हिंद की राजपुतानीया – कवि दुला भाया “काग”

यह रचना हिंदी, गुजराती, चारणी भाषा मे है, जिसमे हिंदुस्तान की राजराणी व क्षत्रियाणी का चित्र है, उसका वर्तन, रहेणीकहेणी, राजकाज मे भाग, बाल-उछेर और शुद्धता का आदर्श है. उसका स्वमान, उसकी देशदाझ, रण मे पुत्र की मृत्यु की खबर सुन वो गीत गाती है, पुत्र प्रेम के आवेश मे उसे आंसु नही आते, लेकिन जब पुत्र रण से भागकर आता है तो उसे अपना जीवन कडवा जहर लगने लगता है, उसका आतिथ्य, गलत राह पर चढ़े पति के प्रति तिरस्कार, रण मे जा रहा पति स्त्रीमोह मे पीछे हटे तो शीष काटकर पति के गले मे खुद गांठ बांध देती है. फिर किसके मोह मे राजपूत वापिस आये?

उसके धावण से गीता झरती है, उसके हालरडे मे रामायण गूंजती है, भय जैसा शब्द उसके शब्दकोश मे नही है. उसका कूटुंबवात्सल्य., सास-ससुर और जेठ के प्रति पूज्य भाव, दास-दासी पर माता जैसा हेत लेकिन बाहर से कठोर, पति की रणमरण की बात सुन रोती नही अपितु घायल फौज के अग्र हो रणहांक गजाती है. एसी आर्यवर्त की राजपुतानी भोगनी नही, जोगनी है. राजपुतो मे आज एसी राजपुतानीयो के अभाव से काफी खोट पड गयी है…इसी बात का विवरण इस रचना मे है…

रंगम्हेल मे बानियां बो’त रहे,
एक बोल सुने नही बानियां का,
दरबार मे गुनिका नाच नचे,
नही तान देखे गुनकानियां का,
नरनार प्रजा मिली पांव नमे,
नही पांव पेसाराय ठानियां का,
जग जिनका जीवन पाठ पढे,
सोई जीवन राजपुतानियां का…..(1)

व्याभिचार करे दरबार कदी,
घरब्हार करी धमकावती थी,
फिटकार सुनावती जिंदगी मे,
फिर नाथ कही न बुलावती थी,
पति जार को आप रिझावती ना,
जगतारक राम रिझावती थी,
एसा पावन जीवन था जिनका,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(2)

अरि फौज चडे, रणहाक पडे,
रजपुत चडे रजधानियां का,
तलवार वडे सनमुख लडे,
केते शीश दडेय जुवानियां का,
रण पुत मरे, मुख गान करे,
पय थान भरे अभिमानियां का,
बेटा जुद्ध तजे, सुणी प्राण तजे,
सोई जीवन राजपुतानियां का…..(3)

रण तात मरे, सुत भ्रात मरे,
निज नाथ मरे, नही रोवती थी,
सब घायल फोज को एक करी,
तलवार धरी रण झुझती थी,
समशेर झडी शिर जिलती थी,
अरि फोज का पांव हठावती थी,
कवि वृंद को गीत गवावती थी,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(4)

निज पूत सोते बाल पालने मे,
रघुनाथ के गायन गावती थी,
कही ज्ञान गीता समजावती थी,
भय मोत का साथ भूलावती थी,
तलवार धरी रन झुझने का,
रन दाव का पाठ पठावती थी,
घर अंबिका थी, रण कालिका थी,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(5)

अभियागत द्वार पे देखती वे,
निज हाथ से थाल बनावती थी,
मिजबान को भोजन भेद बिना,
निज पूत समान जिमावती थी,
सनमान करी फिर दान करी,
चित्त लोभ का लंछन मानती थी,
अपमानती थी मनमोह बडा,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(6)

नृप ताज मे जिनकी लाज बडी,
राजकाज में ध्यान लगावती थी,
प्रजा सुख रहे, नव भूख रहे,
एसा बोल सदा फरमावती थी,
सब रैयत की फरियाद सुनी,
फरियाद की दाद दिलावती थी,
निज रीत के गीत गुंजावती थी,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(7)

रण काज बडे, रजपुत चडे,
और द्वार खडे मन सोचती थी,
मेरा मोह बडा, ईसी काज खडा,
फिर शीश दडा जिमी काटती थी,
मन शेश लटा सम केश पटा,
पतिदेव को हार पे’नावती थी,
जमदूतनी थीं, अबधूतनी थीं,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(8)

पति देव के तातकों मातकों तो,
निज मातपिता मम मानती थीं,
छोटे भ्रातकें हितकीं मात समी,
पितराइयो को पांख में राखती थीं,
दासीदास पें मात का रोफ रखे,
उसे घात की बात न दाखती थीं,
नही भोगनी थीं, जगजोगनी थीं,
सोई हिंद की राजपुतानियां थी…..(9)

आज वीर कीं, धीर कीं खोट पडी,
पडी खोट उदारन दानियां कीं,
प्रजापाल दयाल की खोट पडीं,
पडी खोट दीसे मतिवानियां कीं,
गीता ज्ञान कीं, ध्यान कीं खोट पडीं,
पडी खोट महा राजधानियां कीं,
सब खोट का कारन ‘काग’ कहे,
पडी खोट वे राजपूतानियां कीं…..(10)

~~कवि दुला भाया “काग”

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