हुकम!ओ ई चंदू रो भतीजो है!!

कोई पण आदमी जिण रेत में रमै कै जिण कुए सूं काढ पाणी पिवै उणरो असर कदै ई जावै नीं-

जैड़ो पीवै पाणी! बैड़ी बोलै वाणी!!
जैड़ो खावै अन्न! बैड़ो होवै मन्न।।

इणगत रा पुराणा दाखला आपांरी मौखिक बातां अर ख्यातां में पढण अर सुणण नै मिल़ै। ऐड़ी ई एक रेत अर पाणी रै असर री मौखिक कहाणी सुणणनै मिल़ी जिकी आप तक पूगती कर रैयो हूं।

पोकरण रो गाम माड़वो आपरी वीरत अर कीरत रै पाण चारण समाज में ई नीं अपितु दूजै समाजां में ई चावो रैयो है। एक समय ऐड़ो रैयो कै ओ गांम चारणाचार रो गढ गिणीजतो। आफत में दूजै चारणां अर केई राजपूतां इण गांम री मदत ली। बीकानेर रै गांम खारी माथै बीकानेर राज रो कोप होयो अर गांम खोसीजण री नौबत आयगी जद मेहडू, माड़वा आया। उण बखत माड़वै वाल़ा खारी गया अर धरणै री त्यारी हुई। जद लोगां दरबार नै जाय कैयो कै “माड़वै रा चारण आया है ! मरणो उणां रै सारू सहज है।” आ सुण दरबार आदमी मेल चारणां नै धीजो दियो कै थांरै साथै कोई अन्याय नीं होवैला।

इणी गांम में जैसल़मेर रै कोप सूं बचण सारू राजगढ रै भाट्यां सरण ली।

रजवट (साहस, वीरता) नै रुखाऴण वाऴी इणी धरा माथै मेहरदान धरमावत होयो, जिण जैसऴमेर महारावऴ रणजीतसिंह रै साम्ही स्वाभिमान कायम राखियो अर ‘गड़सीसर’ ताऴाब माथै तेलिया कर चारणाचार नै ऊजऴ कियो-

जाय जैसाणै ऊपरै, जुड़ियो महपत जंग। 
अमलां वेऴा आपनै, रेणव महरा रंग।।

ऐड़ै चारणां रै पाण इणां री चारित्रिक विशेषतावां बतावतां मंगऴैजी दमामी(सिहू) सही ई लिखियो है-

मालम खंडां रखण मरजादा, 
वीर धीर व्रतधारी। 
मिजलस मौड़ गुणां रा मांझी, 
भड़ जीतण जुद्ध भारी।।

ऐ बधतायां इण माटी री तासीर में ही सो इण सगऴी अंजसजोग कथावां नै सुण-सुण र कीकर उठै रै मिनखां री मानसिकता सुदृढ होई इणरो एक किस्सो इण महापुरुषां री परवर्ती पीढी मांय सूं देवूं। वीदाजी सिंढायच री वंश परंपरा में शंकरदानजी होया अर शंकरजी रै चुतरोजी। चुतरैजी रै तीन बेटा 1-भोमजी, 2-सूरजमाल, 3-धनजी।

उण बगत पोकरण रा ठाकुर मंगऴसिंहजी चांपावत हा। मंगऴसिंहजी प्रजा हितैषी अर प्रभावशाली ठाकुर हा-

इलम घराणै अकल रो, जस कर थाकै जीह।
मुरधर में चांपां मुगट, ओ तो मंगऴसींह।।
~~फतहकरणजी ऊजऴ

उण बगत गोमट रो तैयबखां गोमटियो पोकरण ठिकाणै में किणी महताऊ पद माथै हो, जिको माड़वै रै मुसल़मानां रै परणियोड़ो होतो। उल्लेखजोग है कै आधो माड़वो पोकरणां रो अर आधो चारणां रो हो। माड़वा रो कुवो ‘मोड’ जिण माथै दोनूं पाणी पीवता। चूंकि माड़वै री घणकरीक जमीन चारणां कनै ही अर ओ ‘मोड’ कुवो इणां री जमी में हो सो चारण घणो ऊजर लगावता। आ बात पोकरणां नै अणसावती लागती कै गांम म्हांरै दियोड़ो अर धणियाप चारण घणी करै। दूजा कोई होवता तो पोकरणा ई आपरो रूप बतावता पण अठै रा चारण तो खुद ई बलाय रा बटका। इण पूरै भांयखै रै चारणां री ओऴखाण देतां सीतारामजी वीठू सींथऴ-साठीका आपरै एक गीत ‘ठिरड़ै री सोभा’ में चोक रै सलजी पोकरणै रै मूंडै बताई है। इण में सलजी पोकरणा, बीकानेर रै चारण नै भलपण री मूरत अर ठिरड़ै रै चारणां नै टांटियां रो छत्तो बतायो है–

वाह ! वाह ! रे चारण वाह!, 
सतजुग बहै तांहझै साथ। 
म्हांझा पात कऴू री माखी, 
छेड़्यां छिड़ै टांटियां छात!!
वाह! वाह! रे बारठ वाह!, 
दरसण कीनां भूख दुरै। 
म्हांरा चारण कऴै मचाड़ा, 
फुरतां साम्हा पैल फुरै!!

ऐड़ै टांटियां रै छतै में कुण हाथ घालै सो पोकरणां खुद तो कोई घणो विरोध नीं कियो पण ऊंधा-सूंवा दाव लगावता रैया।
उण बगत कीं ऊंधी-सीधी ऐड़ी परंपरावां होती कै लोग उणांरो पाल़ण दृढता सूं करता। ऐड़ी ई एक मानसिकता ही कै उण बगत मुसलमानां सूं आभड़छोत (छूवाछूत) राखता। चूंकि मुसलमानां रो सीधो राज में पासो हो अर कीं पोकरणां सीखाया-
“कै थे सीधो ‘नाऴयार’ (कुए से निकल़ा चड़स जिस जगह खाली हो) सूं पाणी भरलो! चारण कुण होवै मना करणिया?”

जोग सूं उण बगत तैइबखां री घरवाऴी आपरै पीहर आयोड़ी ही सो उणनै आगै करी। बा ई आपरै धणी रो गाढ बतावण सारु कुए पूगर बिनां किणी झिझक रै ‘नाऴयार’, में सीधो घड़ो भर लियो। ठिकाणै री धाक सूं उठै ऊभो कोई मिनख बोलियो नीं पण धनजी चुतराणी सूं आ अजोगती बात सहन नीं होई। उणां आव देखियो अर नीं ताव, आपरै कनै डांग ही सो एक दी घड़ै रै, जिणसूं घड़ो फूटग्यो। लुगाई रीस में तमतमायोड़ी सीधी पीहर रै घरै नीं पूगर भिज्योड़ी ई सीधी पोकरण पूगी अर सारी हकीकत आपरै धणी नै कैयी। तैइबखां सीधो ठाकुर साहब कनै जाय, धनजी री शिकायत करी अर दंडित करण सारु जोर दियो। ठिकाणै सूं हलकारो पूगियो अर धनजी नै कैयो कै अबार रा अबार ठिकाणै में हाजर होवो। एकर तो धनजी ठिकाणै में हालण सूं मना कर दियो पण जद उणांरै भाई भोमजी कैयो कै “धणी रो कैयो नीं टाऴणो, आपां सामधर्मी हां! इंयां कोई ठाकुर खावै नीं, अर जे ऐड़ी कोई बात बणै तो पछै तूं ई चारण है! चारणपणो बतावजै!”

आ बात सुण र धनजी अजेज एक हाथ में कटारी अर एक हाथ में डांग लेय, सीधा हलकारै साथै पोकरण पूगा। ठाकुर साहब साम्हा हाजर होया। ठाकुर साहब खरी मीट सूं जोयो अर पूछियो-
“धनजी थे हो?”

“हां हुकम ! हूं धनो चुतराणी।”

“बारठजी ऊंचो घणो थूको, ठिकाणै रै चाकर री लुगाई रो ई घड़ो फोड़ाय दो, इतरा कांई खावणा अर अपरबल़ी हो?”

ठाकुरां पूछियो तो धनजी निशंक कैयो “हुकम! गाम म्हांरो र म्हांरै बाप-दादै रो ! उठै रो धणी तो हूं ईज हूं ! आप नीं ! आ तो लुगाई ही ! म्हांरी छोरी ही ! जणै घड़ै सूं धिका दियो नींतर अठै बाकी ई ऊधार कठै?”

आ बात सुणर ठाकरां नै ई रीस आयगी, उणां पूछियो-
“आप इंयां घड़ो कीकर फोड़ियो?”

जोग सूं उठै एक टिमची माथै मटकी भर्योड़ी पड़ी ही सो धनजी बिनां किणी सूं डरियां आपरी डांग सूं मटकी रै बाही अर कैयो-
“इंयां फोड़ियो हुकम!” ठाकुर साहब तमतमार उठिया जितै उणांनै किणी कान में कैयो “हुकम! बलाय है! जावण दो! ओ चंदू रो भतीजो है! मोत तो तेवड़ियां बैवै।”

ठाकुर ई चंदू रै जमर अर उण जमर सूं पोकरण ठिकाणै नैं होयै हाण अर अपकीरत सूं परिचित हा। उणांनैं बात याद आवतां ई रीस बुझगी अर कैयो-
“कोई बात नीं! आप जावो! आगैसर ऐड़ी कालाई नीं करोला!! हमकै कोई ऐड़ी भोपा-डफरी की तो म्हारै सूं भूंडो कोई नीं होवैला!! जावो।”

धनजी कैयो – “हुकम ! म्है कांई अरज करी कै ओ गांम म्हारो तो मतलब नाम ई म्हारो। म्हां खातर ई तो चंदू लीला हाड होमिया। लागै आपनै पांतरो पड़ै!! अजै तो वे खीरा ई सजल़ है। इंयां नीं जावूं अठै सूं ! आपरै हाथ रो रुको लिखर दिरावो कै आजसूं आगै ‘मोड’ माथै चारणां री मर्जी बिनां कोई मुसलमान घड़ो तो कांई पाणी ई नीं पी सकैला।”

लोगां कैयो, “टाल़ो हुकम ! इण बलाय नै ! लिखदो, नीतर कोई अजोग हो जावैला।”

ठाकरां एक रुको बणा र दे दियो, जिणरी पाल़णा देश री आजादी तांई होवती रैयी। इण बात सूं राजी होय माड़वै रै लिछीरामजी नाई एक दूहो कैयो-

चुतराणी चित ऊजल़ा, भोम भलो कुल़ भाण।
सूरजमल सतवादियो, धनपत देश दीवाण।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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