होली के कुछ दोहै

सरहद पर गोली चली, धरती होली लाल|
होली पल पल खेलता,भारत माँ का लाल||१
रे भोली ब्रजबालिका, होली काहै लाल|
होली में ब्रजलाल नें, तन जो मला गुलाल||२
मैं भोली नादान बन,होली उसके साथ|
उसने मौका ताड की,चोली पर बरसात||३
होली वह उसकी सखी!,इस होली के संग|
भोली सी ब्रजगोपिका, रंगी श्याम के रंग|।४
होली की शुभकामना,सादर कर स्वीकार|
हम पर अनुग्रह कीजिए,छोड रंग की धार||५
रंग लहू का एक सा,फिर काहै की जंग।
मजहब, जाती भूलजा,कर होली हुडदंग।।६
यह बहुरंगी देश है, नवरंगी परिधान।
सतरंगी त्यौहार ही,है भारत की शान।।७
कोमल कर से कान्ह नें,गाल छुआ ब्रजबाल।
लाल लाल वह हो गई,बिना अबीर गुलाल।।८
होली आते ही मुझे, लगे सोलवा साल।
मन अल्हड होता सखी,तन ज्यों लगे गुलाल।।९
रंग सभी के धुल गये, सबने धोये अंग।
राधा मीरा ही रही,रंगी श्याम के रंग।।१०
होली होली है खतम, रंग रीते है यार।
पढें सूर रसखान औ,मीरां फिर इक बार।।११
रंग बदलते लोग है,पल पल जग मैं यार।
मीरा नरसी सूर ही,रहै सदा इकसार।।१२

‪~~नरपत दान आवडदान आसिया “वैतालिक”

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