड़ा जा रहा हैं यहीं भाव वंदना इस पंक्ति में की है:-
“मोती मुगता चरो भजन रा, मनोसरोवर मांई, “

हे हंसा, तुम इन मोतियों को चुगने के बहाने ही सही, थोड़ी देर तो इसकी पाल़ पर पंखों को विश्राम दो और अपने इतने दिनों की अपणायत को एकदम नहीं तोड़ने की फिर प्रार्थना गुरू हंसा से की :-
“पांख पसारे, बैठो पाल़े, तोड़ो मत अपणाई”।

गुरू भी हंस के समान जैसे दूध और पानी को अलग करने की खासियत हैं, ठीक वैसे ही आप इस संसार रूपी सरोवर के हंस बनकर, हमें भी विवेक की यह शिक्षा देने की विनती इस आगे के शब्दों में :-
“नीर-खीर रा आप विवेकी, इण जग कह्या सदाई”।

इतनी मान मनुहार भी पर भी गुरू हंसा जब रूकने को तैयार नहीं हुआ तो कवि लूंठा ठाकर (ईश्वर) की शपथ देते हुए रूकने की करूण अरदास करते हुए कहता हैं :-
“सोगन है लूंठा ठाकर री, आज रुको गुरूराई”।

हे हंसा ! अगर अब भी तुम नहीं रुकना चाहते तो मुझे आखिरी बार धूप दीप करके चंदन का तिलक तो लगाने दो, इसलिए इतनी उतावल मत करो-
“धूप दीप नैवेध धरूंला, चंदन तिलक लगाई”

इतना ही नहीं, हे (गुरू) हंसा, मैं आपकी आरती अपने मन मंदिर में हमेशा करुंगा, इस लिए थोड़ी देर तो रुक जाओ-
“आप रीझावण करूं आरती, नित मन मंदिर मांई”।

हे गुरू हंसा, अब में जान चुका हूं आप भी ईश्वर के ही एक रूप हो, और आप दोनों में अब कोई भेद नहीं रह गया हैं इसलिए अब मुझे शिष्य नहीं तो एक अपना भक्त मानकर भी हे प्रभु ! थोड़े दर्शन तो दे दो :-
“अनहद (थोरों) थें अनहद रा, इण में भेद न कांई”।

अब जब मैं आपको जान चुका हूं हे गूरू हंस कि ईश्वर के ही रूप हो, फिर भी इतनी उतावल कर रहे हो, यह बात ठीक नहीं हैं-
“तो पण हंसा ! करो उतावल़, ठीक नहीं ओ सांई”

आखिर हंसा के लाख विनती करने पर भी थोड़ा भी नहीं रूकने पर कवि खुद की पीड़ा इस प्रकार प्रकट करता हैं कि-
“हंसा (थोंरे) लारे हालूं, पंख पण नहीं पाई”।

आखिर में कवि नरपत यह विनती करता हैं कि हे गुरूदेव ! मुझसे आप कभी प्रीति मत तोड़ना और मुझे अपना परम शिष्य समझते हुए, अपने चरण-शरण में रखना:-
“नरपत”, सूं तोड़ो मत प्रीति, रखो चरण शरणाई”।

ऐसी कालजयी रचना के रचनाकार श्री नरपतदान आसिया ‘वैतालिक’ ने अपना चारण धर्म निर्वहन करते हुए, गुरू को अपने शब्दों द्वारा जो कालजयीं श्रद्धांजली दी हैं यह इस युग की एक महान और श्रेष्ठ रचना साबित होगी।

इस अमर रचना को अपना स्वर देकर संजीव बनाने वाले श्री हेमंत चौहान भी आने वाले समय में इस स्वर को विश्व पर जन जन के प्रिय और प्रसिद्धि का आसमान छू लेंगे।

इस अमर श्रद्धा कृति के लिए आज समस्त चारण समाज गौरवान्वित हैं।

शुभेच्छूक :-जगदीश दान कविया, राजाबंध, बिराई।

One comment

  • नगेन्द्र सिंह लालस

    “अद्धभुत रचना की अनुपम व्याख्या “

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *