हुलसाया-मन-हंस

स्वर्णाभा बिखरी सुखद, अद्भुत नभ अभिराम।
लगता है वो आ रहा, फिर से मन के धाम।।१

नीला, अरुणिम, गेरूआ, श्याम श्वेत अरु लाल।
सूर्य क्षितिज के थाल से, रहता रंग उछाल।।२

प्रत्यूषा आई पहन, तुहिन-बिंदु-मणि माल।
जली शर्वरी देख यह, चली भृकुटि कर लाल।।३

सप्तपदी की ले शपथ, भरा मांग सिंदूर।
प्राची का लो कर रहा, रवि घूंघट पट दूर।।४

तुहिन खचित मणि मेखला, रचित महावर भाल।
प्रत्यूषा ;को चूमता, पूषा !प्रात: काल। ५

हरी मखमली दूब पे, बैठ ; सुला निज अंक।
सहलाती रवि रश्मियाँ, प्रत्यूषा पर्यंक।।६

पहने अरुणिम ओढनी, प्रिया! उषा है पार्श्व।
नभ विहार करने चले, सूर्य !रथिन-सप्ताश्व। ७

दूर्वा ने निज मध्यमा, में पहना वेदूर्य।
सुबह सुबह यूं ओस में, प्रतिबिंबित है सूर्य।।८

कुश-कांची;खग पैजनी, ओढे अरुणिम चीर।
प्राची नाची मुदित मन, गावत कोकिल कीर।।९

चौसर खेलत ज्यों परी, पहने नौसर हार।।
हरी दूब पर खूब यूं, झलके बुंद तुषार।।१०

दूब-घृताची, तुहिन-घृत, द्विज कुल कलरव गान।
“ओम घृणि सूर्याय ” रट, करते रवि आह्वान।।११

निशा-निबिड़ गजराज की, कर मृगया मुख डाल।
सूर्य सिंह चलने लगा, अंबर वन कर लाल।।१२

हंस-सिंह ने व्योम-वन, तम-गज कर विध्वंस।
दूर्वा सर ;भर तुहिन मणि, हुलसाया मन हंस।।१३

लो चकवा चकई हुए, विरह निशा से मुक्त।
सूर्य-दीप, नभ स्नेह-घृत, जला; हुआ उपयुक्त।।१४

रोम-दूब पर तुहिन बन, करत रास रति रंग।
तरणि धरणि दो है मिले, अंग अंग प्रति अंग।।१५

सद्य यौवना षोड़सी, दूब तुहिन कुच भार।
अल्हड़ कर अटखेलियां, रवि से करती रार।।१६

मेघ-धूम्र, अरुणिम-लपट, तम-वन, दहन कृषानु।
प्रगट भये लो क्षितिज पर, भोर समय श्रीभानु!।।१७

नव प्रभात, नव किरण, नव-तुहिन बिंदु नव भर्ग।
कुश तमाल पर रच रहा, रवि कल्पक नव सर्ग।।१८

शीतल मन्द बयार से, तुहिन सु मंडित पत्र।
रवि-बिंबित यूं डोलते, ज्यूं मणि-धर-अहि-छत्र।।१९

सूर्य-रूप नवदीप भर, क्षितिज वर्तिका स्नेह।
करै उजाला निज निकर, नवल उषा नभ गेह।।२०

वार, मास, ऋतु, राशि ग्रह, योग करण नक्षत्र।
इन सब पर शाशन करें, आदिदेव! इकछत्र।।२१

वाचिक; आंगिक; भंगिमा, कथा, गल्प, रस, कथ्य।
खग-कुल को आ सुबह रवि, सिखलाता नेपथ्य।।२२

त्रासक-कालिय-अहि-तिमिर, अंधक नाशक अंश।
व्योम प्रशासक जगत-विभु, हरि हर ही है हंस।।२३

तुहिन मुकुर निज बिम्ब लखि, उदित उदयगिरि मित्र!
किरण तूलिका कर पकड़, रचै स्वयं का चित्र।।२४

भोर समय नित भव्यतम, तमहर लखि चहुॅ ओर
ओ!रसस्पर्शी मधुप-मन!, मन कर भाव विभोर।।२५

नील सरोवर गगन बिच, आभा अरुण प्रवाल।
भोर समय रवि यूं खिले, ज्यूं नव-कंज-मृणाल।।२६

व्योम-सरोवर, क्षितिज-तट, बदली ज्यों जल वीचि।
खिले फुल्लदल कोकनद, चारु सुबाल मरीचि। २७

जपाकुसुम संकाश वपु, अंबुज-वदन-उजास।
आए रवि रितुराज बन, पग पग खिले पलाश।।२८

नील-क्षितिज आभा नवल, धवल मेघ नवनीत।
ले कर आए कान्ह रवि, पहन सुअंबर पीत।।२९

करत भोर, कलशोर-खग;-वैतालिक उद्गीथ।
सुभट सूर्य जीता सखे!, नत-शिर हुआ निशीथ।।३०

नवल धवल घन पहन पट, विमल विभा अवतंश।
भोर भव्य सौदामिनी, हुई प्रकट ले हंस।।३१

शीतल मलयानिल सुखद, रम्य सु खग रव मंद्र।
ललित हंस-ध्वनि कर श्रवण, गये गेह निज चंद्र।।३२

निखरा नभ शुभ भोर में, दीप्त स्वर्ण रवि वर्ण।
अरु बिखरा वन तुहिन बन, पर्ण पर्ण पर स्वर्ण।।३३

दूर्वादल पर तुहिन के, मुक्ता, रत्न, हिरण्य।
लो बिखेर रवि जौहरी, प्रतिदिन करता पण्य।।३४

मरु सिक्ता कण स्वर्ण पर, तुहिन सुमंडित फोग।
पर बिंबित हो रवि करै, हेम-रत्न शुचि योग।।३५

नमी शबनमी दूब पर, तृण तृण स्नेह तड़ाग।
झिल मिल दीपक जल उठे, सुन रवि दीपक राग।।३६

स्तंभ सघन तम नभ क्षितिज, जगत सुपुत्र कयाधु।
त्राण हेतु अवतरित रवि, शत शत नरहरि साधु!३७

घुघरारै कच मेघ अरु, धूलि धूसरित गात।
बाल सूर्य को मां अदिति, पय-पाती उठ प्रात।।३८

वन;गिरि;उपवन धर चरण, उड़ा तुहिन तृणमूल।
ध्वंस तमस-गज को चले, सपदि सूर्य-शार्दूल!!। ३९

मलयानिल;तरु हरित अरु, आतप-रवि-उपभोग।
सुलभ हुआ लो सुबह में, अमृत सिद्धि सुयोग। ४०

विमल देह;आभा-वदन;भाल-लेप श्रीखंड।
आदि-तपस्वी;सिद्धि रत, ज्योति-पुंज;मार्तंड।।४१

सिंदूरी संध्या लगे, हल्के रंग गुलाल।
अल्हड़ सी नवयौवना, का रवि चूमे भाल।।४२

चारण, किन्नर, नाग, नर, यक्ष, देव, गंधर्व।
जन जन का उल्लास रवि, सकल जगत शुभ पर्व।।४३
~~©नरपत वैतालिक

*कठिन शब्दों के सरलार्थ*
प्रत्यूषा-सुबह, तुहिन-ओस, शर्वरी-रात्रि, पूषा-सूर्य, पर्यंक-पलंग, रथिन-रथवाले, सप्ताश्व-सात घोड़े, दूर्वा-दूब, मध्यमा-बीचवाली अंगुली, वेदूर्य-एक कीमती मणि, कुश-घास, कांची-करधनी, खग-पक्षी, प्राची-पूर्व दिशा, तुषार-ओस बुंद, घृताची-हवन में घी डालने का चम्मच, तुहिन-ओस, घृत-घी, द्विज-पक्षी, ब्राह्मण, मृगया-शिकार, हंस-सूर्य, हंस-हंस, तम-अंधकार, सर-सरोवर, तुहिन-ओस, स्नेह-तेल, स्नेह, तरणि-सूर्य, धरणि-पृथ्वी, कृषानु-अग्नि, भानु-सूर्य, भर्ग-चमकता, सूर्य, कल्पक-कवि, अहिछत्र-नाग का फन, मित्र-सूर्य, तमहर-सूर्य, मधुप-भॅवरा, प्रवाल-प्रवाल, मृणाल-कमलदंड, वीचि-तरंग, लहरें, कोकनद-कमल, मरीचि-सूर्य, जपाकुसुम-गुड़हल, संकाश-के समान, के जैसा, अंबुज-कमल, पलाश-ढाक, नवनीत-मख्खन, वैतालिक-स्तुतिगायक, चारण, उद्गीथ-सामगान, खग-पक्ष, निशीथ-रात्रि का कल्पित पुत्र, सुभट-शूरवीर, सौदामिनी-अप्सरा, दुर्गा, हंस-हंस, सूर्य, मंद्र-तीव्र स्वर (मंद्र सप्तक) , हंस ध्वनि-सूर्य की आवाज (एक मधुर राग) , गेह-घर, तुहिन-ओस, हिरण्य-सोना, पण्य-व्यापार सौदा

 

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